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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

May 16, 2010

वफा सस्ती कब थी-हिन्दी शायरी (vafaa sasti aur mahangi-hindi shayari)

वफा न कभी सस्ती थी
जो कहें अब महंगी हो गयी,
बाज़ार से हो गयी लापता बरसों से
खरीदने वालों की जो तंगी हो गयी।
दाम चुकाकर वफा खरीद सकते हैं,
पर उसके खालिस होने का नहीं दम भरते हैं,
जब जब कीमत का नकाब उतरा
तब असलियत नंगी हो गयी।
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कई अक्लमंद लगे हैं काम पर
दुनियां के आम इंसान जगाने के लिये,
इसलिये कोई दे रहा है खूनी तकरीर
कोई बांट रहा हथियार  लोगों में, लड़ने के लिये।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
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Apr 17, 2008

तस्वीरों को दिखाकर मत बहलाओ-हिन्दी शायरी

तस्वीरों को दिखाकर मत बहलाओ
जो छिपा रहे हो
पहले वह सच बताओ
आहिस्ता-आहिस्ता अपने शब्दजाल में
लोगों को फंसाने की कोशिश करते हुए
दूसरों की सोच को न भूल जाओ
सामने से सभी तस्वीरें
दिल को छू जातीं है
पर अपने पीछे से
कभी किसी को सूंदर नहीं लगतीं
इसलिये सामने ही लगायी जातीं हैं
शब्दों के अर्थ भी कई होते हैं
तुम खुद हो एक भ्रम में
दूसरों को न उलझाओ

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ऊंची इमारतों, होटलों और पार्कों की तस्वीर
नहीं होती किसी शहर की तकदीर
भूख, गरीबी और बीमारी की
बस्तियां सभी जगह होती हैं
जिन पर टिकी है शहर की चमक
गरीब के अंधेरे भी वहीं होतें
लिखें किसी शहर की तारीफ में जो शब्द
उसमें क्यों नहीं आया किसी गरीब का दर्द
यह तुम्हारी चालाकी है या अनजानापन
तुम्हारी तस्वीर और शब्दों में
कभी पूरी हकीकत बयान नहीं होती है
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Jan 22, 2008

अनजाने लोगों के बीच ढूँढें सच्चा प्यार-कविता साहित्य

जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार
पर मिलती है सब जगह से दुत्कार
खुद करो चाहे किसी से भी तुम
मांगो न किसी से इसका उपहार
लोग नहीं निकल पाते अपने दिल से
खरीदा और बिकता पैसे से यहाँ प्यार
भाषा में बहुत होते हैं सुन्दर शब्द
पर बोलने में सब लोग हैं लाचार
अपनों में कितना भी तलाशो नहीं मिलता
गैरों भी नहीं मिल सकता जल्दी प्यार
शब्द में होती ढेर सारी शक्ति
पर पैसे से ही लोग देते-लेते प्यार
बेहतर है निकल पड़े अनजाने सफर पर
शायद कहीं मिल जाये प्यार
अपनों की भीड़ में रहकर ऊबने से अच्छा है
अनजाने लोगों के बीच ढूँढें सच्चा प्यार

Jan 19, 2008

ऐसी कविता मत लिखो-कविता साहित्य

जो तुम्हारे मन की घुटन को
कभी दूर न कर श्के
जो तुम्हें दर्द देने वालों को
कदम पीछे हटने के लिए
मजबूर न कर सके
ऐसी कविता मत लिखो

शब्दों के दलालों की मंडी
सजी है सब जगह
कान और आँख खडे राशन में
एक लाइन की मजबूर की तरह
जो मिलेगा वही पढेंगे और सुनेंगे
भेद न सके गिरोह की चालों को
ऐसी कविता मत लिखो

तुम्हारे अन्दर की पीडा
बन जाये दूसरे के लिए अमृत तो ठीक
जहर बनकर किसी को डसे
तुम्हारे शब्द किसी को कर सकें
उसके मानसिक अंतर्द्वंद से मुक्त तो ठीक
पर वह भ्रम में जाकर फंसे
ऐसी कविता मत लिखो

