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Nov 26, 2011

अन्ना हजारे का जनलोकपाल कहीं प्रायोजित झुनझुना तो नहीं-हिन्दी व्यंग्य (anna hazare ka janlokpak bil aur vidheyak -hindi satire article)

           जनलोकपाल कानून बनेगा या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। जहां तक इस कानून से देश में भ्रष्टाचार रुकने का प्रश्न है उस पर अनेक लोग के मन में संशय बना हुआ है। मूल बात यह है कि देश की व्यवस्था में सुधार लाने के मसले कभी नारों से नहीं सुलझते। एक जनलोकपाल का झुनझुना आम जनमानस के सामने प्रायोजित रूप से खड़ा किया गया है ऐसा अनेक लोगों का मत है। हम देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरु होने वाले लोग अब कमजोर होते जा रहे हैं। वह दो भागों में विभक्त हो गया है। पहले यह आंदोलन बाबा रामदेव के नेतृत्व में चला पर बाद में अन्ना हजारे आ गये। बाबा नेतृत्व ने योग शिक्षा के माध्यम से जो ख्याति अर्जित की है उसके चलते उनको किसी अन्य प्रचार की आवश्यकता नहीं रहती। इसलिये जब आंदोलन चरम पर होता है तब भी चमकते हैं और जब मंथर गति से चलता है तब भी उनका नाम छोटे पर्दे पर आता रहता है। अन्ना हजारे आंदोलन के थमने पर अन्य काम कर प्रचार करते हैं। कभी मौन रखकर तो कभी कोई भ्रष्टाचार से इतर विषय पर बयान देकर वह प्रचार में बने रहने का फार्मूला आजमाते हैं। अभी उन्होंने अपने मोम के पुतले के साथ अपना फोटो खिंचवाया तो विदेश की एक पत्रिका के साक्षात्कार के लिये फोटो खिंचवाये। तय बात है कि कहीं न  कहीं उनके मन में प्रचार पाने की चाहत है। जहां तक उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का सवाल है तो ऐसा लगता है कि कुछ अदृश्य आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक शक्तियों ने उनकी जिस तरह सहायता की उससे प्रतीत होता है कि प्रायोजित समाज सेवकों ने उनको आंदोलन के शीर्ष पर लाकर अपने मुद्दे को आगे बढ़ाया। पहले वही लोग बाबा रामदेव का दामन थामे थे पर चूंकि उनका योग दर्शन भारतीय अध्यात्म पर आधारित है इसलिये उसमें कहीं न कहीं भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की धर्मनिरपेक्ष छवि ध्वस्त होने का भय था इसलिये एक धर्मनिरपेक्ष समाज सेवक अन्ना हजारे को लाया गया। अन्ना का देश के भ्रष्टाचार पर उतना ही अनुभव है जितना किसी आम आदमी का होता है। इस भ्रष्टाचार की जड़ में क्या है? इसे कैसे रोका जाये अगर हमसे कोई बहस करे तो उसकी आंखें और कान फटे की फटे रह जायेंगे। यह अलग बात है कि चूंकि हम बाज़ार और प्रचार समूहों के स्थापित चर्चा करने योग्य विद्वान न होकर एक इंटरनेट प्रयोक्ता ही है इसलिये ऐसी अनेक ऐसी बातें कह जाते हैं जो वाकई दूसरों के समझ में नहीं आ सकती। हमारे कुछ विरले पाठक और मित्र हैं वही वाह वाह कर सकते हैं। असली बात कहें तो यह तो सभी जानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार है। इसलिये उसे हटाने के तमाम तरह के रास्ते बता रहे हैं पर इसके मूल में क्या है, यह कोई हमसे आकर पूछे तो बतायें।
