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Jan 13, 2009

ब्लागर सरकार पर एसा वैसा मत लिख देना-हास्य व्यंग्य

सर्दी की सुबह चाय पीने के बाद ब्लागर कोहरे में घर से बाहर निकला। उसका शरीर ठंड से कांप रहा था पर चाय पीने से जो पेट मं गैस बनती है उससे निपटने का ब्लागर के पास यही एक नुस्खा था कि वह बाहर टहल आये। वह थोड़ा दूर चला होगा तो उसे कालोनी के नोटिस बोर्ड पर एक पर्चा चिपका दिखाई दिया। वह उसे देखकर कर अनेदखा कर निकल जाता पर उसे लगा कि कहीं ब्लागर शब्द लिखा हुआ है। वह सोच में पड़ गया कि यह आखों का वहम होगा। भला यहां कौन जानता है ब्लागर के बारे में। फिर वह रुककर उस पर्चे के पास गया और उसे पढ़ने लगा। उस पर लिखा था कि
‘आज ब्लागर सरकार की दरबार पर विशेष कार्यक्रम होगा। सभी इंटरनेट धार्मिक बंधुओं से निवेदन है कि वहां पहुंचकर लाभ उठावें । इस अवसर पर ब्लागर सरकार की विशेष आरती होगी उसके बाद समस्त धार्मिक बंधुओं को ज्योतिष,विज्ञान,तकनीकी तथा वैवाहिक ब्लाग तथा वेबसाईटों की जानकारी दी जायेगी। ब्लागर सरकार की पूजा से अनेक लोगों ने इंटरनेट पर हिट पाये हैं और उनके प्रवचन भी इस अवसर पर आयोजित किये जायेंगे। स्थान-नीली छतरी, दो पुलों के बीच, घाटी के बगल में। निवेदक ब्लागर स्वामी।


ब्लागर का माथा ठनका। वह भागा हुआ घर लौटा। गृहस्वामिनी ने कहा-‘क्या बात है इतनी जल्दी लौट आये। क्या सर्दी सहन नहीं हुई। मैंने पहले ही कहा था कि बाहर मत जाओ।’
ब्लागर ने कहा-‘यह बात नहीं हैं। मैं साइकिल पर जा रहा हूं थोड़ा दूर जाना होगा। वह जो दूसरा ब्लागर है न! उसने शायद कोई ब्लागर सरकार का दरबार के नाम से कुछ बनाया है। इतने दिन से आया नहीं हैं। मैं समझ गया था कि वह कुछ न कुछ करता होगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘वह क्यों ब्लागर सरकार का दरबार बनायेगा। उसके सामने तो वैसे ही सर्वशक्तिमान का पुराना बना बनाया दरबार है जहां उसकी महफिल जमती है।’
ब्लागर ने कहा-‘पर ठिकाना वही है। जरूर वह कुछ गड़बड़ कर रहा है। मैं जाता हूं। यह दरबार उसी का होना चाहिये। उसने कोई नया बखेड़ा खड़ा किया होगा। वह बहुत दिनों से उस दरबार में भक्तों के जमावड़े और चढ़ावा बढ़ाने की योजनायें बन रहा है।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘तो फिर स्कूटर ले जाओ।’
ब्लागर अपने पुराने स्कूटर की तरफ झपटा तो गृहस्वामिनी ने कहा-‘अब इस पुराने स्कूटर को मत ले जाओ। नया स्कूटर ले जाओ। वैसे ही वहां भीड़ होगी और वह मजाक बनायेगा। उसके नये दरबार में अपनी भद्द मत पिटवाओ।
ब्लागर ने अपना नया स्कूटर लिया। रास्ते में उसका कालोनी का एक मित्र टिप्पणी स्वामी मिल गया। उसे जब ब्लागर ने अपनी बात बताई तो वह भी उसके साथ हो लिया। स्कूटर पर बैठते हुए वह बोला-‘वैसे तो वह तुम और वह दोनों फालतू हो पर क्योंकि स्कूटर तुम्हारा है और पेट्रोल भी तो साथ चलता हूं। मेरा घूमना फ्री में हो जायेगा इसलिये साथ चल रहा हूं।’
दोनों स्कूटर पर सवाल होकर साढ़े तीन मिनट में-टिप्पणी स्वामी की वहां पहुंचते ही दी गयी टिप्पणी के अनुसार-वहां पहुंच गये। ब्लागर का संदेह ठीक था। दूसरे ब्लागर ने अपने सामने बने पुराने दरबार पर पहले ही कब्जा कर रखा था और उसके आंगन में खाली पड़ी जमीन पर बना दिया था ‘ब्लागर सरकार का दरबार’।
