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Nov 17, 2011

अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और क्रिकेट मैच में फिक्सिंग-हिन्दी व्यंग्य (anna hazare ka anti corruption movement and fixing in cricket match-hindi satire article)

       अन्ना हजारे ने कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते जो प्रतिष्ठा अर्जित की उसे बाज़ार और उसका प्रचार माध्यम भुनाने में लगा है। जनमानस में उनकी लोकप्रियता का दोहन करने के लिये पहले तो फटाखे तथा अन्य सामा3न अन्ना छाप बने तो लंबी चौड़ी बहसों में टीवी चैनलों का विज्ञापन समय भी पास हो गया। इधर अन्ना हजारे साहब ने अपने ही प्रदेश के एक खिलाड़ी जिसे क्रिंकेट का कथित भगवान भी कहा जाता को भारत रत्न देने की मांग की है। ऐसे में लगता है कि बाज़ार और प्रचार समूहों ने शायद अपने भगवान को भारत रत्न दिलाने के लिये उनका उपयोग करना शुरु कर दिया है। हो सकता है अब यह सम्मान उसे देना भी पड़े। हालांकि इसके लिये अन्ना साहेब को अनशन या आंदोलन का धमकी देनी पड़ सकती है।
         एक बात यहां हम साफ कर दें कि हम न तो अन्ना हज़ारे के आंदोलन के विरोधी हैं न समर्थक! हम शायद इसके समर्थक होते अगर अन्ना ने अपने पहले अनशन की शुरुआत में ही विश्व कप क्रिकेट में भारत की विजय से प्रेरित होकर यह आंदोलन शुरु होने की बात नहीं कही होती। जिस तरह पेशेवर समाज सेवकों की मंडली ने उनके आंदोलन का संचालन किया उससे यह साफ लगा कि कहीं न कहीं आंदोलन प्रायोजित है और देश की निराश जनता में एक आशा का संचार करने का प्रयास है ताकि कहीं उसकी नाराजगी कहीं देश में बड़े तनाव का कारण न बन जाये। ऐसे में बाज़ार और प्रचार समूहों के स्वामियों के लिये यह जरूरी होता है कि वह कोई महानायक खड़ा कर जनता को आशावदी बनाये रखें। उस समय विश्व के कुछ देशों में अपने कर्णधारों के नकारापन से ऊगह निराश जनता हिंसा पर उतर रही थी तब भारतीय जनता में आशा का संचार करने के लिये उनका आंदोलन चलवाया गया लगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी फिक्सिंग होना बुरा नहीं है पर मुश्किल तब होती है जब जज़्बातों ने ओतप्रोत लोगों को यह बात कहीं जाये तो वह उग्र हो जाते हैं
             देश की स्थिति से सभी चिंतित हैं और इस पर तो हम पिछले छह साल से लिख ही रहे है। क्रिकेट का किसी समय हमें बहुत शौक था पर जब क्रिकेट में फिक्सिंग की बात पता चली तो दिल टूट गया और उसके बाद जब कोई इस खेल का नाम लेता है तो हमें अच्छा नहीं लगता।
          क्रिकेट में फिक्सिंग होती है और इस पर चर्चा प्रचार माध्यमों में अब जमकर चल रही है। आज ही पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी कांबली ने आरोप लगाया कि सन् 1996 में कलकत्ता में खेले गये विश्व कप किकेट सेमीफायनल में भारत के कुछ खिलाड़ियों ने मैच में हार फिक्स की थी। 15 साल बाद यह आरोप वह तब लगा रहे हैं जब सारा देश क्रिकेट मैच देखते हुए भी यह मानता है कि वह फिक्स हो सकता है। स्पष्टतः बाज़ार और प्रचार समूहों ने अपने लाभ के लिये क्रिकेट खेल को व्यवसाय बना लिया है। इतना ही नहीं सट्टा बाज़ार में भी वह अन्य उत्पाद से ज्यादा व्यापार करने वाला खेल बन गया है। ऐसे में इस खेल को मनोरंजन के लिये या फिर टाईम पास के लिये देखना बुरा नहीं है पर इसमें शुचिता की आशा करना मूर्खता है।
           जब अन्ना हज़ारे क्रिकेट से अपने लगाव और किसी खिलाड़ी को भारत रत्न देने की बात कर रहे हैं तो उनको नहीं पता कि इससे वह देश के उन लाखों लोगों के घावों को कुरेद रहे हैं जिन्होंने अपनी युवावस्था इस खेल को देखते हुए गुजार दी और तब पता लगा कि उनके देश के खिलाड़ी तो बाज़ार, प्रचार और अपराध जगत के संयुक्त उपक्रम के तय किये हुए पात्र हैं जो उनके इशारे पर ही चलकर कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे में उनमें से कुछ लोग अन्ना हजारे के आंदोलन को ही नहीं उनकी कार्यशैली पर भी प्रश्न उठा सकते हैं।
