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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

May 28, 2010

खूनखराबे का रोग-हिन्दी शायरी (khoonkharabe ka rog-hindi shayari)

वह खून की होली खेलकर
लाल क्रांति लाने का सपना दिखा रहे हैं,
भरे पेट उनके रोटी से
खेल रहे हैं
बेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,
हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके
वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं।
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गोली का जवाब गोली ही हो सकती है
जानवरों से दोस्ती संभव है,
अकेले आशियाना बनाकर
जीना भी बुरा नहीं लगता
जहां पक्षी करते कलरव हैं,
पर हैवानों से समझौता कर
अपनी अस्मिता गंवाना है,
लड़ने के लिये उनको
फिर लाना कोई नया बहाना है,
कत्ल करने के लिये तत्पर हैं जो लोग,
उनको है खूनखराबे का रोग,
कत्ल हुए बिना वह नहीं मानेंगे,
जिंदा रहे तो फिर बंदूक तानेंगे,
सज्जन होते हैं ज़माने में
असरदार उन पर ही मीठी बोली हो सकती है।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Dec 10, 2008

‘अपने हों या किराये के पंख’ इस पर नहीं सोचते-व्यंग्य कविता

जो है गिद्ध वही कहलाने लगे सिद्ध
नजरें ही जिनकी काली हैं
हीरे और पत्थर की नहीं पहचान
पर पारखी के नाम से प्रसिद्ध
लाज लुटने की फिक्र किसे है
यहां तो अपनी आबरु बेचने पर
आमादा है जमाना
नैतिकता बस एक नारा है
लगाने में अच्छा लगता है
पर जो चलता है वह बिचारा है
यह तो इंसान बस चाहता है बनना
पैसा और पद
जिससे हो जाये प्रसिद्ध
............................

ईमान की बात क्या
आदमी खुद ही बिकने को है तैयार
नहीं मिलते अब आजादी के साथ
जिंदगी गुजारने की चाहत रखने वाले
गुलाम बनने के लिये सब हैं तैयार
इसी चाहते में बनते ं होशियार
कतारें लगी हैं लंबी उनकी
आदमी हो या औरत
इस पर बहस करना है बेकार
ऊंचा उड़ने की ख्वाहिश में
बंधी हैं जंजीरें उनके पांवों में
अपने हों या किराये के पांख
इस पर सोचने में नहीं करते
वह कोई विचार

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Oct 5, 2008

महामशीन, महादानव और छठा तत्त्व-व्यंग्य चिंत्तन

महामशीन का महाप्रयोग हो गया। कुछ समय तक उसे महादानव कहकर भी प्रचारित कर प्रचार माध्यमों ने आम लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। संभवतः लोगों का ध्यान नहीं जा रहा था इसलिये उसका नकारात्मक प्रचार कर पश्चिम के वैज्ञानिकों ने उस महामशीन का नाम प्रतिष्ठित किया। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि नाम करने के लिये बदनाम होने को भी कुछ लोग तैयार हो जाते हैं। कहते हैं कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है‘। शायद इसी तर्ज पर तमाम तरह की बातें की गयीं।

भारतीय संचार माध्यमों को भी अपने लिये चार दिन तक खूब सक्रियता दिखाकर अपने ग्राहकों को संतुष्ट करने का सुंदर अवसर मिला। विज्ञान की फतह-हां, यही शब्द प्रयोग किया है प्रचार माध्यमों ने उस सफल प्रयोग के लिये। पहले महादानव अब महादूत बन गया लगता है। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि पहले किसी को दानव बनाओ फिर देवदूत। इससे किसी विषय को लंबा खींचने का अवसर तो मिलता ही है उससे वह व्यक्ति भी संतुष्ट हो जाता है जिससे बदनाम किया गया पर ऐक बेजान मशीन को जिस तरह प्रचारित किया गया उसे प्रचार के बाजार में सक्रिय लोगों की तारीफ करने का मन करता है।

अब बात करें उस महादानव या महामशीन की जिसे आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी गयी है। वह ब्रह्माण्ड की उत्पति के रहस्य को जानना चाहते हैं। आश्चर्य है कि जो विषय विज्ञान की परिधि से कोसों दूर है वह उस पर काम कर रहे हैं। दुनियां की कोई शय उस रहस्य को नहीं देख सकती। जीवन से पहले और मृत्यु के बाद के रहस्य विज्ञान की शक्ति से बाहर हैं। उन्हें वही ज्ञानी जान सकता है जिसने अपनी इस देह से तपस्या की हो। यह काम हमारे ऋषि और मुनि कर चुके हैं। उन्होंेने इस ब्रह्माण्ड की उत्पति का रहस्य पहले ही बता दिया है।

उसकी संक्षिप्त कहानी इस तरह है कि सत्य बरसों तक ऐसे ही पड़ा हुआ था। उसे इतना समय व्यतीत हो गया कि वह स्वयं को असत्य समझने लगा तब वह प्रयोग करने निकला। पांच तत्व (प्रथ्वी,आकाश.जल.आकाश.और वायु) कणों के रूप में-जिन्हें आधुनिक भाषा में अणु भी कह सकते हैं-उसके समक्ष पड़े हुए थे। वह उनमें दाखिल हो गया तो उस देखने, सुनने सूंघने, और स्पर्श करने का अवसर मिला। वह इन तत्वों से निकल आया पर उसके अंश इसमें छूट गये और वह पांचों तत्व बृहद रूप लेते गये। उनके आपसी संपर्क से ब्रहमाण्ड का सृजन हुआ। यह कथा व्यापक है और इस पर चर्चा आगे भी की जा सकती है।

हमारे देश के ज्ञानी महापुरुषों ने पहले ही इसे जान लिया है। अब विज्ञान की बात करे लें। विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों तक ही कार्य कर सकता है। उन्होंने इस महाप्रयोग में जिन भी चीजों का उपयोग किया वह कहीं न कहीं इसी धरती पर मौजूद हैं। यानि पांच तत्वों में एक तत्व। फिर जल, वायु और अग्नि का भी उन्होंने उपयोग किया होगा। चलो यह भी मान लिया। उन्होंनें आकाशीय तत्व के रूप में गैसों का भी प्रयोग किया होगा। हां, इसके बिना सब संभव नहीं है। मगर वह सत्य का तत्व जो निर्गुण, निराकार, और अदृश्य है उसका उपयोग वह नहीं कर सकते थे। उसे कोई छू नहीं सकता, उसे कोई देख नहीं सकता और जिसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है उस सत्य तत्व का प्रयोग केवल कोई तपस्वी ही कर सकता है। उस सत्य तत्व की केवल अनुभूति की जा सकती है और उसके लिये ध्यान और योग की प्रक्रिया है। जो इन प्रक्रियाओं से गुजरते हैं वही उसकी अनुभूति कर पाते हैं।

भारतीय अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति इस सत्य का जानता है फिर यह कौनसे ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने का प्रयास कर रहे है। यह अलग बात है कि अंग्रेजी की शिक्षा पद्धति ने लोगों को अपना अध्यात्मक भुला दिया है पर फिर भी कुछ लोग हैं जो इस सत्य का धारण किये रहते हैं। आधुनिक विज्ञान मंगल और बृहस्पति तक पहुंच गया है। हो सकता है वह सूर्य तक भी पहुंच जाये। वह ब्रह्माण्ड के अंतिम सिरे तक पहुंच जाये पर वह सत्य उसे नहीं दिखाई देगा। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के साथ ही विज्ञान का भी पोषक है। श्रीमद्भागवत गीता में विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है। क्योंकि धर्म की रक्षा के लिये अस्त्रों और शस्त्रों का प्रयोग अवश्यंभावी होता है इसलिये विज्ञान का विरोध करना तो मूर्खता है पर उसकी सीमाऐं हैं यह सत्य भी स्वीकार करना चाहिए।
हमारे देश ने एक समय योग साधना और ध्यान को नकार दिया था। पश्चिम से आयातित इलाज को ही प्राथमिकता दी जाने लगी। अब यह रहस्य तो सभी जगह उजागर है कि आधुनिक चिकित्सा के पास रोग को रोकने की क्षमता है पर मिटाने की नहीं। इसलिये अब डाक्टर ही अपने मरीजों को योगसाधना करने का मशविरा देते हैं। यानि भारतीय ज्ञान की अपनी महिमा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिम विज्ञान ने आत्मा का वजन 21 ग्राम बताया है जबकि उसका तो कोई वजन है ही नहीं। आदमी मर जाता है तो उसका इतना वजन इसलिये कम हो जाता है क्योंकि कुछ हवा पानी म्ृत्यु के समय निकल जाता है। भारतीय और पश्चिम के विज्ञान बारंबार कहते हैं कि उनको ं ब्रह्माण्ड का रहस्य जानना है मगर पांच तत्वों के मेल से बने इस ब्रह्माण्ड को जानने के लिये क्या वैज्ञानिकों से किसी छठे तत्व को भी अपने प्रयोग को शामिल किया था। अरे, भई वह छठा तत्व किसी की पकड़ में नहीं आ सकता।

