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Sep 16, 2013

रोने पर जश्न-हिन्दी व्यंग्य कविता (rone par jashna-hindi vyangya kavita, a hindi satire poem)



किसी की कामयाबी पर
कौन जश्न मनाता है,
एक दूसरे की तबाही पर ही
सभी को मजा लेना आता है।
कहें दीपक बापू
दिल बहलाने के लिये
चाहिये लोगों को कोई न कोई बहाना,
चलते को गिराकर
अपनी ताकत का अहसास कराते हैं सभी
वक्त खराब करना लगता है
किसी गिरे इंसान को ऊपर उठाना,
बिक जाती है मनोरंजन के बाज़ार में
इसलिये सरलता से सनसनी,
बनते घर की कोई खबर नहीं,
टूटते पर सभी की भोहें तनी,
कुदरत ने इंसान को दिये
हंसने के कई तरीके
मगर उसे दूसरों के रोने पर ही
जश्न मनाना आता है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jan 27, 2013

फर्जी फरिश्ते-हिन्दी कविता (farzi farishtey-hindi kavita or poem)


जोश में मिटा रहे
पुराने नाम और निशान,
अपनी बाहों की ताकत
आजमाकर कमजोर पर
दिखा रहे ताकतवद अपनी शान।
कहें दीपक बापू
फर्जी फरिश्ते पर्दे पर रंगीन कपड़ों के साथ चमकते
 सफेद कागजों पर काले अक्षरों में रोज छपते उनके नाम
हकीकत यह है कि
नहीं है बिल्कुल जान,
बेज़ार ज़माना आकाश में ताक रहा है
कोई रहनुमा कभी तो आयेगा
बचायेगा उनकी उनकी जान।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Jan 18, 2013

तस्वीर में मुस्कराता चेहरा-हिन्दी कविता (taswir mein muskarata chehra-hindi kavita or hindi poem)

तस्वीर में मुस्कराते चेहरे देखकर
उनकी दिल में छिपी उदासी का ख्याल आता है,
जिसने उतारा है उनका चेहरा
अपनी आंखों से
कहा होगा उन्हें मुस्कराने के लिये
यह साफ नज़र आता है।
कहें दीपक बापू
जिंदगी का बोझ ढो रहा है पूरा ज़माना
दौलत नहीं है तो दुःख दूर है
अगर हो तो भी सुख कहां निभाता है,
हां, मोहब्बत है जिनके साथ
उनकी सोहब्बत में
न चाहते हुए भी
मुस्कराना सभी को भाता है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Jul 29, 2012

रौशनी और सनसनी-हिन्दी शायरी (roshni aur sansani-hindi poem or shayari)

रौशनी का चिराग रखा
अंधेरी गली में
मुसाफिरों को रास्ता दिखाने के लिये
किसी ने तारीफ नहीं की
लगाई आग जिन्होंने सड़क पर
मशहूर हो गये,
सनसनी फैलायी जिन्होंने
लोगों के जज़्बातों का कत्ल कर
कभी चमक रहे पर्दे पर
कभी मंच पर चढ़ रहे हैं,
दर्द बांटते रहे
सहलाते रहे जख्म
पूरे ज़माने का
भीड़ में कहीं इसलिये खो गये।
कहें दीपक बापू
दुनियां मे जुल्म करने वाले
कसूरवार नहीं है,
आदी हो गये हैं जमाने के लोग
मर मरकर जीने के
फिर सजा देने वाले
फरिश्ते भी अब उनके हमदर्द हो गये।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Jan 21, 2012

तड़प-हिन्दी शायरियाँ (hindi shayriyan)

