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Jul 31, 2014

शतरंज की बिसात पर-हिन्दी कविता(sahatranj ki bisat par-hindi poem)




कौन सोचता है जिस जमीन पर
आज हम खड़े हैं
कल पाताल में धंस जायेगी।

चलते है चाल शतरंज की बिसात पर
पता नहीं लगता
कौनसी हमें हार के कगार में फंसायेगी।

ख्वाहिशों की फेहररिसत बढ़ी है जमाने की
नहीं जानते लोग
अधूरी रहने पर वही सतायेगी।

कहें दीपक बापू बिखरे हैं सभी लोग
 सपनों को साकार करने के लिये
तानाबाना बुनने में लगे हैं
खौफ भी बसा है दिल में
पता नहीं कौनसी डोर  कब टूट जायेगी।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jul 22, 2014

जिनके हिस्सें आया संघर्ष-हिन्दी व्यंग्य कविता(jinke hisse aayaa sangharsh-hindi satire poem's)



मिल गये जिनको भोगने के साघन
युद्ध में कभी वीरता नहीं दिखातो,
विकास पथ पर चल कर पा गये शिखर
देशभक्तों मे पैसा खर्च कर अपना नाम लिखाते।

रोटियों से पेट भर कर
जिनसे चला नहीं जाता एक कदम भी
लंबी दूरी तय करने के गुर वही सिखाते।

गद्दे पर थक जाते सोते हुए जो शौहरतमंद
वही कमरे से बाहर आकर
लोगों को मेहनत करने  के नुस्खे सिखाते।

कहें दीपक बापू  जिंदगी में जिनके हिस्से आया संघर्ष
मूक भाव से पकड़े रहते अपनी राह
जीवन पथ पर चलते अपने पांव पर
अपने आसरे गैरों पर नहीं टिकाते।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Mar 13, 2014

लालच की ज़मीन पर उम्मीद का उगना-हिन्दी व्यंग्य कविता(lalacha ki zamin par ummeid ka ugana-hindi vyangya kavita)



जुबान उनकी धनुष की तरह टंकार करती पर नहीं छूटता कोई तीर,
हर वाक्य में दहाड़ते हैं पर फिर नहीं कह सकते उनको शब्दवीर।
आश्वासनों का ढेर सारा पुलिंदा उनके पास है चाहे लो जितने,
निभायी नहीं दोस्ती किसी से पर वफा के सुनाते किस्से कितने,
दूसरों के सपनों के जाल में फंसाकर अपने महल खड़े करते हैं,
सर्वशक्तिमान से अपने पाप छिपाने के लिये पुण्य भी बड़े करते हैं,
किसी को रोटी देने का वादा किसी का घर बसाने का उनका इरादा,
मजबूरों की भीड़ में कमजोर दिमाग के शिकार मिल ही जाते ज्यादा,
कहें दीपक बापू ताकत से ज्यादा पाने की ख्वाहिश करती बेबस,
 इसलिये लालच की ज़मीन पर उम्मीद उगाते मिलते  हर जगह पीर
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Mar 7, 2014

कह नहीं सकते-हिन्दी व्यंग्य कविता(kah nahin sakte-hindi vyangya kavita)



नाटक बनते  खबर  या खबर ही नाटक बनती कह नहीं सकते,
पर्दे के नायक दिल देकर बने या बिल लेकर कह नहीं सकते,
कहें दीपक बापू बाज़ार के सौदागरों की मुट्ठी में पूरा जहान है,
कोई दाम देकर  तो कोई दगा देकर खबरों में बना महान है,
पर्दे पर खेल चल रहा है या फिल्म अंदाज लगाना कठिन है,
 खबर जैसी लिखी पटकथा पर करते अभिनेता अभिनय
खिलाड़ी खेलते मगर पहले से तय जीत या हार का दिन है,
हर कोई पैमाना नाप रहा दूसरे की असलियत का
अपने ढोल की  पोल छिपाने में सभी माहिर हैं,
किसी ने मासूम तो किसी ने रोबदार मुखौटा लगाया
डरते हवा के झौंके से उनके कमजोर दिल सब जगह जाहिर है,ं
न दुनियां अब रंगीन रही न कुछ यहां अजीब लगता है
लोगों के अंदाज कितने सच कितने बनावटी है कह नहीं सकते।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Mar 1, 2014

