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Nov 4, 2009

गलतफहमी-हास्य व्यंग्य (galatfahmi-hasya vyangya)

दीपक बापू तेजी से अपनी राह चले जा रहे थे कि पान की एक दुकान के पास खड़े आलोचक महाराज ने उनको आवाज देकर पुकारा-‘अरे, ओए फ्लाप कवि कहां जा रहे हो, कहीं सम्मान वम्मान का जुगाड़ करना है क्या?’
दीपक बापू चैंक गये। दायें मुड़कर देखा तो साक्षात आलोचक महाराज खड़े थे। दीपक बापू उनको देखकर उतावली के साथ बोले-‘आलोचक महाराज, आप अपनी घर से इतनी दूर यहां कैसे पधारे? हमारे लिये तो यही सम्मान है कि आपने हमें पुकारा। धन्य भाग हमारे जो इस इलाके की सीमा तक ही आपका पदार्पण तो हुआ। वरना आप जैसा साहित्यक महर्षि कहां इतनी दूर से यहां आयेगा? चलिये हुजूर हमारे घर को भी पवित्र कर दीजिये जो यहां से केवल तीन किलोमीटर दूर है।’
आलोचक महाराज ने पास ही नाली में पहले थूका फिर बोले-‘जब भी करना, घटिया बात ही करना! ऐसे भी साहित्यक महर्षि नहीं है कि तुम्हारे घर तक तीन किलोमीटर पैदल चलें। वैसे हमारी कार देखो उधर खड़ी है, पर अगर तुम्हें अपने घर लेकर चलना हो तो कोई अलग से इंतजाम करो।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज क्या करें, अपनी साइकिल तो घर पर ही छोड़े आये इसलिये यह संभव नहीं है कि कोई दूसरा इंतजार करें। हां, यह बताईये कि आप इधर कैसे आये, कोई सेवा हमारे लायक हो तो जरूर बतायें।’
आलोचक ने फिर दूसरी बार जाकर नाली में थूक और बोले-‘हमेशा लीचड़ बात ही करना! हम कार में बैठने वाले तुम्हारी साइकिल पर बैठकर क्या अपनी भद्द पिटवायेंगे। गनीमत समझो तुमसे बार कर रहे हैं। बहरहाल यह लो पर्चा! एक साहित्य पुस्तक केंद्र का उद्घाटन हैं। वहां जरूर आना। हमने तुम्हारी दो कवितायें एक गांव के अखबार में छपवा दी थी जिसमें अपनी समालोचना भी लिखी थी। लोगों ने हमारी समालोचना की प्रशंसा की। यह कार्यक्रम नये कवियों का परिचय कराने के लिये भी हो रहा है। तुम तो पुराने हो सोचा क्यों न उद्घाटन पर बुलाकर उनके समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वह तुमसे कुछ सीखें।’

दीपक बापू शर्माते हुए बोले-‘क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं आप? हमारे अंदर ऐसी क्या येाग्यता है जो हम उस केंद्र का उद्घाटन करें? हम तो ठहरे एक अदना कवि! केवल कवितायें ही लिख पाते हैं। आप जैसे आलोचकों के सामने हमारी क्या बिसात? भले ही आप कहानी या कविता न लिखते हों पर साहित्य महर्षि का खिताब आपको ऐसे ही न मिला होगा। यह सम्मान कोई छोटी बात नहीं है।

अबकी बार आलोचक महाराज थूके बिना ही उनकी तरफ मुखातिब हुए और घूर घूर कर देखने लगे। अपना मुंह उनके मुंह के पास ले गये। फिर अपना हाथ उनके मस्तक पर रखा। दीपक बापू सिहर कर बोले-‘यह क्या आलोचक महाराज?’
आलोचक महाराज बोले-‘हम सोच रहे हैं कि कहीं तुम बुखार में तो घर से बाहर भाग कर नहीं आ गये। आजकल मौसम खराब है न! यह कैसी गलतफहमी पाल ली कि हम तुम्हारे इन नाकाम हाथों से किसी पुस्तक केंद्र का उद्घाटन करायेंगे। हमने तुम्हें उद्घाटन करने वाले मुख्य अतिथि के ंरूप में नहीं बल्कि वहां आकर कुछ किताबें खरीदो जिनको पढ़कर तुम्हें लिखने के लिये ढंगा आईडिया मिले, इसलिये बुलाया है। नये कवियों को तुम्हारा यह थोबड़ा दिखाकर बतायेंगे कि देखो इनको, ताउम्र कवितायें लिखने का प्रयास किया पर लिख नहीं सके। कभी कभी कामयाब आदमी की कामयाबी के साथ ही नाकाम आदमी की नाकामी से भी नये लोगों को सिखाने का एक अच्छा प्रयास होता है।’

