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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

May 2, 2011

हास्य कविता-प्रेम और विवाह के फोटो सजाये रखना (hasya kavita-prem aur vivah ke foto sajaye rakhna)

टीवी पत्रकार ने कहा
अपने संपादक से
‘सर,
आप देखिए मैंने
राजघराने के राजकुमार के
विवाह प्रसंग को कितनी अच्छी तरह
अपने चैनल पर चलाया,
ढेर सारे विज्ञापन चलते रहे,
लोगों के मन में स्वयं
और औलादों की ऐसी ही शादी के
सपने मन ही मन पलते रहे,
हमने भी लिया विदेशी चैनलों से
सारा माल साभार,
हो गया अपने चैनल का बेड़ा मुफ्त में पार,
इसे कहते हैं कि हल्दी लगे न फिटकरी
रंग चोखा आया।’

सुनकर संपादक ने कहा
‘वैसे भी कौन हमारे समाचारों पर
कोई खर्चा आता है,
वह तो गनीमत समझो
कि मैंने तुम्हारी नौकरी का जुगाड़
प्रबंधकों से कर रखा है
वरना उनको तो तुम्हारा
वेतन देना भी भारी नज़र आता है,
वैसे भूल जाओ अब इस खबर को,
नहीं खींच सकते यह खबर ऐसे, जैसे रबड़ को,
अब कोई दूसरी सनसनी या रोमांचक
खबर जुटाने लग जाओ,
इस खबर को भी मत भुलाओ,
ध्यान में रखना
राजकुमार के प्रेम प्रसंग,
और सजनी से मिलन का रंग,
अभी हमने श्रृंगार रस से कार्यक्रंम सजाया,
इसलिये जवानों को बहुत भाया,
अब देखन कहीं इस प्रेम में विरह कब आता है,
धनपतियों और राजघरानों के रिश्तों में
कभी ठहराव न उनको न जनता को भाता है,
देखना कब विरह का रंग आता है,
फिर तलाक से भी पब्लिक का नाता है,
इस प्रेम प्रसंग और विवाह की फिल्म और फोटो
अपने पास संजोये रखना
देखे कब होता है हमारी सनसनी का पकना,
कभी प्रेम और विवाह का प्रसंग अधिक नहीं खिंचता
इसलिये उससे हमने इतना नहीं कमाया
जितना विरह से पाया,
जब होगा राजधराने में घरेलू झगड़ा
दर्शकों को देंगे सनसनी का झटका तगड़ा,
शादी एक दिन होती है,
पर झगड़े की बात बरसों तक
हमारे विज्ञापन ढोती है,
इसलिये बाकी खबरों में तलाश करते रहो,
कनखियों से राजघराने की तरफ भी तकते रहे,
प्रेम और शादी से अधिक प्रसंग
विरह का लंबा खिंच जाता है,
उससे ही हर प्रचारक अधिक कमाता है,
तलाक फैलाता है सनसनी,
मजा बढ़ाती है बड़े लोगों की तनातनी,
मैंने तुम्हें वही बात बताई,
जो अनुभव से पाई,
जब देखो राजकुमार और राजकुमारी का फुका चेहरा
समझ लो लंब समय तक
विज्ञापन चलाने के लिये
प्रसंग पाने का मौका पाया।’’
------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Aug 31, 2008

छटांक भर का रोग बचाकर लाये-हास्य व्यंग्य

मेरे मित्र ने कहा-‘कल कोई एक निबंध लिख कर लाना। मेरे बेटी वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाली है तो उसे याद कर बोलेगी।’
उसने विषय बता दिया। अगले दिन मैंने उसे एक कागज पकड़ाया तो उसने मुझसे कहा-‘ऐ भाई! मैंने तुम्हें निबंध लिखने के लिये कहा था। यह क्या छटांक भर लिख कर लाये हो। क्या ब्लाग पर छटांक भर लिखते हुए एक किलो का लिखना भूल गये।’

हमने कुछ सुना कुछ नहीं। बात उससे आगे बढ़ी ही नहीं। छटांक भर शब्द पर ही हम अटक गये। क्या जोरदार शब्द था ‘छटांक भर’। अब तो हमने तय किया कि जब भी लिखेंगे छटांक भर ही लिखेंगे। इस शब्द में इतना आकर्षण लगा कि जब भी कोई हमारे ब्लाग से अंतर्जाल पर टकरायेगा यह शब्द पढ़कर जरूर पढ़ने के लिये प्रेरित होगा। जब से अंतर्जाल पर ब्लाग लिखना शुरू किया है तब से इसी फिराक में रहते हैं कि कोई ऐसा शब्द या पंक्ति हाथ लग जाये जिससे हम हिट हो जायें।