भीड़ का शोरशराबा देखकर
अब अपनी तन्हाई की तड़प नहीं सताती है,
कहें दीपक बापू
अकेलेपर से घबड़ाये लोग
ढूंढते हैं मेलों में खुशी का सामान
खरीदते ही हो जाता जो पुराना
फिर दौड़ते हैं दूसरी के लिये
उम्र उनकी भी ऐसे ही
तड़पते बीत जाती है
....................................
उन दोस्तों के लिये क्या कहें
जिनसे छिपने की कोशिश हम करें
वह हमारे ठिकानों को ढूंढ ही डालते हैं,
कहें दीपक बापू
अपना चेहरा लेकर
बदल बदल कर अदाएँ
वह हर जगह सामने आते हैं
जिनसे मिलना हमेशा हम टालते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Dec 17, 2011

इंसानी रिश्तो का भरोसा-हिन्दी शायरी (insani rishton ka bharosa-hindi shayari)

आदमी बेईमान हो या ईमानदार
सभी इंसान सूरत तो इंसान जैसी पाते हैं,
पहली नज़र में पहचानने का दावा
कौन बेवकूफ करता है
यहां हर कदम पर वादे
धोखे में बदल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
इश्क केवल हो सकता है सर्वशक्तिमान से
इंसानी रिश्तों के क्या भरोसा,
दिल ने जिसे प्यार किया
फिर उसी को कोसा,
लोगों के ख्यालों पर यकीन करना बेकार है
मतलब और समय के साथ
फायदे के लिये रिश्ते भी बदल जाते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Dec 11, 2011

हमदर्दी की जरूरत-हिन्दी शायरी (hamdardi ki zarurat-hindi shayari)

अपने बढ़ते कदमों के नीचे
लोगों के जज़्बात यूं न कुचलते जाओ
जब लड़खड़ायेंगे तुम्हारे पांव
तुम्हें सहारे की जरूरत होगी,
कहें दीपक बापू
अपने दिल के दर्द और खुशी सभी जानते हैं
दूसरे के अहसास के समझते है पराया
नहीं जानता कोई
किसी दिन उसे भी हमदर्दी को जरूरत होगी।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Nov 11, 2011

रूह और दिमाग-हिन्दी शायरी

मेरे दिल में न खुशी है
न कोई गम है
अपनी हालातों से परेशान लोग
हैरान है यह देखकर
यह कभी रोता नहीं
कभी हंसता भी नहीं
बिचारे नहीं जानते
बाज़ार में बिकने वाले
जज़्बात मैंने खरीदना छोड़ दिया है,
इंसानों के फरिश्ते होने की
उम्मीद कभी नहीं करता
अपनी रूह से दिमाग का
अटूट रिश्ता जोड़ दिया है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Oct 27, 2011

चुंबन का स्वाद न मीठा न नमकीन-हिन्दी हास्य व्यंग्य रचना (chumban ka swad n meetha n namakeen-hindi hasya vyangya or comic satire article in hindi)