            आखिरी बात यह कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक महान कार्य है और उसके अगुआ होने के नाते अन्ना को प्रमाद वाले विषयों से दूर रहना चाहिए था। हम उन पर कोई अपनी बात थोप नहीं रहे पर यह सच है कि क्रिकेट से संबंधित विषय अनेक लोगों के लिये मनोरंजन के अलावा कुछ नहीं है। फिर अन्ना हज़ारे के कथित आंदोलन किसी परिणाम की तरफ जाता नहीं दिख रहा। दूसरा यह भी कि अन्ना हजारे ने जनलोकपाल का जो स्वरूप तय किया था उसे आमजन न समझें हो पर जानकार उस नजर रखे हुए हैं। एक बात यहां भी बता दें कि अन्ना हजारे साहब के लक्ष्य और उनके जनलोकपाल के स्वरूप में तालमेल पहले से ही नहीं दिख रहा था। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाने के लिये जूझ रहे अन्ना साहब ने कहा था कि देश में आम जनता से जुड़ी राशन कार्ड, लाइसैंस, विद्यालयों में बालकों के प्रवेश तथा बिजली पानी समस्याओं का निराकरण होना चाहिए। स्पष्टतः यह सभी राज्यों का विषय है जबकि केंद्र सरकार के लोकपाल की परिधि केवल राष्ट्रीय समस्याओं का हल ही संभव है। फिर अन्ना पूरे देश में एक जनलोकपाल की बात कर रहे हैं पर उसके कार्य क्षेत्र का विषय केवल केंद्र होगा। मान लीजिये संसद में लोकपाल विधेयक पास भी हो गया तो क्या अन्ना आम जनता की समस्याओं के हल का दावा कर रहे हैं वह संभव होगा?
              हम यहां अन्ना समर्थकों को निराश नहीं करना चाहते पर एक बात बता दें कि हमें अन्ना के दावों, सरकार के वादों तथा तथा लोगों की यादों के बीच में जाकर देखना है इसलिये निरंतर इस विषय पर कुछ न कुछ लिखते रहते हैं। यह सही है कि हमें अधिक पढ़ा नहीं जाता पर दूसरा सच यह भी कि सुधि लोग पढ़कर इसे अपने लेखों में स्थान देते हैं। हमारा नाम नदारत हो तो क्या पर वह हमारा संदेश जनता के बीच में जाता तो है। बाज़ार और प्रचार समूह क्रिकेट की बात करते हैं अन्ना भी कर रहे हैं। ऐसे में लगता है कि कहीं न कहीं उनके आंदोलन में फिक्सिंग भी हो सकती है भले ही उन्होंने नहीं की हो। देश में भ्रष्टाचार हटाना तो असंभव है पर उसे न्यूनतम स्तर तक लाया जा सकता है पर वह भी ढेर सारी मुंश्किलों के बाद! अलबत्ता अन्ना चाहें तो अपने ही प्रदेश के खिलाड़ी को भारत रत्न दिला सकते हैं। हां, उन्होंने इतनी अच्छी छवि बना ली है कि बाज़ार अपने व्यापारिक उत्पाद और प्रचार माध्यम विज्ञापन से अच्छी कमाई करवाने वाले भगवाने को भारत रत्न दिला सकता है। अभी तक अन्ना अपने आंदोलन को आधी जीत बताकर जनता को खुश करते रहे थे पर भारत रत्न दिलाकर वह देश के जनमानस को पूरी जीत का तोहफा दे सकते हैं। वैसे भी अन्ना देश में राजकीय क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की बात करते हैं क्रिकेट में उनको वह नहीं दिखता मगर जिनको दिखता है वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बारे में तमाम तरह के अनुमान भी कर सकते हैं। उनको लग सकता है अन्ना हजारे के आंदोलन प्रबंधक चूंकि बाज़ार से प्रायोजित हैं इसलिये उनके माध्यम से वह अपने हित साध सकता है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Oct 1, 2011

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी और भारत की चिंता-हिन्दी लेख (afganisatan,america and india ,milatry action ofr peace-hindi lekh(

         अमेरिका अब अफगानिस्तान से जाने की तैयारी कर रहा है तो भारतीय रणनीतिकारों की सांसें फूल रही हैं। भारतीय प्रचार माध्यमों के सूचीबद्ध बुद्धिजीवियों के लिये यह संभव नही है इस विषय पर वह सार्थक बहस कर सकें। यही सूचीबद्ध बुद्धिजीवी न केवल चैनलों पर आते रहते हैं बल्कि समाचार पत्रों में भी उनके लेख वगैरह छपते हैं। इस बात पर तो बहस हो जायेगी कि अफगानिस्तान ने अमेरिका की सेना वापस जाना चाहिए कि नहीं पर इस पर शायद ही कोई अपनी बात ठोस ढंग से कह सके कि भारतीय रणनीतिकारों की सांस इससे फूल क्यों रही है?
       हम इस पर लिख रहे हैं तो हमारे पास जो जानकारी है वह इन्हीं प्रचार माध्यमों के समाचारों पर आधारित हैं यह अलग बात है कि वह उनको राजनीति, समाज, आर्थिक तथा पत्रकारिता के आधारों पर अलग श्रेणीबद्ध करते हैं पर उनके आपसी संबंध पर उनके सूचीबद्ध बुद्धिजीवी दृष्टिपात नहीं कर। किसी समय अफगानिस्तान पाना अमेरिका का लक्ष्य था और आज वहां बने रहना उसके लिये समस्या बन गया है। अगर हम राष्ट्रीय आधारों पर देखें तो यह समस्या अमेरिका की है कि उसकी सेना वहां रहे या जाये। हमें उसमें दिलचस्पी नहीं लेना चाहिए। जब हमारे रणनीतिकार इस बात से घबड़ाते हैं कि वहां से अमेरिकी सेना जाने के बाद भारत पर संकट आ सकता है तो यह बात माननी पड़ेगी कि वहां हमारे लिये भी समस्या है और हम उससे निपटने में सक्षम नहीं है। दूसरी बात यह है कि हम अगर अपने देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक शक्ति के स्तोत्रों को देखें तो ऐसा नहीं लगता कि हमारे लिये कोई बड़ी समस्या है। सामाजिक और एतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करें तो भी ऐसा नहीं लगता कि वहां की आम जनता हमारे से कोई नफरत करती है। तब सवाल उठता है कि आखिर समस्या क्या और कहां है?
         दरअसल हमारे देश ने चालीस वर्ष से कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा। जब हम अपने अंदर बैठे राष्ट्र की संकल्पना को देखते हैं तो पाते हैं कि हर राष्ट्र को अपनी रक्षा के लिये युद्ध करना ही पड़ते हैं। हालांकि भारतीय परिस्थ्तिियों में युद्ध का मतलब भयावह ही होता है। 1971 में पाकिस्तान से युद्ध में विजय तो पाई पर आर्थिक रूप से यह देश वहां से टूटा तो फिर खड़ा नही हो सका। वहां से महंगाई का जो दौर चला तो फिर आज तक थमा नहीं है। विकास हुआ पर जरूरतों भी बढ़ी। कमाई बढ़ी पर रुपये का मूल्य गिरता गया। समाज में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक शिखरों पर बैठे पुरुषों के लिये अब यही समस्या है कि वह अस्तित्व कैसे बनायें रखें। उनकी दिलचस्पी देश की आम जनता के दोहन में है। वह कमाते हैं पर गुणगान अमेरिका और ब्रिटेन का करते हैं। कभी कभी तो लगता है कि देश के शिखर पुरुषों की आत्मा ही अब पश्चिम में बसती है। ऐसे में युद्ध से होने वाली हानि में वह अपनी हानि देखने के साथ ही अपने अस्तित्व का संकट भी अनुभव करते हैं। यही कारण है कि उनको लगता है कि यह देश सुरक्षित रहे और युद्ध भी न करना पड़े इसलिये अमेरिका से वह यही अपेक्षा करते हैं कि वह अफगानिस्तान में अपनी सेना बनाये रखें।
        एक बात तय है कि अफगानिस्तान के आर्थिक संसाधनों का लाभ भारतीय धनपतियों को कहीं न कहीं मिलता है-भले ही वह वैध व्यापार से हो या अवैध व्यापार से। इसके अलावा अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में सक्रिय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जब बात होती है तो भारतीय आर्थिक विश्लेषक इस बात पर प्रकाश नहीं डालते कि उनमें भारतीय धनपतियों का अंश कितना है? हम जानते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कहीं न कहीं भारतीय पैसा और श्रम लगा हुआ है। यह अलग बात है कि इनके कर्ताधर्ता प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकन या ब्रिटिश पूंजीपति हों। स्पष्टतः वैश्विक उदारीकरण के चलते पूरे संसार के धनपति एक हो गये हैं। यह धनपति चाय की पत्ती से लेकर अंतरिक्ष तकनीकी बेचने तक का काम करते हैं। दूसरी बात यह है कि धनपतियों का कहीं न कहीं अपराधियों से सभी संबंध हो गया है और इसी कारण अवैध हथियारों की तस्करी और मादक द्रव्य का व्यापार भी बढ़ा है। इन्हीं धनपतियों के प्रभाव राज्यों पर स्पष्टतः दिखाई देते हैं। भारतीय धनपतियों का प्रभाव जिस तरह विश्व में बढ़ा है उससे लगता है कि अब अफगानिस्तान में भारतीय धनपतियों के लाभ की शायद अधिक संभावना है और अमेरिकी रणनीतिकार इसे समझ रहे हैं। हालांकि भारतीय धनपतियों की अमेरिकी रणनीतिकार अनदेखी नहीं कर सकते पर भविष्य की अधिक संभावनाओं के चलते वह कुछ भी कर सकते हैं। कहीं न कहीं भारतीय धनपति इस बात की अपेक्षा कर रहे हैं कि अमेरिका अफगानिस्तान में बना रहे ताकि उसके प्रबंधकों के सहारे वहां के संसाधनों का दोहन किया जा सके।
         जिस तरह हमारे देश में भ्रष्टाचार जोर पकड़ चुका है। समाज का आम आदमी टूट रहा है ऐसे में किसी भी युद्ध की संभावना किसी को भी डरा देती है। मुश्किल यह भी है कि जब हम एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो ऐसे युद्ध लड़ना भी पड़ेंगे। देश के शिखर पुरुषों को आम जनता से अधिक खतरे भी उठाने पड़ेंगे। इधर अब देख रहे है कि सभी प्रकार के शिखर पुरुषों के स्वामी आर्थिक शिखर पर बैठे धनपति हो गये है। अब यह अलग बात है कि अपने ही प्रचार माध्यमों की वजह से भारतीय धनपतियों के प्रति आम जनता का उनमें विश्वास नहीं रहा। इस पर जिस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा आतंकवाद को धन देने की बातें सामने आ रही हैं उससे देश का जनमानस अब इस बात को समझने लगा है कि व्यापारियों का काम केवल कमाना है देशभक्ति दिखाना नहीं। जरूरत पड़े तो वह देशभक्ति को पर्दे पर बेचकर वह पैसा भी कमा सकते हैं। इधर भारतीय रणनीतिकारों को भी सुविधायें भोगने की आदत हो गयी है। पड़ोस में इतने बड़े युद्ध हो गये पर उनको अपना दिमाग चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। अगर अमेरिका की सेना अफगानिस्तान से चली गयी तो उनको दिमागी कसरत करनी होगी। आर्थिक लाभ से अधिक सामरिक स्थिति पर अधिक सोचना होगा। सबसे बड़ी बात यह कि इसके चलते भारत के पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान शिखर पुरुषों से दोस्ती निभाने के अवसर कम मिलेंगे। अभी हम देख रहे हैं कि हमारे रणनीतिकार इन दोनों देशों से आर्थिक हितों पर ही बात करते हैं। सामरिक महत्व की कोई चर्चा नहीं होती क्योंकि अमेरिकी सेना के वहां रहते हुए हम ‘बाह्य मामलों में हस्तक्षेप से बचने का बहाना’ बना लेते हैं क्योंकि वहां द्वंद्व अमेरिका की स्थिति को लेकर ही चल रहा है। । इस समय अफगानिस्तान के कथित जुझारु लोग अमेरिका से जूझ रहे हैं उसके जाते ही वह भारत की तरफ मुखातिब होंगें तब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के शिखर पुरुषों से आर्थिक लाभ वाला दोस्ताना खतरे में पड़ सकता है क्योंकि तब सैन्य और सामरिक महत्व के विवादास्पद मामले भी उठ खड़े होंगे। तय बात है कि वह आतंकवाद को लेकर ही होंगे।
