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Sep 20, 2010

कश्मीर में पत्थर फैंकने का व्यापार-हिन्दी व्यंग्य (kashmir mein patthar fainkne ka vyapar-hindi vyangya)

पत्रकारिता जगत के गुरुजी और लेखन जगत के एक मित्र ने ऐसा भूसा हमारे दिमाग में भर दिया है कि सम सामयिक घटनाओं पर लिखते ही नहीं बनता क्योंकि जब सभी विद्वान जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रों के आधार पर अपने विचार व्यक्त करते हैं तब हम सोचते हैं कि ‘आखिर, घटनाओं के पात्रों के पास धन कहां से आता है? हालत यह है कि किसी शहर में उपद्रव हो तो हम सोचते हैं कि आखिर दंगाईयों को धन कहां से मिला होगा? किसी टीवी चैनल पर कोई प्रतियोगिता हो तो भी हम अपने हिसाब से जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के आधार विचार करते हुए देखते हैं कि किस समूह का आदमी इसके लिये धन दे रहा है? संभव है यह हमारी संकुचित मानसिकता का प्रमाण हो पर जब कश्मीर में पैसा लेकर सुरक्षा कर्मियों पर पत्थर फैंकने और धर्म आधारित विरोधी नारे लगाने की बात हमारे सामने आई तो ऐसा लगा कि इस पर लिखना चाहिये।
हमने एक मित्र को बताया था कि हमें अंतर्जाल पर लिखने का एक पैसा भी नहीं मिलता तो वह यकीन नहीं कर रहा था। हमने बताया था कि कुछ तो पागल होते हैं जो मुफ्त में काम करते हैं तो कुछ धर्मात्मा भी होते हैं जो यह सोचकर अपना अभियान चलाये रहते हैं कि हमारा क्या जाता है?
यकीनन समाज में इन दोनों की संख्या नगण्य होती है और आज के युग में तो यह सोचना भी मूर्खता है कि कोई बिना पैसे किसी का काम करेगा चाहे वह गोली चलाने का हो या पत्थर फैंकने का! लिखने वाले बहुत लोग हैं जो कश्मीर पर लिखते हैं। पहले जब कश्मीर पर हम लेख पढ़ते थे तो लगता था कि इस मुद्दे को कोई सैद्धांतिक पहलू होगा जो हमारी समझ से परे है।
सच तो यह है कि तब हम सोचते भी नहीं थे पर जब अंतर्जाल पर अपना लिखने का अभियान प्रारंभ किया तो पता चला कि हमारे गुरुजी और मित्र का बताया हुआ फार्मूला हमारे अंदर इस तरह घुसा हुआ है कि उससे मुक्त नहीं हो सकते। लिखते लिखते चिंतन थोड़ा ठीकठाक हो गया पर वह सिमट गया पैसे के इर्दगिर्द! कई बार अपने से पूछते हैं कि बिना पैसे क्यों लिखते हैं? जवाब भी स्वयं को देेते हैं कि अपनी अभिव्यक्ति कई वर्षों से दबी पड़ी है और उसे यहां लाने के लिये प्रायोजक भी स्वयं ही बनना पड़ेगा और सारी दुनियां में चल रहे पैसे के खेल को धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र का शीर्षक देने वाले प्रायोजित विद्वानों को चुनौती देने का यही एक माध्यम है।
जिन लोगों ने हम हमारे फालतु चिंतनों को पढ़ा है वह जानते हैं कि आतंकवाद को हम विशुद्ध व्यापार मानते हैं। चाहे कितना भी समझा लो पर हम यह मानने वाले नहीं है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आंतकवाद से जुड़े पात्र तथा उनके प्रायोजकों को इससे कोई आर्थिक फायदा नहीं होता। नक्सलवाद पर लिखा तो कुछ लोग बुरा मान गये पर इस बात का जवाब नहीं दिया कि ‘आखिर उनके पास बंदूकें कहां से आती है। उनके खाने, पीने और पहनने का खर्चा कौन उठाता है? जो बंदूकें दे रहे हैं वह रोटी क्यों नहीं देते?’
