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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Oct 17, 2010

सही पैमाना-हिन्दी व्यंग्य शायरी (sahi paimana-hindi vyangya shayri)

नैतिकता और बेईमान का पैमाना
पता नहीं कब तय किया जायेगा,
वरना तो हर इंसान सौ फीसदी शुद्धता के फेरे में
हमेशा ही अपने को अकेला पायेगा।
सफेद ख्याल में काली नीयत की मिलावट
सही पैमाना तय हो जाये
तब तोल तोलकर हर कोई
अपने जैसे लोग जुटायेगा।
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कत्ल करने वाला
कौन कातिल कौन पहरेदार
इसका भी पैमाना जब तय किया जायेगा,
तभी ज़माना रहेगा सुकून से
हर कत्ल पर शोर नहीं मचायेगा।
वैसे भी कातिल और पहरेदार
वर्दी पहनने लगे एक जैसी,
अक्लमंदों की भीड़ भी जुटी है वैसी,
कुछ इंसानों का बेकसूर मारने की
छूट भी मिल जाये तो कोई बात नहीं
बहसबाजों को भी अपने अपने हिसाब से
इंसानियत के पैमाने तय करने का
हक आसानी से मौका मिल जायेगा।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Oct 3, 2010

जिंदगी और ज़ंग-हिन्दी कविता (zindagi aur jung-hindi poem)

जिनको शासन मिला है विरासत में
वह बड़े शासक बनना चाहते हैं,
जो शासित हैं
वह भी शासक बनने का ख्वाब पाले
जिंदगी में लड़े जा रहे हैं,
कमबख्त! जिस जिंदगी को
आसानी से जिया जा सकता है
लोग खुद जंग लड़कर
उसे मुश्किल बना रहे हैं।
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Sep 2, 2010

असलियत-हिन्दी शायरी (asliat-hindi shayri)

कुछ लोग
वाह वाह करते हुए
हंसते सामने आते हैं,
कुछ ताने देते हुए
रुंआसे भी नज़र आते हैं।
लगा लिये हैं सभी ने मुखौटे चेहरे पर
अपनी नीयत यूं छिपा जाते हैं,
कमबख्त! यकीन किस पर करें
लोग खुद ही अपनी असलियत छिपाते हैं।
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कोई भी मुखौटा लगा लो अपने चेहरे पर
दूसरा इंसान तुम पर यकीन नहीं करेगा,
मगर तुम अपनी नीयत और असलियत
अपने से छिपा लोगे
तब तुम्हारा ज़मीर किसी का कत्ल करते हुए भी
तुमसे नहीं डरेगा।
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Aug 9, 2010

भूख का अक्स-हिन्दी कविता (bhookh ka aksa-hindi kavita)

दुबली, पतली और सांवली
उस गरीब औरत की काम के समय
मौत होने पर
पति ने हत्या होने का शक जताया।
पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिये
अस्पताल भेजा
और एक घर से दूसरे और वहां से तीसरे
घर में काम करती हुई
उस गरीब औरत की मौत को
संदेहास्पद बताया।
गरीब और बीमार की मौत का पोस्टमार्टम
सुनकर अज़ीब लगता है,
पति लगाये तो कभी नहीं फबता है,
एक औरत
जिसने दस दिन पहले गर्भपात कराया हो,
रोटी की आस में घर से भूखी निकली होगी
कमजोर लाचार औरत की क्या बिसात
उमस तो अच्छे खासे इंसान को वैसे ही बनाती रोगी,
हड्डियों के कमजोर पिंजरे से
कब पंछी कैसे उड़ा
उसकी जिंदगी का रथ कैसे मौत की ओर मुड़ा,
इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने की
जरूरत भला कहां रह जाती है,
सारी दुनियां गरीबी को अपराध
औरत उस पर सवार हो तो अभिशाप बताती है,
जाने पहचाने सवाल हैं,
अज़नबी नहीं जवाब हैं,
भूख और मज़बूरी
पहले अंदर से तोड़ते हैं,
तब ही मौत से लोग नाता जोड़ते हैं,
क्या करेंगे सभी
अगर पोस्टमार्टम में
कहीं भूख का अक्स नज़र आया।
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Jun 21, 2010