दीपक बापू का चेहरा उतर गया वह बोले-‘ठीक है आलोचक महाराज, हमने कविता लिखने का प्रयास किया पर न लिख सके यह अलग बात है? मगर आपने तो कभी लिखी ही नहीं। बल्कि दूसरे लोगों की कविताओं का आलोचना करते हुए उनके कुछ हिस्सों को अपनी कविता बना डाला। हमारी कवितायें कहीं नहीं छपवायीं बल्कि हर बार टरका दिया। खैर, हमें बुरा नहीं लगा। अब चलता हूं।

आलोचक महाराज ने कहा-’नहीं! अभी रुको! मैंने अपना वक्त तुम्हें रोककर खराब नहीं किया। सुनो, यह कूपन लेकर उस दुकान पर आना। इसके लिये पांच सौ रुपया हमें दे दो। वहां इसके बदले तुम छह सौ रुपये की किताब खरीद सकते हो। वैसे मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारी कवितायें अब शहर के अखबारों में भी छपवा दूं। तुमसे बहुत तपस्या करवा ली। लाओ, निकालो पांच सौ रुपये। वहां आकर साढ़ छह सौ रुपये किताबें खरीदना। तुम्हारे लिये पचास रुपये का फायदा करवा देंगें।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, किताबों का तो मेरे घर पर ढेर लगा हुआ है। एक नयी अलमारी बनवा लूं तभी अब किताबें खरीद पाऊंगा। वैसे भी हम आपके पास अपनी एक किताब छपवाने के लिये पांडुलिपि लाये थे तब आपने इतनी अधिक सामग्री देखकर उसे पढ़ने से मना करते हुए कहा था कि ‘किताबों से पढ़ने योग्य पढ़ा जाये उससे अच्छा है कि उनमें लिखने योग्य कार्य किया जाये।’ आपकी बात चुभ गयी तभी से किताबें खरीदना बंद कर दिया। अब जब उनमें लिखने योग्य कर लेंगे तभी सोचेंगे।’
आलोचक महाराज ने कहा-’ठीक है! अब भूल जाना कि मैं तुम्हारी कविताओं पर आलोचना लिखकर उनको प्रकाशित करवाऊंगा।’
दीपक बापू वहां से जल्दी खिसक लिये यह सोचकर कि कहीं उनको पांच सौ रुपये की चपत न लग जाये। साथ ही उनको अपनी गलतफहमी पर भी हैरानी हो रही थी।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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Dec 2, 2007

इसलिए आज हमने कुछ नहीं लिखा

आज कुछ नहीं लिखा। मैं आज सोच रहा था की कोई गजल, गीत, कविता, कहानी, व्यंग्य या कोई लेख लिखूं पर मेरा सारा ध्यान 'उड़न तश्तरी' शब्द चला जा रहा था। गजल लिख रहा था उसमें हर लाइन में उड़न तश्तरी शब्द आ जाता था। जैसे-
''शराब के नशे में देखा आकाश में थी उड़न तश्तरी
उसमें से निकली बहारें बिखेरती एक सुदंर सी परी।''

इसमें गड़बड़ कहीं नहीं है बस खुटका इस बात का था कि यह किसी बड़ी शख्सियत का नाम हुआ तो उसके प्रशंसक बिगड़ जायेंगे। अपनी भावनाएं आहत होने का आरोप लगायेंगे। कुछ और क्यों नहीं लिखा। परी को उड़न तश्तरी से ही क्यों उतारा एरोप्लेन से क्यों नहीं?