          सिनेमा या टीवी के पर्दे पर चुंबन का दृश्य देखकर लोगों के मन में हलचल पैदा होती है। पहले की युवा पीढ़ी तो देखकर मन में कसमसाकर रह जाती थी क्योंकि उस समय लड़कियों की शैक्षणिक तथा व्यवसायिक क्षेत्रों में उपस्थिति नहिनी थी। अब समय बादल गया है और खुलेपन के कारण युवा पीढ़ी को सार्वजनिक रूप से प्रेम के अवसर खूब मिलते हैं और वह उनका उपयोग करने के लिए बेताब हो उठती है।  अगर ऐसे में कहीं किसी प्रसिद्ध हस्ती ने किसी दूसरी हस्ती का सार्वजनिक रूप से चुंबन  लिया और उसकी खबर उड़ी तो हाहाकार भी मच जाता है। कुछ लोग मनमसोस कर रह जाते हैं कि उनको ऐसा अवसर नहीं मिला पर कुछ लोग समाज और संस्कार विरोधी बताते हुए सड़क पर कूद पड़ते हैं। चुंबन विरोधी चीखते हैं कि‘यह समाज और संस्कार विरोधी कृत्य है और इसके लिये चुंबन लेने और देने वाले को माफी मांगनी चाहिये।’
          अब यह समझ में नहीं आता कि सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना समाज और संस्कारों के खिलाफ है या अकेले में भी। अगर ऐसा है तो फिर यह कहना कठिन है कि कौन ऐसा व्यक्ति है जो कभी किसी का चुंबन नहीं लेता। अरे, मां बाप बच्चे का माथा चूमते हैं कि नहीं। फिर अकेले में कौन किसका कैसे चुंबन लेता है यह कौन देखता है और कौन चुंबन ले देकर उसको सार्वजनिक रूप से प्रकट करता है?
           किसी के सार्वजनिक रूप से चुंबन लेने देने पर लोग ऐसे ही हाहाकार मचा देते हैं भले ही लेने और देने वाले आपस में सहमत हों। अगर किसी विदेशी होंठ ने किसी देशी गाल को चुम लिया तो बस राष्ट्र की प्रतिष्ठा के लिए खतरा और समाज के साथ ही  संस्कार विरोधी घोषित कर दिया जाता है। अन्य  भी न जाने कितनी नकारात्मक संज्ञाओं से उसे नवाजा जाता है। कहीं कहीं तो जाति,धर्म और भाषा का लफड़ा भी खड़ा हो जाता है। पश्चिमी देशों में सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना शिष्टाचार माना जाता है जबकि भारत में इसे अभी तक अशिष्टता की परिधि में रखा जाता है। यह किसने रखा पता नहीं पर जो रखते हैं उनसे बहस करने का साहस किसी में नहीं होता क्योंकि वह सारे फैसले ताकत से करते हैं और फिर समूह में होते हैं।
          इतना तय है कि विरोध करने वाले भी केवल चुंबन का विरोध इसलिये करते हैं कि वह जिस सुंदर चेहरे का चुंबन लेता हुआ देखते हैं वह उनके ख्वाबों में ही बसा होता है और उनका मन आहत होता है कि हमें इसका अवसर क्यों नहीं मिला? वरना एक चुंबन से समाज,संस्कृति और संस्कार खतरे में पड़ने का नारा क्यों लगाया जाता है।
           दूसरे संदर्भ में इन विरोधियों को यह यकीन है कि समाज में कच्चे दिमाग के लोग रहते हैं और अगर इस तरह सार्वजनिक रूप से चुंबन लिया जाता रहा तो सभी यही करने लगेंगे। ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस आता है जो पूरे समाज को कच्ची बुद्धि का समझते हैं। यकीनन उनको अपनी आक्रामकता से ही समाज की संस्कृति और संस्कार बचते नज़र आते है।