विज्ञापन का पेड़-हिन्दी क्षणिका (tree of adevertisment-hindi short poem)

गरीबी और महंगाई के मुद्दों से
हर जगह मुंह मोड़ लो,
जो बरसों तक रहे बेनतीजा
ऐसी बहसें चलती रहें
बिना मतलब के मुद्दे जोड़ लो,
तभी विज्ञापन का सदाबहार पेड़
बढ़ता रहेगा
चाहे जब फल तोड़ लो।
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May 28, 2010

खूनखराबे का रोग-हिन्दी शायरी (khoonkharabe ka rog-hindi shayari)

वह खून की होली खेलकर
लाल क्रांति लाने का सपना दिखा रहे हैं,
भरे पेट उनके रोटी से
खेल रहे हैं
बेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,
हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके
वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं।
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गोली का जवाब गोली ही हो सकती है
जानवरों से दोस्ती संभव है,
अकेले आशियाना बनाकर
जीना भी बुरा नहीं लगता
जहां पक्षी करते कलरव हैं,
पर हैवानों से समझौता कर
अपनी अस्मिता गंवाना है,
लड़ने के लिये उनको
फिर लाना कोई नया बहाना है,
कत्ल करने के लिये तत्पर हैं जो लोग,
उनको है खूनखराबे का रोग,
कत्ल हुए बिना वह नहीं मानेंगे,
जिंदा रहे तो फिर बंदूक तानेंगे,
सज्जन होते हैं ज़माने में
असरदार उन पर ही मीठी बोली हो सकती है।
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May 24, 2010

आवारा जिन्न-हिन्दी शायरी (awara jinna-hindi shayari

जीवन पथ पर धीमे धीमे
कदम बढ़ाना
यह राह कहीं सहज तो कहीं कठिन है,
रात्रि को चंद्रमा की इठलाती किरणों के तले
उतना ही मस्ताना जितना सह सको
क्योंकि आगे सूरज की किरणों से सजा
आने वाला दिन है।

अपने घर के रखवाले
खुद ही बनकर रहना,
किसी दूसरे को नहीं सौंपना
अपने सम्मान कागहना,
काली नीयत की आग
अच्छी नज़र को पिघला देती है
जैसे आग से पानी हो जाता हिम है।

चौराहे पर आकर चमकने की कोशिश
तुम्हें बाज़ार में बिकने वाली आवारा चीज़ बना देगी,

यह दौलत पाने के अनंत इच्छा
केवल जिंदगी ही  नहीं 

मौत को भी सोने के भाव गला देगी,
पैसा है यहां सभी का देवता
जबकि सर्वशक्तिमान ने बनाया उसे आवारा जिन्न है।
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May 6, 2010

जज़्बात सौदे की तरह बांटते-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (jazbat saude ki tarah bantte-hindi vyangya kavitaen)

इतिहास के पन्नों में
दर्ज खूनखराबे के हादसो में से
वह अपने ख्याल के मुताबिक
पढ़कर आते हैं।
बैठकर महफिलों में
फिर उन पर आंसु बहाते है,
खून का रंग एक जरूर मानते पर
ख्यालों न मिलते हों तो
कई इंसानों के खून भी
उनको पानी की तरह मानकर नज़र फेर जाते हैं।
-------
कुछ तारीखों को
हमेशा वह दोहराते,
कुछ को भूल जाते।
दर्द का व्यापार करने वाले
अपने जज़्बात सौदे की तरह बांटते
जहां न मिलें दाम,
न मिलता हो इनाम,
वहां से अपनी सोच सहित लापता हो जाते।
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Apr 11, 2010