फिर गीत लिखने बैठा तो उसकी पहली पंक्ति में ही यह शब्द आ गया जैसे-
'' उनकी आँखें देखीं तो थी मदभरी
चमक रहीं थी जैसे उड़न तश्तरी''
बस इससे आगे बात नहीं बढ़ी। पहले यह तो पता करना चाहिऐ कि यह किसी का नाम तो नहीं है। ऐसा लगने लगा कि मैंने कई बार यह नाम देखा है और लगता है कि इस नाम के व्यक्ति के बहुत सारे समर्थक हैं। अब गीत और गजल हैं तो लिखते समय भावनाओं का उतार चढाव तो आते हैं और कुछ ऐसा-वैसा लिख गए तो फिर लोगों को समझाना कठिन हो जायेगा कि भई, हमारे इन शब्दों का उड़न तश्तरी नाम के किसी शख्सियत से कोई लेना-देना नहीं है, पर आजकल कोई किसी की सुनता कहाँ है, सब तो कहने में लगे हुए हैं। एक शब्द पढ़कर पूरे पाठ का अर्थ निकल लेते हैं।

व्यंग्य लिखने बैठे तो फिर 'उड़न तश्तरी' पर ही लिखने का विचार आया। कहीं कोई चमकता पत्थर पहाड़ से गिरा तो लोगों ने कहा यह उड़न तश्तरी है-ऐसे विचार बना और छोड़ दिया। हम जितना इस शब्द को भुलाना चाहते उतना ही याद आता।

कहानी लिखने बैठे तो एक गरीब बच्चे की याद आयी जिसे किसी ने बताया था कि ऊपर से उड़न तश्तरी में बैठकर फ़रिश्ते आते हैं और गरीबों को उपहार देते हैं और वह आकाश में बैठा रात को उड़न तश्तरी देखता रहता है-अब यह कहानी लिखते तो कहानी में अनेक बार इस शब्द को लिखना पड़ता। इसलिए यह विचार स्थगित कर दिया। फिर लेख लिखने को बैठा तो याद आया कि अमेरिका में बहुत पहले लोगों ने उड़न तश्तरी से लोग निकलते देखे थे। अगर उड़न खटोले में देखे होते तो मैं लिख देता। अब सवाल यह है कि क्या उड़न तश्तरी को किसी वस्तु से जोडें और किसी व्यक्ति का नाम हुआ तो समस्या आ जायेगी। जब कुछ लिखते हैं तो उसमें कोई प्रतिकूल टिप्पणी भी आ सकती है और और व्यंग्यात्मक कटाक्ष भी। ऐसे में किसी का नाम हुआ तो वह आपति करेगा और कोई बड़ी शख्सियत का मालिक हुआ तो उसके समर्थक ही बवाल खडा कर देंगे।

मतलब यह कि कोई भी नाम लिखें तो देखना पड़ेगा कि वह अधिक प्रचलित नहीं होना चाहिऐ। ब्लोग पर लिखते हुए कम से कम दो ब्लोग के नाम या उनके संचालन कर्ता का परिचय ऐसे हैं जिन्हें अपने ब्लोग पर लिखना कठिन होता है क्योंकि वह इस तरह के हैं कि उनकी संज्ञा और क्रिया दोनों ही व्यंग्य की और इंगित करतीं है और उनको लिखने का मतलब है उसके नामधारियों से झगडा मोल लेना। जब सारा दिन 'उड़न तश्तरी' शब्द दिमाग से नहीं निकला तो हमें आज लिखने का प्रोग्राम स्थगित कर दिया, ऐसा लिखने से क्या फायदा कि विवाद खडा हो जाये। वैसे देखा जाये तो आजकल लेखक वैसे भी काम है और हम भी कभी कभार ही कोई बड़ी रचना लिखने बैठते है तब एक-एक शब्द पर इतना सोचेंगे तो लिखेंगे क्या?
नोट-यह एक हास्य व्यंग्य आलेख है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना-देना नहीं है, अगर किसी से मेल हो जाये तो संयोग होगा।