       भारतीय रणनीतिकारों की यह चिंता उनकी कमजोरियों को दर्शाती है। वह यह भी दर्शाती है कि सामरिक रूप से शक्तिशाली होते हुए भी हम भारतीयों में वीरता और देश के लिये त्याग करने के संकल्प की कमी है। चालीस साल से शांति भोगते भोगते कहीं न कहीं कायरता का भाव आ गया है। आर्थिक लाभ ही हमारे लिये सर्वोपरि है। हालांकि पहली बात तो यह कि अमेरिका अभी तत्काल अफगानिस्तान से नहंी जाने वाला है इसलिये फिलहाल चिंतायें दूर की हैं। दूसरी बात यह भी है कि जिस तरह अंग्रेज भारत और पाकिस्तान में अपने चरणपुरुष छोड़कर गये वैसे वह अफगानिस्तान में नहीं कर सकता। एक बार वह वहां से निकला तो फिर वहां उसका प्रभाव समाप्त हो जायेगा ऐसे में भारत और पाकिस्तान के धनपतियों के लाभ प्रभावित होंगे। शायद यही कारण है कि भारतीय रणनीतिकार इतने चिंतित है पर जिस तरह भारतीय धनपति देश के प्रति लापरवाह हो गये हैं इस चिंता में आम जनमानस उनके साथ नहीं है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Apr 4, 2011

नववर्ष विक्रम संवतः 2068 का प्रारंभ-भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान, दर्शन और धर्म का महत्व समझें (happy new year of indian hindu religion vikram sanvat 2068-hindi article)

आज से नववर्ष विक्रम संवत् 2068 प्रारंभ हो गया है। चूंकि हमारा राजकीय कैलेंडर ईसवी सन् से चलता है इसलिये नयी पीढ़ी तथा बड़े शहरों पले बढ़े लोगों में बहुत कम लोगों यह याद रहता है कि भारतीय संस्कृति और और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला विक्रम संवत् देश के प्रत्येक समाज में परंपरागत ढंग मनाया जाता है। देश पर अंग्रेजों ने बहुत समय तक राज्य किया फिर उनका बाह्य रूप इतना गोरा था कि भारतीय समुदाय उस पर मोहित हो गया और शनैः शनैः उनकी संस्कृति, परिधान, खानपान तथा रहन सहन अपना लिया भले ही वह अपने देश के अनुकूल नहीं था। यह बाह्य हमारे समाज ने अपनाया पर गोरों की तरह खुले विचार और संस्कारों को स्वीकार नहीं किया। अब स्थिति यह है कि देश हर समाज और समुदाय दोनों संस्कृतियों के बीच अनंतकाल तक चलने वाले ऐसे द्वंद्व में जी रहा है जिससे उसकी मुक्ति का आसार नहीं है।
अंग्र्रेज चले गये पर उनके मानसपुत्रों की कमी नहीं है। सच तो यह है कि अंग्रेज वह कौम है जिसको बिना मांगे ही दत्तक पुत्र मिल जाते हैं जो भारतीय माता पिता स्वयं उनको सौंपते हैं। अंग्रेजी माध्यम वाले अनेक स्कूलों में भारतीय संस्कृति ही नहीं वरन् हिन्दी भाषा बोलने पर ही पाबंदी लग जाती है। ऐसे विद्यालयों में लोग अपने बच्चे भेजते हुए गौरवान्वित अनुभव करते हैं। फिर यही बच्चे आगे देश इंजीनियर, डाक्टर, समाज सेवक तथा अधिकारी बनते हैं। उस समय उनके माता पिता शुद्ध रूप से भारतीय हो जाते हैं और उसके विवाह के लिये अच्छे घर की बहू के साथ ही दहेज की रकम ढूंढना शुरु कर देते हैं। विवाह होने के बाद पाश्चात्य संस्कृति में रचे बचे बच्चे माता पिता से दूर हो जाते हैं फिर कुछ समय बाद उनका रोना भी शुरु हो जाता है कि ‘बच्चे हमें पूछ नहीं रहे। हमें बहु अच्छी नहीं मिली।’