एक ने लिखा कि पड़ौसी देश भारत में अस्थिरता फैलाने के लिये दे रहे हैं। हमारा जवाब है कि पड़ौसी देश जिस तरह भ्रष्टाचार में आकंठ हमारी तरह डूबे हुए हैं उससे यह तर्क भी नहीं जमता क्योंकि उनके साथ हमारे प्रत्यक्ष रूप से एक नंबर के आर्थिक संबंध न हों पर अप्रत्यक्ष रूप से दो नंबर का संपर्क खूब है। सीधी बात यह है कि पुलिस और प्रशासन का ध्यान आतंकवाद की तरफ लगा रहे और दो नंबर के धंधे चलते रहें इसलिये ही यह कथित आतंकवाद खड़ा किया गया है और दुनियां के सभी राष्ट्राध्यक्ष एक होकर उसके मुकाबले की बात करते हैं पर एक होते नहीं क्योंकि दुनियां के एक और दो नंबर के आर्थिक पुरुष कहीं न कहीं उनके भी सहायक हैं। इसलिये आतंकवाद को भी भिन्न भिन्न कोणों से देखा जाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच निजी क्षेत्र में दो नंबर का कितना व्यापार है इसकी जानकारी नहीं मिलती पर यहां की फिल्में वहां दिखाई जा रही हैं जो इस बात का प्रमाण है कि कुछ न कुछ तो है।
हमने यह बात कभी अखबार में ही पढ़ी थी कि जहां आतंकवाद बढ़ता है वहीं तस्करी आदि का काम जोरों पर हो जाता है। इस पर हमने एक लेख लिखा था तो एक विद्वान टिप्पणीकार ने अपनी टिप्पणी में पूर्वोत्तर के आतंकवाद का जिक्र करते हुए बताया था कि वहां ऐसा ही हुआ है। बहस लंबी खींचने की बजाय हम एक कल्पना करें कि भारत में कहीं आतंकवाद न हो तो?
भारत यकीनन विदेशों से हथियार नहीं खरीदेगा?
तस्करों की तस्करी बंद हो जायेगी।
सभी का ध्यान केवल देश के सामान्य मुद्दों पर होगा तो विदेशों से संबंधों पर कौन ध्यान देगा? कौन अमेरिका और ब्रिटेन की परवाह करेगा?
कश्मीर और आतंकवाद पर बनने वाली ढेर सारी फिल्मों को कौन देखेगा? याद रखिये आतंकवाद पर बनी अनेक फिल्में हिट हो गयी और उन्होंने खूब पैसा कमाया। यह फिल्में हॉलीवुड और वॉलीवुड में खूब बनी और अगर यह आतंकवाद न होता दोनों फिल्मी क्षेत्रों का अर्थशास्त्र गड़बड़ा जाता।
क्रिकेट में पाकिस्तान के खिलाफ अन्य देशों के साथ मैच में कौन सट्टे लगायेगा। पाकिस्तान के खिलाड़ी स्वयं हारने के साथ ही दूसरे देशों के खिलाड़ियों को नायक बनाते हैं जो अपने देश की कंपनियों के विज्ञापन कर न केवल पैसा कमाते हैं बल्कि उनका व्यापार भी बढ़ाते हैं। शायद इसलिये उनको फिक्सिंग का पैसा मिलता है?