Aug 30, 2007

इस ब्लोगर मीट पर हास्य कविता मत लिखना

पहले ब्लागर का पता उसके मित्र ने ही दूसरे ब्लागर को दिय था और सख्त हिदायत थी कि किसी भी तरह उससे बहस अधिक मत करना-वह कभी कामेडियन लगता है तो कभी ऐकदम दार्शनिक हो जाता है।
दूसरा ब्लागर उसके पत्ते पर पहुंचा। उसने पहले ब्लागर को उसके मित्र का परिचय दिया। पहले ब्लोगर ने भी उसका स्वागत किया और पूछा-'' आपको देखकर खुशी हुई पर मैने कभी आपका ब्लोग देखा ही नहीं है।'
जरूरत क्या-'दूसरे ने कहा-'मैंने उस पर लिखा ही क्या है जो आप पढ पाते। बस अपने आने की घोषणा करने वाली दो-चार लाइनें डालीं और हो गये ब्लोगर, पर मैं आपका लिखा पढता हूं।'
पहला ब्लोगर-'क्या आपने कभी मेरे ब्लोग पर कमेंट दी है?'
दूसरा ब्लोगर्-''नहीं अब मैं आपका लिखा पढ्कर भूल जाता हूं कि कमेंट भी लिखा जाना चाहिये।'
पहला ब्लोगर-आपको बहुत पसंद आता है?'
दूसरा ब्लोगर-नही!आपका लिखा मेरे समझ से परे होता है, पर आप अच्छा लिखते हैं।'
पहला ब्लोगर-जब आपके समझ में नहीं आता तो कैसे कह सकते हैं कि अच्छा लिखता हूं?'
दूसरा ब्लोगर-मेरे समझ में नहीं आता इसलिये। खैर छोडिये इस बात को, काम की बात करें।' पहला ब्लोगर्-'आप मुझसे क्या चाह्ते हैं?'
दूसरा ब्लोगर-'कुछ खास नहीं! बस ऐक ब्लोगर मीट कर लेते हैं। इतनी सारी ब्लोग मीट हो रहीं हैं पर कोई अपने को बुला ही नहीं रहा है, इसलिये आज हम लोग भी ऐक मीटिंग कर लेते हैं। आप उसकी रिपोर्ट लिख देना।'
पहला ब्लोगर-'मैं क्यों लिखूं? आप क्यों नहीं लिखेंगे ?''
दूसरा ब्लोगर-मैं तो उस पर जबरदस्त कमेंट लिखूंगा।''
पहले ब्लोगर ने देखा कि वह लगातार अपने कंधे उचकाये जा रहा था-ऐसा लग रहा था कि वह कोई व्यायाम करने का आदी हो। पहले ब्लोगर ने कहा-'आप अपने कंधे लगातार इस तरह घुमा क्यों रहे हैं। कोई व्यायाम कर रहे हैं या बचपन से ही ऐसी कोई आदत है। इस तरह आपके कंधे घूम रहे हैं या नाच रहे हैं पता ही नहीं लग रहा है।'
दूसरा बोला-'आप ही देख लीजिये।'
पहला ब्लोगर-'आप ऐसा कर क्यों रहे हैं?'
दूसरा बोला-'और क्या करूं? कंप्युटर पर लिखते-लिखते ऐसी आदत हो गयी है। उस पर काम करते हुए भी टाइप करूं या नहीं ऐसे ही कंधे उचकाता रहता हूं ताकि मुझे यह याद रहे कि मैं ऐक ब्लोगर हूं।'
पहला ब्लोगर-हां, अभी आपने बताया था कि उस पर अपने आने की घोषणा करते हुए ऐक पोस्ट डाली थी। वैसे आप किस तरह और कौनसे विषयों पर लिखते हैं?'
दूसरा ब्लोगर्-'मैंने आपको बताया थ कि बस ऐक बार लिख है और वह मेरी जिंदगी की पहली और आखिरी रचना है।
पहला ब्लोगर्-'कुछ तो लिखते ही होंगे।'
दूसरा ब्लोगर्-'बस कुछ ज्यादा नहीं बस कमेंट लिखता हूं कभी-कभी। वैसे इस लाइन में आपसे सीनियर हूं। वैसे कमेंट लिखना भी कोई आसान काम नहीं है।'
पहला ब्लोगर-'आपकी बात सही हैं, कमेंट लिखना भी कोई आसान काम नहीं है। पर आप बताईये हम दो लोग मिलकर कैसे ब्लोगर मीट कर सकते हैं? क्या आपके पास इसके कोई योजना है?'