बहरहाल मित्र को दोबारा लिखने का आश्वासन दिया। उसके बाद घर आकर एक पुराना लेख निकाला। वह उसी विषय संबंधित था और उसे सौंप दिया। उसने पूछा कि ‘इतनी जल्दी कैसे लिख लिया’।
‘छटांक भर का काम था, इसमें हमें देर क्या लगती है।’हमने कहा
वह बोला-‘अगर यह छटांक भर का काम है तो कल वाले की तौल क्या होगी? उसका तो बांट भी नहीं मिलेगा।’
मैंने कहा-‘मेरे लिये तो सब छंटाक भर है।’
बस तबसे हमारे दिमाग में छटांक भर शब्द को अपना हथियार बना लिया।
कल एक चाय की दुकान पर गये। वहां चाय वाले से कहा-‘देना भई, छटांक भर चाय पिला देना।’
चाय वाला हमें घूर कर देखने लगा और बोला-‘बाबूजी, यह छटांक भर चाय का क्या मतलब है?’
हमने कहा-‘तुम तो रोज पिलाते हो भूल गये क्या?’
वह बोला-‘बाबूजी, तो आप कट चाय बोलिये ना! छटांक भर से मैं कन्फ्यूज हो गया।’
वह चला गया तो हमने उसे यहां काम करने वाले आदमी से कहा-‘भाई, जरा छटांक भर पानी पिला देना।’
वह भी घूर घूर कर हमें देखने लगा। हमने कहा-‘सुना नहीं। छटांक भर पानी पिला देना।’
वह बोला-‘पर छटांक भर पानी तोल कर कैसे लाऊं। वह तो ग्लास मेंे ही आयेगा।’
हमने कहा-‘तुम्हारा ग्लास ही तो छटांक भर का है। ले आओ उसी में।’
उसी समय हमारा वह मित्र भी आ गया। उसने आते ही चाय वाले को दो कप चाय लाने का आदेश दिया और हमारे सामने बैठ गया।
चाय पीते हुए हमने उससे एक आदमी की चर्चा करते हुए कहा-‘उसका छटांक भर फोन नंबर तो देना।’
वह बोला-मेरे पास नहीं है।’
हमने कहा-‘छटांक भर पता ही दे दो।
वह बोला-‘यह छटांक भर का क्या मतलब। पूरा का पूरा ही ले लो एक किलो का। वैसे मैंने तो मजाक में ही कह दिया था छटांक भर तुम तो उसे पकड़ कर बैठ गये।’
मैंने कहा-‘मैंने तो तुमसे कुछ कहा ही नहीं। छटांक भर बहुत हिट शब्द लगा सो पकड़ लिया। अधिक परेशान न होना। अगर हमारे ब्लाग खोलोगे तो वहां अब यही शब्द नजर आयेंगे।’
मेरा मित्र बोला-‘अजीब आदमी हो। इस छटांक भर की बीमारी को वहां भी ले गये।’
हमने पूछा-‘अब यह बताओ कि यह छटांक भर बीमारी क्या होती है वैसे यह आयी तो वहीं से ही थी।’
वह बोला-‘इस बीमारी का नाम है छटांक भर, पर तुम्हारे लिये एक किलो साबित होने वाली हैं। वैसे सच बताना क्या यह मेरे कहने से यह छटांक भर की बीमारी वहां ले गये हो।’
हमने कहा-नहीं! बल्कि यह बीमारी तो आई वहीं से। तुमने तो केवल उसे बढ़ाने का काम किया है। वहां लोग बोलते हैं कि छटांक भर का पाठ लिखता है।’
चाय पीकर हम दोनो बाहर निकले। थोड़ी दूर चलकर हमने एक बाजार देखा और उससे कहा-‘धूप बहुत है। उस किताब की दुकान पर चलते है और वहां से दिमागी बीमारियों के घरेलू इलाज करने वाली किताब खरीदते है।’
वह बोला-‘हां! यह ठीक है। इससे तुम इस छटांक भर की बीमारी से मुक्ति पा लोगे।’
मैंने कहा-‘पगला गये हो। हम अपने इलाज के लिये ही थोड़े ही खरीद रहे हैं। वह तो हमें अपने ब्लाग पर लिखना है। लोग कह रहे हैं कि छटांक भर कविताओं और व्यंग्यों से क्या होता है। सोच रहे है कि वहां आधी रात के बैठकर एक धारावाहिक लिखेंगे‘डाक्टर कहते हैं’, हो सकता है इससे हिट हो जायें।’
वह बोला-‘तुम अपनी बीमारी का क्या करोगे?
हमने कहा-‘उसकी फिक्र तो तुम जैसे दोस्त करें जिनकी वजह से यह लगी है। बहुत किस्मत से बिना बुलाये बीमारी आयी है वरना लोग तो हमदर्दी पाने के लिये बीमारी का नाटक करते हैं। जहां चार लोग बैठते हैं तो मधुमेह,उच्चरक्तचाप,टीवी और तमाम बीमारियों अपने होने की सूचना देकर वहां एक दूसरे से हमदर्दी जुटाते हैं। कुछ होती है और कुछ बताते हुए अपने आप बढ़ जाती है। उस बीमारी से वह स्वयं ही परेशान होते हैं पर हमारी छटांक भर बीमारी तो दूसरों के लिये परेशानी का सबब बनेगी। हमें तो हिट मिलेंगे।’