ब्लागर अपना स्कूटर सीधे अंदर ले गया। वहां एक आदमी तौलिया पहने दांतुन कर रहा था। उसने सिर से ठोढ़ी तक टोपा तथा शरीर पर भारीभरकम पुराना स्वेटर पहनकर रखा था। मूंह में दातुन रखे ही उसने ब्लागर की तरफ उंगली उठाकर कहा-‘उधर रखो। इधर स्कूटर कहां रख रहे हो। यह ब्लागर सरकार का दरबार है।’
ब्लागर उसे घूर कर देख रहा था। टिप्पणी स्वामी ने उससे कहा-‘अरे, भाई यह ब्लागर सरकार का दरबार है और हमारे यह मित्र ब्लागर हैं। इस दरबार का जो स्वामी है वह इनका खास मित्र है। जाओ उसे बुलाओ। ब्लागरों का स्कूटर भी खास होता है।’

जानता हूं। जानता हूं। इसका नया स्कूटर तो क्या पुरानी साइकिल भी खास होती है।’ यह कहकर वह आदमी कुल्ला करने गया। इधर पहले ब्लागर ने टिप्पणी स्वामी से कहा-‘अरे, तुमने पहचाना नहीं यही है वह ब्लागर स्वामी। अब लौटते ही शाब्दिक आक्रमण करेगा।’
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘अरे, यार मैंने उसे एक बार ही देखा है। तुम तो अक्सर उससे मिलते हो।’

उधर से दूसरा ब्लागर लौटा और पहले ब्लागर से बोला-‘यह कौन कबूतर पकड़ लाये? जो मुझे बता रहा है कि तुम्हारा स्कूटर खास है?
पहले ब्लागर ने कहा-‘यह टिप्पणी स्वामी है। कभी कभार टिप्पणी देता है। हालांकि जबसे इसके मकान की उपरी मंजिल बनना शुरू हुई तब से इसकी पत्नी इसे इंटरनेट पर काम नहीं करने देती इसलिये वह भी अब बंद है। बहरहाल यह ब्लागर सरकार के दरबार का क्या चक्कर है।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘चक्कर क्या है? अधार्मिक कहीं के। तुम अपनी टांग क्यों फंसाने आ गये? तुम तो अध्यात्मिक ज्ञान और धर्म को अलग अलग मानते हो न! क्या जानो धर्म के बारे में। चक्कर नहीं है। यह मेरीे श्रद्धा और आस्था है। उस दिन रात को सपने में ब्लागर सरकार के दर्शन हुए और उन्होंने बताया कि उनकी स्थापना करूं! आजकल इंटरनेट के समय लोग सर्वशक्तिमान के सभी नाम और स्वरूपों को पुराना समझते हैं इसलिये उन्होंने मुझे इस नये स्वरूप की स्थापना का संदेश दिया। वैसे तुम यहां निकल लो क्योंकि तुम अपने ब्लाग पर मूर्तिपूजा के विरुद्ध लिखते रहते हो जबकि चाहे जिस दरबार में मूंह उठाये पहुंच जाते हो। हमारा चरित्र तुम्हारी तरह दोहरा नहीं है।’
टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से कहा-‘यार, यह तो तुम्हें काटने दौड़ रहा है। इसे मालुम नहीं कि तुम अध्यात्म के विषय पर लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस बिचारे का दोष नहीं है। बहुत व्यस्त आदमी है इसलिये इसे पढ़ने का अवसर नहीं मिलता।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-वैसे तुम पढ़ने लायक लिखते क्या हो जिसे मैं पढ़ूं। वैसे इस नये स्कूटर का मुहूर्त करने यहां आये हो क्या? यह केवल खाली हाथ मुझे दिखाकर क्या दिखाना चाहते होे। वैसे मैंने तुम्हें उस दिन नये स्कूटर पर देख लिया था। अब बताओ यहां किसलिये आये हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम्हारे इस दरबार का पर्चा अपनी कालोनी में पढ़ा। मुझे लगा कि यह तुम्हारा कोई नया स्वांग है जिसे देखने चला आया।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘हां, तुमसे यही उम्मीद थी। तुम मेरी धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहे हो। वैसे तुम चाहे कितना भी लिखो जब तक ब्लाग स्वामी की कृपा नहीं होगी तब तक तुम हिट नहीं हो सकते।’
पहला ब्लागर-‘ठीक है पहले तुम्हारे ब्लागर सरकार की मूर्ति अंदर चलकर देख लें।’
दूसरा ब्लागर बोला-नहीं। तुम जैसे नास्तिकों का अंदर प्रवेश वर्जित है।’
टिप्पणीकार बोला-‘मैं तो अस्तिक हूं। अंदर जाकर देख सकता हूं न!