दूसरा ब्लोगर्-'मेरे पास दस ब्लोग हैं। आपके पास भी छह ब्लोग है। फ़िर चिंता की क्या बात है? किसी भी ब्लोगमीट में इतने सारे ब्लोग लिखने वाले लेखक नहीं शामिल हुए होंगे।'
वह अपने कंधे लगातार उचकाये जा रहा था। पहला ब्लोगर-'आपकी बात सही हैं। पर हम लिखने वाले तो दो ही लोग हैं।'
दूसरा बोला-'मेरे सभी ब्लोगों पर अलग-अलग नाम हैं। किसीपर मेरा असली नाम नहीं हैं। सभी नाम छ्द्म हैं, आपके भी छ्द्म नाम से कुछ् ब्लोग तो होंगे ही?'
पहला ब्लोगर-हां! ऐक धार्मिक ब्लोग है और उस पर केवल धार्मिक विषयों पर ही लिखता हूं।'
दूसरा ब्लोगर-'तब तो मजा आ गया। हमारे मीट में धार्मिक ब्लोगर का होना चार चांद लगा देगा।'
पहला ब्लोगर-पर वह तो मैं ही हूं।'
दूसरा-पर यहां कौंन देखने आ रहा है। आप तो अपने छ्द्म नाम ही लिख देना। और हां मैने अपने अपनी बच्ची और पत्नी के नाम पर भी ब्लोग बनाये हैं पर उन पर कुछ लिखा नहीं है, मीट में उनकी उपस्थिति भी दिखा देना। इससे महिलाओं की उपस्थिति भी हो जायेगी। '
गृह्स्वामिनी चाय और नाश्ता ले आयी उनके जाने के बाद दूसरा ब्लोगर बोला-'आपने भाभी जी से परिचय नहीं कराया?'
पहला-इसलिये कि आप और मैं आराम से चाय और नाश्ता उदरस्थ कर सकें।'
दूसरा-'क्या ब्लोगिंग से चिढती हैं?"
पहला-'नहीं, नफ़रत करती हैं।'
दूसरा-'कोई बात नहीं है। मेरी पत्नी ने भी घर से निकाल दिया है। अब इधर्-उधर रिश्तेदारों के यहां रहकर गुजार लेता हूं। घर में दोबारा घुसने देने के लिये उसने ब्लोगिंग छोडने की शर्त रखी है।'
पहला-'फ़िर आप ब्लोगिंग कैसे करते हैं?'
दूसरा-'ऐक साइबर कैफ़े वाले को पटा रखा है।'
पहला-'आप किस तरह के ब्लोग पर कमेंट रखते है।'
दूसरा-चाहे जिस पर भी। बस लेखक चिढ जाये या डरकर ब्लोगिंग छोड जाये। मुझे कोई डर भी नहीं लगता क्योंकि मेरा तो सब जगह छ्द्म नाम है, यहां तक कि घर परिवार के लोगों के नाम भी छ्द्म हैं। वह तो मैं खुद मानकर चलता हूं कि उनके नाम है।"
पहला-'आपके ब्लोग का नाम क्या है?"
जैसे ही उसने अपने ब्लोग का नाम बताया पहला ब्लोगर उछल कर खडा हो गया और बोला-'अच्छा तो वह तुम थे जो मेरे छ्द्म ब्लोग पर अभद्र कमेन्ट रख गये थे। तुमने मुझे विचाराधारा की लडाई लडने की चुनौती दी थी और मैने उसी वजह से उसे धर्म का ब्लोग बना दिया। उसके बाद तुम आये ही नहीं। आज आओ तो कर लें विचारधारा पर बहस!'
दूसरा-आप नाराज क्यों हो रहें है? आपने खुद ही कहा कि आपका छ्द्म नाम है, अगर आपक असली नाम होता तो आपका हक बनता शिकायत करने का । अच्छा अब आप ब्लोगर मीट पर रिपोर्ट लिख देना।'
पहला-कौनसी ब्लोगर मीट?'
दूसरा-'यह जो अभी यहां हुई।'
पहला-'यह ब्लोगर मीट थी?'
दूसरा-' और क्या थी? मुझे क्या बेवकूफ़ समझ रखा है जो इतने देर से बात कर रहा हूं। मैं केवल मीटिंग में ही बोलता हूं। मेरे पास फ़ालतु समय नहीं है। और हां, इस पर कोई हास्य कविता मत लिख देना। मुझे वह बिल्कुल पसंद नही है।फ़िर कमेंट नहीं लिखूंगा।'

