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Jun 3, 2010

इश्क, एसोसिएशन और विज्ञापन-हास्य कविता (ishq,association and vigyapan)

छद्म नाम बताकर,
पराया फोटो लगाकर,
आशिक और माशुका ने
अपनी इश्क की कहानी रचाई,
हुई दोनों की पहली मीट
जो उनकी पहली और आखिरी मुलाकात का संदेश लाई।
माशुका गरजते बोली
‘हद हो गयी गयी इंटरनेट पर धोखे की,
कंप्यूटर की लोग इज्जत इतनी करते
जितनी कागज के खोखे की,
अब मैं एक माशुका एसोसियेशन बनाऊंगी,
आशिकों के धोखे से बचाने के लिये
नयी पीढ़ी की लड़कियों में
चेतना और जागरुकता पैदा करूंगी
जिसे बुढ़ापे तक चलाऊंगी,
कब तक सहूंगी यह सब
तुम्हारे साथ इश्क कर मैंने छठी बार चोट खाई।’

सुनकर आशिक भी दहाड़ा,
कविता ऐसे सुनाने लगा जैसे पहाड़ा,
आंखों से खून की धारा बह आई।
वह बोला
‘तुम्हारी एसोसिएशन के जवाब में
मैं भी आशिक एसोसिएशन बनाऊंगा,
छद्म नाम और पराये फोटो वाली
फर्जी माशुकाओं के जाल से बचाऊंगा,
इश्क के धोखे की इंटरनेट से कर दूंगा सफाई।’

सुन रहा था पास में एक
वेबसाईट लिखने वाला
उसके दिमाग में भी एक योजना आई।
मन ही मन कहने लगा
‘अच्छा है जो मेरे सामने हुई यह लड़ाई,
अब दोनों के पाठों का अपनी ’इश्क साईट’ पर लिंक दूंगा,
यह दोनों तो ठहरे फोकटिया,
मैं ठहरा पुराना पोपटिया,
इनका लिखा मजेदार होगा
पाठक मिलेंगे ज्यादा
जिससे अपने विज्ञापनों से चार पैसे कमा लूंगा,
फिर दावा करूंगा कि
इश्क जगत में कचड़ा साफ कर ला रहा हूं सफाई।
इसलिये आशिक माशुका एसोसिशन को
अपनी साईट से जोड़ रहा हूं
लोग पढ़ें और समझें
करें न एक दूसरे से बेवफाई।
अंतर्जाल लेखकों में माननीय भी हो जाऊंगा
इधर करूंगा कमाई।’
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Mar 26, 2010

हर काम का दाम-व्यंग्य कविता (word and prize-hindi satire poem)

लोहे के सामान में जान फूंकने वाला
पेट्रोल मंहगा
और आदमी को जिंदगी देने वाला
पानी बहुत सस्ता है।
बहाते हैं लोग पानी मु्फ्त का मानकर
पर पैट्रोल की कदर करते महंगा जानकर
बिना दाम लिये भलाई करने से
खुद के दिल को तसल्ली जरूर हो जाती है
पर जमाने में कद्र पाने के लिये
हर काम का दाम
वसूल करने का ही एक रस्ता है।
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जो तराशे गये हीरे
वह मुकुट में सज गये,
जिन पर नहीं पड़ी किसी की नज़र
वह खदान में ही सड़ गये।
दोष हीरों का नहीं
कद्रदानों का है
जिनकी नज़रें अब दौलत पर ही रहती हैं
कई तो हीरे के भाव लेकर पत्थर भी जड़ गये।
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कवि,लेखक-संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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Feb 3, 2010

महानायक-हिन्दी व्यंग्य कविता (great actor-hindi comic poem)

पर्दे पर अभिनय करते हुए

कई लोग महानायक हो जाते हैं,

जमीन पर कभी नहीं पड़ते उनके पांव

कभी खेतिहर तो कभी मजदूरी का करते अभिनय

गरीब के हमदर्द की भूमिका में

बटोरते हुए तालियां

किसान प्रेमी होने का दिखावा करते 

पर देखा न होता कभी गांव,

फिर भी आम इंसानों की आखों में

फरिश्तों की तरह बस जाते हैं।

जमीन पर अब नहीं पैदा होते

अत्याचारों से जुझने वाले नायक,

दौलतमंदों की तारीफों में जुटे गायक,

हर कोई बस, पर्दे पर चमकने के लिये

जद्दोजेहद कर रहा है

सच में कारनामों को अंजाम देने की जगह

अफसानों में अदायें भर रहा है

बिना पसीना बहाये पैसा पाने की चाहत,

जल्दी कामयाबी से पाना चाहते दिल की राहत,

पूरा जमाना पका रहा है ख्वाबी पुलाव

इसलिये कागज के पन्नों पर

या पर्दे पर ही महानायक नज़र आते हैं।

जमीन का सच कड़वा है

उससे आम इंसान  भी मुंह फेर जाते हैं।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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