दूसरा ब्लागर बोला-‘नहीं! तुम इसके साथी हो। नास्तिक का साथी भी नास्तिक ही होता है मेरे सामने तुम्हारा यह पाखंड नहीं चल सकता।’
पहला ब्लागर बोला-‘ठीक है। अंदर क्या जाना? यहीं से पूरी तस्वीर दिख रही है। यह पत्थर की है न!
दूसरा ब्लागर-‘नहीं प्लास्टिक की है। आर्डर देकर बनवाई है।
पहला ब्लागर बोला-‘यार, फिर तुम मुझसे नाराज क्यों होते हो? मैंने तो कभी प्लास्टिक की मूर्तियों की पूजा करने से तो रोका नहीं है। वैसे यह डिजाइन तो ठीक है।’
दूसरा ब्लागर-‘‘हां, डिजाइन पर अधिक पैसा खर्च हुआ है जो भक्तों के चंदे से मिले हैं। जैसे सपने में डिजाईन जैसी देखी थी वैसी ही बनवाई है।’
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘यह डिजाईन तो शायद मैंने किसी पत्रिका में देखा था। फिर पैसे किस पर खर्च हुए। लगता है किसी ने ठग लिया।’
दूसरा ब्लागर-टिप्पणी स्वामी! तुम अपनी बेतुकी टिप्पणियां करने बाज आओ। कहीं ब्लागर सरकार नाराज हो गये तो तुम्हारा इस दोस्त को एकाध टिप्पणी मिलती है उससे भी तरस जायेगा। मकान बनने के बाद भी तुम्हारी पत्नी तुम्हें इंटरनेट पर काम करने नहंी देगी।
दोनों मूर्तियां देखने लगे। कंप्युटर के उपर रखे कीबोर्ड पर अपने दोनों हाथों की उंगलियां रख ेएक चूहा बैठा मुस्कराने की मुस्कराने की मुद्रा में था। कंप्यूटर से जुड़ी हर सामग्री को वहां दिखाया गया था। कंप्यूटर की स्क्रीन पर लिखा था ब्लागर सरकार।

टिप्पणीकार ने धीरे से कहा-‘यह चूहा और कीबोर्ड कंप्यूटर के ऊपर क्यों रखा हुआ है।’
दूसरा ब्लागर चीखा-‘चूहा! अरे, यही तो हैं ब्लागर स्वामी! तुम कुछ तो सोचकर बोला करो। अपने इस दोस्त के चक्कर में तुम भी वैसी ही बेहूदा टिप्पणियां कर रहे हो जैसे यह पाठ लिखता है।’
पहला ब्लागर अभी प्लास्टिक की मूर्ति को घूर रहा था। फिर बोला-‘मैंने अपनी कालोनी में एक पहचान वाले के यहां ऐसी ही मूर्ति देखी थी। वह बता रहे थे कि उन्होंने यह कबाडी को बेची थी।’
दूसरा ब्लागर’-‘तुम क्या कहना चाहते हो कि मैंने यह कबाड़ी से खरीदी थी। अब तुम जाओ। यार, तुम मेरा समय खोटी कर रहे हो। अब यहां भक्तों के आने का समय हो गया है। यहां पर मैंने लोगों को ज्योतिष,चैट,विवाह तथा नौकरी में मदद देने के लिये असली कंप्यूटर लगा रखे हैं। वह भक्त आते होंगे।
पहले ब्लागर ने देखा कि टीन शेड से बने केबिन थे जहां कंप्यूटर रखे दिख रहे थे। दूसरा ब्लागर बोला-‘जैसे जैसे भक्तों के कमेंट आते जायेंगे वैसे वैसे दरबार का विकास होता जायेगा।’
ब्लागर और टिप्पणी स्वामी ने आश्चर्य से पूछा-‘कमेंट!