मित्र ने कहा-‘तब तो अगर तुम्हें कोई इनाम वगैरह मिले तो मुझे उसका हिस्सा हमें देना। आखिर यह बीमारी हमने दी है।’
हमने कहा-‘यह तुम्हारा भ्रम हैं। जिस तरह बीमारियों की चर्चा से बढ़ती हैं उसी तरह यह भी तुम्हारी चर्चा से बढ़ी है।
उसने पूछा-‘तो किसी ने ब्लाग वाले ने लिखकर यह बीमारी तुम पर लादी है। उसका नाम मुझे बता दो तो उसको धन्यवाद दूंगा। अरे, उसे हमारे दोस्त को हिट होने का मार्ग बता दिया।’

हमने कहा-‘हम तो उसका नाम भूल ही गये। यह छटांक भर शब्द आकर ही ऐसा चिपका कि सब भूल गये। हम बस खुश हैं। आह...आह......वाह क्या आईडिया मिला। अब तो समझो कोई पुरस्कार मिलकर ही रहेगा।’
मित्र ने कहा-‘साफ कहो संभावित पुरस्कार की सारी राशि हड़पने का मन है। इस शब्द का अविष्कारकर्ता मुझे मानते नहीं और जिसने किया है उसका बताते नहीं। यह भारी चालाकी दोस्तों के साथ नहीं चल सकती।’
हमने कहा-‘भारी भरकम कहां यार! अब तो बस छटांक भर कहो। तुम क्या नहीं चाहते हम ब्लाग पर हिट पायें।’
मित्र ने कहा-‘महाराज, मगर कोई पुरस्कार आ जाये तो छटांक भर हमारे साथ भी बांट लेना। अरे और कुछ नहीं तो छटांक भर मिठाई ही खिला देना।’
हमने कहा-‘हां, अगर कोई पुरस्कार आ गया तो शेयर कर दूंगा ‘छटांक भर’
हमारा मित्र बोला-‘यार, मुझे याद रखना चाहिए कि तुम अब ब्लागर हो। इसलिये ऐसे शब्द नहीं बोलूंगा जिसे चुराकर तुम हिट लो। ऐसे शब्द तुमसे बोलने से क्या फायदा जो छटांक भर भी फायदा न हो।’
हमने कहा‘क्या बात करते हो यार, छटांक भर फायदा तो होगा ही छटांक भर मिठाई खाकर।’
उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा-‘नहीं! बिल्कुल नहीं। तुम्हारी जो हालत दिख रही है तुम भारी भरकम फायदा तो करा दोगे पर छटांक भर नहीं।’
अब हम उसकी तरफ देख रहे थे और लग रहा था कि हमारी बीमारी उसके पास जा रही है। पूरी तरह हमारी बीमारी चली नहीं जाये यह डर हमें लगने लगा। हम अपनी बची बीमारी के साथ वहां से चल दिये ।
.........................................................
नोट-यह व्यंग्य पूरी तरह काल्पनिक है तथा किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।

यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’ पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप
................................................

Mar 10, 2008

समन्दर गहरा कि मन-हिन्दी शायरी

समन्दर गहरा है कि मन
कोई नहीं जान पाया
जिसने जैसा समझा बताया
दोनों पर इंसान काबू नहीं कर सकता
पर फिर भी इसका उपाय बताया

समन्दर में मीठे पानी की तलाश में
आदमी का मन ललचाया
जहाँ मिलता है मीठा पानी
वहाँ से उसका मन कभी नहीं भर पाया

चारों तरफ रौशनी में बैठा शख्स
अंधेरों में रहने वालों का दर्द बयान कर
लूटता हैं वाह-वाही
पर गली में जाने से उसका मन डरता है
उसके बडे होने के अहसास में
कोई सच उनके सामने कह नहीं पाया
अनजाने खौफ में जीता आदमी का मन
समन्दर की लहरों की तरह उठा और गिरता है
हम उसे नहीं चलाते
हमारी जीवन की नैया का मांझी है मन
भला इस सच को कौन जान पाया

अँधेरे में जिनके घर डूबे हैं
वह फिर भी जिन्दगी से नहीं ऊबे हैं
क्योंकि उम्मीद हैं उनको किसी दिन
रौशनी उनके घर में आयेगी
पर जो पी रहे हैं धरती और आकाश की रौशनी
जीते हैं एक डर में
पता नहीं कब अँधेरा उनके निकट आ जाये
इसके लिए उन्होने षड्यंत्रों को
अपना कवच बनाया
जिन्होंने लांघी मजबूरी की हद
वही जीते हैं जिन्दगी को सहजता से
समन्दर गहरा कि मन
उन्होने ही जान पाया
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Feb 28, 2008

किसी को रात डराती है तो किसी को दिन-हिन्दी शायरी

हमने देखा था उगता सूरज
उन्होने देखा डूबता हुआ
वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में
जश्न मनाने की तैयारी
पर हमने देखा था पूरा दिन
हमारा मन भी था डूबा हुआ
वह आसमान में टिमटिमाते तारों की
बात करते हुए खुश हो रहे थे
जबकि हमारा बदन था
तब भी पसीने की बदबू लिया हुआ
सबकी जमीन और आसमान
अलग-अलग होते हैं
किसी को रात डराती है तो किसी को दिन
किसी को भूख नहीं लगती किसी को सताती है
इसलिए सब होते हैं अकेले
क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ
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Feb 1, 2008

क्या तुमने यह ख्वाब देखा है-कविता साहित्य

जाने-पहचाने सफर पर तो
रोज चलते हैं
पर कभी अनजाने सफर पर
चलकर भी देखा है
जान-पहचान के लोगों से
मिलकर तो रोज
कभी जानी हुई बात करते हैं
पर क्या कभी अनजान लोगों से
अपने को अनजानी बाते करते देखा

रोज वही चेहरे और वही स्वर
मन को नहीं लुभा सकते
चाहे कितने दिल और देह के करीब हों
कभी अपने मन को
अनजानों में एक अनजान की तरह
घूमने के लिए तरसते देखा है
जाने-पहचाने लोगों की महफ़िल में
भला कहाँ प्यार मिल पाता है
कभी अनजान चेहरों में
तुमने हमदर्दी का भाव देखा है

दुनिया उससे बहुत बड़ी है
जितनी तुम देखते हो
इस छोर से उस छोर तक
बहुत कुछ है देखने लायक
पर क्या तुमने उसको अपने से
दूर तक देखने का ख्वाब देखा है

Jan 15, 2008

रिश्ते अब उदासी से हो गये-कविता

हमने तो चाही थी खुशी उनकी
पर वह हमें उदासी दे गए
कुछ नहीं माँगा था उनसे
सिवाय कुछ प्यार के पलों के
छोड़ दिया शहर प्रवासी हो गए

कितनी अजीब हैं दुनिया
अपनी बेबसी के साथ जीते लोग
दूसरे की लाचारी पर हँसते हैं
लड़ते हैं जमाने के लिए जो शूरवीर बनकर
जख्म उनके अकेले सहलाने के लिए बचते हैं
हमने उनके लिए बनाया रास्ता
ख़त्म कर दिया उन्होने हमसे वास्ता
हम तो लड़ते रहे हैं हारी हुई ऐसी लड़ाई
जिसमे जीत कभी हो नहीं सकती
शोर से दूर ही होती हमारी बस्ती
हारते जाते हैं
फिर भी लड़ते जाते हैं
रास्ते में कोई मिला
उसके साथ हो जाते हैं
शायद कोई दिल का हाल
सुनकर हमदर्द बन जाये
पर जो आयी उनकी मंजिल
हमें अकेला छोड़ जाते हैं
तन्हाई में बैठकर हँसते हैं
कभी अपने हाल पर रोते हैं
थकती लगती हैं जिन्दगी
रिश्ते अब उदासी से हो गए
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Jan 2, 2008

बिना दर्द के भी इंसान तडपता

कभी-कभी उदास होकर
चला जातो हूँ भीड़ में
सुकून ढूँढने अपने लिए
ढूँढता हूँ कोई हमदर्द
पर वहाँ तो खडा रहता है
हर शख्स अपना दर्द साथ लिए
सुनता हूँ जब सबका दर्द
अपना तो भूल जाता हूँ
लौटता हूँ अपने घर वापस
दूसरों का दर्द साथ लिए

कभी सोचता हूँ कि
अगर इस जहाँ में दर्द न होता
तो हर शख्स कितना बेदर्द होता
फिर क्यों कोई किसी का हमदर्द होता
कौन होता वक्ता कौन श्रोता होता
तब अकेला इंसान तडपता
किसी का दर्द पीने के लिए

Dec 10, 2007

इंसान और परिंदे

ऊपर उठ कर आसमान छू लेने की
चाहत किसमें नहीं होती
पर परिंदों जैसी
किस्मंत सभी की नहीं होती
उड़ते हैं आसमान में
पर उसे छू कर देखने की
ख्वाहिश उनमें नहीं होती
उड़ नहीं सकता आसमान में
फिर भी इंसान की
नजरें उसी पर होती
उड़ते हुए परिंदे
आसमान से जमीन पर भी आ जाते
पर इंसान के कदम जमीन पर होते
पर ख्याल कभी उस पर नहीं टिक पाते
लिखीं गयी ढेर सारी किताबें
आकाश के स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए
जिसमें होतीं है ढेर सारी नसीहतें
पढ़कर जिनको आदमी अक्ल बंद होती
अपने पैर में जंजीरें डालकर
आदमी फिर भी कहता है
'काश हमारी किस्मत भी परिंदों जैसी होती'

Dec 8, 2007

इसे भाग्य कहें या कर्मों का लेखा

पत्थर और कागजों के टुकडों को
जोड़ने में जो अपना मन लगाते
उनको श्रृंगार रस में नहलाए
अलंकार से सजाए
शब्दों के गीत नहीं सुहाते
सुनने के आदी है भयानक शोर
अपने सुर से दूसरे को करते बोर
उन्हें कानों को संगीत के सुर नहीं भाते
इसे भाग्य कहें या कर्मों का लेखा
जन्नत के सुख के लिए आदमी
पूरी जिन्दगी भर लड़ता है
पर इस धरती पर मौजूद
वैसे ही सुनहरे दृश्य उसके नसीब में नहीं आते
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तन की भूख सूखी रोटी खाकर मिट जाये
पर मन की अनंत भूख कहाँ तक थम पाये
जमीन पर पाँव के साथ दिमाग भी रख कर
आदमी अगर सोचे तो कभी नहीं पछताए
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Dec 2, 2007

इसलिए आज हमने कुछ नहीं लिखा

आज कुछ नहीं लिखा। मैं आज सोच रहा था की कोई गजल, गीत, कविता, कहानी, व्यंग्य या कोई लेख लिखूं पर मेरा सारा ध्यान 'उड़न तश्तरी' शब्द चला जा रहा था। गजल लिख रहा था उसमें हर लाइन में उड़न तश्तरी शब्द आ जाता था। जैसे-
''शराब के नशे में देखा आकाश में थी उड़न तश्तरी
उसमें से निकली बहारें बिखेरती एक सुदंर सी परी।''

इसमें गड़बड़ कहीं नहीं है बस खुटका इस बात का था कि यह किसी बड़ी शख्सियत का नाम हुआ तो उसके प्रशंसक बिगड़ जायेंगे। अपनी भावनाएं आहत होने का आरोप लगायेंगे। कुछ और क्यों नहीं लिखा। परी को उड़न तश्तरी से ही क्यों उतारा एरोप्लेन से क्यों नहीं?

फिर गीत लिखने बैठा तो उसकी पहली पंक्ति में ही यह शब्द आ गया जैसे-
'' उनकी आँखें देखीं तो थी मदभरी
चमक रहीं थी जैसे उड़न तश्तरी''
बस इससे आगे बात नहीं बढ़ी। पहले यह तो पता करना चाहिऐ कि यह किसी का नाम तो नहीं है। ऐसा लगने लगा कि मैंने कई बार यह नाम देखा है और लगता है कि इस नाम के व्यक्ति के बहुत सारे समर्थक हैं। अब गीत और गजल हैं तो लिखते समय भावनाओं का उतार चढाव तो आते हैं और कुछ ऐसा-वैसा लिख गए तो फिर लोगों को समझाना कठिन हो जायेगा कि भई, हमारे इन शब्दों का उड़न तश्तरी नाम के किसी शख्सियत से कोई लेना-देना नहीं है, पर आजकल कोई किसी की सुनता कहाँ है, सब तो कहने में लगे हुए हैं। एक शब्द पढ़कर पूरे पाठ का अर्थ निकल लेते हैं।

व्यंग्य लिखने बैठे तो फिर 'उड़न तश्तरी' पर ही लिखने का विचार आया। कहीं कोई चमकता पत्थर पहाड़ से गिरा तो लोगों ने कहा यह उड़न तश्तरी है-ऐसे विचार बना और छोड़ दिया। हम जितना इस शब्द को भुलाना चाहते उतना ही याद आता।

कहानी लिखने बैठे तो एक गरीब बच्चे की याद आयी जिसे किसी ने बताया था कि ऊपर से उड़न तश्तरी में बैठकर फ़रिश्ते आते हैं और गरीबों को उपहार देते हैं और वह आकाश में बैठा रात को उड़न तश्तरी देखता रहता है-अब यह कहानी लिखते तो कहानी में अनेक बार इस शब्द को लिखना पड़ता। इसलिए यह विचार स्थगित कर दिया। फिर लेख लिखने को बैठा तो याद आया कि अमेरिका में बहुत पहले लोगों ने उड़न तश्तरी से लोग निकलते देखे थे। अगर उड़न खटोले में देखे होते तो मैं लिख देता। अब सवाल यह है कि क्या उड़न तश्तरी को किसी वस्तु से जोडें और किसी व्यक्ति का नाम हुआ तो समस्या आ जायेगी। जब कुछ लिखते हैं तो उसमें कोई प्रतिकूल टिप्पणी भी आ सकती है और और व्यंग्यात्मक कटाक्ष भी। ऐसे में किसी का नाम हुआ तो वह आपति करेगा और कोई बड़ी शख्सियत का मालिक हुआ तो उसके समर्थक ही बवाल खडा कर देंगे।