अच्छा हुआ उस समय वहां चित्रकार या उसका प्रशंसक मौजूद नहीं था-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(achhca huaa us samaya vahan chitrakar ya uska prashansak maujud nahin thaa-hindi vyangya chinttan lekh)



           
            अपने देश में चित्रकला या पैंटिंग के प्रशंसको ंकी कमी नहीं है।  खासतौर से रेखाचित्रों के जानने के लिये जिस तरह की पारखी आखें चाहिये वह सभी की नहीं होती।
            एक मशहूर चित्रकार का किस्सा कहीं पढ़ा था।  उसका चित्र या पैंटिंग की प्रदर्शनी देखने एक सेठानीनुमा महिला सहेलियों के साथ गयी थी। उसने उस चित्रकार से उस चित्र की  कीमत पूछी जो वह केवल इसलिये खरीदना चाहती थी ताकि वह अपने को कलापारखी सिद्ध कर सके। चित्रकार ने उससे पूछा कि ‘आपको पता है कि इस चित्र में क्या है?’
            महिला ने जवाब दिया-‘नहीं, मैं तो इसे केवल अपने साथ आई सहेलियो पर आर्थिक शक्ति का प्रभाव दिखाने के लिये खरीदना चाहती हूं।’’
            चित्रकार बिफर उठा। इतना कि उस महिला को उसने प्रदर्शनी से बाहर निकालकर ही दम लिया और कहा कि ‘मैं अपना चित्र किसी गैर पारखी को नहीं बेच सकता।’’
            यह घटना पुरानी है। जब हमने पढ़ी थी तो चित्रकार और उस महिला के बीच विवाद में अपने आपको दोनों तरफ कहीं खड़ा अनुभव नहीं कर पाये। हमने चित्रकार का वह चित्र भी उस समाचार पत्र में देखा था जिसमें इस घटना का ब्यौरा था।  वह चित्र हमारी  समझ में तो नहीं आया।  अगर हम वहां होते तो यकीनन चित्रकार से यही पूछते कि यह चित्र क्या कह रहा है?
            यकीनन वह चित्रकार हमारी हालत भी वही करता। यह अलग बात है कि हमारी तर्कशक्ति और वाणी प्रहार का उसे सामना तो करना ही पड़ता। लेखन के प्रारंभिक दौर में हमारा संपर्क जनवादी तथा प्रगतिशील विचाराधारा के लेखकों से रहा है।  उस समय तक हमारे समझ में उनके समूहों का रूप नहीं आता था। कालांतर में अध्ययन के साथ यह बात सामने आयी कि यह विचारधारा के लेखक अपने एतिहासिक इष्टों के स्वप्न संसार का बोझ ढोते हैं। आधुनिक चित्रकला जगत में कई ऐसी प्रतिमायें हैं जिन्हें जो इस संसार के विषयों को सत्य मानते हुए  उसे अपनी कल्पनाशक्ति से बदलना भी चाहते हैं।  भारतीय अध्यात्म दर्शन उनके लिये जड़ता का प्रमाण या बुर्जूआवादी है। इन स्वप्नजीवी लोगों के संसार पर अधिक बात करना बेकार है पर एक बात महत्वपूर्ण है कि उनकी रचनायें पढ़ने में मजा आता है।  इंटरनेट पर इनके लेख पढ़ने पर यह तो पता लगता है कि अपनी विचाराधारा के प्रतिबद्धता निभाने में वह अन्य विचाराधारा के लेखकों से आगे हैं  वह भाषा सौंदर्य की जिस तरह प्रस्तुति करते हैं वह प्रशंसनीय है।  जिस इंटरनेट पर लिखने के लिये किसी प्रकार के लेखन नियम की आवश्यकता अधिक नहीं है वहां भी यह अपने पाठों में उसका पालन करते हैं।
