बौद्धिक अँधेरे में ज्ञान के चिराग
कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं
सदियों से अपनी जगह खडे बुत भी
लोगों को चलते नजर आ रहे हैं
जिनको नहीं दिखता उनको क्या कहें
जिनको दिखता है वही
हवा में अपने संदेश उडाये जा रहे हैं
इधर है ताज खङा
उधर है हिमालय अड़ा
एक को बनाया गरीब और
मजदूरों ने अपने ख़ून पसीने से
इस बात को जग भूला
दुसरे को सृष्टी ने खुद गडा
जिस पर होता है व्यापार
वहीं लोग अपने जज्बात
बेचने जा रहे हैं
विज्ञान ने की है इतनी तरक्क़ी
कि लोग अपने ज्ञान-चक्षुओं की
रोशनी खोते जा रहे हैं
कहैं दीपकबापू
कभी गर्मी की तीक्ष्ण धुप में जलते
कभी वर्षा की फुहारों में चमकते
कभी सर्दी में ठंड में दमकते
ताज में भला पहिये लग सकते हैं
पर लोग हैं कि लगाए जा रहे हैं
हम ज्ञानी हैं कि अज्ञानी यही
नहीं समझ पा रहे हैं
समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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