इंसानी मुखौटा-हिन्दी शायरी (insani mukhauta-hindi shayri)

भूख बाहर बिफरी है
अनाज के दाने गोदामों में पाये जाते हैं
भूखे इंसानों के पांव वहां तक क्या पहुचेंगे
पंछी भी पंख वहां तक नहीं मार पाते हैं।
इंसानी मुखौटा लगाये शैतानों ने
कर लिया है दौलत और ताकत पर कब्जा
अपनी भूख मिटाने के वास्ते
हुक्मत अपने इशारों पर चलाये जाते हैं।
--------
वादों पर कब तक यकीन करें
हर बार धोखा खाया है,
मगर फिर भी लाचारी से देखते
क्योंकि उन्होंने हर वादे से पहले
चेहरे पर नया मुखौटा लगाया है।

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Mar 30, 2010

वैचारिक योग

अहिंसासत्यास्तेब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः।
हिन्दी में भावार्थ-अहिंसा, सत्य, अस्तेय,ब्रह्चर्यऔर अपरिग्रह-यह पांच यम हैं।
शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः।।
हिन्दी में भावार्थ-शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर की आराधना-यह पांच नियम हैं।
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्।
हिन्दी में भावार्थ-जब वितर्क यम और नियम के पालन में बाधा पहुंचाने लगे तो उसके विपरीत विचार का चिंतन करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-शारीरिक योगासन के साथ वैचारिक योग का भी महत्व है क्योंकि जीवन में मनुष्य के कर्म ही उसके फल का आधार होते हैं  जिनके करने की शुरूआत मस्तिष्क में उत्पन्न विचार से ही होती है।  अहिंसा न करना, सत्य मार्ग पर स्थित रहना, दूसरे के स्वामित्व की वस्तु का अपहरण न करना (जिसे चोरी भी कहा जाता है), काम में अधिक अनुरक्त न रहना तथा भौतिक साधनों के संचय में अधिक रुचि न रखना एक तरह से वैचारिक योगासन है।  इनमें स्थित व्यक्ति दृढ़ व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है। इन प्रवृत्तियों को यम कहा जाता है और इनमें स्थित होने पर मनुष्य सिद्ध हो जाता है।
यही स्थिति नियमों की है।  प्रातःकाल शौच आदि से निवृत होने पर अपने अंदर जब स्वच्छता का अनुभव हो तभी यह मानना चाहिये कि हम स्वस्थ हैं।  इसके अलावा सांसरिक वस्तुओं को लेकर संतोष का भाव रखते हुए तप एवं स्वाध्याय में लीन रहकर ईश्वर की भक्ति करने से अपने अंदर एक महान आनंद की अनुभूति होती है।
अनेक बार जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब हम डांवाडोल होते हैं। ऐसे में विपरीत विचार का चिंतन करना चाहिये। जब हमें क्रोध आये तब शांति का और जब निराशा उत्पन्न हो तब आशा पर विचार करना चाहिये। जब लोभ की प्रवृत्ति जागे तक त्याग का सोचें।  जब किसी की निंदा का मन हो तो किसी की प्रशंसा पर विचार करें।  इस तरह सकारात्मक प्रवृत्ति का निर्माण करें ताकि जीवन पथ पर अधिक से अधिक आनंद की प्राप्ति हो। यह वैचारिक या साधना मनुष्य को उत्कृष्ट श्रेणी का बनाती है। अच्छे विचार और संकल्प से स्वयं की बुद्धि जोड़ने पर वह पवित्र हो जाती है और इसके विपरीत अगर उसमें कुविचारों और अन्मयस्कता का समावेश किया जाये तो भारी अनर्थ का सामना करना पड़ता है।

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Mar 28, 2010

चाणक्य नीति दर्शन-धन और भोजन की तृष्णा कभी नहीं मिटती (Dhan aur bhojan ki bhookh-chankya niti)