हमें पैसा नहीं मिलता पर लिखते हैं पर जिस मुद्दे में पैसा न दिखे उस पर नहीं लिखते। कुछ टीवी पर देखा और कुछ अंतर्जाल पर पढ़ा। उससे पता लगा कि पहले कश्मीर में पत्थर फैकने और धर्म आधार पर विरोधी नारे लगाने के लिये दो तीन सौ रुपये मिलते थे अब पंद्रह सौ मिलने लगे है-लगता है कि वहां उनको भी कोई वेतन आयोग होगा। यकीन मानिए इसका कोई आर्थिक लाभ उठायेगा।
प्रसंगवश कश्मीर के बारे में एक जगह पढ़ने को मिला था कि वहां की एक अलगाववादी महिला नेता अपने बच्चे को विदेश में पढ़ने भेजने के लिये भारतीय पासपोर्ट मांग रही है। वह पाकिस्तान से भी पासपोर्ट ले सकती थी पर चूंकि वह देश संदिग्ध है और संभव है कि विदेश में उसे शक की नज़र से देखा जाता इसलिये उसे भारतीय पासपोर्ट चाहिए। यानि अपने काम के लिये उसे भारत नाम की जरूरत है। यह महिला नेता कश्मीर के बच्चों के भारतीय शिक्षा से दूर रहने के लिये कहती थी पर उसका लड़का पढ़ा और विदेश जाना चाहता है। यानि उसका आंदोलन से जुड़ा होना किन्ही स्वार्थों की वजह से ही है।
सीधा मतलब यह है कि कश्मीर मुद्दे में देखने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के आधार देखते फिरें पर हम तो अर्थशास्त्र के अनुसार चलते हैं। यह पत्थर फैंकने या फिंकवाने का काम किसी आर्थिक लाभ के कोई करता होगा इस पर यकीन करना वैसे भी कठिन है। कश्मीर को भारत से अलग करने की कोशिश करने के प्रयास किये जा रहे हैं पर वह धरती से तो अलग नहीं हो सकता और न ही वहां के लोग कोई अलग हैं। भले लोगों की कहीं कमी नहीं है और कश्मीर में भी नहीं होगी पर यकीनन पत्थर फैंकने और फिंकवाने वाले लोगों ने उनके अस्तित्व को नकार रखा है। अगर ईमानदारी से कश्मीर की समस्या का हल करना है तो वहां से विस्थापित पंडितों की वापसी जरूरी है। दूसरी बात यह कि पाकिस्तान के पास कश्मीर के हिस्से के अलावा भी अन्य हिमालयीन क्षेत्र हैं जो बहुत समृद्ध हैं जहां उसने सत्यानाश कर दिया है इसलिये उसके बराबरी के व्यवहार की बजाय ताकत से बात करना चाहिये। वहां के सैन्य शासकों ने अपने धन कमाने और कश्मीर सहित हिमालयीन क्षेत्र के लोगों का शोषण इतना किया है कि वह इन्हीं पत्थर फैंकने के व्यापारियों की वजह से चर्चा में नहीं आ पाता। संभव है हिमालयीन क्षेत्र के शोषक अपना धंधे को दुनियां की नज़र बचाने के लिये यह पैसा देते हों। भारत जो हथियार खरीदता है तो उससे भी दुनियां का बहुत बड़ा व्यापार तो चल ही रहा है। संभव है हथियार बेचने वाले व्यापारी या उनके दलाल भी इस आतंकवाद को जारी रखने के पक्षधर हों। वह मदद करते हैं या नहीं यह तो प्रचार माध्यमों को देखना होगा क्योंकि उनके प्रसारणों पर ही तो आम लेखक लिख पाते हैं।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Nov 3, 2007

पाकिस्तान में सरकार पुरानी, इमरजेंसी नयी

पाकिस्तान में फिर इमरजेंसी लगा दी गयी है। अगर देखा जाये तो हालत वैसे ही जैसे नवाज शरीफ के तख्ता पलट के समय थे, पर इस बार कोई तख्ता पलट नहीं है पर मुशर्रफ ने ऐसा माहौल बनाया गया जैसे कोई तख्ता पलट हो रहा हो। इसमें में कोई शक नहीं है की मुशर्रफ में ऐसी चालाकी हो यह कभी नहीं लगता पर उनके पीछे कोई बहुत चालाक खोपडी है जो उनका संचालन कर रही है। सामने कोई नहीं है पर मुशर्रफ ऐसे सिद्ध हैं कि दुनिया को भूत दिखा रहे हैं। हमने कई भूत भगाने वाले ओझा देखे हैं पर मुशर्रफ जैसा नहीं देखा। हमेशा गरजने वाला अमेरिका भी केवल दु:ख व्यक्त कर रहा है। पिछले आठ वर्ष से मुशर्रफ वहाँ राज्य कर रहे हैं पर हालत बिगड़ते रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में लड़ने निकले मुशर्रफ से किसी ने नहीं पूछा कि 'जनाब, यह आतंकवाद आया कहाँ से?' आठ वर्ष से जूझ रहे मुशर्रफ अब तक आतंकवाद पर काबू नहीं पा सके। अमेरिका ने जिस तरह पाकिस्तान में अपना उपनिवेश कायम कर रखा है वह अब उसे तकलीफ देह होने वाला है।

