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Feb 15, 2014

विदुर नीति-काम निकलने के बाद कोई पूछता नहीं है(vidur neeti-kam nikalne ke baad koyee poochhta nahin hai)



      इस रंगीबिरंगी दुनियां का खेल निराला है।  सकाम रूप से लिप्त लोग अनेक बार यह सोचकर संताप भोगते हैं कि हमने दूसरों के लिये बहुत कुछ किया पर हमें सभी ने धोखा दिया। अपनी संतान को लेकर भी लोग अनेक प्रकार के ऐसे अनुभव करते हैं कि उन्होंने जिनके लिये जीवन जिया वही उनको छोड कर बाहर चले़ गये।  निष्काम भाव से काम करने वालों को कभी संताप नहीं होता। जिन लोगों ने भारतीय अध्यात्म दर्शन में मन बसा लिया है उनके लिये तो बस ही सिद्धांत होता है कि नेकी कर और दरिया में डाल।
      सुबह का समय धर्म के लिये आरक्षित है। इस दौरान जिसने तन और मन की कमाई कर ली उसे धन की चिंता नहीं सताती।  दोपहर के अर्थकाल के दौरान वह अपना मन सांसरिक कार्यों में उतना ही लगाता है जिससे देह का सात्विक  व्यवसाय से भरणपोष हो सके। वह  अपने सांसरिक दायित्वों का यह सोचकर निर्वहन करता है कि उनको किसी दूसरे पर छोड़ना न मुमकिन है न उचित।  ऐसे दायित्व पूरे हो जायें तो बहुत अच्छी बात है भले ही उसका कोई प्रत्यक्ष लाभ न हो पर मन को शांति तो मिलनी चाहिए।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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षडिमें षटसु जीवन्ति सप्तमो नीपलभ्यते।
चौराः प्रमत्ते जीवन्ति व्यधितेषु चिकित्सकाः।।
प्रमादा कामयानेषु यजमानेषु याजकाः।
राजा विवदमानेषु नित्यं मूर्खेषु पण्डिताः।।
     हिन्दी में भावार्थ-कोई भी मनुष्य छह दूसरे प्रकार के मनुष्यों अपनी जीविका चलाता है, सातवें की उपलब्धि नहीं है। चोर असावधान, चिकित्सक रोगी, मतवाली स्त्रियां कामी, पुरोहित यजमान, राजा झगड़ालू तथा विद्वान मूर्खों से अपनी जीविका चलाता है।
षडेते ह्यमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम्।
आचार्य शिक्षिताः शिष्यः कृतदाराश्च मातरम्।।
नारीं विगतकायास्तु कृतार्थाश्चि प्रयोजकम्।
नांव निस्तीर्णकांतारा आतुराश्च चिकित्सकम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-छह प्रकार के लोग अपने उपकारी का समय आने पर तिरस्कार करते हैं। शिक्षा समाप्त होने पर शिष्य गुरु, विवाहित पुत्र पालकों, कामवासना शांत होने पर पुरुष स्त्री, कार्य निकलने पर पूरुष सहायक, नदी पार करने पर सवार नाव तथा स्वस्थ होने पर रोगी चिकित्सक का तिरस्कार करते हैं।

      जिंदगी लंबी है और इसमें लोग मिलते और बिछड़ते हैं। कुछ लोग काम करवाने के लिये निकट आते हैं और उसके बाद पूछते भी नहीं।  किसी के साथ वर्षों तक साथ काम करते हुए मित्रता हो जाती है।  जब वह कहीं चला गया तो भूल जाता है। निष्कामी लोग जानते हैं कि इस जीवन में मनुष्य भले ही दैहिक रूप से वैसा ही रहे पर उसका भाव स्थान, अर्थ तथा समय के अनुसार बदलता रहता है। कहा जाता है कि जो चूल पर साथ ही वही दिल के पास है। अगर हम श्रीमद्भागवत गीता का संदेश समझें तो मनुष्य त्रिगुणमयी माया के वश में होकर ही सारे काम करता है।  ऐसे वह जिस सांसरिक विषय से जुड़ता है पूरी तरह से उसमें समर्पित हो जाता है।  यह संभव है कि इस दौरान ही किसी व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बने पर जब उस विषय से दूर हो जाये तो यकीनन हमें भी उससे दूर होना पड़ेगा। ऐसे में स्वयं को पीड़ा देने की बजाय हमें सच्चाई का ज्ञान करना चाहिए।
      जीवन में प्रतिदिन नये दृश्य घटित होते हैं किसी में हम नायक होते हैं किसी में दूसरा इसका श्रेय पाता है। हमें किसी की उन्नति देखकर स्वयं पीड़ित होने की बजाय अपने काम पर ध्यान रखना चाहिए।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Feb 8, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-मौन रहने के लाभ उठाना सीखें(bhartrihari neeti shatak-maun rahane ke labh uthana seekhen)



      प्रकृत्ति ने मनुष्य को बुद्धि का इतना बड़ा खजाना दिया है कि उससे वह अन्य जीवों पर शासन करता है। हालांकि अज्ञानी मनुष्य इसका उपयोग ढंग से नहीं करते या फिर दुरुपयोग करते हैं।  मनुष्य अपनी इंद्रियों में से वाणी का सबसे अधिक दुरुपयोग करता है। मनुष्य के मन और बुद्धि में विचारों का जो क्रम चलता है उसे वह वाणी के माध्यम से बाहर व्यक्त करने के लिये आतुर रहता है। आजकल जब समाज में रिश्तों के बीच दूरी बनने से लोगों के लिये समाज में आत्मीयता भाव सीमित मात्रा में उपलब्ध है तथा  आधुनिक सभ्यता ने परिवार सीमित तथा सक्रियता संक्षिप्त कर दी है तब मनुष्य के लिये अभिव्यक्ति की कमी एक मानसिक तनाव का बहुत बड़ा कारण बन जाती है।  परिवहन के साधन तीव्र हो गये हैं पर मन के विचारों की गति मंद हो गयी है।  लोग केवल भौतिक साधनों के बारे में सोचते और बोलते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति उनकी रुचि अधिक नहीं है इससे उनमें मानसिक अस्थिरता का भाव निर्मित होता है।
      समाज में संवेदनहीनता बढ़ी है जिससे लोग एक दूसरे की बात समझत नहीं जिससे आपसी विवाद बढते हैं। विषाक्त सामाजिक वातावरण ने लोगों को एकाकी जीवन जीने के लिये बाध्य कर दिया है।  यही कारण है कि अनेक लोग अपने लिये अभिव्यक्त होने का अवसर ढूंढते हैं जब वह मिलता है तो बिना संदर्भ के ही बोलने भी लगते हैं।  मन के लिये अभिव्यक्त होने का सबसे सहज साधन वाणी ही है पर अधिक बोलना भी अंततः उसी के लिये तकलीफदेह हो जाता है। वाणी की वाचलता मनुष्य की छवि खराब ही करती है। कहा भी जाता है कि यही जीभ छाया दिलाती है तो धूप में खड़े होने को भी बाध्य करती है।

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिमिंतम् छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदा समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-परमात्मा ने मनुष्य को मौन रहने का गुण भी प्रदान किया है इसके वह चाहे तो अनेक लाभ उठा सकता है। जहां ज्ञानियों के बीच वार्तालाप हो रहा है तो वहां अपने अज्ञानी मौन रहकर स्वय को विद्वान प्रमाणित कर सकता है।

      हम जब बोलते हैं तो यह पता नहीं लगता कि हमारी वाणी से निकले शब्द मूल्यवान है या अर्थहीन। इसका आभास तभी हो सकता है जब हम मौन होकर दूसरों की बातों को सुने। लोग कितना अर्थहीन और कितना लाभप्रद बोलते हैं इसकी अनुभूति होने के बाद आत्ममंथन करने पर  ही हमारी वाणी में निखार आ सकता है। दूसरी बात यह भी है कि हमारा ज्ञान कितना है इसका पता भी लग सकता है जब हम किसी दूसरे आदमी की बात मौन होकर सुने।  इसके विपरीत लोग किसी विषय का थोड़ा ज्ञान होने पर भी ज्यादा बोलने लगते हैं। आज के प्रचार युग में यह देखा जा सकता है कि साहित्य, कला, धर्म और संस्कृति के विषय पर ऐसे पेशेवर विद्वान जहां तहां दिखाई देते हैं जिनको अपने विषय का ज्ञान अधिक नहीं होता पर प्रबंध कौशल तथा व्यक्तिगत प्रभाव के कारण उनको अभिव्यक्त होने का अवसर मिल जाता है।
      कहने का अभिप्राय है कि आत्मप्रवंचना कर हास्य का पात्र बनने की बजाय मौन रहकर ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जहां चार लोग बैठे हों वह अगर उनके वार्तालाप का विषय अपनी समझ से बाहर हो तो मौन ही रहना श्रेयस्कर है। आजकल वैसे भी लोगों की सहनशक्ति कम है और स्वयं को विद्वान प्रमाणित करने के लिये आपस में लड़ भी पडते हैं। विवादों से बचने में मौन अत्यंत सहायक होता है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Feb 1, 2014

अपना रक्तचाप न बढ़ाओ-हिन्दी व्यंग्य कविता ------------------



लोकतंत्र का खेल है उसके गुण गाते जाओ,
कुर्सी के खेल की धारा में बहस कर ं शब्द बहाते जाओ।
कहें दीपक दीपक बापू महंगाई कभी कम नहीं होती,
भ्रष्टाचार वह राक्षस है जिसकी आंख कभी नहीं सोती।
देश में हर कदम पर स्वर्ग बसाने का वादा मिलता है,
चालाक लोगों के मजे है भला इंसान सभी जगह पिलता है।
कोई विकास का नारा देता कोई ईमानदार बनकर आता है,
बदलाव के नारे बहुत सुनते पर समाज पीछे ही जाता है।
समाज सेवा में पेशेवरों ने बना लिया है अपना ठिकाना,
चंदे से  अपने घर चलाते मजबूरी उनकी दान करते दिखाना।
आखों से खबरे पढ़ो और देखो कानों से  सुनो फिर भूल जाओ,
दिमाग में ज्यादा देकर अपना रक्तचाप कभी न बढ़ाओ।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Jan 26, 2014

घर के अंदर और बाहर-हिन्दी व्यंग्य कविता(ghar ke bahar aur bahar-hindi vyangya kavita)



देश के आजादी और गणतंत्र को वही दे रहे गाालियां,
जिन्होंने आम इंसान से बजवाईं अपने लिये तालियां।
कहें दीपक बापू
अपनी अभिव्यक्ति के लिये मिले जिन्हें प्रचार के साधन,
दिखने के रहते बागी पर होते सौदागरों के साजन,
मसलों के लिये जूझते लोगों को देखकर जमाना खुश होता,
पर्दे के पीछे करते वही करते सौदे में समझौता जब वह सोता।
अपनी छवि चमकाने के लिये जो करते दूसरों का अपमान,
दूर बैठे आम इंसानों में ढूंढ रहे अपने लिये सम्मान,
घर से बाहर सड़क पर जूलूस निकाल कर जो लगा रहे नारे
घर के अंदर वही ले जाते सोने बहाकर लाने वाली नालियां।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Jan 20, 2014

अच्छा है चिल्लाने का बहाना-हिन्दी व्यंग्य(achchha hai chillane ka bahana-hindi vyangya)



नित नये स्वांग रचें,
अपने ही सच से आप बचें,
जिंदगी में हर पल एक नया शगूफा छोड़कर
सरल है स्वयं को  बहलाना
मौका मिले तो दूसरे को भी बरगलाना।
कहें दीपक बापू
पर्दे पर चलती खबर
फिल्म की तरह बनी लगती हैं,
पात्रों की अदायें बाद में हुई 
पहले लिखी लगती है,
जब काम न बनता हो अपने आप से
अस्त्र शस्त्रों को पास में दबाकर
भीड़ में हमदर्दी पाने के लिये
अच्छा है चिल्लाने का बहानां
......................................

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Jan 10, 2014

लोगों की लाचारी-हिन्दी व्यंग्य कविता (logon ki lachari-hindi vyangya kavita)


ठंड में ठिठुरते हुए बच्चे, औरतें और वृद्ध पुरुष
झौंपड़ी में कांप रहे हैं
जिंदगी उनकी ले रही सासें ठहरकर
अपने दर्द को अपने दिल से ही ढांक रहे हैं।
कहें दीपक बापू
वातानुकूलित शमियानों में
शीतलहर को धोखा देने का स्वांग करते
महलों वाले लोग मजे ले रहें हैं,
संगीत नृत्य के बीच मच रहा जोर
सलामी उनको सौंदर्य प्रसाधनों से
सजे चेहरे दे रहे हैं,
परवाह नहीं बेबस लोगों के मरने की,
शिखर पर सारे साधन उनके पास
नहीं जरूरत किसी से डरने की,
किसकी करें शिकायत
किस पर लगायें आरोप
ज़माने ने उनके वादे अपने सपनों में बसा लिये,
सौंप कर उनके सिंहासन अपने हाथ बांध दिये,
आतिशबाजी जलाकर जश्न मना रहे भलाई के ठेकेदार
लोगों की लाचारी वह भांप रहे हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Dec 27, 2013

आम आदमी और जाम आदमी-हिन्दी हास्य व्यंग्य(aam admi aur jaam aadmi-hindi hasya vyangya-hindi hasya vyangya or hindi satire on comman man)



            हमारे देश में आम आदमी होना कभी गौरव की बात समझी नहीं जाती। कोई कितना भी अच्छा  लेखक, कवि, या चित्रकार हो अगर उसके नाम के समक्ष कोई पद, पदवी या प्रकाशन नहीं है तो उसे समाज में आम आदमी ही माना जाता है। अगर वह कहीं अपने रचनाकर्म की बात करे तो उससे  सवाल यही किया जाता है कि‘तुम उसके अलावा क्या करते हो?’
            हमारे समाज की यह वास्तविकता है कि वह राजकीय छवि की ही प्रशंसा करता है।  भगवान श्रीराम राजपद पर बैठे थे उनका राज्य काल इतना प्रशंसनीय रहा कि लोग आज भी उसे याद करते हैं पर जिन बाल्मीकी महर्षि ने उन पर बृहइ  ग्रंथ की रचना के माध्यम से उनको  भगवान के रूप में समाज के सामने प्रतिष्ठत किया उन्हें  कभीं भगवान का दर्जा नहीं मिला।  जिन महर्षि वेदव्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को भगवत् पर पद प्रतिष्ठत करने के साथ ही श्रीगीता के संदेशों का इस तरह स्थापित किया कि पूरा विश्व उनको मानता है मगर व्यासजी समाज  पूज्यनीय तो बने पर प्रेरक नहीं। कोई व्यक्ति बाल्मीक या वेदव्यास जैसी रचना करने की  दूर यह बात सोच भी नहीं सकता।  जो आम जीवन जी रहा है वह खास बनने के लिये हमेशा बेताब रहता है।
            ‘आम आदमी का भला करना है’ का नारा लगाते हुए अनेक लोग खास बन गये। इतने खास कि उन्हें अब आम आदमी की कतार होने का भय लगता है।  उस दिन एक प्रदेश के राज्यमंत्री का समाचार देखा। वह अब चाय बेचता है।  अपना दर्द बयान कर रहा था।  आम से खास बने लोगों के लिये उसके समाचार  डरावना हो सकते हैं। 
            खास आदमी अपना स्तर बनाये रखने के लिये भारी जद्दोजेहद करता है। इसमें उसे आम से खास बनने से अधिक मेहनत करना होती है। 
            बहरहाल अपने दीपक बापू आजकल भारी परेशानी में है।  स्वयं को आम आदमी कहकर अभी तक अपने फ्लाप होने के आरोप से छिपते फिर रहे थे। अब यह मुश्किल हो गया है।
            उस दिन वह एक किराने की दुकान पर गये। वहां से सौ ग्राम शक्कर खरीदी और अपने घर चल दिये। हालांकि उन्होंने शक्कर खरीदने के लिये  अपने घर से पांच किलोमीटर दूर की दुकान चुनी थी ताकि कोई जान पहचान वाला न देख ले। अभी तक समाज में उनकी  छवि मध्य वर्गीय मानी जाती थी,  पर महंगाई ने उनको निम्न वर्ग में पहुंचा दिया था। यह सच्चाई कोई जान न ले इस कारण दीपक बापू किराने का सामान दूर से ही खरीदते हैं।  मगर उनका दुर्भाग्य भी पीछा नहंीं छोड़ता। वह शक्कर खरीद कर पलटे नहीं कि एक कार उनके पास आकर रुकी। आलोचक महाराज उसमें से निकले। बोले-‘‘कार खाली जा रही है। चलो घर तक छोड़ देता हूं। तुम मुझे पांच रुपये दे देना।
            कंगाली में आटा  गीला। चार रुपये की शक्कर खरीदी थी और पांच रुपये का किराया देना पड़े यह दीपक बापू को मंजूर नहीं था। बहरहाल हास्य कवि-भले ही फ्लाप हो-यह सहन नहीं कर सकता कि कोई उसे इस तरह जलील करे। बोले-‘‘नहीं, मै तो पैदल घर से निकला हूं। मुझें अपनी सेहत बनाये रखनी है।
            आलोचक महाराज हंसे-‘‘तुम्हारी सेहत में ऐसा क्या है जिसे बनाये रखना है।  एकदम दुबले पतले कीकट रखे हो। हमें देखो कितने मोटे ताजे हैं।  तुम्हारे पास अभी पांच रुपये नहीं हों तो बाद में दे देना। इतना उधार तो तुम पर रख ही सकता हूं।’
            दीपक बापू बोले-‘नहीं आप जाईये। मेरे पास पांच रुपये का छुट्टा नहीं है।’’
            आलोचक महाराज बोले-‘‘छुट्टा नहीं है, या हैं ही नहीं! जहां तक मेरा अनुमान है कि तुम्हारी जेब में दस दस रुपये के चार, नहीं हो सकता है कि तीन, नहीं नही मुझे लगता है कि  एक दस के नोट से अधिक नहीं हो सकता।  इधर तुम्हारी हास्य कवितायें छोटी पत्रिकाओं में छपती हैं वहां से पैसा मिलता ही नही है।  इधर उधर टाईप कर कमाने का तुम्हारा धंधा भी अब कंप्यूटर की वजह से कम हो गया है।’
            दीपक बापू हंसे-‘‘बोले आप हंस लीजिये।  आप को तो बड़े बड़े लोगों का संरक्षण मिला हुआ है। हम तो आम आदमी हैं, ऐसे ही फटेहाल ही ठीक हैं।’’
            इसी बीच दुकानदार को किसी दूसरे ग्राहक को देने के लिये खुले पैसे चाहिये थे। वह दीपक बापू के पास आया और बोला-‘साहब आपके पास दस रुपये के खुले होंगे। आपने अभी सौ ग्राम शक्कर खरीदी थी। मैंने सोचा आपके पास जरूर खुले पैसे होंगे। मुझे दूसरे ग्राहक को देने हैं।’’
            दीपक बापू चिढ़कर बोले-‘‘नहीं है! जाओ यहां से!
             उसके दूर होते ही आलोचक महाराज कृत्रिम आश्चर्य से बोले-‘‘आम आदमी! तब तो तुमसे डरना पड़ेगा। अरे, तुम्हें मालुम नहीं है आजकल आम आदमी के नाम से बड़ों बड़ों को पसीना आता है।  आम आदमी नाम का एक संगठन जलवे दिखा रहा है। तुम अगर आम आदमी होते तो यहां सौ ग्राम शक्कर खरीदने पांच किलोमीटर चलकर नहीं आते। यह दुकानदार खुद ही सौ ग्राम की बजाय एक किलो शक्कर देने घर आता।’’
            दीपक बोले-‘एक तो आप हमारी कवितायें छपने के लिये किसी बड़े पत्र या पत्रिका के संपादक से सिफारिश नहीं करते। अब हमारे आम आदमी होने का उपहास तो न उड़ायें जिस पर हम अपनी हास्य कवितायें लिखते हैं।
            आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम अब स्वयं को आम आदमी नहीं जाम आदमी कहा करो। तुमने सुना है कि यह बात आम जाम है।  आम आदमी शब्द तो आम की तरह मीठा हो गया है। अपने को आप आदमी कहने से पहले  दमखम रखना वरना.......कहीं तुमने आम आदमी होने का दावा किया और प्रमाणित नहीं कर सके तो कोई मार मारकर जाम आदमी बना देगा।’’
            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, यही तो हमारे पास एक पदवी थी इसे भी अगर आप खास लोग छीन लेंगे तो बचा ही क्या?’’
            आलोचक महाराज बोले-‘‘भईये देख लो! हम तो तुम्हें आम आदमी नहीं जाम आदमी ही कहेंगे। आम आदमी तो विकास पथर पर चलता है, तुम जाम आदमी की तरह खड़े हो। दूसरी बात अपनी हास्य कविताओं में अब आम आदमी के दर्द पर रोना नहीं क्योंकि अब वह योद्धाओं की पहचान बन गया है।’’
            दीपक बापू   सोचने की मुद्रा में बोले-‘मगर जाम आदमी शब्द भी नहीं चल पायेगा।  ऐसा करते हैं सामान्य आदमी शब्द चल जायेगा।’
            आलोचक महाराज ने पहले आकाश में देखते हुए बोले-देखो भई, आम इंसान शब्द थोड़ा ठंडा है। हास्य कविताओं में नहीं चल पायेगा। जाम आदमी जमेगा।’’
            दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप छोड़ें। आम आदमी शब्द आपको ले जाना है तो ले जायें रहा हमारी हास्य कविताओं के प्रभाव का सवाल! आप परेशान न हों! हमारी हास्य कवितायें आपकी सिफारिश चाहे न पायें पर उनका प्रभाव शब्दों की वजह से हमेशा रहेगा।  हम आम इंसान से ही काम चला लेंगे।
            आलोचक महाराज गुस्से में कार के अंदर चले गये। दीपक बापू परेशान हाल घर की तरफ चल पड़े। सौ ग्राम शक्कर खरीदने की पोल से अधिक उनको इस बात की चिंता थी कि आम आदमी शब्द उनकी लेखनी से दूर जा रहा था।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Dec 12, 2013