धनेषु जीवतिव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्तः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।
हिन्दी में भावार्थ-
धन और भोजन के सेवन तथा स्त्री के विषयों में लिप्त रहकर भी अनेक मनुष्य अतृप्त रह गए, रह जाते हैं और रह जायेंगे।
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।
या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
उस संपत्ति से क्या लाभ जो केवल घर की अपने ही उपयोग में आती हो। जिसका पथिक तथा अन्य लोग उपयोग करें वही संपत्ति श्रेष्ठ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के लोभ की सीमा अनंत है। वह जितना ही धन संपदा के पीछे जाता है उतना ही वह एक तरह से दूर हो जाती हैं। किसी को सौ रुपया मिला तो वह हजार चाहता है, हजार मिला तो लाख चाहता है और लाख मिलने पर करोड़ की कामना करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दौलत की यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। आदमी का मन मरते दम तक अतृप्त रहता है। जितनी ही वह संपत्ति प्राप्त करता है उससे ज्यादा पाने की भावना उसके मन में जाग्रत होने लगती है।
आखिर अधिकतर लोग संपत्ति का कितना उपयोग कर पाते हैं। सच तो यह है कि अनेक लोग जीवन में जितना कमाते हैं उतना उपभोग नहीं कर पाते। उनके बाद उसका उपयोग उनके परिजन करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो सार्वजनिक हित के लिये दान आदि कर समाज हित का काम करते हैं। ऐसे ही लोग सम्मान पाते हैं। जिन लोगों की अकूल संपत्ति केवल अपने उपयेाग के लिये है तो उसका महत्व ही क्या है? संपत्ति तो वह अच्छी है जिसे समाज के अन्य लोग भी उपयोग कर सके। जब समाज किसी की संपत्ति का उपयोग  करता है तो उसको याद भी करता है। संपत्ति के संग्रह से स्वयं को आत्म तृप्ति तो हो सकती हैं पर अगर वह किसी दूसरे के काम की नहीं है तो उसकी कोई प्रशंसा नहीं करता।  शायद यही कारण है कि हमारे देश में दान कि महिमा का बखान किया गया है जिससे समाज में सामंजस्य बना रहता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Feb 12, 2010

जय हो दूरदर्शन-हिन्दी हास्य व्यंग्य (jay ho doosrdarshan-hindi haysa vyangya)

