तुम तय करो पहले
अपनी जिन्दगी में
चाहते क्या हो
फिर सोचो
किस्से और कैसे चाहते क्या हो
उजालों में ही जीना चाहते हो
तो पहले चिराग जलाना सीख लो
उससे पहले तय करो
रोशनी में देखना चाहते क्या हो
बहारों में जीना है तो
फूल खिलाना सीख लो
उड़ना है हवा में तो
जमीन पर पाँव
पहले रखना सीख लो
अगर तैरना है तो पहले
पानी की धार देखना सीख लो
यह ज़िन्दगी तुम्हारी
कोई खेल नहीं है
इससे खिलवाड़ मत करो
इसे मजे से तभी जीं पाओगे
जब दिल और दिमाग पर
एक साथ काबू रख सकोगे
तुम्हारे चाहने से कुछ नहीं होता
अपने नसीब अपने हाथ से
अपनी स्याही और
अपने कागज़ पर
लिखना सीख लो
पर पहले यह तय करो
इस जिन्दगी के इस सफर में
देखना और पढ़ना चाहते क्या हो
----------------------
समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
-
--- ज़माने पर सवाल पर सवालसभी उठाते, अपने बारे में कोई पूछे झूठे जवाब जुटाते। ‘दीपकबापू’ झांक रहे सभी दूसरे के घरों में, गैर के दर्द पर अपन...
-
जमीन पर लहु बिखरा पड़ा है फिर भी उनका बयान किन्तु और परंतु शब्दों के साथ खड़ा है। मरने वालों पर बोले वह कुछ शब्द पर कातिलों का दर्द भी बया...
-
तुम तय करो पहले अपनी जिन्दगी में चाहते क्या हो फिर सोचो किस्से और कैसे चाहते क्या हो उजालों में ही जीना चाहते हो तो पहले चिराग जलाना सीख...
3 comments:
बहुत बढिया रचना है।बहुत सही कहा है-
उजालों में ही जीना चाहते हो
तो पहले चिराग जलाना सीख लो
उससे पहले तय करो
रोशनी में देखना चाहते क्या हो
Bahut hi achhe vichar,
Dhanyavad
Aarambha
अच्छी लगी आपकी कविता....बधाई
Post a Comment