वह चला गया। पहले ब्लोगर ने यह सोचकर चैन की सांस ली ऐक तो घर में यह किसी को पता नहीं लगा कि वह ब्लोगर था दूसरा उसने हास्य कविता के मनाही की थी हास्य आलेख की नहीं।

Aug 24, 2007

ऐसा भी होता है-कहानी

उनके दोनो बेटे-बहु प्रतिवर्ष की भांति भी इस वर्ष अपने माता-पिता के पास रहने के लिए आये। अब पति-पत्नी अकेले ही रहते थे। पति अब रिटायर हो गये थे, और दोनों ही सुबह, दोपहर और शाम एक मंदिर में जाते थे। उनके दोनों लड़के पढने के बाद शहर से बाहर नौकरी कर रहे थे और उनकी अच्छी आय थी। अपने माता-पिता से मिलने वह साल में पांच-छ: बार जरूर आते थे पर विवाह के बाद पिछले तीन वर्षों में यह आगमन केवल एक वर्ष तक रह गया था। इधर उनके पिताजी भी रिटायर हो गये थे। रिटायर होने से पूर्व भी पति महोदय दिन में दो बार अपनी पत्नी को सुबह-शाम जरूर मंदिर गाडी पर बैठा कर जरूर ले जाते थे, अब वह क्रम तीन बार हो गया था। उनकी पत्नी अपने मंदिर जाने का प्रदर्शन पडोस में जरूर करतीं और बार-बार अपने धर्मभीरू होने की चर्चा अवश्य करती। और कभी-कभी बिना किसी आग्रह के ज्ञान भी देतीं देती थी। उनका मंदिर घर से दो किलोमीटर दूर था और किसी दिन गाडी खराब हो या पति महोदय का स्वास्थ्य ठीक न हो तो उन्हें अनेक ताने सुनने को मिलते। वह कभी घर से मंदिर तक पैदल नहीं गयीं।


उस दिन वह अपनी बहुओं पर अपना ज्ञान बघार रहीं थीं-"अपने शरीर को चलाते रहना चाहिए, वरना लाचार हो जाता है अब देखो तुम्हारे ससुर कभी नाराज होकर मंदिर नहीं ले जाते तो मैं पैदल ही चली जाती हूँ कभी भी झगडा नहीं करती- अपने पति से कभी भी झगडा नहीं करना चाहिए। बिचारे पुरुष तो जीवन भर कमाने में ही समय गंवाते हैं।"

वगैरह........वगैरह।इधर वह अपने पति के साथ मंदिर गयी और उधर उनकी बहुओं ने पडोसियों से बातचीत शुरू की और फिर उसने सासके दावे की इस तरह सत्यता का पता लगाने का प्रयास किया कि वह बिचारे समझ नहीं पाए ।

एक पडोसन बोली -"हमने तो कभी भी तुम्हारी सास को पैदल जाते हुए नहीं देखा, अगर गाडी खराब हो या उनका मन न हो या उनके कोई रिश्तेदार आ गये हौं तो मंदिर न ले जाने के लिए उनको हजार ताने देतीं हैं। तुम्हारे ससुर तो सीधे हैं सब सह जाते हैं।"

बहुओं की ऑंखें खुल गयीं, उन्हें अपनी सास पर वैसे भी यकीन नहीं था- और अब तो पडोसियों से भी पुष्टि करा ली थी। उन्होने अपने-अपने पतियों को उनकी माँ की पोल बतायी-हालांकि पडोसन ने आग्रह किया था कि वह ऐसा न करे क्योंकि उनके जाने के बाद उनकी सास उनसे लडेगी।

इधर उनके बहु-बेटे अपने घरों को रवाना हुए और उधर वह अपने पडोसियों पर पिल पडी-"तुम लोगों से किसी का सुख देखा नहीं जाता। मेरी बहुओं को भड़काती हो। अब देखना जब तुम्हारे घर में बहुएँ आयेंगी तो मैं भी यही करूंगी।"

एक पडोसन बोली-"हमें क्या पता था कि तुम्हारी बहुएँ चालाकी करेंगी। पता नहीं तुमसे क्या बात नमक मिर्च लगाकर कह गयीं हैं।"