अरे, हम क्या देखना चाहते हैं और यह क्या दिखा रहे हैं।
भइये यह क्या हुआ। हम टीवी पर देशभर के शिव मंदिरों में आज मनाये जा रहे शिवरात्रि पर्व को देखना चाहते हैं पर यह सभी चैनल वाले एक नायक शाह की फिल्म रिलीज होने का का शोर इस तरह दिखा रहे हैं जैसे कि उसने कोई युद्ध जीत लिया हो।
अब समझ में आया गड़बड़झाला। बुढ़ा चुका हीरो उनके विज्ञापन का भी आधार है! देश के सबसे बड़ी कपंनी  भारतीय संचार निगम की प्रतिद्वंद्वी एक टेलीफोन कंपनी उसी हीरो को लिये डोल रही है उसको लगता है कि उसके कनेक्शन उसकी वजह से ही बढ़ रहे हैं।  पिछले साल पंद्रह अगस्त पर भी उसके नाम पर जोरदार शोर मचा था। अमेरिका में  हवाई अड्डे पर उसे रोका गया।  तब देश की इज्जत दांव पर लग गयी थी। यह चैनल वाले भूल गये थे कि इस देश में आजादी का पर्व मनाया जा रहा है। सारा दिन उसका नाम ही रटते रहे।  केवल दिल्ली दूरदर्शन ही आजादी के विषय पर आजादी से अकेले डटा रहा। 
‘अरे शाह’, ‘हाय शाह’, और ‘अपना शाह’ जैसा गाते हुए यह निजी चैनल  उस हीरो को शिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।  अब समझ में आया पंद्रह अगस्त का माजरा। हमें लगता है कि अमेरिका में हवाई अड्डे पर उसे  इसलिये ही रोका गया होगा  ताकि भारत के निजी टीवी चैनल उसका नाम जाप सकें-यह कल्पना अब की हालतों को देखकर ही पैदा होती है।   अब यकीन नहीं होता कि वह एक सच था-यकीनन वह प्रायोजित खबर रही होगी  ताकि पंद्रह अगस्त को घर बैठा भारतीय समुदाय अपने देश की आजादी के बारे में सोचने की बजाय उस बुढ़ा चुके हीरो के बारे में अधिक सोचे।  पंद्रह अगस्त को आता देखकर पहले ही यह योजना बनी होगी।
कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अमेरिका में भी नववर्ष और क्रिसमस की छुट्टियों में लोगों के ध्यान को भटकाने के लिये ही अनेक ऐसी खबरें बनवायीं जाती हैं, भले ही उनमें सत्यता का पुट हो। सद्दाम हुसैन को फांसी और बेनजीर की हत्या के समय कुछ अंतर्जाल लेखकों ने ऐसी बातें लिखी थीं, पर उस पर यकीन नहीं हुआ। उनका आशय तो यही था कि कहीं एक नंबर एक तो कहीं दो नंबर वाले लोग इन प्रचार माध्यमों के छद्म साथी उनको प्रचार के अवसर उपलब्ध कराते हैं।   अब लगता है कि उन लेखकों ने शायद यही बात कहीं से देखी या सुनी होगी और परिस्थतियां उनको विश्वास करने योग्य लगती होंगी।  फिर अपने देश का आधुनिक बौद्धिक चल तो अमेरिकी शैली पर ही रहा है तब यह शक होना स्वाभाविक है।
यह आज महाशिवरात्रि का पर्व भी पहले से तय था। शायद फिल्म को इसी दिन पहली बार प्रदर्शित किया जाने की योजना बनी होगी और साथ में विवाद खड़े करने का कार्यक्रम भी बना होगा। इस कार्यक्रमं  के पीछे शिव के नाम धरने वाले गण भी लगाने का विचार हुआ होगा। पहले क्रिकेट पर उस हीरो का बयान फिर शिव नाम धारी कथित गणों का उस पर शाब्दिक हमला-अपने देश के प्रचार मसीहाओं की इस बात के लिये प्रशंसा तो करनी होगी कि उन्होंने सारे कार्यक्रम हवाई रूप से करवाये, जमीन पर खून खराबा नहीं हुआ।  फ्लाप हो रही क्रिकेट भी हिट तो  बुढ़ा राह हीरो भी जवान होने लगा था। 
बाजार के सौदागर और उसके प्रचार प्रबंधक लगातार इस बात का प्रयास करते  हैं कि सोने के अंडे देने वाली यह दोनों मुर्गियां-क्रिकेट और फिल्म-बुढ़ायें नहीं और अंडे देती रहें इसके लिये क्रीम पाउडर से अभिनेता अभिनेत्रियों और खिलाड़ियों का मेकअप होता है तो विवादास्पद घटनाओं से उनके व्यक्तित्व में निखार लाया जाता है।   इतना ही नहीं विदेशों में भी पैसा मिले इसके लिये भी कोशिश कम नहीं होती इसलिये उनका ऐजेंडा भी चलाया जाता है।  
आजादी के दिन अमेरिका को तो शिवरात्रि के दिन शिव जी के कलियुगी गणों को खलनायक बना दिया। बना क्या दिया! सभी खुद ही तैयार हुए होंगे यह अभिनय करने के लिये। अमेरिका हो या भारत, यहां सब बिकता है भले ही हर कोई आजाद दिखता है।
अब यह कौन समझाये कि फिल्मी और क्रिकेट दर्शक ही केवल देश नहीं होते।  बीसीसीआई -जो कि एक क्लब ही है-की टीम पिटे तो देश का कहीं सम्मान नहीं गिरता और  फिल्म दिखे या नहीं इससे देश की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा का कोई तारतम्य नहीं है। मगर वह गाये जा रहे हैं कि ‘फिल्मी दर्शकों फिल्म की अग्रिम टिकिट खरीदकर  दिया शिव के गणों को करारा जवाब।’
लोग देख रहे होंगे, कुछ सोचने की विलासिता भी में व्यस्त होंगे पर यह कौन पूछेगा  कि ‘अरे, भई यह बताओ तो सही यह मैच चल कहां रहा था?  बैठे ठाले पाकिस्तान को देश की अभिव्यक्ति और काम करने की स्वतंत्रता से जोड़ दिया है।  बुढ़ा रहा हीरो उनके लिये आजादी का नायक बन रहा है। बैठे ठाले शिव के गण भी मिल गये जिनकी प्रतिष्ठाा सूरज डूब रहा था और वह उसे बचाने आये। 
इससे भला तो दिल्ली दूरदर्शन लगा जिसने घर पर बैठे ठाले ही हरिद्वार के दर्शन कराये। भगवान शिवजी का गुणगान कर मन को प्रसन्नता प्रदान की।  गंगा के विषय पर अच्छी चर्चा सुनाई।  इसी दूरदर्शन की कभी लोग आलोचना करते थे पर आज हमें उसे देखना अच्छा लगा।  सच बात तो यह है कि निजी समाचार चैनल तो अब शाह परस्त हो गये हैं जो भ्रम का प्रतीक हैं। सत्य के प्रतीक शिव उनको नहीं सुहाते। देश के अनेक बुद्धिजीवी कहते थे कि दूरदर्शन तो जनता पर खबरें थोपता है पर यह निजी चैनल क्या कर रहे हैं?

