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Dec 10, 2007

इंसान और परिंदे

ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की
चाहत किसमें नहीं होती
पर परिंदों जैसी
किस्मंत सभी की नहीं होती
उड़ते हैं आसमान में
पर उसे छू कर देखने की
ख्वाहिश उनमें नहीं होती
उड़ नहीं सकता आसमान में
फिर भी इंसान की
नजरें उसी पर होती
उड़ते हुए परिंदे
आसमान से जमीन पर भी आ जाते
पर इंसान के कदम जमीन पर होते
पर ख्याल कभी उस पर नहीं टिक पाते
लिखीं गयी ढेर सारी किताबें
आकाश के स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए
जिसमें होतीं है ढेर सारी नसीहतें
पढ़कर जिनको आदमी अक्ल बंद होती
अपने पैर में जंजीरें डालकर
आदमी फिर भी कहता है
'काश हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती'