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Jul 5, 2011

जिंदगी का हिसाब किताब-हास्य व्यंग्य कवितायें (jindagi ka hisab kitab-hasya vyangya kavitaen)

हिसाब किताब में
जिंदगी का खेल लोग यूं ही खेलते जाते हैं,
ज्ञान का संदेश सुने
या माया के अंक गुने
बीच रास्ते पर चलते हुए
इसलिये सर्वशक्तिमान का नाम भी
गिन गिनकर लिये जाते हैं।
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एक बंदे ने दूसरे बंदे से पूछा
‘सर्वशक्तिमान का नाम
माला फिराते हुए क्यों लेते हो,
क्या डर है कि कहीं गिनती भूल जाओगे,
ज्यादा लेने पर फल नहीं मिलेगा
कम लिया तो शायद कम पाओगे,
इसलिये हिसाब किताब से काम करते हो।

दूसरे बंदे ने कहा
‘‘हमें कच्चा मत समझना,
सर्वशक्तिमान का नाम
माला के साथ जपते हुए भी
गिनती गिनते जाते हैं,
दिन भर दुकान पर
रुपये गिनने का अभ्यास बना रहे
इसलिये मन ही मन अंक भी गाये जाते हैं,
नाम स्मरण तो बचपन की आदत है,
पचपन में बनी मजबूरी बनी यह इबादत है,
लेते हैं सर्वशक्तिमान का नाम
यह सोचकर कि हम रुपये गिने जाते हैं।’’
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।