तुम जिन हांड-मांस के पुतलों को
बोलते, देखते और सुनते देख रहे हो
अपने स्वार्थों की चाबी के भरे
रहने तक ही चलते हैं
खतरनाक चेहरे और आवाजों को
देखकर सहमते हैं
जो नहीं भर सकें उनमें
इंसानों जैसी संवेदनाएं
ऐसी कविता मत लिखो
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Nov 6, 2007

तुम्हारे प्रेम के विरह में हास्य लिखता हूँ

ब्लोगर उस दिन एक पार्क में घूम रहा था तो उसकी पुरानी प्रेमिका सामने आकर खडी हो गयी। पहले तो वह उसे पहचाना ही नहीं क्योंकि वह अब खाते-पीते घर के लग रही थी और जब वह उसके साथ तथाकथित प्यार (जिसे अलग होते समय प्रेमिका ने दोस्ती कहा था) करता था तब वह दुबली पतली थी। ब्लोगर ने जब उसे पहचाना तो सोच में पड़ गया इससे पहले वह कुछ बोलता उसने कहा-''क्या बात पहचान नहीं रहे हो? किसी चिंता में पड़े हुए हो। क्या घर पर झगडा कर आये हो?"

''नहीं!कुछ लिखने की सोच रहा हूँ।''ब्लोगर ने कहा;''मुझे पता है कि तुम ब्लोग पर लिखते हो। उस दिन तुम्हारी पत्नी से भेंट एक महिला सम्मेलन में हुई थी तब उसने बताया था। मैंने उसे नहीं बताया कि हम दोनों एक दूसरे को जानते है।वह चहकते हुए बोली-''क्या लिखते हो? मेरी विरह में कवितायेँ न! यकीनन बहुत हिट होतीं होंगीं।'

ब्लोगर ने सहमते हुए कहा-''नहीं हिट तो नहीं होतीं फ्लॉप हो जातीं हैं। पर विरह कवितायेँ मैं तुम्हारी याद में नहीं लिखता। वह अपनी दूसरी प्रेमिका की याद में लिखता हूँ।''

''धोखेबाज! मेरे बाद दूसरी से भी प्यार किया था। अच्छा कौन थी वह? वह मुझसे अधिक सुन्दर थी।''उसने घूरकर पूछा।

''नहीं। वह तुमसे अधिक खूबसूरत थी, और इस समय अधिक ही होगी। वह अब मेरी पत्नी है। ब्लोगर ने धीरे से उत्तर दिया।

प्रेमिका हंसी-''पर तुम्हारा तो उससे मिलन हो गया न! फिर उसकी विरह में क्यों लिखते हो?'

''पहले प्रेमिका थी, और अब पत्नी बन गयी तो प्रेम में विरह तो हुआ न!''ब्लोगर ने कहा।
पुरानी प्रेमिका ने पूछा -''अच्छा! मेरे विरह में क्या लिखते हो?"

''हास्य कवितायेँ और व्यंग्य लिखता हूँ।" ब्लोगर ने डरते हुए कहा।
''क्या"-वह गुस्से में बोली-''मुझे पर हास्य लिखते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की। वरना तुम तो मेरे को बदनाम कर देते। आज तो मेरा मूड खराब हो गया। इतने सालों बाद तुमसे मिली तो खुशी हुई पर तुमने मुझ पर हास्य कवितायेँ लिखीं। ऐसा क्या है मुझमें जो तुम यह सब लिखते हो?'

ब्लोगर सहमते हुए बोला-"मैंने देखा एक दिन तुम्हारे पति का उस कार के शोरूम पर झगडा हो रहा था जहाँ से उसने वह खरीदी थी। कार का दरवाजा टूटा हुआ था और तुम्हारा पति उससे झगडा कर रहा था. मालिक उसे कह रहा था कि''साहब. कार बेचते समय ही मैंने आपको बताया था कि दरवाजे की साईज क्या है और आपने इसमें इससे अधिक कमर वाले किसी हाथी रुपी इंसान को बिठाया है जिससे उसके निकलने पर यह टूट गया है और हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं. तुम्हारा पति कह रहा था कि'उसमें तो केवल हम पति-पत्नी ने ही सवारी की है', तुम्हारे पति की कमर देखकर मैं समझ गया कि...............वहाँ मुझे हंसी आ गई और हास्य कविता निकल पडी. तब से लेकर अब जब तुम्हारी याद आती है तब......अब मैं और क्या कहूं?''

वह बिफर गयी और बोली-''तुमने मेरा मूड खराब किया। मेरा ब्लड प्रेशर वैसे ही बढा रहता है। डाक्टर ने सलाह दी कि तुम पार्क वगैरह में घूमा करो। अब तो मुझे यहाँ आना भी बंद करना पडेगा। अब मैं तो चली।"

ब्लोगर पीछे से बोला-''तुम यहाँ आती रहना। मैं तो आज ही आया हूँ। मेरा घर दूर है रोज यहाँ नहीं आता। आज कोई व्यंग्य का आइडिया ढूंढ रहा था, और तुम्हारी यह खुराक साल भर के लिए काफी है। जब जरूरत होगी तब ही आऊँगा।''

वह उसे गुस्से में देखती चली गयी। ब्लोगर सोचने लगा-''अच्छा ही हुआ कि मैंने इसे यह नहीं बताया कि इस पर मैं हास्य आलेख भी लिखता हूँ। नहीं तो और ज्यादा गुस्सा करती।''

नोट-यह एक स्वरचित और मौलिक काल्पनिक व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है और किसी का इससे मेल हो जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.

Oct 30, 2007

भले लोगों का तलाश करें ठौर

सामने कुछ कहैं
पीठ पीछे कुछ और
ऐसे लोगों की बातों पर क्या करें गौर
बात काम करें मचाएँ ज्यादा शोर
बोले और पीछे पछ्ताएं
जैसे नाचने के बाद रोए मोर
जिनके मन में नही सदभाव
उनकी वाणी में होता है कटुता का भाव
अपनी पीठ आप थपथपापाएं
अपने दिल का मैल छिपाएं
क्या पायेंगे ऐसे लोगों को बनाकर सिरमौर
उनकी भीड़ में शामिल होने से बेहतर है
अकेले में समय गुजारें
उनके झुंड में रहने से अच्छा है
भले लोगों का तलाश करें ठौर

Oct 23, 2007

अनुभूति

अपने अन्दर ही अपने पर
जब यकीन नहीं होता
तब किसी दूसरे पर
कोई कैसे भरोसा करेगा
जैसे मन में होगा खुद का चेहरा
वैसा ही दूसरे का भी लगेगा
तुम कितना चाहो
उधार की रौशनी से
तुम्हारा मन रोशन हो जाये
वह कभी संभव नहीं
क्योंकि जब तक तुम
खुद के नहीं बन सकते
तब क्या लगेगा गैर भी अपना
तुम्हें तो अपना भी गैर लगेगा
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Sep 3, 2007

अपनी सोच से अपने को बचाओ

विश्वास, सहृदयता और प्रेम हम
ढूंढते दोस्तो, रिश्तेदारों और
अपने घर-परिवार में
अपने मन में कब और कहाँ है
कभी झांक कर देखा है
इस देह से बनी दीवार में

अपने अहं में खुद को जलाए देते हैं
इस भ्रम में कि कोई और
हमें देखकर जल रहा है
लोगों के मन में हमारे प्रति
विद्वेष पल रहा है
कभी अपने मन को साफ नहीं कर पाते
चाहे कितनी बार जाते
सर्वशक्तिमान के दरबार में

कुछ देर रूक जाओ
अपनी सोच को अपने से बचाओ
और फिर अपनी देह में सांस ले रहे
उस अवचेतन की ओर देखो
उससे बात करो
तब तुम्हारा भ्रम टूटेगा कि
कितना झूठ तुम सोच रहे थी
और सच क्या है इस संसार में
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