यह समाज का अंतद्वंद्व है कि लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे गुलाम पर अमीर बने। भारत में यह संभव हुआ है क्योंकि यहां सरकारी नौकरियों की संख्या अधिक रही है। इधर निजीकरण के दौर में तो महंगे वेतन वाली नौकरियों का भी निर्माण हुआ है। अब नौकरी तो नौकरी है यानि गुलामी! अपना बच्चा दूसरे का गुलाम बना दिया पर आशा यह की जाती है कि वह माता पिता की जिम्मेदारी आज़ादी से निभाये। यह कैसे संभव है? नौकरी अंततः गुलामी है और अगर बच्चा नौकरी कर रहा है तो फिर उससे आज़ादी से सामाजिक कर्तव्य निर्वहन की आशा करना व्यर्थ है।
पिछले अनेक दिनों से देश में अंग्रेज साहबों के खेल क्रिकेट की विश्व प्रतियोगिता का शोर चलता रहा है। इस खेल का प्राचीन इतिहास बताता है कि अंग्रेज गोरे साहब बल्लेबाज और उनके गुलाम गेंदबाज होते थे। आज यह खेल हमारे समाज का हिस्सा बन गया है। पिछले दिनों भूतपूर्व कप्तान कपिल देव ने कहा था कि क्रिकेट में बल्लेबाज साहब और गेंदबाज मजदूर की तरह होता है। हम जब देश के नामी खिलाड़ियों की सूची देखते हैं तो बल्लेबाजों का नाम ही ऊपर आता है और गेंदबाज को वास्तव में मज़दूर के रूप में ही देखा जाता है। जो लोग अपने बच्चों को क्रिकेटर बनते देखना चाहते हैं वह उसके बल्लेबाजी के स्वरूप की कल्न्पना करते हैं न कि गेंदबाज की।
इधर क्रिकेट से माल बटोर रहे प्रचार माध्यमों को यह होश नहीं है कि विक्रम संवत् 2068 प्रारंभ हो गया है। विक्रम संवत् आधुनिक बाज़ार में होने वाले सौदा का पर्व नहीं है। ईसवी संवत् इसके लिये बहुत है। जब हम भारतीय संस्कृति या धर्मों की बात करते हैं तो दरअसल वह बाज़ार के लिये प्रयोक्ता नहीं जुटाते।  विक्रम संवतः पर आधुनिक बाज़ार और उनके प्रचार माध्यम मॉल, टॉकीज, बार, तथा होटलों के लिये युवा पीढ़ी को प्रेरित नहीं कर सकते। उनके अंदर काम तथा व्यसन की भावनाओं को प्रज्जवलित नहीं कर सकते।  क्योंकि भारतीय संस्कृति और धर्म  मनुष्य को अंतर्मन में जाकर अपना ही आत्ममंथन करने के लिये प्रेंरित करते हैं जबकि विदेशी संस्कृति और धर्म मनुष्य को बाहर जाकर जीवन से जूझने के लिये प्रेरित करते हैं जिससे अंततः बाज़ार और धर्म के ठेकेदार उसे बंधक बना लेते हैं। विदेशी संस्कृति और धर्म में आज तक अध्यात्म का महत्व नहीं समझा गया। देह में मौजूद आत्मा तत्व को परखने का प्रयास ही नहीं किया गया। तत्वज्ञान तो उनमें हो ही नहीं सकता क्योंकि वह मनुष्य देह तथा परमात्मा के बीच स्थित उस आत्मा को स्वीकार ही नहीं करते जिसके साथ योग के माध्यम से संपर्क किया जाये तो यही आत्मा परमात्मा से संयोग कर मनुष्य देह को अत्यंत शक्तिशाली बना देता है। सच तो यह है कि विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति की याद दिलाता है और कम से कम इस बात की अनुभूति तो होती है कि भारतीय संस्कृति से जुड़े सारे समुदाय इसे एक साथ बिना प्रचार और नाटकीयता से परे होकर मनाते हैं।
इस शुभ अवसर पर समस्त पाठकों  तथा ब्लॉग लेखक मित्रों  को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।
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कवि, लेखक , संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet,editor,writer and auther-Deepak 'Bharatdee',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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