Showing posts with label व्यंग्य कवितायें. Show all posts
Showing posts with label व्यंग्य कवितायें. Show all posts

Jun 14, 2011

तेल उधार लेकर चिराग न जलाएँ-हिन्दी साहित्यक कविता

तेल उधार लेकर

घर के चिराग न जलाएँ,

मांगी मिठाई से

दिवाली न मनाएँ,

अँधेरों में जीना,

जुबान चाहे मांगे स्वाद

अपने होंठ भूख से सीना,

वरना गुड़ बनकर

अमीरों के हत्थे चढ़ जाओगे।

फिर गुलामी की जज़ीरों से

लड़ते रहोगे

आज़ादी के लिए छटपटाओगे।

--------------

मांगने से मिलती नहीं अमीरी

छीनने से सिंहासन नहीं मिल जाता है।

अपनी दौलत, शौहरत और ताकत

पर भले ही तुम इतराते रहो

अपने घमंड से काँपते देखो ज़माना

सच यह है कि

तुम्हारी ताकत से

क्या हिलेगा देश में कोई पेड़

किसी शहर का पत्ता तक हिल नहीं पाता है।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Mar 31, 2010

हंसना और रोना भी व्यापार है-हिन्दी शायरी (hansha aur rone ka vyapar-hindi shayri)

दौलत कमाने से अधिक वह
उसे छिपाने के लिये वह जूझ रहे हैं,
उनके अमीर होने पर किसी को शक नहीं
लोग तो बस उनके
काले ठिकानों की पहेली बूझ रहे हैं।
--------
इतनी दौलत कमा ली कि
उसे छिपाने के लिये वह परेशान है,
खौफ के साये में जी रहा खुद
फिर भी जमाने को लूटने से उसको फुरसत नहीं
उसकी अदाओं पर जमाना हैरान हैं।
----------
यूं तो दुनियां को वह
ईमान का रास्ता बताते है,ं
पर मामला अगर दौलत का हो तो
वह उसे खुद ही भटक जाते हैं।
-------
उनका हंसना और रोना भी व्यापार है,
पैसा देखकर मुस्कराते है,
कहो तो रोकर भी दिखाते हैं,
अकेले में देखो उनका चेहरा
लोग क्या, वह स्वयं ही डर जाते हैं।
-----------

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Jan 14, 2010

दिल तो एक है-हिन्दी शायरी (dil to ek hai-hindi shayri)

प्यार मांगने की चीज होती तो

किसी से भी मांग लेते,

इज्जत छीनने की चीज होती तो

किसी से भी छीन लेते।

लोग नहीं सुनते अपने ही दिल की बात,

मारते हैं अपने ही जज़्बात को लात,

दिमाग को ही अपना मालिक समझते,

बड़े अक्लमंद दिखने को सभी हैं तैयार

पर लुटती होती कहीं अक्ल तो सभी लूट लेते।

---------

कुछ पल का साथ मांगा था

वह सीना तानकर सामने खड़े हो गये।

गोया अपनी सांसे उधार दे रहे हों

हमें अपनी जिंदगी को ढोने के लिये

जो ऊपर वाले ने बख्शी है,

फरिश्ता होने के ख्याल में

वह फूलकर कुप्पा हो गये।

----------

ताली दोनों हाथ से बजती है,

दिल की बात दिल से ही  जमती है,

हाथ तो दो है

चाहे जब बजा लेंगे,

पर दिल तो एक है क्या करेंगे?


लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
-------------------------------------

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप