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Jun 14, 2011

तेल उधार लेकर चिराग न जलाएँ-हिन्दी साहित्यक कविता

तेल उधार लेकर

घर के चिराग न जलाएँ,

मांगी मिठाई से

दिवाली न मनाएँ,

अँधेरों में जीना,

जुबान चाहे मांगे स्वाद

अपने होंठ भूख से सीना,

वरना गुड़ बनकर

अमीरों के हत्थे चढ़ जाओगे।

फिर गुलामी की जज़ीरों से

लड़ते रहोगे

आज़ादी के लिए छटपटाओगे।

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मांगने से मिलती नहीं अमीरी

छीनने से सिंहासन नहीं मिल जाता है।

अपनी दौलत, शौहरत और ताकत

पर भले ही तुम इतराते रहो

अपने घमंड से काँपते देखो ज़माना

सच यह है कि

तुम्हारी ताकत से

क्या हिलेगा देश में कोई पेड़

किसी शहर का पत्ता तक हिल नहीं पाता है।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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May 16, 2010

वफा सस्ती कब थी-हिन्दी शायरी (vafaa sasti aur mahangi-hindi shayari)

वफा न कभी सस्ती थी
जो कहें अब महंगी हो गयी,
बाज़ार से हो गयी लापता बरसों से
खरीदने वालों की जो तंगी हो गयी।
दाम चुकाकर वफा खरीद सकते हैं,
पर उसके खालिस होने का नहीं दम भरते हैं,
जब जब कीमत का नकाब उतरा
तब असलियत नंगी हो गयी।
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कई अक्लमंद लगे हैं काम पर
दुनियां के आम इंसान जगाने के लिये,
इसलिये कोई दे रहा है खूनी तकरीर
कोई बांट रहा हथियार  लोगों में, लड़ने के लिये।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
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Apr 23, 2010

दौलतमंदों का सजा बाज़ार-हिन्दी शायरी (daulatmandon ka bazar-hindi shayari)

पैसे कमाने का हुनर
दुनियां में सबसे अच्छा माना जाता है,
भले ही कोई फन हो न हो
दौलतमंद खरीद लेता है
सारे फनकार कौड़ी के भाव
इसलिये हुनरमंद भी माना जाता है।
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मयस्सर नहीं हैं जिनको रोटी
उनसे ज़माना खौफ खाता है।
इसलिये फुरसत मिलने पर करते हैं
सभी गरीब का भला करने की बात
बाकी समय तो दौलतमंदों के सजाये
बाजार में ही बीत जाता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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