         फिल्मों में भी नायिका के आधे अधूरे चुंबन दृश्य दिखाये जाते हैं। नायक अपना होंठ नायिका के गाल के पास लेकर जाता है और लगता कि अब उसने चुंबन लिया पर अचानक दोनों में से कोई एक या दोनों ही पीछे हट जाते हैं। इसके साथ ही सिनेमाहाल में बैठे वह  लड़के -जो इस आस में हो हो मचा रहे होते हैं कि अब नायक ने नायिका का चुंबन लिया-हताश होकर बैठ जाते हैं। चुम्मा चुम्मा ले ले और देदे के गाने जरूर बनते हैं नायक और नायिक एक दूसरे के पास मूंह भी ले जाते हैं पर चुंबन का दृश्य फिर भी नहीं दिखाई देता। फिल्म निर्माता जानते हैं कि ऐसा करना खतरनाक हो सकता है।
        आखिर ऐसा क्यों? क्या वाकई ऐसा समाज और संस्कार के ढहने की वजह से है। नहीं! अगर ऐसा होता तो फिल्म वाले कई ऐसे दृश्य दिखाते हैं जो तब तक समाज में नहीं हुए होते पर जब फिल्म में आ जाते हैं तो फिर लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। फिल्म से सीख कर अनेक अपराध हुए हैं ऐसे में अपराध के नये तरीके दिखाने में फिल्म वाले गुरेज नहीं करते पर चुंबन के दृश्य दिखाने में उनके हाथ पांव फूल जाते हैं। सच तो यह है कि चुंबन  जब तक लिया न जाये तभी तक ही आकर्षण है उसके बाद तो फिर सभी खत्म है। यही कारण है कि काल्पनिक प्यार बाजार में बिकता रहे इसलिये होंठ और गाल पास तो लाये जाते हैं पर चुंबन का दृश्य अधिकतर दूर ही रखा जाता है।
       यह बाजार का खेल है। अगर एक बार फिल्मों से लोगों ने चुंबन लेना शुरू किया तो फिर सभी जगह सौंदर्य सामग्री की पोल खुलना शुरू हो जायेगी। महिला हो या पुरुष सभी सुंदर चेहरे सौंदर्य सामग्री से पुते होते हैं और जब चुंबन लेंगे तो उसका स्पर्श होठों से होगा। तब आदमी चुंबन लेकर खुश क्या होगा अपने होंठ ही साफ करता फिरेगा। सौंदर्य प्रसाधनों में कोई  ऐसी चीज नहीं होती जिससे जीभ को स्वाद मिले। कुछ लोगों को तो सौदर्य सामग्री से एलर्जी होती और उसकी खुशबू से चक्कर आने लगते हैं। अगर युवा वर्ग चुंबन लेने और देने के लिये तत्पर होगा तो उसे इस सौंदर्य सामग्री से विरक्त होना होगा ऐसे में बाजार में सौंदर्य सामग्री के प्रति पागलपन भी कम हो जायेगा। कहने का मतलब है कि गाल का मेकअप उतरा तो समझ लो कि बाजार का कचड़ा हुआ। याद रखने वाली बात यह है कि सौदर्य की सामग्री बनाने वाले ही ऐसी फिल्में के पीछे भी होते हैं और उनका पता है कि उसमें ऐसी कोई चीज नहीं है जो जीभ तक पहुंचकर उसे स्वाद दे सके।
       कई बार तो सौंदर्य सामग्री से किसी खाने की वस्तु का धोखे से स्पर्श हो जाये तो जीभ पर उसके कसैले स्वाद की अनुभूति भी करनी पड़ती है। यही कारण है कि चुंबन को केवल होंठ और गाल के पास आने तक ही सीमित रखा जाता है। संभवतः इसलिये गाहे बगाहे प्रसिद्ध हस्तियों के चुंबन पर बवाल भी मचाया जाता है कि लोग इसे गलत समझें और दूर रहें। समाज और संस्कार तो केवल एक बहाना है।
        एक आशिक और माशुका पार्क में बैठकर बातें कर रहे थे। आसपास के अनेक लोग उन पर दृष्टि लगाये बैठै थे। उस जोड़े को भला कब इसकी परवाह थी? अचानक आशिक अपने होंठ माशुका के गाल पर ले गया और चुंबन लिया। माशुका खुश हो गयी पर आशिक के होंठों से क्रीम या पाउडर का स्पर्श हो गया और उसे कसैलापन लगा। उसने माशुका से कहा‘यह कौनसी गंदी क्रीम लगायी है कि मूंह कसैला हो गया।’
       माशुका क्रोध में आ गयी और उसने एक जोरदार थप्पड़ आशिक के गाल पर रसीद कर दिया। आशिक के गाल और माशुका के हाथ की बीचों बीच टक्कर हुई थी इसलिये आवाज भी जोरदार हुई। उधर दर्शक तो जैसे तैयार बैठे ही थे। वह आशिक पर पिल पड़े। अब माशुका उसे बचाते हुए लोगों से कह रही थी कि‘अरे, छोड़ो यह हमारा आपसी मामला है।’