            किस्सा हमारी दिल्ली यात्रा का है। हम वहां पारिवारिक काम से गये थे।  वहां साकेत के एक मॉल में जाना हुआ। उसमें स्टील के बर्तनों का एक पेड़ खड़ा किया गया था।  हमें देखकर आश्चर्य हुआ। समझ में नहीं आया कि यह है क्या? अगर बर्तनों की दुकान मानी जाये तो यह प्रश्न था कि कोई विक्र्रेता वहां दिखाई नहीं दे रहा था।  अगर यह माना जाये कि यह सामान बिकने के लिये यहां लाया गया है और फिर किसी दुकान में सजाया जायेगा यह भी नहीं लग रहा था। सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह हमारी आंखों को प्रिय लगने की बजाय चुभने वाला एक ढेर लग रहा था।  हमारे साथ चले लोग उसे आश्चर्य चकित होकर तो देख रहे थे पर अधिक देर प्रभावित रहें हों यह नहीं लगा। यह जल्दी समझ में आ गया कि यह वहां हाल की सजावट का हिस्सा है पर आकर्षक नहीं लगा।  देखा जाये तो सजावट पर पैसा खर्च करना है इसलिये कुछ अनोखा किया जाये इसी मद्देनज़र यह रचना हुई होगी। फिर पैसा है तो आदमी यह नहीं देखता कि वह कौनसी चीज खरीद रहा है। वह तो यह दिखाता है कि उसके पास पैसा है जिससे कुछ अनोखा खरीद सकता है।  इस तरह स्टील के बर्तनों के ढेर पर हम अपने शहर की बाज़ारों में वहां देख सकते हैं जहां बर्तनों का बाज़ार लगता है। सीधी बात कहें तो आखों के सामने कोई अनोखापन नहीं आ रहा था।
            आज एक जनवादी ब्लॉग पर एक पाठ पढ़ने पर पता चला कि यह भी एक व्यवसायिक कला बन गयी है।  एक कलाकार का नाम उसमें आया जिसने इससे बहुत पैसा बनाया है।  हमारा मानना है कि यकीनन वह पेड़ इसी कलाकार का रहा होगा।  हमसे गलती यह हुई कि हमने वह पेड़ तो देखा पर उसके आसपास कहीं कुछ नहीं देखा। संभव है कि वहां उसका नाम लिखा होता। बहरहाल कलाकार के नाम की बात करें तो ब्लॉग में बताया गया कि स्टील के इस तरह की कलाकारी में धातुकर्म से जुड़े मजदूर लगते हैं, कलाकार केवल अपनी कल्पना के आधार पर चित्र का सृजन एक इंजीनियंर कर तरह करता है।  एक तरह से कहें तो वह नाम का कलाकार है पर चूंकि उसका व्यवसाय इसी तरह का है इसलिये उसे यह उपाधि मिलती है। वह पूर्वकाल में चित्रकार भी रहा है।
            हम उस ब्लॉग लेखक के आभारी है जिसने यह जानकारी दी दूसरी बात यह कि हम खैर मना रहे हैं कि वह लेखक या उसका प्रशंसक वहां नहीं था वरना हमने साथियों के सामने उस कलाकृति का उपहास उड़ाया था।  कम से कम हमें स्टील के बर्तनों की वह कलाकृति प्रभावपूर्ण नहीं लगी थी और उस पर तमाम तरह की व्यंग्यात्मक टिप्पणियां अपने मुख से निकली थीं। अगर जनवादी सुनते तो प्रसन्न होते क्योंकि पूंजीवाद की मूर्खतापूर्ण रूप जिस तरह सामने आ रहे है उस पर टिप्पणियां सटीक बैठती थीं।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Feb 15, 2014

