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May 24, 2007

झूठी शान की खातिर

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रुप रचाएं साधू का
चाल, चरित्र और चाहत असाधु की
यज्ञ करें राष्ट्र के कल्याण के लिए
मूहं मैं राम, बगल में छुरी
बगला भगत पर टिकी धर्म की धुरी
कौन किसको साधे
कौन किससे सधे
सबने निज स्वार्थ ओढ़ लिए
माया के अँधेरे में भटक रहे हैं
एअर कन्डीशन कमरे में सांस ले रहे हैं
भ्रम,भय और भ्रष्टाचार का अँधेरा फैलाकर
लोगों को रोशनी के अहसास बैच रहे हैं
खालीपन है सबकी आँखों में
इन्सान तरस रहा है
इन्सान देखने के लिए
कहीं समंदर का पानी मीठा बताएं
कभी भगवान को दूध पिलायें
कही मूर्ती के आंसू टपक्वायें
इंसानियत और ईमान ढूंढते थक गये
किसी इन्सान में देखने के लिए
कौन कहता है कि
मजहब नहीं सिखाता बैर रखना
दुनियां में हर जंग पर
धर्म-मजहब का नाम है
इंसानों के बीच खडी है दीवार
इनके नाम पर
सब लड़ रहे है अपने -अपने
पंथ के गौरव के लिए
बनाया था इश्वर ने
इन्सान को आजादी से
जीने के लिए
उसने स्वर्ग के मोह में
अपने को गुलाम बना लिया
जात , भाषा और धर्म की
झूठी शान की खातिर लड़ने के लिए
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Apr 24, 2007

जो मैं अपना दर्द सुनाने चला-चिन्तन

  • घर से निकलकर मैं चौराहे पर यह सोचकर पहुंचा कि लोगों को अपना दर्द और व्यथाएं सुनाऊंगा और वह बडे प्यार से मुझे सहलायेंगे और मेरे मन का बोझ हल्का हो जाएगा । वहां पहले ही भीड़ जमा थी और सब अपनी करुण कथा सूना रहे थे। मैं कुछ देर सबकी सुनता रहा क्योंकि मैं खामोश था और बाकी सब चीख चिल्ला कर अपनी बात कह रहे थे, कोई किसी की सुन नहीं रहा था। मैं वहां से वापस लोट पडा, यह सोचकर कि यह मेरा दर्द कम क्या करेंगे उसे बड़ा और देंगे।
  • मैं अपना दर्द सुनाने दर-दर भटका और घर-घर अटका जिसे देखो मुझे देखकर अपना दर्द सुनाने लगता और मैं खोमोशी से सुनता, ऐसे कयी दरों पर दस्तक दीं और घरों के अन्दर गया पर सब जगह यही हाल था । सब अपना हाल सुनाते और रोनी सूरत बनाते । मैं यह सोचकर वहां से निकल जाता कि यह लोग क्या मेरे मन में प्रफुल्लता का भाव लाएंगे । यह तो मेरी सूरत को भी रोनी बना देंगे।
  • आख़िर तय किया किया अपना दर्द स्वंय ही कम करेंगे। प्रात: उठकर पक्षियों को दाना देना शुरू किया। वहां चिड़िया,तोता, कबूतर और गिलहरी को दाना चुगते देख मन में स्वंय ही प्रफुल्लता का भाव उत्पन्न होने लगा। दर्द ऐसे हवा हुआ कि पता ही न चला । मैं सोच रहा था कि क्या दुनियां में मेरे अन्दर की पीडा को हर कर कोई और ऐसे प्रफुल्लता का भाव और कोई उत्पन्न कर सकता था?
  • तालाब किनारे जाकर मछलियों को भी भोजन डालने लगा, उन्हें देखकर अकथनीय सुख की अनुभूति हुई । मैं सोच रहा था कि दौलत लेकर भी कोई ऐसा सुख नहीं दे सकता। आवारा कुत्ते को डबलरोटी खिलाई , धन्यवाद में उसने पूँछ हिलायी। उसकी आंखों में निच्छ्ल स्नेह की भाव थे, और मुझे अपनी पीडा कम होतीं दिखाईं दीं।
  • मैंने अपने घर में रखे गमलों को पानी देना शुरू किया और जब उन्हें हरियाली में नहाते देखा तो मेरे अन्दर जो भाव पैदा हुए उनको कोई इन्सान पैदा नहीं का सका। मुझे लगने लगा कि जैसे वह कह रहे हौं कि -"यार, चिंता क्यों करते हो हम हैं न! मेरे मुख पर मुस्कराहट के भाव पैदा होते। मैं उनका एक तरह से मुस्कराकर धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।
  • अब मैं किसी से कोई सवाल नहीं करता हूँ, क्योंकि मुझे लगता है दर्द बांटने के विषय में आदमी का साथी नहीं प्रतिद्वंदी है, हर कोई अपना दर्द सुनाना चाहता है। सुनना किसी की कोई नहीं चाहता । इस विषय पर हम दोस्त हो सकते है तो केवल इतने ही कि हम दर्द सुनते दिखते हैं पर वास्तविकता में अपने दिमाग में उस समय अपना दर्द सुनाने के लिए शब्द ढूँढ रहे होते हैं। हम दोस्त होने का दावा कर सकते हैं पर यह केवल स्वार्थ के लिए , किसी का दर्द दूर करना तो रहा अलग विषय हम उसे सुनते भी नहीं है।
  • इसीलिये मैं सोचता हूँ कि अपना दर्द दूर करने के लिए एक ही उपाय है बेजुबानों की आवाज सुनो, और प्रक्क्रुती के निकट जाओ, ऐसे काम करो जिससे तुम्हारा कोई सवार्थ सिध्द न होता हो तभी अपना दर्द कम कर पाओगे .