लोकतंत्र के गीत-हिन्दी व्यंग्य कविता(loktantra ke geet-hindi vyangya kavita or satire poem)

लोकतंत्र में ईमानदार होने से ज्यादा
दिखना जरूरी है,
वादे करते जाओ,
दावे जताते जाओ,
भले ही यकीन से उनकी दूरी हो।
कहें दीपक बापू
सत्ता का रास्ता चुनाव से जाता है,
लोगों को शब्दों के जाल में फंसना  भाता है,
चल रहा है देश भगवान भरोसे,
इंसानों को कोई क्यों कोसे,
दिल में भले ही कुर्सी के मचलता हो,
दिमाग में अपना घर भरने का विचार पलता हो,
सादगी दिखाओ ऐसी
जिसमें चालाकी भरी पूरी हो।
गरीब का भला न कर पाओ,
पर नित उसके गीत गाओ,
चाहे जुबान की जो मजबूरी हो।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Dec 1, 2013

अंतर्जालीय जनसंपर्क(सोशल मीडिया) के अधिक प्रभावी होने का भ्रम न पालें-हिन्दी संपादकीय (social media in not powerful in hindi language than TV and news paper in india-hindi editorial)



            अंतर्जाल पर सामाजिक संपर्क जिसे हम सोशल मीडिया कह रहे हैं उसके प्रभावों पर इस समय देश में बहस चल रही है।  कुछ लोग यह मानते हैं कि देश की सामाजिक, राजनीतिक तथा वैचारिक स्थिति पर इसका अधिक प्रभाव है तो कुछ इसे नहीं मान रहे।  हमारा मानना है कि यह कथित सोशल मीडिया वास्तव में एक ऐसी आभासी दुनियां है जिसके बारे में अनुमान ही किया जा सकता है।  एक तथ्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करना कठिन काम है। 
            यह लेखक पिछले आठ वर्ष से लिख रहा है पर सच्चाई यह है कि इसका नाम अपने मोहल्ले के बाहर भी एक ब्लॉग लेखक के रूप में कोई नहीं जानता। पहचानना तो दूर की बात है किसी एक व्यक्ति से इसके माध्यम से भौतिक संपर्क तक नहीं हो पाया। कथित रूप से अनेक मित्र बने पर जैसे जैसे खुलासे हो रहे हैं उससे साफ साफ लगता है कि अंतर्जाल कंपनियों ने अपनी अपनी माया जिस तरह रची है उससे ख्वामख्वाह में अपने प्रसिद्ध होने का भ्रम पाल लिया था।  यह भ्रम भी उन मित्रों की ही देन थी जो अत्यंत भावपूर्ण रूप से टिप्पणियां देते थे।  हमारा मानना है कि कोई आठ ऐसे लोग रहे होंगे (जिनके नाम हमारे एक स्थानीय अखबार में छपे थे जो हमें अब याद नहीं हैं) जो हिन्दी भाषा के विशारद थे और वह पेशेवराना अंदाज में संगठित बाज़ार को भविष्य के लिये जमीन प्रदान कर रहे थे।  उनकी प्रतिभा यकीनन असंदिग्ध रही है। इनमें भी कम से कम एक आदमी ऐसा है जो हमें हार्दिक भाव से चाहता रहा होगा। वह कई नाम से आता होगा और यकीनन अपनी टिप्पणी में अपना वास्तविक नाम नहीं लिखता होगा। वह महिला भी हो सकती है, क्योंकि आभासी दुनियां में कुछ भी कहना कठिन है।
            हमने अंतर्जाल पर केवल अपनी रचनात्मकता स्वयं को दिखाने का लक्ष्य रखकर प्रारंभ किया पर कथित मित्र अच्छे अदाकर भी थे इसलिये उन्होंने हमारे सामने अनेक उत्सुकतायें पैदा कीं। अगर हम पत्रकार नहीं रहे होते तो जल्दी उन पर यकीन कर लेते। हमें  यह जल्द समझ में आ भी गया कि इस तरह की आत्मीयता के पीछे कुछ राज है। इशारों में हमने अपनी बात कह भी डाली और उसके बाद हमारी यह आभासी दुनियां एकदम समाप्त हो गयी।  इससे हमें राहत मिली कि हमें कोई पढ़ता नहीं है क्योंकि ऐसे में विवादों में पड़ने का भय नहीं रहता।   अंतर्जाल पर प्रकाशित पाठों से पता चलता है कि देश के कुछ अखबारों में प्रकाशित अनेक लेखों में प्रतिष्ठत हिन्दी ब्लॉगरों के नाम  होते हैं पर हमारा नाम नहीं मिलता।   सीधी बात कहें तो हम आज भी वहीं है जहां आठ वर्ष पहले थे।  कथित मित्रों के पाठ अब भी देखते हैं उसमें अपना नाम तक नहीं होता।  लोग यह न सोचें कि हम इससे निराश हैं क्योंकि हमें पता था कि हमें कुछ पेशेवर लोग केवल हिन्दी में अंतर्जाल पर अधिक से अधिक हिन्दी लिखने के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिये हमसे मित्रता का स्वांग कर रहे हैं।  हम स्थानीय अखबार में छपे नामों को इसलिये भी याद नहीं रख पाये क्योंकि उनमें से कोई भी अपनी वास्तविक छवि के साथ नहीं था।  वह आठ लोग पता नहीं कितने नामों से पाठ और टिप्पणियां लिखते रहे थे। उस समय ऐसा लगता है कि सैंकड़ों ब्लॉगर होंगे पर ऐसा था नहीं। वह न केवल अच्छे लेखक थे पर अच्छे अदाकार भी थे। उनके अनेक पाठ ऐसे थे जो उनकी प्रतिभा का प्रमाण थे।  वह बेहतर ढंग एक ही समय में मित्र और विरोधी की भूमिका निभा लेते थे।  कोई कह नहीं सकता कि एक समय में एक व्यक्ति इस तरह दोहरी भूमिका निभा सकता है। बहरहाल उन्होंने हमसे पीछा छुड़ाया तो हमें भी तसल्ली हुई। एक बात तय रही कि इन आठों में कोई भी ऐसा नहीं था जो हम जैसा स्वतंत्र चिंत्तन रखता हो।  यह सभी कहीं न कहीं देश में प्रचलित राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तथा कला क्षेत्रों में बंटे समाज में अपने समूहों के प्रतिनिधि थे।  हम विशुद्ध रूप से भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा की तरफ उस समय तक मुड़ चुके थे। सच्ची बात यह कि हमने अंतर्जाल पर लिखते हुए अपने अंदर एक दृढ़ वैचारिक ढांचे का निर्माण किया।  इस उपलब्धि ने हमें इतना मजबूत बनाया कि हमें साफ लगने लगा कि जिस राह पर हम हैं वह किसी हमराही के मिलने की संभावना नगण्य रहेगी। सत्य स्वीकार करने के साथ ही मनुष्य में दृढ़ता का भाव आता है यह हमारी इस यात्रा से निकाला गया निष्कर्ष है।