मगर वह नहीं रुकीं और बोलतीं गयी-"तुम लोगों का क्या मतलब? मैं अपनी बहुओं से कुछ भी कहूं। तुन कौन होती हो बीच में दखल देने वाली ....." उन्होने और भी बहुत कुछ कहा और इस तरह सास-बहु का झगडा पडोसियों के मत्थे आ चूका था।

Jun 20, 2007

लड़ते रहो, हमें अपने ब्लोग हिट कराना है

लड़ते रहो दोस्तो
ख़ूब लड़ो
किसी तरह अपनी रचनाएं
हिट कराना है
बेझिझक छोडो शब्दों के तीर
गजलों के शेर अपने
मन की किताब से
निकल कर बाहर दौडाओ
कुछ कवितायेँ हौं
तुम्हारे हृदय पटल पर
उन्हें भी यहां ले आओ
किसी तरह अपना नाम
दुनिया में चमकाना है


निडर होकर लड़ो
इस प्रचार की रणभूमि में
इतना लड़ो कि
तुम्हारे लिखे को पढने के लिए
लोगों की भीड़ जुट जाये
तुम्हारे लिखे डायलाग
शोले की तरह
जनमानस में छा जाये
किसी तरह
अपने निज-पत्रक
घर-घर पहुंचाना है


पर शब्दों के तीर से
किसी अपने का मन घायल न करना
गजलों के शेरों की दहाड़ से
किसी का दिल विचलित न करना
लड़ना मिलजुलकर (नूरा कुश्ती )
पर अपने मन मैले न करना
अभी तो शुरूआत है
हमें बहुत दूर जाना है
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कुछ तुम कहो
कुछ हम कहें
खामोशी से तो अच्छा है
हम मिलजुलकर लड़ने लगें

जो नहीं देखते हमें
वह भी देखने लगें
बदनाम होंगे तो क्या
नाम तो होगा
आओ मुकाबला फिक्स करने लगें

कभी तुम जीतो कभी हम
खिलाडियों में नाम तो होगा
अन्दर हंसो
पर बाहर दिखो गंभीर
ऐसा न हो लोग
असलियत समझने लगें
जब फीका हो आकर्षण
लोग हमसे बोर होने लगें
हम अपनी लडाई के
ढंग बदलने लगें
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(यह व्यंग्य कविता काल्पनिक हैं और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है)