दुनियां का सबसे बड़ा प्रयोग-यही नाम उसे दे रहे हैं। लगता है कि वैज्ञानिकों के पास कोई काम नहीं बचा है। हमारे हिसाब से वैज्ञानिकों के पास एक काम है जिस पर वह नाकाम हो रहे हैं। वह यह कि बिना तेल के कार,स्कूटर,वायुयान और घर की बिजली जल सके इस पर उनको काम करना चाहिये। परमाणु ऊर्जा के उपयोग से जो पर्यावरण प्रदूषण होता है उसकी तरफ अनेक वैज्ञानिक इशारा करते हैं। अगर वैज्ञानिको को करना ही है तो ऐसे यंत्र बनाये जो कि सूर्य से इस धरती पर आने वाली ऊर्जा का संयच तीव्र गति से कर सकें और बिना तेल और लकड़ी के लोगों का खाना बन सके। अभी तक तो धरती पर मौजूद तेल,गैस और अन्य रसायनों के भंडारों से ही सारा संसार चल रहा है। मतलब यह कि अभी धरती पर ही विजय नहीं पायी और आकाश में ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने चले हैं। अनेक लोग बिचारे रोज अखबार और टीवी इसलिये ही खोलकर देखते हैं कि कहीं कोई ऐसी चीज बनी गयी क्या जिससे बिना तेल और बिजली के उनका काम चल सके। स्कूटर चलाने के लिये अभी भी पैट्रोल पंप पर जाना पड़ता है और गैस के लिये फोन करना पड़ता हैं। कंप्यूटर चलाने के लिये लाईट खोलना पड़ती है। यह सब सौर ऊर्जा से हो जाये तो फिर माने कि विश्व के वैज्ञानिकों ने तरक्की की है।

जहां तक इन पश्चिमी वैज्ञानिकों की बात है वह अनेक तरह के अविष्कारों से नये नये साधन बना चुके हैं पर ऊर्जा के मामले में फैल हैं। परमाणु ऊर्जा का नाम बहुत है पर उसे केवल बम की वजह से जाना जाता है जो अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये थे। अगर उससे कुछ बिजली बनी भी है तो वह कोई समस्या का हल नहीं हैं। बात तो तब मानी जाये जैसे स्कूटर हर कोई आदमी चला लेता है वैसे ही उसके पास ऐसे साधन भी हों कि वह घर बैठे ही सूर्या से ऊर्जा एकत्रित कर उसे चला सके। कहीं ऐसा तो नहीं पश्चिम के वैज्ञानिक केवल उसी स्तर तक काम करते हों जहां तक आम आदमी सुविधाओं का दास बने और स्वतंत्र रूप से विचरण न कर सकें। इस महाप्रयोग का प्रचार कितना भी हो पर वह छठा तत्व-जिसे वैज्ञानिक जानने का प्रयास ही नहीं कर रहे-विज्ञान के कार्य करने की परिधि से बाहर है, यह बात तय है।
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Nov 5, 2007

रास्ते तो बनते हैं बिगड़ते हैं

अपने रास्ते को नहीं जानते जब
दूसरे के पद चिन्हों पर चलते हैं
जब कोई अपना ख्याल नहीं बनाते
दूसरे के नारों पर कहानी गढ़ते हैं
जब अपने शब्द नहीं रच पाते
तब दूसरे के वाद पर
अपने प्रपंच रचते है

पुराने बिखर चुके विचार
नयेपन की हवा से दूर होते हैं
हम तरक्की की चाह में
बेकार अपने सिर ढोते हैं
कहवा घरों और चाय के गुमटियों पर
चुस्कियाँ लेते हुए अपनी गरीबी और बीमारी
पर बात करते हुए रोते हैं
पर इससे घर और देश नहीं चलते हैं

हाथ में सिगरेट लेकर रास्ते पर चलते हुए
टीवी के कैमरे के सामने अपने विचारों की
आग उगलते हुए
अपने को बहुत अच्छे लगते हैं
गरीबी और भुखमरी पर लिखते हैं
बडे-बडे ग्रंथ
शब्दों में मार्मिकता का बोध गढ़ते हैं
पर यह तुम्हारा गढा गया सोच
कभी गरीब और भूख से बेजार लोगों का
पेट नहीं भर सकता
जिनके लिए तुम सब रचते हो
वही लोग उसे नहीं पढ़ते हैं

सच तो यह है कि
गरीबी के लिए चाहिऐ धन
भूख के लिए रोटी
जिस आकाश की तराग देखते हो
दोनों वहाँ नहीं बनते हैं
इसलिए चलते जाओ रास्ता सामने है
खडे होकर बहस मत करो
रेत और पानी की धाराओं से
इस धरती पर रास्ते बिगड़ते और बनते हैं

Nov 3, 2007

पाकिस्तान में सरकार पुरानी, इमरजेंसी नयी

पाकिस्तान में फिर इमरजेंसी लगा दी गयी है। अगर देखा जाये तो हालत वैसे ही जैसे नवाज शरीफ के तख्ता पलट के समय थे, पर इस बार कोई तख्ता पलट नहीं है पर मुशर्रफ ने ऐसा माहौल बनाया गया जैसे कोई तख्ता पलट हो रहा हो। इसमें में कोई शक नहीं है की मुशर्रफ में ऐसी चालाकी हो यह कभी नहीं लगता पर उनके पीछे कोई बहुत चालाक खोपडी है जो उनका संचालन कर रही है। सामने कोई नहीं है पर मुशर्रफ ऐसे सिद्ध हैं कि दुनिया को भूत दिखा रहे हैं। हमने कई भूत भगाने वाले ओझा देखे हैं पर मुशर्रफ जैसा नहीं देखा। हमेशा गरजने वाला अमेरिका भी केवल दु:ख व्यक्त कर रहा है। पिछले आठ वर्ष से मुशर्रफ वहाँ राज्य कर रहे हैं पर हालत बिगड़ते रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में लड़ने निकले मुशर्रफ से किसी ने नहीं पूछा कि 'जनाब, यह आतंकवाद आया कहाँ से?' आठ वर्ष से जूझ रहे मुशर्रफ अब तक आतंकवाद पर काबू नहीं पा सके। अमेरिका ने जिस तरह पाकिस्तान में अपना उपनिवेश कायम कर रखा है वह अब उसे तकलीफ देह होने वाला है।

मुझे लगता है कि यह इमरजेंसी बहुत दूर तक जाने वाली है। जिसे पाकिस्तान कहा जाता है उसका राजनीतिक मानचित्र कुछ भी कहता हो पर उसका संविधान बलोचिस्तान और सीमा प्रांत के इलाकों में नाम भर को चलता है। अंग्रेजों ने इस देश पर डेढ़ सौ वर्ष राज्य किया पर फिर भी यह उनकी निजी जागीर नहीं था जो सिंध, बलूचिस्तान और सीमा प्रांत और पूर्वी बंगाल पाकिस्तान के नाम पर लिख गए। पूर्वी बंगाल तो पाकिस्तान से अलग हो गया पर बाकी तीनों प्रांत भी अब इस रास्ते पर हैं। मैंने अंतर्जाल पर अंग्रेजी में कई पाकिस्तानी ब्लोग देखे हैं और मुझे उनको पढ़ने पर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि क्या वह उनके ही हैं या कोई छद्म ब्लोग हैं। पाकिस्तान पर बहुत समय तक पंजाब से प्रभावित लोगों का राज्य रहा है। उनका नजरिया केवल पंजाब के हितों तक ही सीमित रहा है। वैसे पाकिस्तान में आपातकाल लगना कोई बड़ी बात नहीं है पर इस बार का संकट पाकिस्तान के अस्त्तित्व के लिए चुनौती बनने जा रहा है-और जो लोग सोच रहे हैं कि मुशर्रफ इसे बचा लेंगे वह गलती पर हैं।

