समाज एक कारखाना और
परिवार एक उत्पादित है
उन बुद्धिजीवियों के लिये
जो सजाते हैं अपने ख्यालों में
बड़े करीने से,
ढूंढते हैं परिवारों में
टूटने बिखरने की कहानियां
वाद और नारे से आगे उनकी सोच नहीं जाती,
जिसे कई बार दोहराते
इनामों की थाली उनके घर सजकर आती,
जगा रहे हैं श्रम के लिए इंसाफ की रौशनी
ऐसे लोग
जिनका बदन नहीं नहाया कभी पसीने से।
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कभी ढूंढते हैं लड़खड़ाती प्रेम कहानी में
आजादी का सवाल,
दुनियां में सच की जंग के लिये
तब मचाते हैं इंसानियत के आशिक की तरह बवाल।
कहीं खूनखराबे में
इंसाफ की जंग के कायदे बतलाते
देश के पहरेदारों की शहादत से
अपना मुंह छिपाते
कलम के वीरों की तरह ठोकते ताल।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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