मुझे लगता है कि यह इमरजेंसी बहुत दूर तक जाने वाली है। जिसे पाकिस्तान कहा जाता है उसका राजनीतिक मानचित्र कुछ भी कहता हो पर उसका संविधान बलोचिस्तान और सीमा प्रांत के इलाकों में नाम भर को चलता है। अंग्रेजों ने इस देश पर डेढ़ सौ वर्ष राज्य किया पर फिर भी यह उनकी निजी जागीर नहीं था जो सिंध, बलूचिस्तान और सीमा प्रांत और पूर्वी बंगाल पाकिस्तान के नाम पर लिख गए। पूर्वी बंगाल तो पाकिस्तान से अलग हो गया पर बाकी तीनों प्रांत भी अब इस रास्ते पर हैं। मैंने अंतर्जाल पर अंग्रेजी में कई पाकिस्तानी ब्लोग देखे हैं और मुझे उनको पढ़ने पर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि क्या वह उनके ही हैं या कोई छद्म ब्लोग हैं। पाकिस्तान पर बहुत समय तक पंजाब से प्रभावित लोगों का राज्य रहा है। उनका नजरिया केवल पंजाब के हितों तक ही सीमित रहा है। वैसे पाकिस्तान में आपातकाल लगना कोई बड़ी बात नहीं है पर इस बार का संकट पाकिस्तान के अस्त्तित्व के लिए चुनौती बनने जा रहा है-और जो लोग सोच रहे हैं कि मुशर्रफ इसे बचा लेंगे वह गलती पर हैं।

वैसे पाकिस्तान एक राष्ट्र है इस बात की पोल तो कई बार खुल चुकी है पर नवाज शरीफ की हाल ही में पाकिस्तान वापसी के समय एक छोटे देश के राजदूत ने उन्हें समझौते के वह दस्तावेज दिखाए जो उन्होने अपनी रिहाई के लिए उसको गवाह बनाकर दस्तक किये थे-यह बात का खुला प्रमाण था कि पाकिस्तान में अन्य राष्ट्रों की कितनी चलती है। अभी तक हर संकट में पाकिस्तान की सेना मजबूत रहती थी पर इस बार वह वजीरिस्तान में ऐसी जंग में फंसी हुई है जहाँ से उसका निकलना अगले कई बरसों तक संभव नहीं है। यह ऐसे इलाके हैं जिन पर अंग्रेज भी कभी पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाए और लोग भी वह हैं जो आज कश्मीर का हिस्सा आज पाक के पास है वह इन्हीं कबाइलियों के वजह से है। इस बार पाकिस्तान की सेना उनसे लड़ रही है जो पाकिस्तान के लिए एक हथियार रहे हैं।
भारत तो सदियों से पाकिस्तान के क्षेत्रों से आने वाले संकटों का सामना करता रहा है और वह आने वाली इस उथल-पुथल से उपजे संकट को भी झेल लेगा पर विश्व के अन्य देशों को वहां से आतंकवाद निर्यात होने वाला संकट और भी बढ़ सकता है। पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न राष्ट्र है और कई लोगों को शक है कि वहाँ से परमाणु तकनीकी आतंकवादियों के हाथ लग सकती है। यह कोई साधारण बात नहीं है कि पाकिस्तान एक परमाणु राष्ट्र है उसकी अस्थिरता अब पूरे विश्व के लिए खतरा है। मुशर्रफ बहुत समय तक पूरे विश्व को धोखा नही दे सकते और फिर उन पर आतंकवाद को पनपाने का आरोप है और आज वह उससे संघर्ष जिस तरह कर रहे हैं लोग उनकी नीयत पर शक करते हैं। इसी आतंकवाद का भी उन्होने इस बार ऐसा भूत खडा किया और अपने को पूरे विश्व में स्वीकार्य दिखाने का जिस तरह प्रयास किया उससे तो यह सवाल यह उठता है कि आखिर वह दोस्त किसके हैं-अमेरिका के, आतंकवादियों के या अपनी कुर्सी के। बहरहाल अगर सब कुछ पटरी पर नहीं आया तो पूरा विश्व इस घटनाक्रम प्रभावित होगा।