मतलब यह कि कोई भी नाम लिखें तो देखना पड़ेगा कि वह अधिक प्रचलित नहीं होना चाहिऐ। ब्लोग पर लिखते हुए कम से कम दो ब्लोग के नाम या उनके संचालन कर्ता का परिचय ऐसे हैं जिन्हें अपने ब्लोग पर लिखना कठिन होता है क्योंकि वह इस तरह के हैं कि उनकी संज्ञा और क्रिया दोनों ही व्यंग्य की और इंगित करतीं है और उनको लिखने का मतलब है उसके नामधारियों से झगडा मोल लेना। जब सारा दिन 'उड़न तश्तरी' शब्द दिमाग से नहीं निकला तो हमें आज लिखने का प्रोग्राम स्थगित कर दिया, ऐसा लिखने से क्या फायदा कि विवाद खडा हो जाये। वैसे देखा जाये तो आजकल लेखक वैसे भी काम है और हम भी कभी कभार ही कोई बड़ी रचना लिखने बैठते है तब एक-एक शब्द पर इतना सोचेंगे तो लिखेंगे क्या?
नोट-यह एक हास्य व्यंग्य आलेख है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना-देना नहीं है, अगर किसी से मेल हो जाये तो संयोग होगा।

Nov 5, 2007

रास्ते तो बनते हैं बिगड़ते हैं

अपने रास्ते को नहीं जानते जब
दूसरे के पद चिन्हों पर चलते हैं
जब कोई अपना ख्याल नहीं बनाते
दूसरे के नारों पर कहानी गढ़ते हैं
जब अपने शब्द नहीं रच पाते
तब दूसरे के वाद पर
अपने प्रपंच रचते है

पुराने बिखर चुके विचार
नयेपन की हवा से दूर होते हैं
हम तरक्की की चाह में
बेकार अपने सिर ढोते हैं
कहवा घरों और चाय के गुमटियों पर
चुस्कियाँ लेते हुए अपनी गरीबी और बीमारी
पर बात करते हुए रोते हैं
पर इससे घर और देश नहीं चलते हैं

हाथ में सिगरेट लेकर रास्ते पर चलते हुए
टीवी के कैमरे के सामने अपने विचारों की
आग उगलते हुए
अपने को बहुत अच्छे लगते हैं
गरीबी और भुखमरी पर लिखते हैं
बडे-बडे ग्रंथ
शब्दों में मार्मिकता का बोध गढ़ते हैं
पर यह तुम्हारा गढा गया सोच
कभी गरीब और भूख से बेजार लोगों का
पेट नहीं भर सकता
जिनके लिए तुम सब रचते हो
वही लोग उसे नहीं पढ़ते हैं

सच तो यह है कि
गरीबी के लिए चाहिऐ धन
भूख के लिए रोटी
जिस आकाश की तराग देखते हो
दोनों वहाँ नहीं बनते हैं
इसलिए चलते जाओ रास्ता सामने है
खडे होकर बहस मत करो
रेत और पानी की धाराओं से
इस धरती पर रास्ते बिगड़ते और बनते हैं

Oct 27, 2007

सच और झूठ

एक झूठ सौ बार बोला जाये
तो वह सच हो जाता है
और एक सच सौ बार
दुहराया जाये तो
मजाक हो जाता है
सच होता है अति सूक्ष्म
विस्तार लेते वृक्ष की तरह
कई झूठ भी समेटे हुए
वटवृक्ष बन जाता है
कौनसा पता झूठ का है
और कौनसा सच का
पता ही नही लग पाता है
लोग पते पकडे हाथ में ऐसे
मानो सच पकडा हो
भले ही झूठ ने उनकी बुद्धि को जकडा हो
जिनके पास सच है
उनको भी भरोसा नहीं उस पर
जिन्होंने झूठ को पकडा है
वह भी अपने पथ को सच
मानकर चलते हैं उस पर
सदियों से चल रहा है द्वंद
सच और झूठ का
इसका अंत कहीं नहीं आता है।
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Sep 8, 2007

दृष्टा बनकर जो रहेगा

अगर मन में व्यग्रता का भाव हो तो
सुहाना मौसम भी क्या भायेगा
अंतर्दृष्टि में हो दोष तो
प्राकृतिक सौन्दर्य का बोध
कौन कर पायेगा
मन की अग्नि में पकते
विद्वेष, लालच, लोभ, अहंकार और
चिन्ता जैसे अभक्ष्य भोजन
गल जाता है देह का रक्त जिनसे
तब सूर्य की तीक्ष्ण अग्नि को
कौन सह पायेगा
अपने ही ओढ़े गये दर्द और पीडा का
इलाज कौन कर पायेगा
कहाँ तक जुटाएगा संपत्ति का अंबार
कहाँ तक करेगा अपनी प्रसिद्धि का विस्तार
आदमी कभी न कभी तो थक जाएगा
जो दृष्टा बनाकर जीवन गुजारेगा
खेल में खेलते भी मन से दूर रहेगा
वही अमन से जीवन में रह पायेगा
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Jul 12, 2007

सबसे अलग हटकर लिखो

तू लिख
समाज में झगडा
बढाने के लिए लिख
शांति की बात लिखेगा
तो तेरी रचना कौन पढेगा
जहां द्वंद्व न होता वहां होता लिख
जहाँ कत्ल होता हो आदर्श का
उससे मुहँ फेर
बेईमानों के स्वर्ग की
गाथा लिख
ईमान की बात लिखेगा
तो तेरी ख़बर कौन पढेगा


अमीरी पर कस खाली फब्तियां
जहाँ मौका मिले
अमीरों की स्तुति कर
गरीबों का हमदर्द दिख
भले ही कुछ न लिख
गरीबी को सहारा देने की
बात अगर करेगा
तो तेरी संपादकीय कौन पढेगा

रोटी को तरसते लोगों की बात पर
लोगों का दिल भर आता है
तू उनके जज्बातों पर ख़ूब लिख
फोटो से भर दे अपने पृष्ठ
भूख बिकने की चीज है ख़ूब लिख
किसी भूखे को रोटी मिलने पर लिखेगा
तो तेरी बात कौन सुनेगा

पर यह सब लिख कर
एक दिन ही पढे जाओगे
अगले दिन अपना लिखा ही
तुम भूल जाओगे
फिर कौन तुम्हे पढेगा

झगडे से बडी उम्र शांति की होती है
गरीब की भूख से लडाई तो अनंत है
पर जीवन का स्वरूप भी बेअंत है
तुम सबसे अलग हटकर लिखो
सब झगडे पर लिखें
तुम शांति पर लिखो
लोग भूख पर लिखें
तुम भक्ति पर लिखो
सब आतंक पर लिखें
तुम अपनी आस्था पर लिखो
सब बेईमानी पर लिखें
तुम अपने विश्वास पर लिखो
जब लड़ते-लड़ते थक जाएगा ज़माना
मुट्ठी भींचे रहना कठिन है
हाथ कभी तो खोलेंगे ही लोग
तब हर कोई तुम्हारा लिखा पढेगा
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Jul 8, 2007

ज्ञान के चिराग कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं

बौद्धिक अँधेरे में ज्ञान के चिराग
कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं
सदियों से अपनी जगह खडे बुत भी
लोगों को चलते नजर आ रहे हैं

जिनको नहीं दिखता उनको क्या कहें
जिनको दिखता है वही
हवा में अपने संदेश उडाये जा रहे हैं

इधर है ताज खङा
उधर है हिमालय अड़ा
एक को बनाया गरीब और
मजदूरों ने अपने ख़ून पसीने से
इस बात को जग भूला
दुसरे को सृष्टी ने खुद गडा
जिस पर होता है व्यापार
वहीं लोग अपने जज्बात
बेचने जा रहे हैं

विज्ञान ने की है इतनी तरक्क़ी
कि लोग अपने ज्ञान-चक्षुओं की
रोशनी खोते जा रहे हैं

कहैं दीपकबापू
कभी गर्मी की तीक्ष्ण धुप में जलते
कभी वर्षा की फुहारों में चमकते
कभी सर्दी में ठंड में दमकते
ताज में भला पहिये लग सकते हैं
पर लोग हैं कि लगाए जा रहे हैं
हम ज्ञानी हैं कि अज्ञानी यही
नहीं समझ पा रहे हैं

Jun 27, 2007

तब भी अकेले नजर आओगे

जब तुम बदलाव के लिए
आगे बढते जाओगे
भीड़ से अलग होकर
अकेले नजर आओगे

बदलाव की हवा के झोंके से भी
लोग घबडा जाते हैं
तुम्हारे तूफ़ान लाने की कोशिश
उनके ठहरे मन को
हिला कर रख देगी
जिनके लिए बदलाव चाहते हो
तुम उनसे ही लड़ते नजर आओगे

हकीकत से परे लोग देखते हैं ख्वाब
सवालों पर सवाल करते हैं
देता नहीं कोई जवाब
जवाब देने की कोशिश में
तुम असंख्य सवालों में
खुद ही घिर जाओगे