दूसरा ब्लागर बोला-‘कमेंट यानि चढ़ावा। अरे, इतने दिन से ब्लागिंग कर रहे हो तुम्हें मालुम नहीं कि कमेंट भी चढ़ावे की तरह होता है और प्रसाद भी! वैसे तुम क्या समझोगे? तुम्हारे पाठ पढ़ता कौन है? जो कमेंट लगायेगा।’
दूसरा ब्लागर मूर्ति तक गया और वहां से लड्ड्ओं की थाली ले आया। उस एक लड्ड् के दो भाग किये। एक भाग अपने मूंह में रख गया। फिर दूसरे भाग के दो भाग कर उसका एक भाग अपने मूंह में रख लिया और बाकी के दो भागों में एक पहले ब्लागर को दूसरा टिप्पणी स्वामी को देते हुए बोला-तुम दोनों तो हो नास्तिक। फिर भी यह थोड़ा थोड़ा प्रसाद खा लो। कल हमारे यहां एक लड़के को इंटरनेट पर चैट करते समय अपनी गर्लफ्रैंड का पहला ईमेल मिला तो उसने मन्नत पूरी होने पर यह लड्डूओं की कमेेंट चढ़ा गया।’
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘इसकी क्या जरूरत थी। हम तो ब्लागर सरकार के दर्शन कर वैसे ही बहुत खुश हो गये।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘चुपचाप खालो टिप्पणी स्वामी! वरना इससे भी जाओगे।
फिर उसने दूसरे ब्लागर से पूछा-‘वह तुम्हारा विशेष कार्यक्रम कब है?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘परसों हो गया। क्या तुमने उस पर्चे में तारीख नहीं पढ़ी थी।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, जोश में होश नहीं रहा। अच्छा हम दोनों चलते हैं।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘बहुत मेहरबानी! अब मैं ब्लाग सरकार की विशेष आरती करूंगा। ब्लाग सरकार की मेहरबानी हो तो अच्छा अच्छे कमेंट आयेंगे तो तुम दोनों की शक्लें देखने से जो बुरा टोटका हो गया उसको मिटाने के लिये यह जरूरी है। और हां! ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’

पहला ब्लागर और टिप्पणी स्वामी स्कूटर से वापस लौटने लगे। टिप्पणी स्वामी ने पहले ब्लागर से पूछा-‘तुम इस पर कुछ लिखोगे।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, हास्य व्यंग्य!
टिप्पणी स्वामी ने कहा-‘पर उसने मना किया था न! कहा था कि ब्लागर सरकार पर कुछ एैसा-वैसा मत लिख देना।’
पहले ब्लागर ने स्कूटर रोक दिया और बोला-‘यार, उसने हास्य व्यंग्य लिखने से मना तो नहीं किया था! चलो लौटकर फिर भी पूछ लेते हैं।’
टिप्पणीकार हैरान होकर उसकी तरफ देखने लगा। फिर पहले ब्लागर ने कहा-‘अगली बार पूछ लूंगा।
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Jun 27, 2008

उनका ही सावन साथी होता-हिन्दी शायरी

आकाश में छाये काले बादल
तन को छूती हैं बरखा की बूंदें
मन को खुश करती बहती हुई शीतल हवा
ऐसे में आती हैं होंठो पर हंसी
कोई दिल में ख्याल नहीं होता
अक्सर यह सोचता हूं कि
समझ सकता खुशी क्या होती है
ऐसा कोई साथ होता
मुर्दा चीजों में मन लगाते हैं सब
जानते नहीं कि तसल्ली क्या होती
गर्मी में बंद वातानुकूलित कमरों में
अपनी जिंदगी का पल गुजारने वाले
क्या जाने सुख का मतलब
अवकाश के दिन पिकनिक
मनाने का इंतजार करते
जब लगती है धूप सताने
जिन्होने दी गर्मी में सूरज की जलती धूप को
अपने खून से पसीने की दी है आहूति
उनका ही सावन साथी होता
और वर्षा की हर बूंद उनके लिए अमृत होता