          जब अन्ना हजारे रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठे थे तब उनके अनुयायी और सहायक सगंठन जनलोकपाल बिल पर बहस कर रहे थे। अन्ना खामोश थे। दरअसल बिल बनाने में उनकी स्वयं की कोई भूमिका नहीं दिखाई दी। सीधी बात यह है कि एक मुद्दे पर चल रहे आंदोलन और उस संबंध में कानून के तय प्रारूप के लिये वह अपना चेहरा लेकर आ गये या कहें कि प्रायोजित समाज सेवकों को एक अप्रायोजित दिखने वाला चेहरा चाहिए था वह मिल गया। यह अलग बात है कि उस चेहरे पर भी कहीं न कहंी प्रायोजन का प्रभाव था। अब यह बात साफ लगने लगी है कि इस देश में कुछ आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक शक्तियां थीं जो एक प्रभावी लोकपाल बनाने की इच्छुक थीं पर प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय होने कोे लेकर उनकी कुछ सीमायें थीं इसलिये स्वयं सामने न आकर अन्ना हजारे को आगे कर दिया। इन शक्तियों को यह सोच स्वाभाविक था कि प्रत्यक्ष रूप से सक्रियता पर उनको गैरों का ही नहीं बल्कि अपने लोगों का भी सामना करना पड़ सकता है। इसी मजबूरी का लाभ अन्ना हजारे को मिला।
             अब मान लीजिये जनलोकपाल बन भी गया तो अन्ना हजारे का नाम हो जायेगा। सवाल यह है कि जनलोकपाल से समस्या हल हो जायेगी। हल हो गयी तो ठीक वरना पासा उल्टा भी पड़ सकता है। जैसा कि कुछ लोग यह प्रश्न उठा रहे हैं कि वह भी अगर भ्रष्ट या उदासीन भाव तो निकला तो क्या होगा?
            अभी तो भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत प्रचार माध्यमों के हो हल्ला मचाने पर कार्यवाही हो जाती है और न करने पर संविधानिक संस्थाओं से सवाल पूछा जा सकता है। फिर कई जगह संविधानिक संस्थाऐं स्वयं भी सक्रिय हो उठती हैं। अगर जनलोकपाल बन गया तो फिर प्रचार माध्यम क्या करेंगे जब संविधानिक एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी से परे होती नजर आयेंगी। फिर भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाकी कानूनों का क्या होगा? क्या वह ठंडे बस्ते में पड़े रहेंगे। कहीं ऐसा तो नहीं प्रचार माध्यमों के हल्ले को थामने तथा संविधानिक एजेंसियों की सक्रियता को रोकने के लिये कथित रूप से एक स्वतंत्र जन लोकपाल की बात होती रही। अभी प्रचार माध्यम वर्तमान व्यवस्था के पदाधिकारियों पर बरस जाते हैं पर जनलोकपाल होने पर वह ऐसा नहीं कर पायेंगे। जनलोकपाल भ्रष्टाचार नहीं रोक पाया तो प्रचार माध्यम केवल उसका नाम लेकर रोते रहेंगे और व्यवस्था के पदाधिकारी जिम्मेदारी न निभाने के आरोप से बचे रहेंगे। जब प्रचार माध्यमा किसी के भ्रष्टाचार पर शोर मचायेंगे तो उनसे कहा जायेगा कि जाओ लोकपाल के पास, अगर उसने नहीं सुनी तो भी शोर मचाना मुश्किल होगा क्योंकि तब कहा जायेगा कि देखो उसे लोकपाल ने नहंी पकड़ा है। भगवान ही जानता है सच क्या है? अलबत्ता जिस तरह लग रहा है कि जनलोकपाल बनने के बाद भ्रष्टाचार पर प्रचार माध्यमों में मच रहा ऐसा शोर अधिक नहीं दिखाई देगा। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल होगा कि किसने किसके हित साधे?
          जहां तक भ्रष्टाचार खत्म होने का प्रश्न है उसको लेकर व्यवस्था के कार्य में गुणवत्ता तथा संचार तकनीकी की उपयोगिता को बढ़ाया जाना चाहिए। देखा यह जा रहा है कि व्यवसायिक क्षेत्र में कंप्यूटर का प्रयोग बढ़ा है पर समाज तथा व्यवस्था में उसे इतनी तेजी से उपयोग में नहीं लाया जा रहा है। इसके अलावा अन्य भी उपाय है जिन पर हम लिखते रहते हैं और लिखते रहेंगे। जैसा कि हम मानते हैं कि जनलोकपाल पर आंदोलन या बहस के चलते लोग अपनी परेशानियों के हल होने की आशा पर शोर मचाने की बजाय खामोश होकर बैठे हैं और यही बाज़ार तथा उसके प्रायोजित लोग चाहते हैं। कहीं परेशान लोगों के समय पास करने के लिये ऐसा किसी सीधे प्रसारित मनोरंजक धारावाहिक की पटकथा का हिस्सा तो नहीं है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Nov 4, 2009