फिर भी तुम अपनी कोशिश
कभी मत छोड़ना
बदलाव के तूफान से
कभी मुहँ मत मोड़ना
चलते रहो अपनी राह पर
हर खबर पर तुम्हारा नाम होगा
बनेगी तुम्हारी अलग पहचान
जब तुम जीत जाओगे
भीड़ होगी तुम्हारे पीछे
हालांकि तुम तब भी
अकेले नजर आओगे
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Jun 24, 2007

शाश्वत प्रेम पर एक कविता

न पीडा से
न किसी चाहत से
न किसी शब्द से
वह बहता आता है
सहज भाव से
अपनी पीडाओं को भुला दो
अपनी चाहतों को छोड़ दो
अपनी वाणी को मौन दो
तब शाश्वत प्रेम
आत्मा में प्रकट हो जाता है

न दुःख का भय
न सुख की आशा
न बिछड़ने का मोह
न मिलने की ख़ुशी
न किसी इच्छा से उपजा प्रेम
आत्मा में उपज कर
सारे बदन में
स्फूर्ति लहराए जाता है
कितनी भी कोशिश कर लो
शाश्वत प्रेम कभी
बाहर दिखाया नहीं जाता है

शाश्वत प्रेम एक भाव है
जो इंसानों के साथ
पशु-पक्षियों और पडे-पौधों में भी
पाया जाता है
प्रेम करने वाले मिट जाते है
पर शाश्वत प्रेम का भाव
जीवन के साथ बहता जाता है
जो व्यक्त होता है
उसे समझो क्षणिक प्रेम
जो अव्यक्त है
शाश्वत प्रेम कहलाता है

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Jun 20, 2007

लड़ते रहो, हमें अपने ब्लोग हिट कराना है

लड़ते रहो दोस्तो
ख़ूब लड़ो
किसी तरह अपनी रचनाएं
हिट कराना है
बेझिझक छोडो शब्दों के तीर
गजलों के शेर अपने
मन की किताब से
निकल कर बाहर दौडाओ
कुछ कवितायेँ हौं
तुम्हारे हृदय पटल पर
उन्हें भी यहां ले आओ
किसी तरह अपना नाम
दुनिया में चमकाना है


निडर होकर लड़ो
इस प्रचार की रणभूमि में
इतना लड़ो कि
तुम्हारे लिखे को पढने के लिए
लोगों की भीड़ जुट जाये
तुम्हारे लिखे डायलाग
शोले की तरह
जनमानस में छा जाये
किसी तरह
अपने निज-पत्रक
घर-घर पहुंचाना है


पर शब्दों के तीर से
किसी अपने का मन घायल न करना
गजलों के शेरों की दहाड़ से
किसी का दिल विचलित न करना
लड़ना मिलजुलकर (नूरा कुश्ती )
पर अपने मन मैले न करना
अभी तो शुरूआत है
हमें बहुत दूर जाना है
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कुछ तुम कहो
कुछ हम कहें
खामोशी से तो अच्छा है
हम मिलजुलकर लड़ने लगें

जो नहीं देखते हमें
वह भी देखने लगें
बदनाम होंगे तो क्या
नाम तो होगा
आओ मुकाबला फिक्स करने लगें

कभी तुम जीतो कभी हम
खिलाडियों में नाम तो होगा
अन्दर हंसो
पर बाहर दिखो गंभीर
ऐसा न हो लोग
असलियत समझने लगें
जब फीका हो आकर्षण
लोग हमसे बोर होने लगें
हम अपनी लडाई के
ढंग बदलने लगें
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(यह व्यंग्य कविता काल्पनिक हैं और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है)

Jun 15, 2007

मौसम की पहली वर्षा में अपनी कविता हिट

तो बदहाल हो गया
तो निहाल हो गया
कविता लिखकर
निकला घर से बाहर
साईकिल पर पसीने में नहाते
बाज़ार के लिए
लौटने के लिए ज्यों ही तैयार हुआ
तेज आंधी और बादल
लड़ते-लड़ते चले आ रहे थे
इस मौसम की पहली बरसात में
रिम-झिम फुहारों से मुझे
नहला रहे थे
सोचा कहीं रूक कर
पानी से अपने बदन को बचाऊँ
फिर याद आया मुझे वह बहता पसीना
जो कविता लिखते समय आ रहा था
सोचा क्यों न उसके हिट होने का
लुत्फ़ बूंदों में नहाकर उठाऊं
कुछ पल अपने को "महाकवि"
होने का अहसास कराऊँ
मेरी कविता को पढने
स्वयं बदल आये थे
पानी साथ भरकर लाए थे
कविताएँ तो कई लिखीं
यह पहली कविता थी
जिसकी बूंदों में बादल भी
लगते नहाये थे
जो वर्ष ऋतू की पहली बूंदे
मेरे शहर में लाकर
मेरी कविता हिट करने लाए थे
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