वैसे पाकिस्तान एक राष्ट्र है इस बात की पोल तो कई बार खुल चुकी है पर नवाज शरीफ की हाल ही में पाकिस्तान वापसी के समय एक छोटे देश के राजदूत ने उन्हें समझौते के वह दस्तावेज दिखाए जो उन्होने अपनी रिहाई के लिए उसको गवाह बनाकर दस्तक किये थे-यह बात का खुला प्रमाण था कि पाकिस्तान में अन्य राष्ट्रों की कितनी चलती है। अभी तक हर संकट में पाकिस्तान की सेना मजबूत रहती थी पर इस बार वह वजीरिस्तान में ऐसी जंग में फंसी हुई है जहाँ से उसका निकलना अगले कई बरसों तक संभव नहीं है। यह ऐसे इलाके हैं जिन पर अंग्रेज भी कभी पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाए और लोग भी वह हैं जो आज कश्मीर का हिस्सा आज पाक के पास है वह इन्हीं कबाइलियों के वजह से है। इस बार पाकिस्तान की सेना उनसे लड़ रही है जो पाकिस्तान के लिए एक हथियार रहे हैं।
भारत तो सदियों से पाकिस्तान के क्षेत्रों से आने वाले संकटों का सामना करता रहा है और वह आने वाली इस उथल-पुथल से उपजे संकट को भी झेल लेगा पर विश्व के अन्य देशों को वहां से आतंकवाद निर्यात होने वाला संकट और भी बढ़ सकता है। पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न राष्ट्र है और कई लोगों को शक है कि वहाँ से परमाणु तकनीकी आतंकवादियों के हाथ लग सकती है। यह कोई साधारण बात नहीं है कि पाकिस्तान एक परमाणु राष्ट्र है उसकी अस्थिरता अब पूरे विश्व के लिए खतरा है। मुशर्रफ बहुत समय तक पूरे विश्व को धोखा नही दे सकते और फिर उन पर आतंकवाद को पनपाने का आरोप है और आज वह उससे संघर्ष जिस तरह कर रहे हैं लोग उनकी नीयत पर शक करते हैं। इसी आतंकवाद का भी उन्होने इस बार ऐसा भूत खडा किया और अपने को पूरे विश्व में स्वीकार्य दिखाने का जिस तरह प्रयास किया उससे तो यह सवाल यह उठता है कि आखिर वह दोस्त किसके हैं-अमेरिका के, आतंकवादियों के या अपनी कुर्सी के। बहरहाल अगर सब कुछ पटरी पर नहीं आया तो पूरा विश्व इस घटनाक्रम प्रभावित होगा।

Sep 8, 2007

दृष्टा बनकर जो रहेगा

अगर मन में व्यग्रता का भाव हो तो
सुहाना मौसम भी क्या भायेगा
अंतर्दृष्टि में हो दोष तो
प्राकृतिक सौन्दर्य का बोध
कौन कर पायेगा
मन की अग्नि में पकते
विद्वेष, लालच, लोभ, अहंकार और
चिन्ता जैसे अभक्ष्य भोजन
गल जाता है देह का रक्त जिनसे
तब सूर्य की तीक्ष्ण अग्नि को
कौन सह पायेगा
अपने ही ओढ़े गये दर्द और पीडा का
इलाज कौन कर पायेगा
कहाँ तक जुटाएगा संपत्ति का अंबार
कहाँ तक करेगा अपनी प्रसिद्धि का विस्तार
आदमी कभी न कभी तो थक जाएगा
जो दृष्टा बनाकर जीवन गुजारेगा
खेल में खेलते भी मन से दूर रहेगा
वही अमन से जीवन में रह पायेगा
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Aug 4, 2007

जीवन के खेल निराले

आँखों से देखने की चाहत में
कई लोगों को गर्त में
गिरते देखा है
बोलने के लिए चाहे जैसे
शब्द दूसरों पर पत्थर की
तरह फेंकने वालों को
अपने ही वाक जाल में
फंसते देखा है
झूठ और दिखावटी अभिनंदन के
लिए उठने वाले हाथों को
हाथकडी में बंधते देखा है

इन सबसे परे होकर
जो रखते हैं अपने
मन पर नजर
जीभ से निकले शब्दों में
जिनके होता है मिठास
हाथ उठते हैं
जिनके केवल सर्वशक्तिमान के आगे
उन्हें ही सहज भाव से
जीवन जीते देखा है
--------------

May 29, 2007

कुछ न लिखने से तो कविता लिखना ही अच्छा

NARAD:Hindi Blog Aggregator
पिछले कई दिनों से मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोग ब्लोगों पर आने वाली कविताओं पर ज्यादा खुश नहीं होते उनको लगता है कि ऐसे लोग केवल जगह घेर रहे हैं। जैसे-जैसे ब्लोगों के संख्या बढ रही है वैसे वैसे कविताओं की रचनाएं में भी बढ़ना स्वाभाविक हैं । इस पर नाखुश होने की बजाय ऐसे कवियों को प्रोत्साहन ही दिया जाना चाहिए जो विपरीत हालतों में कुछ लिख तो रहे हैं, और हिंदी ब्लोग अभी अपने शैशव काल में है और उसे इस तरह की रचनाओं की आवश्यकता भी है । अभी तो कई लोगों को यही नहीं पता कि हिंदी में ब्लोग लिखे कैसे जा सकते हैं । मैं अपने आस-पास के लोगों को जब अपने ब्लोगों के बारे में बताता हूँ तो वह सुनते हैं पर उनके कोई ऎसी प्रतिक्रिया नहीं देते जिससे मेरा उत्साहवर्धन हो । स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती है और लोग जब मुझसे मिलते हैं तो उनकी प्रशंसा करते हैं। वह मेरे रचना पर मेरे सामने सकारात्मक और कुछ लोग नकारात्मक प्रतिक्रिया भी व्यक्त करते हैं। जितना पिछले तीन माह में जितना मैं इन ब्लोगों में लिख चुका हूँ उतना तो मैं दो साल में भी नहीं लिख पाता , पर नये शौक़ की वजह से यह कर पा रहा हूँ पर वास्तविकता यह है कि इसमें जितनी मेहनत है उतनी कोई करना नहीं चाहेगा । कोई आर्थिक फायदा न हो तो ऐसा मनोरंजन भी कौन चाहेगा ?

मेरे मित्र मुझसे हमेशा कहते हैं तुम तो कवितायेँ न लिखकर केवल व्यंग्य, कहानी और हास्य-व्यंग्य लिखा करो । मेरे एक मित्र है जो अक्सर मुझे मेरी गद्य रचनाओं पर दाद देते हैं पर जब कोई कविता छपती है तो उसकी चर्चा नहीं करते । एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आप कभी मी कविताओं पर दाद नहीं देते क्या बात है?

तो वह मुझसे बोले कि -" तुम जो कवितायेँ लिखते है उनमें विषय अत्यंत गूढ़ होते है या एकदम हलके और उनका प्रस्तुतीकरण भी काव्यात्मक कम गद्यात्मक अधिक होता है और मुझे लगता है कि तुम मेहनत से बच रहे है और दूसरा यह कि इतनी गूढ़ बात पर मैं उससे ज्यादा पढना चाहता हूँ जितना आपने लिखा होता है, तुम्हारे गद्य रचनाओं का तो मैं प्रशंसक हूँ । "

उनकी बात सुनकर मैं हंस पडा तो वह बोले-'' मैं सच कहूं कि तुम गद्य ही लिखा करो, और लोग भी तुम्हें गद्य लेखक के रुप में ही देखना चाहते हैं। कविता तो कोई भी लिख सकता है ।"

कई पत्रिकाओं के संपादक भी मुझसे पद्य रचनाओं की बजाय गद्य रचनायें ही माँगते हैं। फिर भी मौका मिलते ही मैं कविता लिखने से बाज नहीं आता, क्योंकि कई बार कविता विषय कोई संजोये रखने के काम भी आती है। कई बार ऐसे अवसर आते हैं कि किसी घटना को देखकर कोई विचार पैदा होता है तो उस समय इतना समय नही होता कि या मन नहीं होता कि कोई गद्य रचना लिखी जाये तब कविता में उसे लिखकर संचित किया जाना भी कोई आसान कम नहीं है पर अगर उसमें दक्ष हैं तो गद्य लेखन भी आसान होता है ।

अभी मेरे इसी ब्लोग पर पिछली रचना "हाँ, मैं उसे जानता हूँ" मेरे पास रजिस्टर में पद्य के रुप में दर्ज थी और उसे मैं ब्लोग पर उसी रुप में लिखने वाला था पर मुझे लगा कि इसे थोडा विस्तृत ढंग से लिखने का प्रयास करना चाहिए, और तब मैंने यह महसूस किया कि अगर मैं उस समय इस पर कविता नहीं लिखता तो शायद इस गद्य के रुप में प्रस्तुत नहीं कर सकता था।जब मैंने युनिकोड में लिखने का प्रयास शुरू किया तो सबसे पहले कविताएं लिखीं थी और आज भी जब मैं वह पढता हूँ तो लगता है ब्लोग पर जो शुरूआत में कवितायेँ लिख रहे हैं उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिऐ-इस बात के लिए कि वह विपरीत परिस्थतियों में भी लिख रहे हैं । यह देश बहुत विशाल है उतना ही व्यापक हिंदी भाषा का प्रभाव है। हिंदी में लिखने वाले कई नए लेखकों तो यह पता ही नहीं है कि ब्लोग क्या चीज है और हिंदी के गोदरेज टाईप का उनका ज्ञान बहुत अच्छा है, अपने अनुभव से मैं यह जान गया हूँ कि उनके लिए युनिकोड में लिए एक नया अनुभव होगा और बिना किसी प्रोत्साहन के वह शायद ही इतनी मेहनत करने को तैयार हौं, खासतौर से जब इसमें किसी आर्थिक लाभ की कोई ज्यादा आशा तत्काल न हो।
अत: नए लोगों को उनके कविताओं पर भी दाद अवश्य दीं जानी चाहिए। जहाँ तक मेरी काव्य रचनाओं का सवाल है वह अपने विषयों को सजोये रखने के लिए करता ही रहूँगा । अभी मुझे समय लगेगा बड़ी रचनाओं को -जैसे कहानी व्यंग्य , और आलेख-प्रस्तुत करने में समय लगेगा क्योंकि वह एक बैठक में लिखे नहीं जा सकते , और उसे पहले लिखने से पहले कागज पर उतरना जरूरी होगा। मैंने अभी तक जो लिखा है वह सीधे कंप्युटर पर टाईप किया है और कभे स्वयं ही लगता है कि मैं इसे बेहतर करूं। यह तय है पहले कागज़ पर लिख कर उसे फिर कम्प्यूटर पर उतारने में मजा आयेगा। फिलहाल अपने हाथ को साफ करने के लिए कवितायेँ लिख रहा हूँ और चाहता हूँ कि जो नए लिखने वाले कवितायेँ लिख रहे हैं उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।