गलतफहमी-हास्य व्यंग्य (galatfahmi-hasya vyangya)

दीपक बापू तेजी से अपनी राह चले जा रहे थे कि पान की एक दुकान के पास खड़े आलोचक महाराज ने उनको आवाज देकर पुकारा-‘अरे, ओए फ्लाप कवि कहां जा रहे हो, कहीं सम्मान वम्मान का जुगाड़ करना है क्या?’
दीपक बापू चैंक गये। दायें मुड़कर देखा तो साक्षात आलोचक महाराज खड़े थे। दीपक बापू उनको देखकर उतावली के साथ बोले-‘आलोचक महाराज, आप अपनी घर से इतनी दूर यहां कैसे पधारे? हमारे लिये तो यही सम्मान है कि आपने हमें पुकारा। धन्य भाग हमारे जो इस इलाके की सीमा तक ही आपका पदार्पण तो हुआ। वरना आप जैसा साहित्यक महर्षि कहां इतनी दूर से यहां आयेगा? चलिये हुजूर हमारे घर को भी पवित्र कर दीजिये जो यहां से केवल तीन किलोमीटर दूर है।’
आलोचक महाराज ने पास ही नाली में पहले थूका फिर बोले-‘जब भी करना, घटिया बात ही करना! ऐसे भी साहित्यक महर्षि नहीं है कि तुम्हारे घर तक तीन किलोमीटर पैदल चलें। वैसे हमारी कार देखो उधर खड़ी है, पर अगर तुम्हें अपने घर लेकर चलना हो तो कोई अलग से इंतजाम करो।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज क्या करें, अपनी साइकिल तो घर पर ही छोड़े आये इसलिये यह संभव नहीं है कि कोई दूसरा इंतजार करें। हां, यह बताईये कि आप इधर कैसे आये, कोई सेवा हमारे लायक हो तो जरूर बतायें।’
आलोचक ने फिर दूसरी बार जाकर नाली में थूक और बोले-‘हमेशा लीचड़ बात ही करना! हम कार में बैठने वाले तुम्हारी साइकिल पर बैठकर क्या अपनी भद्द पिटवायेंगे। गनीमत समझो तुमसे बार कर रहे हैं। बहरहाल यह लो पर्चा! एक साहित्य पुस्तक केंद्र का उद्घाटन हैं। वहां जरूर आना। हमने तुम्हारी दो कवितायें एक गांव के अखबार में छपवा दी थी जिसमें अपनी समालोचना भी लिखी थी। लोगों ने हमारी समालोचना की प्रशंसा की। यह कार्यक्रम नये कवियों का परिचय कराने के लिये भी हो रहा है। तुम तो पुराने हो सोचा क्यों न उद्घाटन पर बुलाकर उनके समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वह तुमसे कुछ सीखें।’

दीपक बापू शर्माते हुए बोले-‘क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं आप? हमारे अंदर ऐसी क्या येाग्यता है जो हम उस केंद्र का उद्घाटन करें? हम तो ठहरे एक अदना कवि! केवल कवितायें ही लिख पाते हैं। आप जैसे आलोचकों के सामने हमारी क्या बिसात? भले ही आप कहानी या कविता न लिखते हों पर साहित्य महर्षि का खिताब आपको ऐसे ही न मिला होगा। यह सम्मान कोई छोटी बात नहीं है।

अबकी बार आलोचक महाराज थूके बिना ही उनकी तरफ मुखातिब हुए और घूर घूर कर देखने लगे। अपना मुंह उनके मुंह के पास ले गये। फिर अपना हाथ उनके मस्तक पर रखा। दीपक बापू सिहर कर बोले-‘यह क्या आलोचक महाराज?’
आलोचक महाराज बोले-‘हम सोच रहे हैं कि कहीं तुम बुखार में तो घर से बाहर भाग कर नहीं आ गये। आजकल मौसम खराब है न! यह कैसी गलतफहमी पाल ली कि हम तुम्हारे इन नाकाम हाथों से किसी पुस्तक केंद्र का उद्घाटन करायेंगे। हमने तुम्हें उद्घाटन करने वाले मुख्य अतिथि के ंरूप में नहीं बल्कि वहां आकर कुछ किताबें खरीदो जिनको पढ़कर तुम्हें लिखने के लिये ढंगा आईडिया मिले, इसलिये बुलाया है। नये कवियों को तुम्हारा यह थोबड़ा दिखाकर बतायेंगे कि देखो इनको, ताउम्र कवितायें लिखने का प्रयास किया पर लिख नहीं सके। कभी कभी कामयाब आदमी की कामयाबी के साथ ही नाकाम आदमी की नाकामी से भी नये लोगों को सिखाने का एक अच्छा प्रयास होता है।’