विदुर नीति-काम निकलने के बाद कोई पूछता नहीं है(vidur neeti-kam nikalne ke baad koyee poochhta nahin hai)



      इस रंगीबिरंगी दुनियां का खेल निराला है।  सकाम रूप से लिप्त लोग अनेक बार यह सोचकर संताप भोगते हैं कि हमने दूसरों के लिये बहुत कुछ किया पर हमें सभी ने धोखा दिया। अपनी संतान को लेकर भी लोग अनेक प्रकार के ऐसे अनुभव करते हैं कि उन्होंने जिनके लिये जीवन जिया वही उनको छोड कर बाहर चले़ गये।  निष्काम भाव से काम करने वालों को कभी संताप नहीं होता। जिन लोगों ने भारतीय अध्यात्म दर्शन में मन बसा लिया है उनके लिये तो बस ही सिद्धांत होता है कि नेकी कर और दरिया में डाल।
      सुबह का समय धर्म के लिये आरक्षित है। इस दौरान जिसने तन और मन की कमाई कर ली उसे धन की चिंता नहीं सताती।  दोपहर के अर्थकाल के दौरान वह अपना मन सांसरिक कार्यों में उतना ही लगाता है जिससे देह का सात्विक  व्यवसाय से भरणपोष हो सके। वह  अपने सांसरिक दायित्वों का यह सोचकर निर्वहन करता है कि उनको किसी दूसरे पर छोड़ना न मुमकिन है न उचित।  ऐसे दायित्व पूरे हो जायें तो बहुत अच्छी बात है भले ही उसका कोई प्रत्यक्ष लाभ न हो पर मन को शांति तो मिलनी चाहिए।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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षडिमें षटसु जीवन्ति सप्तमो नीपलभ्यते।
चौराः प्रमत्ते जीवन्ति व्यधितेषु चिकित्सकाः।।
प्रमादा कामयानेषु यजमानेषु याजकाः।
राजा विवदमानेषु नित्यं मूर्खेषु पण्डिताः।।
     हिन्दी में भावार्थ-कोई भी मनुष्य छह दूसरे प्रकार के मनुष्यों अपनी जीविका चलाता है, सातवें की उपलब्धि नहीं है। चोर असावधान, चिकित्सक रोगी, मतवाली स्त्रियां कामी, पुरोहित यजमान, राजा झगड़ालू तथा विद्वान मूर्खों से अपनी जीविका चलाता है।
षडेते ह्यमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम्।
आचार्य शिक्षिताः शिष्यः कृतदाराश्च मातरम्।।
नारीं विगतकायास्तु कृतार्थाश्चि प्रयोजकम्।
नांव निस्तीर्णकांतारा आतुराश्च चिकित्सकम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-छह प्रकार के लोग अपने उपकारी का समय आने पर तिरस्कार करते हैं। शिक्षा समाप्त होने पर शिष्य गुरु, विवाहित पुत्र पालकों, कामवासना शांत होने पर पुरुष स्त्री, कार्य निकलने पर पूरुष सहायक, नदी पार करने पर सवार नाव तथा स्वस्थ होने पर रोगी चिकित्सक का तिरस्कार करते हैं।

      जिंदगी लंबी है और इसमें लोग मिलते और बिछड़ते हैं। कुछ लोग काम करवाने के लिये निकट आते हैं और उसके बाद पूछते भी नहीं।  किसी के साथ वर्षों तक साथ काम करते हुए मित्रता हो जाती है।  जब वह कहीं चला गया तो भूल जाता है। निष्कामी लोग जानते हैं कि इस जीवन में मनुष्य भले ही दैहिक रूप से वैसा ही रहे पर उसका भाव स्थान, अर्थ तथा समय के अनुसार बदलता रहता है। कहा जाता है कि जो चूल पर साथ ही वही दिल के पास है। अगर हम श्रीमद्भागवत गीता का संदेश समझें तो मनुष्य त्रिगुणमयी माया के वश में होकर ही सारे काम करता है।  ऐसे वह जिस सांसरिक विषय से जुड़ता है पूरी तरह से उसमें समर्पित हो जाता है।  यह संभव है कि इस दौरान ही किसी व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बने पर जब उस विषय से दूर हो जाये तो यकीनन हमें भी उससे दूर होना पड़ेगा। ऐसे में स्वयं को पीड़ा देने की बजाय हमें सच्चाई का ज्ञान करना चाहिए।
      जीवन में प्रतिदिन नये दृश्य घटित होते हैं किसी में हम नायक होते हैं किसी में दूसरा इसका श्रेय पाता है। हमें किसी की उन्नति देखकर स्वयं पीड़ित होने की बजाय अपने काम पर ध्यान रखना चाहिए।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Feb 8, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-मौन रहने के लाभ उठाना सीखें(bhartrihari neeti shatak-maun rahane ke labh uthana seekhen)