May 24, 2007

झूठी शान की खातिर

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रुप रचाएं साधू का
चाल, चरित्र और चाहत असाधु की
यज्ञ करें राष्ट्र के कल्याण के लिए
मूहं मैं राम, बगल में छुरी
बगला भगत पर टिकी धर्म की धुरी
कौन किसको साधे
कौन किससे सधे
सबने निज स्वार्थ ओढ़ लिए
माया के अँधेरे में भटक रहे हैं
एअर कन्डीशन कमरे में सांस ले रहे हैं
भ्रम,भय और भ्रष्टाचार का अँधेरा फैलाकर
लोगों को रोशनी के अहसास बैच रहे हैं
खालीपन है सबकी आँखों में
इन्सान तरस रहा है
इन्सान देखने के लिए
कहीं समंदर का पानी मीठा बताएं
कभी भगवान को दूध पिलायें
कही मूर्ती के आंसू टपक्वायें
इंसानियत और ईमान ढूंढते थक गये
किसी इन्सान में देखने के लिए
कौन कहता है कि
मजहब नहीं सिखाता बैर रखना
दुनियां में हर जंग पर
धर्म-मजहब का नाम है
इंसानों के बीच खडी है दीवार
इनके नाम पर
सब लड़ रहे है अपने -अपने
पंथ के गौरव के लिए
बनाया था इश्वर ने
इन्सान को आजादी से
जीने के लिए
उसने स्वर्ग के मोह में
अपने को गुलाम बना लिया
जात , भाषा और धर्म की
झूठी शान की खातिर लड़ने के लिए
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May 17, 2007

जब सब्जी खरीदने में कला की जरूरत नहीं होगी

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रांची और इन्दौर में सब्जी के फूटकर व्यापारियों द्वारा द्वारा रिलायंस और सुभीक्षा के कंपनियों के व्यापार में प्रवेश का जमकर विरोध किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि विश्व बाजार में आ रहे परिवर्तनों का भारत के परंपरागत व्यापार पर प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है , हालांकि इन दोनो जगह हो रहे प्रदर्शनों में वहां के स्थानीय कारण ही जिम्मेदार लगते हैं , और इन दोनों कंपनियों के सब्जी के फूटकर व्यापार में प्रवेश से कोई ज्यादा भूचाल आने वाला है इसकी कोई अभी निकट भविष्य में संभावना भी नहीं लगती।

देश में मौजूद कुछ मॉल में यह काम पहले ही शुरू हो चुका है और कहीं से किसी प्रकार के विरोध की खबर नहीं थी , और अचानक इस तरह विरोध शुरू होने के पीछे कोई राजनीतिक या स्थानीय व्यवसायिक कारण होने की संभावना इसी लिए भी हो सकती है क्योंकि जिन इलाकों में यह मॉल हैं या तो पोश इलाक़े हैं या नगरों के मध्य में स्थित हैं , और वहां से कुछ लोगों को ज्यादा फायदा है और वह इसे गवाना नहीं चाहते । भारत में जितने भी महानगर और नगर हैं वहां सब्जी मंडियां है और शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहाँ कोई इलाका सब्जी मंडी के रुप में नहीं जाना जाता हो।खेरीज सब्जी व्यापार और उत्पादन में करोड़ों लोगों लगे हैं और एक अरब दस करोड़ की आबादी वाले इस देश में कोई एक कंपनी इसका व्यापार करने का सामर्थ्य नहीं रखती । परंपरागत खैरिज सब्जी व्यापार के मूल स्वरूप में बदलाव आने में अभी कयी बरस लग जायेंगे । हाँ अगर यह कंपनिया जब पूरे सामर्थ्य सा काम करेंगी तो उन इलाकों और उपभोक्ताओं की रुचियों पर नियत्रण कर सकती हैं जो नए और धनाढ्य प्रवृति के हैं। अभी इन इलाकों पर रैहडी वालों का एक छत्र नियंत्रण है और एक तरह से माने तो यह भारत के परंपरागत खैरिज व्यापार का ही नया रुप हैं जो शहरों के ब्रह्द रुप लेने की साथ ही पनपा है , जब शहर छोटे थे तो लोग पैदल ही मंडी की तरफ निकलकर अपना सामान ले आते थे। अब जब सभी जगह कालोनियां बन गयी हैं तो रेह्डी वालों को भी वहाँ सब्जी बेचकर रोजगार प्राप्त करने का अवसर मिल गया। अब इन कंपनियों के आने से उन्हें एक ऎसी चुनौती का सामना उन्हें करना होगा जिसके लिए वह तैयार नहीं है,और इस तरह प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि इसके लिए कोई वह उचित कारण नहीं बता सकते क्योंकि यहां सभी को व्यापार करने का अधिकार प्राप्त है वह चाहे कोई कंपनी क्यों न हो।दरअसल अब उनके सामने अपने व्यवसाय को विश्वसनीय बनाने के चुनौती आने वाली है। अभी तक उन्होने अपना व्यवसाय किया पर आम उपभोक्ता कभी उनसे सन्तुष्ट नहीं रहा और कम तोलना और अधिक भाव बताने की आदत ने समाज में ऎसी हालत बना दीं कि आज सब्जी बेचना नहीं बल्कि खरीदना एक कला माना जाता है। इस मामले में मुझे हमेशा परिवार में फिसड्डी माना जाता है, पहले पिताजी कहते थे कि"-तुझे कभी सब्जी खरीदने के अकल नहीं आयेगी। "और अब यही ताने हमारी श्रीमती देतीं है कि आपको तो कभी सब्जी लेना नहीं आयेगी ।

रविवार को सत्संग के बाद हम दोनों एक सप्ताह की सब्जी खरीने मंडी जाते है। मैं स्कूटर बाहर खड़ा कर किराने का सामान खरीदने बाजार चला जाता हूँ हमारी श्रीमती सब्जी वालों से झिकझिक कर अपनी खरीद कर आती हैं और मैं बाजार से लौटता हू फिर दौनों घर आते हैं। वह इन सब्जी वालों की ख़ूब शिक़ायत करती हैं-हालांकि कुछ सब्जी वालों को वह ईमानदार भी मानती है और जो सब्जी उनसे मिलती है उसे खरीदकर ही दूसरी सब्जी उन लोगों से खरीद्ती हैं जिन पर उनका यकीन कम है। इस क्रम में एक वाक़या मुझे याद है जो सब्जी व्यापार के खेरीज विक्रीताओं के लिए एक सबक है। हुआ यह कि एक बार नाप्तोल वालों ने रविवार को मंडी के बाहर अपना शिविर लगाया , उस दिन सभी सब्जी वालों ने दाम बड़ा दिया और तर्क दिया कि आज हम पूरी तरह से सही तौल दे रहे है क्योंकि बाहर नाप्तोल वाले बैठे हैं कहीं फंस न जाये इसीलिये दाम कम नहीं करेंगे और न कम तौलेंगे -अगर कहें कि आज कम तौलने का अवसर नहीं है अत: अपने पूरे दाम लेंगे। उस समय हमारी श्रीमतीजी की टिप्पणी थी कि काश यह नापतौल वाले हर रविवार को आयें ताकी मैं इस झिकझिक से बच सकूं। कालोनी में आने वाले ठेले वालों से वह एकदम नाखुश रहती है और कहती हैं कि नाप में कम भाव में ज्यादा केमामले में तो वह मंडी वालों से भी आगे हैं -हालांकि उनका मानना है सब ऐसे नहीं है पर जो लोग सही हैं उनके लिए भी कम मुसीबत नहीं है लोग उनके एकदम उचित दाम और सही नापतौल का सम्मान नहीं करते।

मैं अपने लिए फल लाता हूँ तो वह उनमें उनके खराब, कच्चा और वजन में कम होने की बात जरूर करती हैं और दाम के बारे में तो यही कहती हैं कि महंगा है और वैसे भी तुम कहाँ कम करने के लिए कहते हो।मॉल के मामले में भी उनका कहना है वहां सब्जियाँ रखी हुयी मिलती है। मतलब वह अभी भी वह उसी ढंग से सब्जी खरीदने के लिए तैयार है जैसे अभी तक कर रहीं थीं। जबकि मैं सोच रहा था कि अब सब्जी खरीने में किसी कला की जरूरात नहीं पडेगी। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है शोर ज्यादा है और तथ्य कम है कि कंपनियों के कारोबार से सब्जी बेचने वाले बेरोजगार हो जायेंगे। अभी बाज़ार बहुत बड़ा है और परंपरागत उपभोक्ता भी बहुत हैंजो शायद इन उंचे शोरूम की तरफ बरसों तक मुहँ उठाकर भी न देखें । हाँ , वह उपभोक्ता उनके पास जाएगा जो सब्जी खरीदने की कला में दक्ष नहीं है-हालांकि उनमें भी बहुत से लोग वहाँ नहीं जाएंगे

May 11, 2007

आध्यात्म यानी आत्मसाक्षात्कार का साधन

हम जब भी कुछ विचार करते हैं तो उसका केंद्र इस संसार में मौजूद तत्व ही होते हैं जो हमें दिखाई देते हैं जिनका मूल स्वभाव ही नश्वर है। परमात्मा से बिछडे आत्मा तत्व की तरफ हम देखते तक नहीं जो हमारी देह को धारण किये हुए हां और जो अविनाशी भी है। हम देख-और सुख के मायावी जाल में इस तरह फंसे हैं कि लगता है बस यह सांसरिक तत्व ही सत्य है और केवल उसमें ही फंसकर अपना जीवन गुजार देते हैं , और उस आत्मा से कभी नहीं जुड़ते जो सदैव हमारी और इस भाव से ताकता रहता है कि हम उससे संपर्क करेंगे। पंच तत्वों से बनी इस देह में रहने वाली तीन प्रक्रतियां अहंता, ममता और वासना सदैव हमारी बुध्दी और मन को इस तरह फंसाये रहती हैं कि हम अपने आत्मा पर जीवन भर दृष्टि नहीं कर पाते और ढ़ेर सारी तकलीफें झेलते हैं। सरलता से जिस जीवन को जिया जा सकता है उसमें हम ढ़ेर सारे तकलीफें स्वयं बुला लेता हैं। आप सोच रहे होंगे कि कोई वृध्द व्यक्ति अपनी रोनी रो रहा है। ऎसी बात नहीं है न मैं वृद्ध हूँ न नवयुवक । तनाव के पल मेरे लिए भी आते हैं पर उस समय मैं अपने इष्ट का स्मरण करता हूँ तब हस पड़ता हूँ, लगता है कि इसे मैं अपना दु:ख क्यों समझ रहा हूँ यह तो देह के साथ लगा ही रहेगा। मैं सभी प्रकार के सांसरिक कार्य करते हुए भी उनमें पाने भाव को लिप्त नहीं करता , यह राज केवल मैं ही जानता हूँ पर मेरे निकट के लोग इसका आभास तक नहीं कर पाते, वह सोचते हैं कि मैं हंस रहा हूँ पर मैं केवल इस दुनियां में लोगों का पाने देह पर अभिमान को देखकर हंसता हूँ। मैं अगर किसी का काम करता हूँ तो वह खुश होकर मुझे धन्यवाद देता है पर मुझ पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता क्योंकि जो काम मैं करता हूँ उसका करतार स्वयं को नहीं मानता। बचपन से लेकर आज तक भगवान् की भक्ती करते हुए मैं मन मैं कोई कामना नहीं रखता क्योंकि मेरा मनाना है कि जो हुआ वह तो होना ही था और जो रहा है उस पर मेरा बस नहीं है जो होना है वह अटल है, फिर उस अपने इष्ट से मैं क्या माँगूं जिसने इस देह में सारे कार्य करने की शक्ति दीं है । और हम कोई भी सांसारिक कार्य उससे संपन्न कर सकते है तो फिर हम उस परमपिता के सामने क्यों हाथ फैलाते हैं ? जी समय हम उसे अपने ह्रदय में धारण कराने का प्रयास करते हैं तब हमारे अन्दर मौजूद अहंता,ममता और वासना तीनों मिलाकर हमें कुछ मांगने के लिए प्रेरित करती हैं और हम भगवन से वह माँगते है, जबकि उस समय कुछ न सोचे तो वह हमारे अन्दर स्थापित होकर हमें परमानंद की अनुभूति करायेगा पर उस समय भे सांसरिक बात सोचकर हम वह कीमती समय नष्ट कर देते हैं। शेष आगे

May 3, 2007

लिखना है तो लिखना है

मैं क्यों लिखता हूँ , मुझे नहीं मालुम ! अब सवाल भी अपने से है जवाब भी स्वयं ही देना है। लेखक होने के कारण भावुक हूँ और यह भावुकता इसके मुझ को मजबूर करती है । यह जरूर नहीं है कि हर भावुक व्यक्ति लेखक हो पर लेखक भावुक होता हो इसमें संशय नहीं है , यह अलग बात है कि अपनी संवेदनशीलता को अपने शब्दों में कितना पिरो सकता है यह वही जानता है । बात लिखने की चल रही है और मैं अपने लिखने का उद्देश्य तलाशना चाहता हूँ। मैंने लिखना अपने अकेलेपन में स्वयं को तलाशने के लिए किया था-और यह सिलसिला शुरू हुआ तो यह भाव बना कि लोग इसे पढ़ें । देश के कयी अखबारों में छपने के साथ मेरी लिखने की भूख भी बढती गयी और फिर धीरे धीरे विरक्ति होती गयी और फिर टीवी पर क्रिकेट देखने की आदत ने अपना लिखा बाहर भेजना बंद किया और फिर लिखना भी कम हो गया । मैंने एक बात अनुभव की जब मैं नहीं लिखता तो मेरा मन परेशान हो उठता था , और जब लिखता तो मेरे अन्दर एक खुशनुमा अहसास होता। लिखते समय मैं एक बात का ध्यान रखता हूँ कि मैं अपना तनाव मन की खिड़की से बाहर फैंक रहा हूँ पर वह मेरी रचना के पास से निकल रहे पाठक पर नहीं गिरना चाहिए। कभी भी मैं नकारात्मक विचारधारा का समर्थक नहीं रहा, और किसी पर अपने लिखने से व्यक्तिगत आक्षेपों से दूर ही रहता हूँ । किसी एक घटना पर लिखने में मजा नहीं आता और न ही उसमें कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है। एक समय पर एक कोई घटना जब होती है तो हम समझते हीं कि वह केवल वहीं हुयी है जबकि वैसी घटना विगत में हो चुकी होती है और भविष्य में भी होने की तैयारी होती है -बस पात्रों के नाम, स्थान और समय बदलता रहता है।जब मेरे मन में हलचल होती है तो उस पर नियन्त्रण करने के लिए मैं कलम उठा लेता हूँ-अब आप कह सकते हैं कि कंप्युटर पर आ जाता हूँ। मेरे मन की पीडा लिखने को प्रेरित करती है। पीड़ा के उदगम और विसर्जन के बीच की प्रक्रिया के बीच चिंतन और मनन चलता रहता है।कम्पूटर की भाषा में कहें तो प्रोसेस चलता रहता है। मेरे प्रयास रहता है मी पीडा के विसर्जन से दूसरी जगह उदगम नहीं होना चाहिऐ। जिन लोगों में अपनी गलती से सीखने की आदत होती है वह कभी निराश नहीं होते -उन्हें अपने हादसों से ही ज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास हो जाता है। जो लोग अपनी नाकामियों की गलती दूसरों पर डालते हैं और हादसों से जो बिखरने लगते हैं वह कभी लिख नहीं सकते और न ही बोल पाते हैं और उनके पास घुटने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता। एक लेखक के रुप ने मुझे कभी इस स्थिति में नहीं आने दिया । लोग विरोधाभासों में जीते है पर उनेह इसकी अनुभूति नहीं होती । मैं भी कयी बार अपने अन्दर इन विरोधाभासों को देखता हूँ और उन पर दृष्टि रखता हूँ । विरोधाभास का मतलब एक घटना पर एक तर्क और वैसी घटना दूसरी जगह होने पर दूसरा तर्क देना। अपने साथ कोई बात होने पर एक तर्क वैसी ही बात दुसरे के साथ होने पर दूसरा तर्क देना एक मंवील स्वभाव का हिस्सा है। कई बार ऎसी स्थिति आने पर मैं ऐसा करता हूँ पर कम से कम मैं अपने अन्दर इस बोध के साथ रहता हूँ पर लोग अपने को भुलावे में डालने में सफल हो जाते हैं। मैं समय की बलिहारी मान लेता हूँफिर मैं क्यों लिखता हूँ ? इसका उत्तर मैंने लिखते लिखते ढूँढ लिया । हमारी सारी इन्द्रियां अपने मूल स्वरूप के अनुसार काम करती हैं-जैसे आँखों का काम है देखना वह देखती हैं ,कानों का काम है सुनना वह सुनते हैं, नाक कान है सूंघना वह सून्घती हैं , मस्तिष्क का काम है सोचना वह सोचता है और मुख का काम है भोजन ग्रहण करना और शब्दों के उदगम स्थल के रुप में अपनी भुमिका का निर्वहन करना। लिखना किसी भी इन्द्रिय का मौलिक काम नहीं है और वह केवल स्व प्रेरणा से ही संभव है । स्व प्रेरणा से कोई भी कार्य करने में जो अनुभूति है उसे लेखन के द्वारा ही महसूस किया जा सकता है । मेरा लिखना निरुद्देश्य है पर निष्फल नहीं है क्योंकि इससे न केवल मुझे आनंद मिलता है वरन अनेक अच्छे मित्र इसी लेखन के जरिये मिले हैं और सम्मान भी मिला है।इण्टरनेट पर ब्लोग बनाने का फैसला मेरी गलतियों का परिणाम से हे हुआ। दरअसल मैं कुछ ढूँढ रहा था और मैं सोच रहा था कि मैं वही कर रहा हूँ। पता लगा कि एक ब्लोग बन गया है , समझ में कुछ आया नहीं अचानक नारद पर बने ब्लोग की याद आयी । नारद को भेजी गयी एक रचना अभी एक रचना एक वेब मेगजीन अभिव्यक्ति में छपी है जो इस बात का प्रमाण है मेरा उस समय ज्ञान कितना था। मैं आज भी नारद पर जाने के लिए पहले अभिव्यक्ति का दरवाजा खट ख्ताता हूँ। कर रहा था नारद से संपर्क और सोचता था कि पत्रिका से कर रहा हूँ । अपनी गलतियों और हादसों से बचने के लिए लिखना भी एक कारण है पर इन्टरनेट पर उनसे भी पीछा नहीं छूटता । सोचा गलती से ब्लोग बना और हादसे से नारद में प्रव्वेश हुआ , तो लिखो कोई पूछे तो पूछता रहे कि तुम लिखे क्यों हो?

May 1, 2007

मजदूर दिवस:श्री गीता में है समाजवाद का संदेश

"जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुध्द सत्वगुण से युक्त पुरुष संशय रहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।"
श्री मद्भागवत गीता के १८वे अध्याय के दसवें श्लोक में उस असली समाजवादी विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जो हमारे देश के लिए उपयुक्त है । जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारे इस ज्ञान सहित विज्ञानं से सुसज्जित ग्रंथ में कोई भी संदेश विस्तार से नहीं दिया गया है क्योंकि ज्ञान के मूल तत्व सूक्ष्म होते हैं और उन पर विस्तार करने पर भ्रम की स्थिति निमित हो जाती है, जैसा कि अन्य विचारधाराओं के साथ होता है। श्री मद्भागवत गीता में अनेक जगह हेतु रहित दया का भी संदेश दिया गया है।
आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी और उन्हें करेंगे वह लोग जो स्वयंभू मजदूर नेता और समाज के गरीब तबकों के रक्षक होने का दावा करते हैं और इस दिन घड़ियाली आंसू बहाते हैं। अगर उनकी जीवनशैली पर दृष्टिपात करें तो कहीं से न मजदूर हैं और न गरीब। भारत में एक समय संगठित और अनुशासित समाज था जो कालांतर में बिखर गया। इस समाज में अमीर और गरीब में कोई सामाजिक तौर से कोई अन्तर नहीं था। श्री मद्भाग्वत गीता में ऊपर लिखे श्लोक को देखें तो यह साफ लगता है अकुशल श्रम से आशय मजदूर के कार्य से ही है । आशय साफ है कि अगर आप शरीर से श्रम करे हैं तो उसे छोटा न समझें और अगर कोई कर रहा है तो उसे भी सम्मान दे। यह मजदूरों के लिए संदेश भी है तो पूंजीपतियों के लिए भी है । और हेतु रहित दया तो स्पष्ट रुप से धनिक वर्ग के लोगों के लिए ही कहा गया है-ताकी समाज में समरसता का भाव बना रहे। आमतौर से मेरी प्रवृत्ति किसी में दोष देखने की नहीं है पर जब चर्चा होती है तो अपने विचार व्यक्त करना कोई गलत बात नहीं है उल्टे उसे दबाना गलत है । कार्ल मार्क्स एक बहुत बडे अर्त्शास्त्री माने जाते है जिन के विचारों पर वामपंथी विचारधारा का निर्माण हुआ और जिनका नारा था "दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ"। सोवियत रूस में इस विचारधारा के लोगों का लंबे समय तक राज रहा और चीन में आज तक कायम है । शुरू में नये नारों के चलते लोग इसमें बह गये पर अब लोगों को ल्गंने लगा है कि अमीर आदमी भी कोई ग़ैर नहीं वह भी इस समाज का हिस्सा है । जब आप किसी व्यक्ति या उनके समूह को किसी विशेष संज्ञा से पुकारते हैं तो उसे बाकी लोगों से अलग करते हैं और आप फिर कितना भी दावा करें कि आप समाजवाद ला रहे हैं गलत सिध्द होगा। भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके गुणों, कर्म और व्यक्तित्व के आधार पर तय होती है और उसके व्यवसाय और आर्थिक आदर पर नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो संत शिरोमणि श्री कबीरदास, श्री रैदास तथा अन्य अनेक ऎसी विभूतियाँ हैं जिनके पास कोई आर्थिक आधार नहीं था और वे आज हिंदू विचारधारा के आधार स्तम्भ माने जाते हैं , कुल मिलाकर हमारे देश में अपनी विचारधाराएँ और व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इस समाज को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया है और इसीलिये वर्गसंघर्ष के भाव को यहां कभी भी लोगों के मन में स्थान नहीं मिल पाया-जो वामपंथी विचारधारा का मूल तत्व है। परिश्रम करने वालों ने रूखी सूखी खाकर भगवान का भजन कर अपना जीवन गुजारा तो सेठ लोगों ने स्वयं चिकनी चुपडी खाई तो घी और सोने के दान किये और धार्मिक स्थानों पर धर्म शालाएं बनवाईं । मतलब समाज कल्यान को कोई अलग विषय न मानकर एक सामान्य दायित्व माना गया।
मैं कभी अमीर व्यक्ति नहीं रहा , और मुझे भी शुरूआत में अकुशल श्रम करना पडा, पर मैंने कभी अपने ह्रदय में अपने लिए कुंठा और सेठों कि लिए द्वेष भाव को स्थान नहीं दिया। गीता का बचपन से अध्ययन किया हालांकि उस समय इसका मतलब मेरी समझे में नहीं आता था पर भक्ती भाव से ही वह मेरे पथ प्रदर्शक रही है। आज के दिन अकुशल काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ही संदेश मैं देना चाहता हूँ कि अपने को हेय न समझो । सेठ शाहुकारों के लिए भी यह कहने में कोइ संकोच नहीं है अपने साथ जुडे मजदूरों और कर्मचारियों पर हेतु रहित दया करें ।