दीपक बापू का चेहरा उतर गया वह बोले-‘ठीक है आलोचक महाराज, हमने कविता लिखने का प्रयास किया पर न लिख सके यह अलग बात है? मगर आपने तो कभी लिखी ही नहीं। बल्कि दूसरे लोगों की कविताओं का आलोचना करते हुए उनके कुछ हिस्सों को अपनी कविता बना डाला। हमारी कवितायें कहीं नहीं छपवायीं बल्कि हर बार टरका दिया। खैर, हमें बुरा नहीं लगा। अब चलता हूं।

आलोचक महाराज ने कहा-’नहीं! अभी रुको! मैंने अपना वक्त तुम्हें रोककर खराब नहीं किया। सुनो, यह कूपन लेकर उस दुकान पर आना। इसके लिये पांच सौ रुपया हमें दे दो। वहां इसके बदले तुम छह सौ रुपये की किताब खरीद सकते हो। वैसे मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारी कवितायें अब शहर के अखबारों में भी छपवा दूं। तुमसे बहुत तपस्या करवा ली। लाओ, निकालो पांच सौ रुपये। वहां आकर साढ़ छह सौ रुपये किताबें खरीदना। तुम्हारे लिये पचास रुपये का फायदा करवा देंगें।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, किताबों का तो मेरे घर पर ढेर लगा हुआ है। एक नयी अलमारी बनवा लूं तभी अब किताबें खरीद पाऊंगा। वैसे भी हम आपके पास अपनी एक किताब छपवाने के लिये पांडुलिपि लाये थे तब आपने इतनी अधिक सामग्री देखकर उसे पढ़ने से मना करते हुए कहा था कि ‘किताबों से पढ़ने योग्य पढ़ा जाये उससे अच्छा है कि उनमें लिखने योग्य कार्य किया जाये।’ आपकी बात चुभ गयी तभी से किताबें खरीदना बंद कर दिया। अब जब उनमें लिखने योग्य कर लेंगे तभी सोचेंगे।’
आलोचक महाराज ने कहा-’ठीक है! अब भूल जाना कि मैं तुम्हारी कविताओं पर आलोचना लिखकर उनको प्रकाशित करवाऊंगा।’
दीपक बापू वहां से जल्दी खिसक लिये यह सोचकर कि कहीं उनको पांच सौ रुपये की चपत न लग जाये। साथ ही उनको अपनी गलतफहमी पर भी हैरानी हो रही थी।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Mar 28, 2009

विरह में हास्य कवितायेँ लिखता हूँ- (हास्य-व्यंग्य)

व्यंग्य कवि उस दिन एक पार्क में घूम रहा था तो उसकी पुरानी प्रेमिका सामने आकर खडी हो गयी। पहले तो वह उसे पहचाना ही नहीं क्योंकि वह अब खाते-पीते घर के लग रही थी और जब वह उसके साथ तथाकथित प्यार (जिसे अलग होते समय प्रेमिका ने दोस्ती कहा था) करता था तब वह दुबली पतली थी। ब्लोगर ने जब उसे पहचाना तो सोच में पड़ गया इससे पहले वह कुछ बोलता उसने कहा-''क्या बात पहचान नहीं रहे हो? किसी चिंता में पड़े हुए हो? क्या घर पर झगडा कर आये हो?"
''नहीं!कुछ लिखने की सोच रहा हूँ।''व्यंग्य कवि ने कहा।