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दीपक भारतदीप

Nov 11, 2007

उसकी दूसरी गलती-हिंदी कहानी

बोस का आदेश था कि मुझे उस कंपनी में एक 'आवश्यक सौदे ' के लिये जाना होगा। मैने मना किया और कहा कि-'मुझसे उंचे पद वाले अधिकारी जब इस कंपनी में हैं तो आप मुझे क्यों भेज रहें है और उस कंपनी की मैनेजिंग डायरेक्टर मुझ जैसे जूनियर से बात करना पसंद करेगी यह भी एक प्रश्न है।''
बोस ने मेरी राय को सिरे से ही नकारते हुए कहा-''नहीं! मैं तुम्हारी बात से एग्री नहीं करता क्योंकि तुम बहुत सीनियर हो, और रही अधिकारी होने या न होने की बात तो तुम इस शहर में बने रहने के लिये प्रमोशन नहीं लेते ताकि कहीं यहां से ट्रांसफर ना हो जाये। हैड क्वार्टर वाले भी इस बात को जानते है और इसलिए मुझे फोन पर तुम्हें ही इस काम के लिये भेजने को कहा है।"
आखिर मुझे वहां जाना ही पडा। मेरे इंकार के पीछे वह वजह नहीं थी जो मैने बोस को बताई थी। ऐक जैसे व्यवसाय होने के कारण उस कंपनी के संगठन और प्रबंधन की जानकारी मुझे होना स्वाभाविक थी कि ऐक एसा व्यक्ति वहां के प्रबंधन में था जो मेरे साथ पहले ऐक जगह काम कर चुका था और गबन के आरोप में वहां से निकला गया था। उसके इस कार्य की जानकारी उसके ही ऐक मित्र ने वहां के प्रबंधन को दी थी कि वह उसके साथ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करेंगे। मगर प्रबंधन ने उसकी नहीं मानी और उसके खिलाफ़ पुलिस कार्रवाई की और वह कुछ दिन जेल में रहा और उसका मित्र उसे यह समझाने में सफ़ल रहा था कि यह सब मेरी वजह से हुआ था। वह जाते-जाते मुझसे बद्ला लेने की धमकी दे गया था-और वह जिस तरह का आदमी था उससे दूर रहना ही बेहतर था।
आखिर बोस के आदेश पर मैं वहां पहुंचा। मैं शंकित जरूर था पर डरा हुआ बिलकुल नहीं था। साथ ही मैं यह भी जानता था कि सब कुछ वैसा नहीं होगा जैसे बोस चाहते थे।
कंपनी की इमारत में घुसते ही वहां खडे चौकीदर को मैने अपना परिचय दिया तो उसने अंदर ऐक टेबल की तरफ़ जाने का इशारा किया जहां ऐक महिला बैठीं थी। मैं वहां पहुंचा और उसे अपना परिचय दिया तो उसने कहा-''आप अभी बैठिये।''
मैं उसके पास बैठ गया, कुछ देर बाद वह बोली-'' हमारी मेम साहब से मिलने के पहले उनके सचिव से मिलना होगा। वह अभी आते ही होंगे।"
मैने अभी बैठा ही था कि वह बोली-''लीजिये सर आगये।'' मैने पलट कर देखा और मुझे मिली जानकारी गलत नहीं थी। वही था और मुझे घूर रहा था। वह महिला उससे बोली-" सर, इनसे मिलिये, यह उस कंपनी से आये हैं जिसके लिये मेमसाहब कल बता रही थीं।''
वह मुझे घूर रहा था। मैं उससे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था पर वह ऐसे ही चला गया।
मैने स्वागती महिला की तरफ देखा तो वह बोलीं-''वह उधर मेमसाहब के चेम्बर में पूछ्ने गये हैं।'' मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं था। वह कुछ खेल करेगा यह मैं जानता था। थोडी देर बाद चपरासी आया और स्वागती से बोला-''वह कौन साह्ब हैं जो मेमसाहब से मिलने आये हैं। आप उनसे बोल दीजिये कि मेम साह्ब अपने ही समकक्ष किसी अधिकारी से बात करेंगी, मामूली कर्मचारी से नहीं।''