Jun 4, 2007

क्योंकि अब यहाँ चमत्कार नहीं होते

(इस ब्लोग पर व्यंग्य लिखें का मेरा यह एक प्रयास है)
देखो वही अपनी जिन्दगी मैं चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठा है, ऐसे बहुत कम लोग दिखाई देंगे जो अपनी जिन्दगी में किसी चमत्कार की आशा में चुप बैठता हो।
बेटा या बेटी मैट्रिक क्या पास करते हैं माता-पिता उसके इंजीनियर, डोक्टर ,कलेक्टर और एस।पी।होने की आशा संजोये रखने लगते हैं। सब लोगों की बात मैं नहीं कह सकता पर अधिकतर लोग उसके विवाह के सपने देखते हैं । बेटा है तो सोचते हैं इतना दहेज़ मिल जाएगा कि रिश्तेदार,मित्र,आस-पडोस और समाज भी क्या कहेगा ? यार उनका लड़का भी क्या हीरा है? अगर बेटी है तो लोग सोचते हैं कि उसकी कहें नौकरी लग जाये तो हो सकता है कि बिना दान-दहेज़ के उसकी शादी हो जाये तो लोग कहें देखो अपनी लडकी को इतना लायक बनाया कि उसकी बिना दहेज़ की शादी हो गयी।केवल यही नहीं जो सौ रूपये रोज कमा रहा है वह हजार के , जो हजार कमा रहा है वह लाख और जो लाख रोज कमा रहा है -----अब यह फेह्स्त बहुत लंबी हो जायेगी।
मेरी बात पर यकीन नहीं हो तो बाबाओं और फकीरों के यहां लगने वाली भीड़ को देखिए ----सायकिल वाले से लेकर कार वाले तक वहां तक पहुंचते हैं। गरीब का तो समझ में आता है पर अमीर लोग भी वहाँ पहुंच जाते हैं -कहा जाता है कि पैसे से सारे काम हो जाते हैं, फिर भी अमीरों का वहां देखकर गरीबों को समझ में नहीं आता कि जब पैसे वाले भी सुखी नहीं है तो कौन खुश रह सकता है? फिर भी लाईन में लगा रहता है जबकि अपने सामने देख रहा है कि पैसे वाले को उस जगह बिना लाईन के वहां प्रवेश मिल रहा है -उल्टे वह सोचता है कि वह सिध्द बाबा कोई चमत्कार कर दे तो मैं भी ऐसे ही दर्शन करूंगा।
मतलब लोग हैं कि चमत्कार के लिए मरे जा रहे हैं, पर कोई स्वयं चमत्कार नहीं करना चाहता है । अरे, भाई तुम जब तक स्वयं चमत्कार नहीं करोगे तब तक कोई और तुम्हारे लिए चमत्कार क्यों करेगा?तुम कभी सोचते हो कि अपनी थाली से रोटी निकालकर किसी बेजुबान पशु को दें-जब तुम उसे रोटी दोगे तो वह उसके लिए चमत्कार जैसा है। क्या कभी तुम किसी गरीब मजदूर के घर जाकर उसके बच्चे को नए वस्त्र देते हो? उसके लिए यह चमत्कार जैसा नहीं होगा?
फिर भी नही समझते तो मैं तुमसे सवाल करता हूँ कि क्या तुमने कभी ऐसे चमत्कार देखे हैं जिस पर हम जैसा कोई फ्लाप लेखक कहानी लिखकर सुपर हिट हो गया हो। अगर आपने कुछ ऐसे चमत्कार देखे हैं तो मेरे इस ब्लोग में कमेन्ट में रख दें , मुझे बड़ी ख़ुशी होगी । क्योंकि मुझे लगता है अब इस देश में चमत्कार होते नहीं दिखते जो कर सकते हैं वह स्वयं ही इनके चक्कर में घूम रहे हैं
।१।क्या आपने सुना है कि कोई बूढा हो चूका अभिनेता अब निर्माता बनकर अपने बेटे की बजाय किसे बाहर के लड़के को अपनी फिल्म का हीरो के रुप में ले रहा हो या कोई निर्माता किसी पुराने अभिनेता के बेटे की जगह किसी गाँव से लड़का लाकर उसे हीरो बना रहा है। ऐस भी नहीं होता कि कोई निर्माता अपनी फिल्म के लिए बस कंडक्टर को हीरो बना रहा हो , यह हो भी कैसे सकता है आजकल कोई निर्माता भला बस में सफ़र करता है ? मैं देख रहा हूँ कि बिचारे लड़के गली-मुहल्लों में खाली -पीली एक्टिंग करते फिर रहे हैं कि शायद कोई निर्माता उन्हें देखकर अपनी फिल्म के लिए अनुबंधित कर ले। उन पर तरस आता है
।२।क्या आपने सुना है कि किसी राजनीतिक पार्टी के नेता ने अपने बेटे-बेटी, पत्नी, बहु और दामाद के आलावा परिवार के बाहर के आदमी को पार्टी के अध्यक्ष पद या मुख्यमंत्री पद के लिए नियुक्त करनातो दूर ऐसा करने का सोचा भी है?
३।क्या आपने सूना है कि किसी बडे संत या धर्मं स्थान के प्रमुख ने अपने बेटे के अलावा अपने किसी अन्य शिष्य को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया हो
।४।क्या आपने सुना है कि भारतीय क्रिकेट चयन समिति का कोई मेंबर किसी गली मुहल्ले में जाकर किसी खिलाड़ी का चयन करके लाया हो और उसे टेस्ट मैच खिलाया हो।
नहीं सुना तो भूल जाओ और सुना है तो यह चमत्कार सबके साथ नही होता-वैसे कोई कहे कि किसी के साथ हुआ है तो झूठ बोल रहा है क्योंकि वह चमत्कार प्रायोजित ही हो ससकता है ।सो मेरे दोस्तो भूल जाओ अब यहाँ चमत्कार नही होते ।खेलो, ख़ूब खेलो, नाचो, ख़ूब नाचू, भजो और ख़ूब भजो पर चमत्कार की उम्मीद नहीं करना। थी जिन्दगी में खुश रह पाओगे