''मुझे पता है कि तुम हमेशा कुछ न कुछ पर लिखते हो। मेरे प्यार ने तुमको कवि बना दिया था. एक उस दिन तुम्हारी पत्नी से भेंट एक महिला सम्मेलन में हुई थी तब उसने बताया था। मैंने उसे यह नहीं बताया कि हम दोनों एक दूसरे को जानते है।वह चहकते हुए बोली-''क्या लिखते हो? मेरी विरह में कवितायेँ न! यकीनन बहुत हिट होतीं होंगीं।'
व्यंग्य कवि ने सहमते हुए कहा-''नहीं हिट तो नहीं होतीं फ्लॉप हो जातीं हैं। वैसे अब मैं श्रृंगार रस में लिखने वाला कवि नहीं रहा बल्कि हास्य कवि बन गया हूँ और विरह में व्यंग्य और हास्य कवितायेँ लिखता हूँ. दूसरी बात यह है मैं तुम्हारी याद में नहीं बल्कि वह अपनी दूसरी प्रेमिका की याद में श्रंगार रस से लबालब कवितायेँ लिखता हूँ।''
''धोखेबाज! मेरे बाद दूसरी से भी प्यार किया था। अच्छा कौन थी वह? वह मुझसे अधिक सुन्दर थी।''उसने घूरकर पूछा।
''नहीं। वह तुमसे अधिक खूबसूरत थी, और इस समय अधिक भी ही होगी। वह अब मेरी पत्नी है। व्यंग्य कवि ने धीरे से उत्तर दिया।
प्रेमिका हंसी-''पर तुम्हारा तो उससे मिलन हो गया न! फिर उसकी विरह में क्यों लिखते हो?'
''पहले प्रेमिका थी, और अब पत्नी बन गयी पर उसके प्रेम में कभी कभी श्रृंगार रस से डूबी कवितायेँ लिखता हूँ,''व्यंग्य कवि ने कहा।
पुरानी प्रेमिका ने पूछा -''अच्छा! मेरे विरह में क्या लिखते हो?"
''हास्य कवितायेँ लिखता हूँ।" व्यंग्य कवि ने डरते हुए कहा।

''क्या"-वह गुस्से में बोली-''मुझ पर हास्य लिखते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की। वरना तुम तो मेरे को बदनाम कर देते। आज तो मेरा मूड खराब हो गया। इतने सालों बाद तुमसे मिली तो खुशी हुई पर तुमने मुझ पर हास्य कवितायेँ लिखीं। ऐसा क्या है मुझमें जो तुम यह सब लिखते हो?'
व्यंग्य कवि सहमते हुए बोला-"मैंने देखा की एक दिन तुम्हारे पति का उस दिन कार के शोरूम पर झगडा हो रहा था जहाँ से उसने वह खरीदी थी। कार का दरवाजा टूटा हुआ था और तुम्हारा पति उससे झगडा कर रहा था। मालिक उसे कह रहा था कि''साहब। कार बेचते समय ही मैंने आपको बताया था कि दरवाजे की साईज क्या है और आपने इसमें इससे अधिक कमर वाले किसी हाथी रुपी इंसान को बिठाया है जिससे उसके निकलने पर यह टूट गया है और हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। तुम्हारा पति कह रहा था कि'उसमें तो केवल हम पति-पत्नी ने ही सवारी की है', तुम्हारे पति की कमर देखकर मैं समझ गया कि...............वहाँ मुझे हंसी आ गई और हास्य कविता निकल पडी। तब से लेकर अब जब तुम्हारी याद आती है तब......अब मैं और क्या कहूं?''
वह बिफर गयी और बोली-''तुमने मेरा मूड खराब किया। मेरा ब्लड प्रेशर वैसे ही बढा रहता है। डाक्टर ने सलाह दी कि तुम पार्क वगैरह में घूमा करो। अब तो मुझे यहाँ आना भी बंद करना पडेगा। अब मैं तो चली।"
व्यंग्य कवि पीछे से बोला-''तुम यहाँ आती रहना। मैं तो आज ही आया हूँ। मेरा घर दूर है रोज यहाँ नहीं आता। आज कोई व्यंग्य का आइडिया ढूंढ रहा था, और तुम्हारी यह खुराक साल भर के लिए काफी है। जब जरूरत होगी तब ही आऊँगा।''
वह उसे गुस्से में देखती चली गयी। व्यंग्य कवि सोचने लगा-''अच्छा ही हुआ कि मैंने इसे यह नहीं बताया कि इस पर मैं उसकी विरह में बड़े हास्य व्यंग्य भी लिखता हूँ। नहीं तो और ज्यादा गुस्सा करती।''
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