दूरदर्शन के समाचारों पर महाशिवरात्रि के पर्व मनाने के समाचार भी अच्छे लगे।  ऐसा लग रहा था कि जैसे वाकई अपने देश का ऐसा चैनल है जिसे इस बात का पता है कि देश का दर्शक क्या देखना चाहता है? जबकि यह निजी चैनल देखते हैं कि कौन उनके विज्ञापन का नायक है उसी का नाम ऐसे लेते हैं जैसे कि वह कोई भगवान हो। इसलिये यह कहने को मन करता है कि ‘जय हो दूरदर्शन’।  निजी चैनल वाले अपनी आजादी का आनंद शाह नाम धारी  के साथ उठायें हमें आपत्ति नहीं। हम तो भगवान शिवजी का स्मरण कर उसका आनंद उठायेंगे। हमारा मानना है कि जो जैसा स्मरण करता है वैसा ही गुण उसमें आता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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Jan 24, 2010

केवल दस्तखत का काम किया-हिन्दी शायरियां (kewal dastkhat ka kam-hindi shayriyan)

वफा हम सभी से निभाते रहे

क्योंकि गद्दारी का नफा पता न था।

सोचते थे लोग तारीफ करेंगे हमारी

लिखेंगे अल्हड़ों में नाम, पता न था।

------

राहगीरों को दी हमेशा सिर पर छांव

जब तक पेड़ उस सड़क पर खड़ा था।

लोहे के काफिलों के लिये कम पड़ा रास्ता

कट गया, अब पत्थर का होटल खड़ा था।

-------

जुल्म, भूख और बेरहमी कभी

इस जहां से खत्म नहीं हो सकती।

उनसे लड़ने के नारे सुनना अच्छा लगता है

गरीबी बुरी, पर महफिल में खूब फबती।

--------

हमारे शब्दों को उन्होंने अपना बनाया

बस, अपना नाम ही उनके साथ सजा लिया।

उनकी कलम में स्याही कम रही हमेशा

इसलिये उससे केवल दस्तखत का काम किया।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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