पत्थर और कागजों के टुकडों को
जोड़ने में जो अपना मन लगाते
उनको श्रृंगार रस में नहलाए
अलंकार से सजाए
शब्दों के गीत नहीं सुहाते
सुनने के आदी है भयानक शोर
अपने सुर से दूसरे को करते बोर
उन्हें कानों को संगीत के सुर नहीं भाते
इसे भाग्य कहें या कर्मों का लेखा
जन्नत के सुख के लिए आदमी
पूरी जिन्दगी भर लड़ता है
पर इस धरती पर मौजूद
वैसे ही सुनहरे दृश्य उसके नसीब में नहीं आते
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तन की भूख सूखी रोटी खाकर मिट जाये
पर मन की अनंत भूख कहाँ तक थम पाये
जमीन पर पाँव के साथ दिमाग भी रख कर
आदमी अगर सोचे तो कभी नहीं पछताए
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समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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