            इस अनुभव के कारण हमने यह भी निष्कर्ष निकाला कि अगर आठ वर्ष से लिखते हुए जो अंतर्जाल हमें एक अंतरंग मित्र या स्थाई पाठक न दिला सका तो वह किसी के लिये फलीभूत नहीं हो सकता। अलबत्ता यहां काम करने पेशेवर लोग किसी के सामने किसी भी तरह की आभासी दुनियां खड़ी कर सकते हैं।  यह अलग बात है कि उनकी आभासी दुनियां के साथ कुछ सत्य जुड़ जाता है पर उसका प्रतिशत कितना होगा इसका विश्लेषण करना बाकी है।  इस समय चुनावों पर सोशल मीडिया के जिस प्रभाव का उल्लेख किया जा रहा है उसका अधिक आंकलन हमें सशंकित करता है। यह पेशेवर लोग हिन्दी भाषी क्षेत्रों में किसी के लिये प्रचार कर सकते हैं पर उन्हीं व्यक्तित्वों का जो परंपरागत प्रचार माध्यमों में-टीवी और समाचार पत्र-पहले से ही स्थापित हैं। इनमें यह शक्ति नहीं है कि अंतर्जाल पर सक्रिय व्यक्ति को इन माध्यमों में स्थापित कर सकें। यह संगठित बाज़ार और प्रचार समूहों के पिछलग्गू हो सकते हैं पर कोई स्वतंत्र मार्ग निर्मित नहीं कर सकते। आठ वर्ष लिखते रहने के बाद हमारा कोई नाम नहीं लेता इससे अफसोस नहीं होता क्योंकि हमें पता है कि हिन्दी भाषा के स्थापित समूहों ने ही यहां कब्जा किया है और जो हमें कभी पहचानने का प्रयास नहीं करेंगे।  वह परंपरागत समूहों और व्यक्तियों के अनुयायी होकर यहां आये हैं कि किसी स्वतंत्र हिन्दी लेखन समाज का निर्माण करना उनका लक्ष्य है। एक पेशेवर को जिस तरह के तौर तरीके आजमाने चाहिये वही वह कर रहे हैं।  वह धन कमायें हमें बुरा नहीं लगता पर अगर वह समाज में कोई नवीन परिवर्तन का स्वप्न दिखायें तो उनको चुनौती देने का मन हमारा भी करता है।  हमने पहले भी लिखा कि जिस तरह स्थापित हिन्दी भाषी प्रकाशनों का रवैया रहा है कि वह किसी लेखक को उभारते नहीं वरन् उभरे हुए किसी हिन्दी क्षेत्र के अंग्रेंजी लेखक को हिन्दी में अनुवाद कर प्रकाशित कर अपनी कमाई  का लक्ष्य पूरा करना बेहतर समझते  हैं उसी तरह  अंतर्जाल पर भी रहने वाला है। एक सामान्य शुद्ध हिन्दी लेखक के लिये जिस तरह प्रबंध कौशल के अभाव में कहीं नाम और नामा कमाना कठिन है वैसा ही यहां भी है।  अलबत्ता हम जैसे स्वांत सुखाय लेखकों के लिये यह मजेदार है।  कहीं कुछ देखकर अपनी भड़ास यहां निकालना अपने आप में एक मनोरंजक काम लगता है।
            अपनी बात करते हुए हम इस बात को भूल ही गये कि समाज पर इस अंतर्जाल के प्रभाव की बात करना है। एक बात हम यहां यह भी बता दें कि देश के व्यवसायिक टीवी चैनल इससे बहुत डरे हुए होंगे।  वजह यह कि टीवी चैनल से ऊबे लोगों के लिये अंतर्जाल एक नये टॉनिक का काम करता है।  यहीं कारण है कि सभी टीवी चैनल इस तरह की सामग्री देते हैं है जिससे नयी पीढ़ी के लोग उसके साथ बने रहें। यही कारण है कि अनेक समाचार वह फिल्म की तरह पेश करते हैं।  एक ही समाचार पर सात दिन तक बहसें होती हैं। खासतौर से प्रतिष्ठित लोगों का कभी खराब समय आता है तो वह इन चैनलों के लिये कमाई का अवसर बन जाता है।  जिस दिन यह टीवी चैनल फार्म में होते हैं उस दिन हमारे ब्लॉग पिटते हैं और जिस दिन अपने ब्लॉग हिट देखते हैं तो पता लगता है कि टीवी चैनल कमजोर हैं।  सीधी बात कहें तो अभी भी टीवी चैनल और समाचार पत्र ताकतवर बने हुए हैं।  उन्होंने अपने प्रयासों से अंतर्जाल के प्रयोक्ता अपनी तरफ खींच लिये हैं।  दूसरी बात यह भी है कि अंतर्जाल हिन्दी भाषा से नये लेखक देने में नाकाम रहा है जिससे उसका मकड़जाल भी कमजोर रहा है।  अंतर्जाल पर पेशेवर लोग इस बात को समझ लें कि उनके पास एक भी ऐसा नाम नहीं है कि वह दावा कर सकें कि उन्होंने यहां किसी हिन्दी भाषी लेखक को उभारा। यह बात अंतर्जाल के प्रयोक्ताओं को निराश करने वाली है।  सबसे बड़ी बात यह कि हम उनके हिन्दी भाषी क्षेत्रों में उस तरह की पहुंच को मानते ही नहीं जैसा कि वह दावा करते है। कुछ विवाद सोशल मीडिया को लेकर खड़े हुए है पर हमारा मानना है कि यह केवल इस प्रचार के लिये हैं कि अंतर्जाल के प्रयोक्ता बने रहें। जिस तरह फेसबुक (facebook), ट्विटर(twitter) तथा ब्लॉग (blogger and wordpress blog) से मोहभंग होते लोगों को हम देख रहे हैं उससे तो यह लगता है कि यह आम उपयोग से बाहर होने वाला ही है। इसलिये किसी को भी सोशल मीडिया के अधिक शक्तिशाली होने का भ्रम नहीं पालना चाहिये। शेष अगले भाग में।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Nov 5, 2013

मंगल मिशन के लिये शुभकामनायें-हिन्दी संपादकीय(good wish for mangal mission-hindi editorial)



                        
        भारतीय वैज्ञानिक आज मंगल पर खोज के लिये एक अंतरिक्ष यान प्रेषित कर देश के लोगों का आत्मविश्वास बढ़ाया है| इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा का सारा विश्व लोहा मानता है यह अलग बात है कि यहां पूरी सुविधायें न होने से अनेक लोग पलायन कर दूसरे देशों की सेवा करते हैं।  इतना ही नहीं भारतीय प्रचार माध्यम भी विदेशों में काम कर रहे  भारतीय मूल के वैज्ञानिकों का चमत्कृत करने वाला प्रचार करते है।  इससे भारतीय जनमानस के एक बहुत बड़े वर्ग में यह भाव होता है कि हमारे यहां तो विदेशों जैसा विकास हो ही नहीं सकता।  इतना ही नहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो किसी वैज्ञानिक उपलब्धि पर यह कहकर फब्ती कसता है कि ऐसे काम की बजाय देश के गरीबों पर पैसा खर्च किया जाता। यह संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण है कि अपने देश के वैज्ञानिकों का मनोबल बढ़ाने की बजाय घटाने का प्रयास किया जाये। जिस तरह देश में निराशा का  वातावरण है  उसमें भारतीय वैज्ञानिकेां ने मंगल पर जाने योग्य अंतरिक्ष यान का निर्माण कर लिया इसके लिये वह बधाई के पात्र हैं।
                        जहां तक देश में व्याप्त समस्याओं की बात है तो वह कभी खत्म नहीं होंगी अलबत्ता उन्हें नियंत्रित करने के सरकारी प्रयास होते रहे हैं यही बात महत्वपूर्ण है।  अगर कुछ जनहितैषी विद्वान ऐसी उपलब्धियों की देश में व्याप्त समस्याओं की आड़ में खिल्ली उड़ाते हैं तो उन पर दया ही आती है। वह देश या राष्ट्र के बने रहने के सिद्धांतों को नहीं समझते।  अगर उनकी बात मान ली जाये तो राज्य केवल राजस्व वसूली करे और प्रजा में रोटियां बांटता फिरे।  न सेना की जरूरत न पुलिस की जरूरत, बस सभी तरह रोटियां बांटने वाले दफ्तर खुले होने चाहिये।  ऐसे लोगों के बयान हास्यास्पद होते है।
                        एक राष्ट्र के नियंत्रक को प्रजा का आत्मविश्वास तथा अन्य राष्ट्रों की प्रजा में अपनी छवि बनाये रखने का समान प्रयास करना चाहिये।  जहां तक वैज्ञानिक प्रतिभाओं की बात है तो भारत की छवि उज्जवल है। दूसरी बात यह कि भारत में गरीब अधिक संख्या में है पर यह गरीब देश नहीं कहा जा सकता। देश में कृषि, खनिज तथा वन संपदा का अकूत भंडार है।  समस्या आर्थिक असमान वितरण की है न कि पैसे की कमी की। ऐसा कौनसा देश हैं जहां सारे अमीर है। ढूंढने निकलें तो अमेरिका तक में गरीबी मिल जाती है।  गरीब के हित का ख्याल होना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उच्च तथा मध्यम वर्ग के लोगों के  आत्मविश्वास बढ़ाने पर पर ध्यान नहीं दें। इस तरह की उपलब्धियां उन लोगों को आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, जो राष्ट्र निर्माण के साथ ही उसकी रक्षा के कार्य में तत्पर होते हैं। यह आत्मविश्वास राष्ट्र के लिये अप्रत्यक्ष रूप से फलदायी होता है।  अपने आत्मविश्वास से युवा वर्ग राष्ट्र को स्थिरता और विकास के मार्ग पर ले जाता है। यह ठीक है इससे उनको व्यक्तिगत लाभ होता है और राज्य का भी यही लक्ष्य होता है कि लोग आत्मनिर्भर बने।  प्रजा का निजी लाभ ही राज्य का लाभ होता है। जब हम राष्ट्र की बात करते हैं तो उच्च, मध्यम और गरीब तीनों वर्ग के लोग उसमें शमिल रहते हैं और राज्य का यह काम है कि वह सबका ध्यान रखे।  मंगल मिशन से देश का आत्मविश्वास बढ़ेगा उसके लाभों का रुपयों में आंकलन नहीं किया जा सकता।
                        बहरहाल यह मंगल मिशन कामयाब हो इससे हमें बहुत प्रसन्नता होगी।  देश के आर्थिक तथा वैज्ञानिक रणनीतिकारों ने इस प्रयास में  रुचि लेते हुए  इसमें सहमति दी इसके लिये वह भी बधाई के पात्र हैं।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे वैज्ञानिकों ने कुछ सोच समझकर ही यह मिशन तैयार किया होगा। इसके लिये वह बधाई के पात्र हैं। हमारी कामना है कि वह सफल हों।                   


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Oct 21, 2013

ज्ञान से कीमती बड़ा खजाना कहां मिलेगा-हिन्दी व्यंग्य लेख(gyan se kimti bada khazana kahan milega-hindi vyangya lekh)



                        एक संत ने एक सपना देखा कि एक पुराने महल में पंद्रह फुट नीचे  एक हजार टन सोना-जो एक एक स्वर्गीय राजा का है जिसे अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था-दबा हुआ है।  उसने अपनी बात जैसे तैसे भारतीय पुरातत्व विभाग तक पहुंचायी।  पुरातत्व विभाग ने अपनी सांस्कृतिक खोज के तहत एक अभियान प्रारंभ किया।  पुरातत्वविद् मानते हैं कि उन्हें सोना नहीं मिलेगा। मिलेगा तो इतने बड़े पैमाने पर नहीं होगा।  अलबत्ता कोई प्राचीन खोज करने का लक्ष्य पूरा हो सकता है, यही सोचकर पुरातत्व विभाग का एक दल वहां खुदाई कर रहा है।
                        यही एक सामान्य कहानी अपने समझ में आयी पर सोना शब्द ही ऐसा है कि अच्छे खासे आदमी को बावला कर दे। सोने का खजाना ढूंढा जा रहा है, इस खबर ने प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री प्रसारण का वह  अवसर प्रदान किया है जिसकी तलाश उनको रहती है।  भारत में लोगों वेसे काम अधिक होने का बहाना करते हैं पर ऐसा कोई आदमी नहीं है जो टीवी पर खबरें देखने में वक्त खराब करते हुए  इस खबर में दिलचस्पी न ले रहा हो। व्यवसायिक निजी चैनलों ने भारतीय जनमानस में इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि इसके माध्यम से कोई भी विषय सहजता से भारत के आम आदमी के लिये ज्ञेय बनाया जा सकता है।  इस पर खजाना वह भी सोने का, अनेक लोगों ने दांतों तले उंगली दबा रखी है। टीवी चैनलों ने लंबी चौड़ी बहसें चला रखी हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि संत ने सपना देखा है तो तय बात है कि बात धर्म से जुड़नी है और कुछ लोगों की आस्थायें इससे विचलित भी होनी है।  सोना निकला तो संत की वाह वाह नहीं हुई तो, यह बात अनेक धर्मभीरुओं को डरा रही है कि इससे धर्म बदनाम होगा।
                        कहा जाता है कि संत त्यागी हैं। यकीनन होंगे। मुश्किल यह है कि वह स्वयं कोई वार्तालाप नहीं करते और उनका शिष्य ही सभी के सामने दावे प्रस्तुत करने के साथ ही विरोध का प्रतिकार भी कर रहा है। इस पर एक टीवी पर चल रही बहस में एक अध्यात्मिक रुचि वाली संतवेशधारी महिला अत्यंत चिंतित दिखाई दीं। उन्हें लग रहा था कि यह एक अध्यात्मिक विषय नहीं है और इससे देश के भक्तों पर धर्म को लेकर ढेर सारा भ्रम पैदा होगा।
                        एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में कम से कम हमें तो इससे कोई खतरा नहीं लगता।  सच बात तो यह है कि अगर आप किसी को निष्काम कर्म का उपदेश दें तो वह नहीं समझेगा पर आप अगर किसी को बिना या कम परिश्रम से अधिक धन पाने का मार्ग बताओ तो वह गौर से सुनेगा।  हमारे देश में अनेक लोग ऐसे हैं जिनके मन में यह विचार बचपन में पैदा होता है कि धर्म के सहारे समाज में सम्मान पाया जाये।  वह कुछ समय तक भारतीय ज्ञान ग्रंथों का पठन पाठन कर अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। थोड़े समय में उनको पता लग जाता है कि इससे बात बनेगी नहीं तब वह सांसरिक विषयों में भक्तों का मार्ग दर्शन करने लगते है। कुछ चमत्कार वगैरह कर शिष्यों को संग्रह करना शुरु करते हैं तो फिर उनका यह क्रम थमता नहीं।  अध्यात्मिक ज्ञान तो उनके लिये भूली भटकी बात हो जाती है।  लोग भी उसी संत के गुण गाते हैं जो सांसरिक विषयों में संकट पर उनकी सहायता करते हैं।  यहां हम एक अध्यात्मिक चिंतक के रूप में बता दें कि ऐसे संतों के प्रति हमारे मन में कोई दुर्भाव नहीं है। आखिर इस विश्व में आर्त और अर्थाथी भाव के भक्तों को संभालने वाला भी तो कोई चाहिये न! जिज्ञासुओं को कोई एक गुरु समझा नहीं सकता और ज्ञानियों के लिये श्रीमद्भागवत गीता से बड़ा कोई गुरु होता नहीं। आर्ती और अर्थार्थी भक्तों की संख्या इस संसार में सर्वाधिक होती है। केवल भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व में धर्म के ठेकेदारों का यही लक्ष्य होते है। केवल भारतीय धर्म हीं नहीं बल्कि विदेशों में पनपे धर्म भी इन ठेकेदारों के चमत्कारों से समर्थन पाते हैं। जब अंधविश्वास की बात करें तो भारत ही नहीं पूरे विश्व में ऐसी स्थिति है।  जिन्हें यकीन न हो वह हॉलीवुड की फिल्में देख लें। जिन्होंने भूतों और अंतरिक्ष प्राणियों पर ढेर सारी फिल्में बनायी हैं। दुनियां के बर्बाद होने के अनेक संकट उसमें दिखाये जाते हैं जिनसे नायक बचा लेता है। ऐसे संकट कभी प्रत्यक्ष में कभी आते दिखते नहीं।
                        हम संतों पर कोई आक्षेप नहीं करते पर सच बात यह है कि जब वह सांसरिक विषय में लिप्त होते हैं तो उनका कुछ पाने का स्वार्थ न भी हो पर मुफ्त के प्रचार का शिकार होने का आरोप तो उन पर लगता ही है। दूसरी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान साधक स्पष्टतः उनकी छवि को संदेह की नजरों से देखने लगते है।  विदेशी लोग भारत के बारे में कह करते थे  कि यहां हर डाल पर सोने की चिड़िया रहती है।  जब हम मार्ग में गेेंहूं के खेत लहलहाते देखते हैं तो लगता है कि यहां खड़ी फसलें देखकर ही उन्होंने ऐसा कहा होगा।  हो सकता है यह हमारा पूर्वाग्रह हो क्योंकि हमें गेंहूं की रोटी ही ज्यादा पसंद है।  उससे भूख शांत होती है। दूसरी बात यह भी है कि सेोने से कोई अधिक लगाव नहीं रहा।  गेंहूं की रोटी लंबे समय तक पेट में रहती है और दिल में संतोष होता है। संतोषी आदमी को सोना नहीं सुहाता।  मुश्किल यह है कि सोना प्रत्यक्ष पेट नहीं भर पाता।
                        कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने। भारत में सोने की कोई खदान हो इसकी जानकारी हमें नहीं है।  सोना दक्षिण अफ्रीका में पैदा होता है।  तय बात है कि सदियों से यह विदेश से आयातित होता रहा है।  सोना यहां से दूर रहा है इसलिये भारत के लोग उसके दीवाने रहे हैं।  जिस गेंहूं से पेट भरता है वह उनके लिये तुच्छ है।  एक हजार टन सोना कभी किसी राजा के पास रहा हो इस पर यकीन करना भी कठिन है। हीरे जवाहरात की बात समझ में आती है क्योंकि उनके उद्गम स्थल भारत में हैं।  अनेक प्राचीन ग्रंथों में स्वर्णमय हीरे जवाहरात जड़े मुकुटों तथा सिंहासन  की बात आती है पर उनके सोने की परत चढ़ी रही होती होगी या रंग ऐसा रहा होगा कि सोना लगे।  असली सोना यहां कभी इतना किसी व्यक्ति विशेष के पास रहा होगा यह यकीन करना कठिन है।
                        भारत में लोगों के अंदर संग्रह की प्रवृत्ति जबरदस्त है।  कुछ समझदार लोग कहते हैं कि अगर सोने का आभूषण तीन बार बनवाने के लिये किसी एक आदमी के पास ले जायें तो समझ लो पूरा सोना ही उसका हो गयां।  इसके बावजूद लोग हैं कि मानते नहीं। अनेक ढोंगी तांत्रिक तो केवल गढ़ा खजाना बताने के नाम पर धंधा कर रहे हैं। इतना ही नहीं अनेक ठग भी सोना दुगंना करने के नाम पर पूरे गहने ही महिलाओं के हाथ से छुड़ा लेते है।  बहरहाल खुदाई पूरी होने पर सोना मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य ही बतायेगा पर टीवी चैनलों में विज्ञापन का समय समाचार तथा बहस के बीच खूब पास हो रहा है।
                        आखिर में हमारा हलकट सवाल-अरे, कोई हमें बतायेगा कि श्रीमद्भागवत गीता के बहुमूल्य ज्ञान के खजाने से अधिक बड़ा खजाना कहां मिलेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com