      प्रकृत्ति ने मनुष्य को बुद्धि का इतना बड़ा खजाना दिया है कि उससे वह अन्य जीवों पर शासन करता है। हालांकि अज्ञानी मनुष्य इसका उपयोग ढंग से नहीं करते या फिर दुरुपयोग करते हैं।  मनुष्य अपनी इंद्रियों में से वाणी का सबसे अधिक दुरुपयोग करता है। मनुष्य के मन और बुद्धि में विचारों का जो क्रम चलता है उसे वह वाणी के माध्यम से बाहर व्यक्त करने के लिये आतुर रहता है। आजकल जब समाज में रिश्तों के बीच दूरी बनने से लोगों के लिये समाज में आत्मीयता भाव सीमित मात्रा में उपलब्ध है तथा  आधुनिक सभ्यता ने परिवार सीमित तथा सक्रियता संक्षिप्त कर दी है तब मनुष्य के लिये अभिव्यक्ति की कमी एक मानसिक तनाव का बहुत बड़ा कारण बन जाती है।  परिवहन के साधन तीव्र हो गये हैं पर मन के विचारों की गति मंद हो गयी है।  लोग केवल भौतिक साधनों के बारे में सोचते और बोलते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति उनकी रुचि अधिक नहीं है इससे उनमें मानसिक अस्थिरता का भाव निर्मित होता है।
      समाज में संवेदनहीनता बढ़ी है जिससे लोग एक दूसरे की बात समझत नहीं जिससे आपसी विवाद बढते हैं। विषाक्त सामाजिक वातावरण ने लोगों को एकाकी जीवन जीने के लिये बाध्य कर दिया है।  यही कारण है कि अनेक लोग अपने लिये अभिव्यक्त होने का अवसर ढूंढते हैं जब वह मिलता है तो बिना संदर्भ के ही बोलने भी लगते हैं।  मन के लिये अभिव्यक्त होने का सबसे सहज साधन वाणी ही है पर अधिक बोलना भी अंततः उसी के लिये तकलीफदेह हो जाता है। वाणी की वाचलता मनुष्य की छवि खराब ही करती है। कहा भी जाता है कि यही जीभ छाया दिलाती है तो धूप में खड़े होने को भी बाध्य करती है।

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिमिंतम् छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदा समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-परमात्मा ने मनुष्य को मौन रहने का गुण भी प्रदान किया है इसके वह चाहे तो अनेक लाभ उठा सकता है। जहां ज्ञानियों के बीच वार्तालाप हो रहा है तो वहां अपने अज्ञानी मौन रहकर स्वय को विद्वान प्रमाणित कर सकता है।

      हम जब बोलते हैं तो यह पता नहीं लगता कि हमारी वाणी से निकले शब्द मूल्यवान है या अर्थहीन। इसका आभास तभी हो सकता है जब हम मौन होकर दूसरों की बातों को सुने। लोग कितना अर्थहीन और कितना लाभप्रद बोलते हैं इसकी अनुभूति होने के बाद आत्ममंथन करने पर  ही हमारी वाणी में निखार आ सकता है। दूसरी बात यह भी है कि हमारा ज्ञान कितना है इसका पता भी लग सकता है जब हम किसी दूसरे आदमी की बात मौन होकर सुने।  इसके विपरीत लोग किसी विषय का थोड़ा ज्ञान होने पर भी ज्यादा बोलने लगते हैं। आज के प्रचार युग में यह देखा जा सकता है कि साहित्य, कला, धर्म और संस्कृति के विषय पर ऐसे पेशेवर विद्वान जहां तहां दिखाई देते हैं जिनको अपने विषय का ज्ञान अधिक नहीं होता पर प्रबंध कौशल तथा व्यक्तिगत प्रभाव के कारण उनको अभिव्यक्त होने का अवसर मिल जाता है।
      कहने का अभिप्राय है कि आत्मप्रवंचना कर हास्य का पात्र बनने की बजाय मौन रहकर ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जहां चार लोग बैठे हों वह अगर उनके वार्तालाप का विषय अपनी समझ से बाहर हो तो मौन ही रहना श्रेयस्कर है। आजकल वैसे भी लोगों की सहनशक्ति कम है और स्वयं को विद्वान प्रमाणित करने के लिये आपस में लड़ भी पडते हैं। विवादों से बचने में मौन अत्यंत सहायक होता है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Feb 1, 2014

अपना रक्तचाप न बढ़ाओ-हिन्दी व्यंग्य कविता ------------------



लोकतंत्र का खेल है उसके गुण गाते जाओ,
कुर्सी के खेल की धारा में बहस कर ं शब्द बहाते जाओ।
कहें दीपक दीपक बापू महंगाई कभी कम नहीं होती,
भ्रष्टाचार वह राक्षस है जिसकी आंख कभी नहीं सोती।
देश में हर कदम पर स्वर्ग बसाने का वादा मिलता है,
चालाक लोगों के मजे है भला इंसान सभी जगह पिलता है।
कोई विकास का नारा देता कोई ईमानदार बनकर आता है,
बदलाव के नारे बहुत सुनते पर समाज पीछे ही जाता है।
समाज सेवा में पेशेवरों ने बना लिया है अपना ठिकाना,
चंदे से  अपने घर चलाते मजबूरी उनकी दान करते दिखाना।
आखों से खबरे पढ़ो और देखो कानों से  सुनो फिर भूल जाओ,
दिमाग में ज्यादा देकर अपना रक्तचाप कभी न बढ़ाओ।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Jan 26, 2014

घर के अंदर और बाहर-हिन्दी व्यंग्य कविता(ghar ke bahar aur bahar-hindi vyangya kavita)



देश के आजादी और गणतंत्र को वही दे रहे गाालियां,
जिन्होंने आम इंसान से बजवाईं अपने लिये तालियां।
कहें दीपक बापू
अपनी अभिव्यक्ति के लिये मिले जिन्हें प्रचार के साधन,
दिखने के रहते बागी पर होते सौदागरों के साजन,
मसलों के लिये जूझते लोगों को देखकर जमाना खुश होता,
पर्दे के पीछे करते वही करते सौदे में समझौता जब वह सोता।
अपनी छवि चमकाने के लिये जो करते दूसरों का अपमान,
दूर बैठे आम इंसानों में ढूंढ रहे अपने लिये सम्मान,
घर से बाहर सड़क पर जूलूस निकाल कर जो लगा रहे नारे
घर के अंदर वही ले जाते सोने बहाकर लाने वाली नालियां।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Jan 20, 2014

अच्छा है चिल्लाने का बहाना-हिन्दी व्यंग्य(achchha hai chillane ka bahana-hindi vyangya)



नित नये स्वांग रचें,
अपने ही सच से आप बचें,
जिंदगी में हर पल एक नया शगूफा छोड़कर
सरल है स्वयं को  बहलाना
मौका मिले तो दूसरे को भी बरगलाना।
कहें दीपक बापू
पर्दे पर चलती खबर
फिल्म की तरह बनी लगती हैं,
पात्रों की अदायें बाद में हुई 
पहले लिखी लगती है,
जब काम न बनता हो अपने आप से
अस्त्र शस्त्रों को पास में दबाकर
भीड़ में हमदर्दी पाने के लिये
अच्छा है चिल्लाने का बहानां
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Jan 10, 2014

लोगों की लाचारी-हिन्दी व्यंग्य कविता (logon ki lachari-hindi vyangya kavita)


ठंड में ठिठुरते हुए बच्चे, औरतें और वृद्ध पुरुष
झौंपड़ी में कांप रहे हैं
जिंदगी उनकी ले रही सासें ठहरकर
अपने दर्द को अपने दिल से ही ढांक रहे हैं।
कहें दीपक बापू
वातानुकूलित शमियानों में
शीतलहर को धोखा देने का स्वांग करते
महलों वाले लोग मजे ले रहें हैं,
संगीत नृत्य के बीच मच रहा जोर
सलामी उनको सौंदर्य प्रसाधनों से
सजे चेहरे दे रहे हैं,
परवाह नहीं बेबस लोगों के मरने की,
शिखर पर सारे साधन उनके पास
नहीं जरूरत किसी से डरने की,
किसकी करें शिकायत
किस पर लगायें आरोप
ज़माने ने उनके वादे अपने सपनों में बसा लिये,
सौंप कर उनके सिंहासन अपने हाथ बांध दिये,
आतिशबाजी जलाकर जश्न मना रहे भलाई के ठेकेदार
लोगों की लाचारी वह भांप रहे हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Dec 27, 2013

आम आदमी और जाम आदमी-हिन्दी हास्य व्यंग्य(aam admi aur jaam aadmi-hindi hasya vyangya-hindi hasya vyangya or hindi satire on comman man)