Apr 22, 2007

माया का जिनपर है वरदहस्त, दर्शन पर उनका पहला हक

अगर कोइ दौलत,शौहरत और सुपर हिट बेटे और बहु वाला कोई शख्स किसी मंदिर के दर्शन करने जाता है और आम श्रध्दालू के लिए दर्शन बंद कर वहां के प्रबंधक उस महान शख्सियत को पहले दर्शन का अवसर देते है तो हमारे देश का मिडिया बहुत शोर मचाता है । किसी एक घटना का यहां उल्लेख करना बेकार -क्योंकि पिछले छह महीनों में ऐसा एक अभिनेता और दो दो मुख्यमंत्रियों की घटना तो चर्चा का विषय ज्यादा बनीं पर कुछ को थोडा ही कवरेज़ मिला। जब में अपना व्यंग्य या चिन्तन लिखता हूँ तो एक घटना से प्रभावित नहीं होता कयी घटनाएं घट चुकीं होतीं हैं तो कुछ वैसी ही घटने वाली होती हैं।
मामला है जब कोई वी.आयी.पी.जब किसी मंदिर में दर्शन करने जाता है तो वहां आम आदमी का प्रवेश निशिध्द हो जाता। इस पर मीडिया तो नाराज होता है कुछ बुध्दिजीवी लोगों को भी भारी आपत्ति होती है मैं उनसे सहमत नहीं होता। वजह ! हमारे आध्यात्म में साकार और निराकार दोनों रुप में इश्वर की उपासना की जाती है। तुलसीदास, कबीरदास, रहीम, सूरदास, और मीरा जैसे संत-कवियों ने पद्य रचनाओं का न केवल हिंदी साहित्य में वरन हमारे अध्यात्म में महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि सगुण और निर्गुण दोनों तरह की भक्ती का संदेश उनमें अंतर्निहित है। हमारे देश में गीता के संदेश के रुप में एक ऐसा ज्ञान है जिसको कोई भी चुनौती नहीं दे सकता। जो हमारा इश्वर है वह हमारे मन में है, उससे बाहर ढूँढने के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। फिर भी मैं मंदिर जाता हूँ अपने इष्ट की बाह्य अनुभूति करना भी अच्छा लगता है। मतलब मंदिर जाने से अपने मन में एक स्फूर्ति पैदा होती है। जिस दिन मंदिर नहीं जाता उस दिन अटपटा लगता है। मतलब अपनी भक्ती का लोजिक मैं समझा नहीं सकता। एक बार मैं एक मंदिर गया, उस समय मंदिर में ज्यादा भीड़ नहीं थी , मैं मंदिर के अंडर दाखिल हुआ तो एक वी.आयी.पी.भी वहां दाखिल हुए उनके साथ सुरक्षा गार्ड और अन्य लोग भी थे । मेरे देखते देखते सब लोग भगवान् की प्रतिमा के पास पहुंच गये। रोका तो किसी को नहीं गया पर उनकी भीड़ इतनी थी कि वहां अन्दर कोई खङा न रह सके । मैं एक तरफ खड़ा हो गया । अपने आप पर स्वयं पर ही रोक लगादी। जब वह चले गये तब मैंने वहां ध्यान लगाया । एक अन्य सज्जन भी मेरे साथ वहां मौजूद थे, जब मैं ध्यान लगाकर बाहर निकल रहा था तो वह मुझसे बोले ,"अच्छा ही हुआ जो आप और मैंने बाद में दर्शन और ध्यान किया। पहला दर्शन का हक इन्हीं बडे लोगों को ही है आख़िर इन पर भगवान् ने ख़ूब माया बरसाई है।"
मैं हंस पडा तो फिर बोली-"बताईये लोग मंदिर में आकर भगवन से क्या माँगते हैं। मकान, दुकान, औलाद और तमाम के तरह के सुख ही न! जब इन लोगों को इतने सारे सुख मिल ही गये हैं तो इसका मतलब है कि भगवन इन पर पर मेहरबान हैं। तो बताईये इनका पहला हक हुआ कि नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मैं निर्लिप्त भाव से वहां खङा था, मेरे मन में एक बार भी खिसियात का भाव नही आया था। जब उस अनजान व्यक्ति ने अपनी टिप्पणी दी तब भी मैं उसे अनसुना कर गया पर कुछ दिनों से जब ऎसी घटनाओं के बारे में पढ़ और सुन रहा हूँ तो मुझे यह घटना याद आती है। एक बात बात दूं कि न यह मेरे लिए गंभीर चिन्तन का विषय है न व्यंग्य का। हाँ, इतना जरूर कहता हूँ कि अगर तुम भगवान से कुछ माँगते हो तो यह भी मान लो कि जिनके पास दौलत, शोहरत पद और तमाम तरह के रुप में माया मौजूद है तो उसे भगवान् का प्रिय जीव मानने में संकोच क्यों ? और अगर निष्काम भाव से मत्था टेकना या ध्यान लगाने जाते हो तो फिर उनकी परवाह वैसे ही नहीं करोगे -किसी के कहने की जरूरत ही नहीं है, योगी और ध्यानी जानते है कि इश्वर की दरबार में सब समान है। यह तो माया का खेल है जो आदमी को वी.आयी.पी.का दर्जा दिलाती और छीनती है। खेलती है माया और आदमी सोचता है में मैं खेल रहा हूँ वह रहती है तो आदमी के मन में उसे बनाए रखने का भय भगवन के दरबार में ले जाता है और चली जाती है तो उसे मांगने वहन जानता है। सच्च भक्त कभी इन चीजों कि परवाह नहीं करते। ।

Apr 21, 2007

बडे लोग ही करते हैं छोटी हरकतें

इस देश कि सबसे बड़ी समस्या क्या है? भ्रष्टाचार, बेकारी भुखमरी, पेयजल का संकट , बिजली की कमी या खाद्धान्न का अभाव । जीं नहीं यह समस्या नहीं हैं बल्कि हमारी अज्ञानता, संकीर्ण विचारों, अदूरदर्शिता और लापरवाही से उपजी उस समस्या का परिणाम है जिसने बोने चरित्र के लोगों को ऊंचे पदों पर पहुंचा दिया है और भले काम को संपन्न करने का ठेका निम्न चरित्र के लोगों को मिलने लगा है। इस देश की समस्या है सज्जनों की निष्क्रिय सज्जनता और बुद्धिजीवियों का यथास्थ्तिवादी रवैया है। सज्जन आदमी किसी भी घटना पर यह सोचकर चुप हो जाता है कि मेरे साथ कोई वारदात थोड़े ही हुयी है, और बुध्दिजीवी किसी घटना पर जो बहस करते हैं उसमें केवल सतही विचार व्यक्त करते हैं और आख़िर उनके वार्तालाप पर कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।
अब तो यह हालत हो गयी है कि हर प्रकार के छोटे और बडे अपराध में तथाकथित बडे लोगों का हाथ निकलता है। मैं किसी घटना का जिक्र इसलिये नहीं करता क्योंकि उससे चिन्तन कि धारा संकीर्ण हो जाता है और वह एक घटना में सीमित होकर रह जाता है । मानव तस्करी, अनैतिक संबंध और अपराधियों से नजदीकी रिश्ते जैसे आरोपों से सभी तथाकथित बडे लोगों पर ही लगे हैं और आजकल लड़कियों की मोहब्बतों की कथाओं में जुटा मीडिया इन पर कभी खुलकर बहस नहीं करता । आख़िर विदेशों में बैठे अपराधी क्या केवल शासकीय कर्मचारियों और अधिकारीयों के दम पर ही सारा कारोबार चला रहे है? मीडिया में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह किसी का नाम ले सके, घर से भागी लड़कियों को अपने माता-पिता के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते दिखाने में उसे मजा आ रहा है । जिनके घर की लडकियां भाग जाती हैं उनके माता-पिता की क्या हालत होती है इसका ख़्याल उसे नहीं रहता । सज्जन लोग अपनी इज्जत के भय से दुबक जाता है, और मिडिया उसे इश्क का दुश्मन और जाने कौनसे शब्दों से नवाज्ता है। क्रिकेट में भारत की हार की समीक्षा करते समय कयी ऐसे पहलू मीडिया ने छुए तक नहीं जिनपर जनता को संदेह था। मैं उसे भी दोष नहीं देता क्योंकि उसमें भी वही लोग काम जिन्होंने मैकाले द्वारा रचित शिक्षा प्रणाली से अपना जीवन शुरू किया है और क़सम खा रखी है कि क्लर्क की तरह ही काम करेंगे ।
आजादी के बाद नारों की जो नयी संस्क्र्ती इस देश में बनना शुरू हुई तो उसने धीरे धीरे गंभीर चिंतन की प्रवृति को समाप्त ही कर दिया। जो लोग शिक्षित हुए उन्हें क्लर्क बनने की पंक्ति में लगा दिया और जो महत्वाकांक्षी थे उनके लिए बडे प्रशासकीय पदों का सृजन कर उन्हें सुशोभित किया गया। तब तक इस देश में परिवार वाद का भाव नहीं पनपा था और इसीलिये बडे लोगों ने अपना बड़प्पन बनाए रखने के लिए जनता के भलाई के लिया कम किया पर मैकाले ने जो सपना इस देश में जो क्लर्क पैदा करने का सपना देखा था उसे इस देश के शिक्षाविदों ने जारी रखा। जब बौध्दिक निष्क्रियता की प्रवृति स्थापित हो गयी तो शुरू हो गया परिवारवाद और भायी-भतीजावाद का दौर - और फिर उनकी रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किये जाने लगे। बोने चरित्र के लोगों ने इसका लाभ उठाया और अब जो चित्र हमारे सामने है वह यह है कि भला आदमी सब तरफ से आतंक के साए में जीं रहा है और बोने चरित्र और विचार वाले लोग ऊंचे पदों पर पहुंच गये इसका एक ही उपाय है सज्जन अपनी सज्जनता को भय के साथ नहीं वरन हिम्मत के साथ जिए और बोने चरित्र वाले लोगों का सम्मान करना बंदकर दे ।

Apr 12, 2007

पाकिस्तान का नया पैंतरा:पानी के लिए जंग

पाकिस्तान के विदेश मंत्री कसूरी ने कहा है कि पानी को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच युध्द हो सकता है। इसका सीधा मतलब यह है भारत चाहे कितनी भी कोशिश कर ले पकिस्तान के पास युध्द के बहानों की कमी नहीं रहेगी। उसे किसी मामले के सुलझने से मतलब नही है उसे बस हमेशा इस इलाक़े में तनाव बनाए रखना है। ऐसा लगता है कश्मीर मामले पर अपने देश में घटते जनसमर्थन से पाकिस्तान के रणनीतिकारों की नीद हराम हो गयी हैं और भारत की छबि वहां न बने और पाकिस्तान की जनता कहीं भारत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण न अपनाने लगे उनसे यह बयां दिलवाया गया है। पाकिस्तान का जन्म ही भारत से नफरत के आधार पर हुआ है- उसका अमेरिका ने लालन-पोषण भी केवल इसलिये किया ताकि भारत और चीन पर नियंत्रण रख सके। यह अलग बात है पाकिस्तान के नेताओं ने अमेरिका से धन लेकर अपने घर भरे और वहां की जनता को भारत विरोध और इस्लाम के नाम पर भूखा रखते रहे , और आज वहां दोनों मुद्दों की हवा निकल रही है तो वहां के शासक पाकिस्तान का असितत्व बचाने के लिए ऐसे बयां दे रहे हैं।
पकिस्तान जाने वाली नदियाँ भारत से गुजरती हैं और भारत ने अपने विकास के साथ अनेक नदियों पर बाँध बना लिए हैं। साथ ही यहां किसी से क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है, पूरा विकास न हुआ हो पर किसी प्रदेश विशेष के प्रति केंद्र सरकार ने न तो लगाव दिखाया है और न ही उपेक्षा की है। यही कारन है कि इस देश में अलगाववादी आंदोलनों को कभी भारी जनसमर्थन नहीं मिलता । पाकिस्तान में देश का मतलब है पंजाब और पंजाब में भी लाहौर और रावलपिंडी तक ही उनका सोच है। पंजाब के बडे शहरो के लिए पेयजल और खेती के लिए पानी के इंतजाम के लिए सिंध और और बलूचिस्तान जाने वाले नदियों पर बाँध बना दिए हैं जिससे दोनों प्रदेशों में वर्ष भर अकाल रहता है। हिंदूओं के लिए पवित्र माने जाने वाली सिंध नदी में पानी का बहाव अब बहुत कम हो गया है, इसके अलावा सिंधी और ब्लूचियों के मन में पजाब के प्रति अधिक लगाव दिखाने के कारण बहुत रोष है। भारत के आतंकवादियों को पाकिस्तान ने इस्लामाबाद या लाहौर में न रखकर सिंध और बलूचिस्तान में शरण दीं जो आज वहां के लिए सिरदर्द बन गये हैं। दोनों प्रदेशों की जनता अब यह समझ गयी है कि पंजाब के हितों की खातिर उनको बलि का बकरा बनाया गया है-क्योंकि जब पाकिस्तान यह कहता है कि उसके यहां भी आतंकवाद है तो वह इन्ही प्रदेशों की तरफ इशारा करता है। इससे पंजाब को कोई परेशानी नहीं है। सारा संकट सिंध और बलूचिस्तान की जनता पर है। उसका अंदरूनी आतंकवाद भी इस तरह प्रायोजित किया गया है कि पंजाब में शांति रहे और वह विश्व को दिखा सके कि वह एक आतंक प्रभावित देश है।
पानी के मामले में कसूरी का यह बयान पंजाब की जनता को बहलाने के लिए दिया गया है जो इन गर्मियों के मौसम मैं पेयजल संकट का सामना कर रही है । अगर कहीं पंजाब की जनता नाखुश हो गयी तो पंजाब के शासक न घर के रहेंगे न घाटा के । जहां तक भारत का प्रश्न है तो इस समय भारत कि नदियों में ही पाने सूख जाता है तो उसके द्वारा पानी को रोकना का प्रश्न ही नही है। फिर भी भारत को सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि पाकिस्तान की रणनीति खुराफाती दिमाग वाले लोग चलाते हैं जिनका असितत्व ही भारत विरोध पर निर्भर है।

Apr 4, 2007

सुबह सचिन ने मूहं खोला, शाम गुरू का सिंहासन डोला

सुबह जब मैंने सचिन का बयां टीवी पर देखा और सुना मुझे लगा कि अब गुरू ग्रेग का खेल होता है। दरअसल ऐसा लोगों को लग जरूर रहा है कि सचिन के साथ देश के क्रिकेट प्रेमियों की सहानुभूति है - यह एक भरम है। सचिन इस समय उन लोगों के लिए ही महत्वपूर्ण है जिनसे या तो जिनका आर्थिक फायदा है या अभी भी जिनके विज्ञापन टीम इंडिया के वर्ल्ड कप से बाहर होने के कारण जंग खा रहे हैं, और वह उनको अभी जिंदा रखने के लिए सचिन का कैरियर को आगे जारी रहते देखना चाहते हैं। जहां तक सचिन के खेल से भारतीय टीम को लाभ मिलने का प्रश्न है तो उसे जीवनदान तभी मिल सकता है जब सचिन वहां से हट जाये। मैं तो साफ कहता हूँ कि भारतीय टीम में कोई भूतपूर्व कप्तान नहीं रहना चाहिऐ। किसी भी भूतपूर्व कप्तान ने एन्मौके पर अपनी टीम को जितने का कम किया हो ऐसा मुझे याद नहीं आता। सचिन जब कप्तान थे तो अजहर खेलते जरूर थे पर टीम का साथ तब छोड़ते थे जब टीम को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती थी । वह कप्तान बने तो सचिन ने भी अपने रिकॉर्ड के लिए अनेक परियां खेलीं पर भारत्त कितनों में जीत पाया इस पर हमारे क्रिकेट विशेषज्ञ अभी तक एक मत नहीं हो पाये हैं। फिर सोरभ कप्तान बने तो फिर सचिन कभी अन्दर तो कभी बाहर होते रहे । कभी बीमारी का बहाना तो कभी चोट का बहाना। मज़े की बात यह कि जिन दिनों सचिन नहीं खेले उन्हीं दिनों सह्बाग का आगमन हुआ और वह अच्छ खेलते हुए उस मुकाम तक पहुंच गये जहां सचिन थे। धोनी का आगमन भी सचिन की अनुपस्थ्त में हुआ। पर तमाम तरह के दबावों के चलते हमेशा ही सचिन की जगह हमेशा बनाए रखी गयी । अगर हम इस देखें तो वेणुगोपाल राव, वसीम जफर और रोमेश पोवार जैसे खिलाडी जो इस विश्व कप के लिए ही लाए गये थे उन्हें इसीलिये टीम से हटाया गया कि सचिन को जगह देने के लिए सौरभ को भी रखना जरूरी था। फिर उसे रख रहे हैं तो सह्बाग को रखना ही था। सह्बाग के बारे में तो चयन समिति के अध्यक्ष दिलीप वेंगसरकर का कहना था कि उसे शामिल करने के लिए राहुल द्रविड़ ने दबाव डाला था। अब इस बात पर विचार करें तो यह समझ में आएगा कि उन्हें पता था कि दो भूतपूर्व कप्तानों के रहते टीम की बल्लेबाजी क्रम में उनके भरोसे का बल्लेबाज़ होना जरूरी है। यह द्रविड़ का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सह्बाग नही चल पाये क्योंकि वह अपनी सफलता के नशे में सब भूल चुके थे और टीम बुरी तरह हारी। अगर कहीं भाग्य से वह चल जाते तो अभी तक सौरभ और सचिन अपनी पीठ थपथपा रहे होते।
चैपल को पता था कि सचिन की आलोचना के क्या परिणाम होंगे । फिर भी उन्होने की, क्योंकि उन्होने भी पलटवार की तैयारी कर रखी होगी । न वह जोन राइट की तरह है जो केवल एक किताब लिखकर रह जाये न ही वह वूल्मर की तरह बोलने वाले हैं कि उन्हें नज़रंदाज किया जा सके। अब बात निकली है तो दूर तक जायेगी। वूल्मर ने जो देखा था वह शायद किसी को बता दिया था कि मैं यह जान गया हूँ पर चैपल हमेशा खामोशी से काम करने वाले आद्नी रहे हैं। जहां तक उनके विदेशी होने का मामला है मैं उनका अपमान होते देखना इसीलिये नहीं चाहूँगा। उनके कामकाज को लेकर कोइ आलोचना हो अलग बात है। जहां तक उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न है पुराने भारतीय खिलाडी उनकी इज्जत करते हैं। जहां तक सचिन का सवाल है एक बात मैं बता दूं कि अपनी जिम्म्देदारी को व्यवसायिक ढंग से पूरा करना आस्ट्रेलिया वालों से सीखना चाहिऐ -ऐसा मेरा मान ना है। बहरहाल जो हो रहा है उसका संबंध खेल से कम वर्चास्वा बनाले रखने के लिया ज्यादा है.

Apr 3, 2007

आख़िर युवाओं को मौका देने में हर्ज़ क्या है?

अभी भी भारतीय क्रिकेट टीम में नए लोगों को मोका देने की बात प्रभावी ढंग से नहीं की जा रही है । यह आश्चर्य की बात है कि अभी भी पुराने खिलारियों को धोने की तैयारी दिख रही है। लोगों के जज्बातों को समझा नहीं जा रहा है।

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Mar 23, 2007

होली पर योगी करे खामोशी से अपना चिन्तन

सभी होली मना रहे थे तब मैं अपने घर पर बैठा चिन्तन कर रह था । मुझे चिन्तन और व्यंग्य करना अच्छा लगता है
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