ऐसा कहकर वह चला गया, इस बीच स्वागती के पास फोन आगया और वह मुझसे बोली-''तुम तो कोई छोटे कर्मचारी हो। मेडम तुमसे नहीं मिलना चाहतीं। तुम अब यहां से तुरंत चले जाओ मेम साह्ब के सेक्रेटरी का आर्डर है।''
मैं जानता था कि कौन बोल रहा था , और मुझे उसके व्यवहार पर बिल्कुल गुस्सा नहीं आया क्योंकि मैं जानता था हमारी कंपनी से ज्यादा उस कंपनी को हमारी जरूरत थी। अगर मैं वहां से चला जाता तो किसी ऐक को जवाब देना ही था मुझे या उस कंपनी की डिप्टी डायरेक्टर को। मेरा इस तरह वहां से लौटना मेरी कंपनी स्वीकार नहीं कर सकती थी।
मैने स्वागती पर बैठी उस महिला कर्मचारी से कहा-''क्या मैं फोन कर सकता हूं।"
उसने एकदम शुष्क और कड़े स्वर में कहा-''नहीं। आपको यहाँ से जाने का आदेश है।''
मैंने बाहर निकल गया और बाहर से पीसीओ से अपने बॉस को फोन किया और उन्हें जानकारी दी। वह बोले-''उन्हें ग़लतफ़हमी है। तुमसे इस तरह का व्यवहार कर हमारी कंपनी से अनुबंध की उम्मीद छोड़ देना चाहिये, क्योंकि हमारा हेड क्वार्टर इस बहुत गंभीरता से लेगा। फ़िर भी मैं बात करता हूं। तुम दस मिनट बाद मुझे फोन करना।''
मैं वहीं खडा रहा। बरसात के दिन थे और मुझे पसीना आने के साथ प्यास भी बहुत लग रही थी, पर इससे ज्यादा इस बात की फिक्रथी कि दो कंपनियों के बीच मेरी वजह से विवाद छिड़ने वाला था। मैं ऐक होटल में गया और चाय्-नाश्ता करने के बाद फ़िर उसी पी.सी.ओ. पर आया। लगभग आधा घंटा गुजर गया था। मैने बॉस को फोन किया, मेरी आवाज सुनते ही बॉस बोले-''क्या कभी तुम किसी कंपनी में गबन करने के बाद जेल गए हो। क्या तुम्हें कभी नौकरी से निकाला गया। और क्या तुम इस कंपनी की तरफ़ से कांट्रेक्ट करने में अपना कमीशन खाते हो। क्यातुम ऐक बहुत बडे कमीशन खोर हो?''
मैने हंसकर कहा-'आपके मूंह से अपने बारे में यह कहानी सुनकर मुझे बिल्कुल ताज्जुब नहीं हुआ।' ''मैं जानता हूं!" बोस ने कहा-''तो तुम यह भी जानते हो कि किसने यह कहानी गढी होगी। मुझे उसका नाम बताओ। अभी तुम वहां जाओ मेडम तुमसे बात करने को तैयार हैं।''
पीसीओ उस कंपनी के दफ़्तर से ज्यादा दूर नहीं था। मैं जैसे ही वहां से बाहर निकला वैसे ही वह चपरासी मुझे मिल गया तो अंदर से मेरे लिये संदेश ले आया था और स्वागती ने मुझे बाहर जाने का आदेश दिया था। वह बोला-'सर, मेडम आपको बुला रहीं है।'
मैं उस कंपनी के इमारत की सीढियाँ चढ़कर उसी स्वागती के पास से गुजरा तो वह एकदम बोली-''सॉरी सर, मुझे मेडम के सेक्रेटरी साह्ब ने ऐसा करने को कहा था।"
मैं उसकी बात का जवाब दिये बिना ही डिप्टी मेनेजिंग की नेम प्लेट लगे कक्ष में दाखिल हो गया। वह काम कर रही थी और मेरी आहट सुनते ही उसने सिर ऊपर किया, मैं हतप्रभ रह गया वह एकदम मेरी तरफ़ देख रही थी। फ़िर बोली-''आप! नहीं मैं यकीन नहीं करती कि आप..................वह झूठ बोल रहा था।''
मैं उसे वहां देखकर आश्चर्य में था''तुम यहां कब आयी।'
वह बहुत खुश होकर बोली-''मैं तीन महिने से यहां हूं और आपका पता ढूंढ रही हूं और पता लगा कि अपने मकान बना लिया है। पहले तो आप बैठिये । मैं कुछ मंगवाती हूं। काम की बातें तो होती रहेंगी। मैं आपको ऐसे तो जाने नहीं दूंगी."
मैंने कहा-''हां। वैसे तुम्हें देखकर बहुत खुशी हो रही है, पर हमें काम पर भी बात करना चहिये क्योंकि बोस इस मामले में आज ही निर्णय करना चाह्ते हैं।"
-''आप बैठो तो सही-" काम की बाते तो होती रहेंगीं, मैं इस समय अपने हैड क्वार्टर से ओनलाइन बात कर रही हूं और उसमें आपकी कंपनी के बारे में भी चर्चा हो रही है। वैसे घर परिवार में सब ठीक है! मेरी प्यारी सहेली के हाल कैसे हैं। मैं उससे मिलना चाहती हूं। उसीको तो ढूंढ रही हूं और आज उसका पति हाथ आ गया तो अब उसे इतनी आसानी से नहीं छोडूंगी।"वह खुश होकर बोली.
मैं बैठ गया। वह ओन लाइन बात कर रही थी और मैं पिछली यादों में खो गया।
वह मेरी पत्नी की बचपन की सहेली थी और हमारे ऐक वर्ष बाद ही उसका विवाह भी हमारे शहर में हुआ। चूँकि दोनों ऐक ही शहर की थी इसलिए ऐक बार उसके विवाह के ऐक माह बाद दोनों अपने मायके भी साथ गयीं थीं । वह विवाह सेपहले ऐक कंपनी में कलर्क थी और यह आश्वासन मिलने के बाद कि उसकी कंपनी उसी शहर में उसका ट्रांसफर कर देगी लड़के वाले शादी को तैयार हुए थेक्योंकि वह कामकाजी लड़की चाह्ते थे। विवाह के बाद वह बहुत दिनों तक परेशान रही और इस दौरान मेरी पत्नी उसका हौसला बढाती , फ़िर ऐक दिन वह और उसका पति शहर छोड़ गये और उसके बाद कोई संपर्क नहीं हुआ पर यह जरूर पता लगा कि दोनों ने अपनी जिंदगी में आगे बहुत तरक्की की है। उसके बारे में जानकारी तभी मिलती जब मेरी पत्नि मायके जाती और उसके घर जरूर जाती और वहीं से जानकारी मिल जाती।
''मैं कल ही आपके घर आउंगी।"वह बोली तो मेरे विचारों कर क्रम टूटा-'आप अपना फोन नंबर दो तो मैं पहले अपनी सहेली से बात कर लूं। उसे यह बताऊँ तो सही मैं यहां हूं।"
हमारी कार्य सबंधित बात भी पूरी हो गयी थी और मैने उसे अपना फोन नंबर दिया और बाहर निकलने लगा तो वह बोली-''हां, आप यह तो बताओ वह मेरा सेक्रेटरी किसकी कहानी सुना रहा था। यकीनन आपकी तो है नहीं, क्योंकि आप जेल तो गये नहीं है क्योंकि मुझे पता पड़ जाती। कहीं अपनी तो नहीं सुना रहा था क्योंकि वह यहां बदनाम है।'
''यह तो उसी से ही पूछ लेना-"मैने कहा और बाहर निकल गया।
वह बाहर ही खडा था और उसका मूंह सूखा हुआ लग रहा था। मुझसे बोला-"वह तुम्हें जानती है?"
मैंने शुष्क स्वर में कहा-''वह मुझे बहुत मानती भी है पर मैने तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहा और न कहूंगा। मगर तुमने अपनी मुसीबत ऐक बार खुद बुलाई है। वह तुम्हें छोडेगी नही क्योंकि मेरी पत्नि से जब मिलेगी तो वह उसे जरूर बताएगी, आज से छह वर्ष पूर्व अपनी नौकरी खोने के बाद किस तरह धमकी दी थी। मैं कोशिश करूंगा वह इसे न बताये पर लगता है तुम्हारे पाप पीछा कर रहे हैं क्योंकि जिस कहानी को मैं भूल चुका था उसे तुमने खुद याद किया है, तुम्हें मेरी चर्चा उससे नही करनी थी, ताकि पुरानी बाते फिर एक बार हमारे सामने न आ सकें।"
मैं वहां से निकल आया और वह वहीं खडा आसमान में देख रहा था।शायद वह समझ गया था की उसने यह दूसरी गलती की है और लगभग वैसी ही जैसे पहले की थी जब उसने अपनी करिस्तानियों का जिक्र अपने मित्र से किया था जिसने प्रबंधन को पूरी बात बता दी थी।
नोट-यह मेरी मौलिक एवं स्वरचित हिंदी कहानी है।