            हमारे देश में आम आदमी होना कभी गौरव की बात समझी नहीं जाती। कोई कितना भी अच्छा  लेखक, कवि, या चित्रकार हो अगर उसके नाम के समक्ष कोई पद, पदवी या प्रकाशन नहीं है तो उसे समाज में आम आदमी ही माना जाता है। अगर वह कहीं अपने रचनाकर्म की बात करे तो उससे  सवाल यही किया जाता है कि‘तुम उसके अलावा क्या करते हो?’
            हमारे समाज की यह वास्तविकता है कि वह राजकीय छवि की ही प्रशंसा करता है।  भगवान श्रीराम राजपद पर बैठे थे उनका राज्य काल इतना प्रशंसनीय रहा कि लोग आज भी उसे याद करते हैं पर जिन बाल्मीकी महर्षि ने उन पर बृहइ  ग्रंथ की रचना के माध्यम से उनको  भगवान के रूप में समाज के सामने प्रतिष्ठत किया उन्हें  कभीं भगवान का दर्जा नहीं मिला।  जिन महर्षि वेदव्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को भगवत् पर पद प्रतिष्ठत करने के साथ ही श्रीगीता के संदेशों का इस तरह स्थापित किया कि पूरा विश्व उनको मानता है मगर व्यासजी समाज  पूज्यनीय तो बने पर प्रेरक नहीं। कोई व्यक्ति बाल्मीक या वेदव्यास जैसी रचना करने की  दूर यह बात सोच भी नहीं सकता।  जो आम जीवन जी रहा है वह खास बनने के लिये हमेशा बेताब रहता है।
            ‘आम आदमी का भला करना है’ का नारा लगाते हुए अनेक लोग खास बन गये। इतने खास कि उन्हें अब आम आदमी की कतार होने का भय लगता है।  उस दिन एक प्रदेश के राज्यमंत्री का समाचार देखा। वह अब चाय बेचता है।  अपना दर्द बयान कर रहा था।  आम से खास बने लोगों के लिये उसके समाचार  डरावना हो सकते हैं। 
            खास आदमी अपना स्तर बनाये रखने के लिये भारी जद्दोजेहद करता है। इसमें उसे आम से खास बनने से अधिक मेहनत करना होती है। 
            बहरहाल अपने दीपक बापू आजकल भारी परेशानी में है।  स्वयं को आम आदमी कहकर अभी तक अपने फ्लाप होने के आरोप से छिपते फिर रहे थे। अब यह मुश्किल हो गया है।
            उस दिन वह एक किराने की दुकान पर गये। वहां से सौ ग्राम शक्कर खरीदी और अपने घर चल दिये। हालांकि उन्होंने शक्कर खरीदने के लिये  अपने घर से पांच किलोमीटर दूर की दुकान चुनी थी ताकि कोई जान पहचान वाला न देख ले। अभी तक समाज में उनकी  छवि मध्य वर्गीय मानी जाती थी,  पर महंगाई ने उनको निम्न वर्ग में पहुंचा दिया था। यह सच्चाई कोई जान न ले इस कारण दीपक बापू किराने का सामान दूर से ही खरीदते हैं।  मगर उनका दुर्भाग्य भी पीछा नहंीं छोड़ता। वह शक्कर खरीद कर पलटे नहीं कि एक कार उनके पास आकर रुकी। आलोचक महाराज उसमें से निकले। बोले-‘‘कार खाली जा रही है। चलो घर तक छोड़ देता हूं। तुम मुझे पांच रुपये दे देना।
            कंगाली में आटा  गीला। चार रुपये की शक्कर खरीदी थी और पांच रुपये का किराया देना पड़े यह दीपक बापू को मंजूर नहीं था। बहरहाल हास्य कवि-भले ही फ्लाप हो-यह सहन नहीं कर सकता कि कोई उसे इस तरह जलील करे। बोले-‘‘नहीं, मै तो पैदल घर से निकला हूं। मुझें अपनी सेहत बनाये रखनी है।
            आलोचक महाराज हंसे-‘‘तुम्हारी सेहत में ऐसा क्या है जिसे बनाये रखना है।  एकदम दुबले पतले कीकट रखे हो। हमें देखो कितने मोटे ताजे हैं।  तुम्हारे पास अभी पांच रुपये नहीं हों तो बाद में दे देना। इतना उधार तो तुम पर रख ही सकता हूं।’
            दीपक बापू बोले-‘नहीं आप जाईये। मेरे पास पांच रुपये का छुट्टा नहीं है।’’
            आलोचक महाराज बोले-‘‘छुट्टा नहीं है, या हैं ही नहीं! जहां तक मेरा अनुमान है कि तुम्हारी जेब में दस दस रुपये के चार, नहीं हो सकता है कि तीन, नहीं नही मुझे लगता है कि  एक दस के नोट से अधिक नहीं हो सकता।  इधर तुम्हारी हास्य कवितायें छोटी पत्रिकाओं में छपती हैं वहां से पैसा मिलता ही नही है।  इधर उधर टाईप कर कमाने का तुम्हारा धंधा भी अब कंप्यूटर की वजह से कम हो गया है।’
            दीपक बापू हंसे-‘‘बोले आप हंस लीजिये।  आप को तो बड़े बड़े लोगों का संरक्षण मिला हुआ है। हम तो आम आदमी हैं, ऐसे ही फटेहाल ही ठीक हैं।’’
            इसी बीच दुकानदार को किसी दूसरे ग्राहक को देने के लिये खुले पैसे चाहिये थे। वह दीपक बापू के पास आया और बोला-‘साहब आपके पास दस रुपये के खुले होंगे। आपने अभी सौ ग्राम शक्कर खरीदी थी। मैंने सोचा आपके पास जरूर खुले पैसे होंगे। मुझे दूसरे ग्राहक को देने हैं।’’
            दीपक बापू चिढ़कर बोले-‘‘नहीं है! जाओ यहां से!
             उसके दूर होते ही आलोचक महाराज कृत्रिम आश्चर्य से बोले-‘‘आम आदमी! तब तो तुमसे डरना पड़ेगा। अरे, तुम्हें मालुम नहीं है आजकल आम आदमी के नाम से बड़ों बड़ों को पसीना आता है।  आम आदमी नाम का एक संगठन जलवे दिखा रहा है। तुम अगर आम आदमी होते तो यहां सौ ग्राम शक्कर खरीदने पांच किलोमीटर चलकर नहीं आते। यह दुकानदार खुद ही सौ ग्राम की बजाय एक किलो शक्कर देने घर आता।’’
            दीपक बोले-‘एक तो आप हमारी कवितायें छपने के लिये किसी बड़े पत्र या पत्रिका के संपादक से सिफारिश नहीं करते। अब हमारे आम आदमी होने का उपहास तो न उड़ायें जिस पर हम अपनी हास्य कवितायें लिखते हैं।
            आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम अब स्वयं को आम आदमी नहीं जाम आदमी कहा करो। तुमने सुना है कि यह बात आम जाम है।  आम आदमी शब्द तो आम की तरह मीठा हो गया है। अपने को आप आदमी कहने से पहले  दमखम रखना वरना.......कहीं तुमने आम आदमी होने का दावा किया और प्रमाणित नहीं कर सके तो कोई मार मारकर जाम आदमी बना देगा।’’
            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, यही तो हमारे पास एक पदवी थी इसे भी अगर आप खास लोग छीन लेंगे तो बचा ही क्या?’’
            आलोचक महाराज बोले-‘‘भईये देख लो! हम तो तुम्हें आम आदमी नहीं जाम आदमी ही कहेंगे। आम आदमी तो विकास पथर पर चलता है, तुम जाम आदमी की तरह खड़े हो। दूसरी बात अपनी हास्य कविताओं में अब आम आदमी के दर्द पर रोना नहीं क्योंकि अब वह योद्धाओं की पहचान बन गया है।’’
            दीपक बापू   सोचने की मुद्रा में बोले-‘मगर जाम आदमी शब्द भी नहीं चल पायेगा।  ऐसा करते हैं सामान्य आदमी शब्द चल जायेगा।’
            आलोचक महाराज ने पहले आकाश में देखते हुए बोले-देखो भई, आम इंसान शब्द थोड़ा ठंडा है। हास्य कविताओं में नहीं चल पायेगा। जाम आदमी जमेगा।’’
            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप छोड़ें। आम आदमी शब्द आपको ले जाना है तो ले जायें रहा हमारी हास्य कविताओं के प्रभाव का सवाल! आप परेशान न हों! हमारी हास्य कवितायें आपकी सिफारिश चाहे न पायें पर उनका प्रभाव शब्दों की वजह से हमेशा रहेगा।  हम आम इंसान से ही काम चला लेंगे।
            आलोचक महाराज गुस्से में कार के अंदर चले गये। दीपक बापू परेशान हाल घर की तरफ चल पड़े। सौ ग्राम शक्कर खरीदने की पोल से अधिक उनको इस बात की चिंता थी कि आम आदमी शब्द उनकी लेखनी से दूर जा रहा था।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com