      एक दर्शक बोला-‘अरे, छोड़ें कैसे? समाज और संस्कृति को खतरा पैदा करता है। चुंबन लेता है। वैसे तुम्हारा चुंबन लिया और तुमने इसको थप्पड़ मारा। इसलिये तो हम भी इसको पीट रहे हैं।’
        माशुका बोली‘-मैंने चुंबन लेने पर थप्पड़ थोड़े ही मारा। इसने चुंबन लेने पर जब मेरी क्रीम को खराब बताया। कहता है कि क्रीम से मेरा मूंह कसैला हो गया। इसको नहीं मालुम कि चुंबन कोई नमकीन या मीठा तो होता नहीं है। तभी इसको मारा। अरे, वह क्रीम मेरी प्यारी क्रीम है।’
       तब एक दर्शक फिर आशिक पर अपने हाथ साफ करने लगा और बोला-‘मैं भी उस क्रीम कंपनी का ‘समाज और संस्कार’रक्षक विभाग का हूं। मुझे इसलिये ही रखा गया है कि ताकि सार्वजनिक स्थानों पर कोई किसी का चुंबन न ले भले ही लगाने वाला कोई  भी क्रीम लगाता हो। अगर इस तरह का सिस्टम शुरु हो जायेगा तो फिर हमारी क्रीम बदनाम हो जायेगी।’
        बहरहाल माशुका ने जैसे तैसे अपने आशिक को बचा लिया। आशिक ने फिर कभी सार्वजनिक रूप से ऐसा न करने की कसम खाई।
        हमारा देश ही नहीं बल्कि हमारे पड़ौसी देशों में भी कई चुंबन दृश्य हाहाकर मचा चुके हैं। पहले टीवी चैनल वाले प्रसिद्ध लोगों के चुंबन दृश्य दिखाते हैं फिर उन पर उनके विरोधियों की प्रतिक्रियायें बताना नहीं भूलते। कहीं से समाज और संस्कारों की रक्षा के ठेकेदार उनको मिल ही जाते हैं।
        वैसे पश्चिम के स्वास्थ्य वैज्ञानिक चुंबन को सेहत के लिये अच्छा नहीं मानते। यह अलग बात है कि वहां चुंबन खुलेआम लेने का शिष्टाचार है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे बुरा समझा जाता है। चुंबन लेना स्वास्थ्य के लिये बुरा है-यह जानकर समाज और संस्कारों के रक्षकों का सीना फूल सकता है पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि अमेरिकन आज भी आम भारतीयों से अधिक आयु जीते हैं और उनका स्वास्थ हम भारतीयों के मुकाबले कई गुना अच्छा है।
         वैसे सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना अशिष्टता या अश्लीलता कैसे होती है इसका वर्णन पुराने ग्रंथों में कही नहीं है। यह सब अंग्रेजों के समय में गढ़ा गया है। जिसे कुछ सामाजिक संगठन अश्लीलता कहकर रोकने की मांग करते हैं,कुछ लोग कहते हैं कि वह सब अंग्रेजों ने भारतीयों को दबाने के लिये रचा था। अपना दर्शन तो साफ कहता है कि जैसी तुम्हारी अंतदृष्टि है वैसे ही तुम्हारी दुनियां होती है। अपना मन साफ करो, पर भारतीय संस्कृति के रक्षकों देखिये वह कहते हैं कि नहीं दृश्य साफ रखो ताकि हमारे मन साफ रहें। अपना अपना ज्ञान है और अलग अलग बखान है।
जहां तक चुंबन के स्वाद का सवाल है तो वह नमकीन या मीठा तभी हो सकता है जब सौंदर्य सामग्री में नमक या शक्कर पड़ी हो-जाहिर है या दोनों वस्तुऐं उसमें नहीं होती।
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Sep 16, 2011

विकास और महंगाई-हिन्दी हास्य कविता (vikas aur mehangai or mahangai-hindi hasya kavita)

उनसे पूछा गया कि
‘‘आप इस तरह कब तक महंगाई बढ़ायेंगे,
आम आदमी को यूं तड़पायेंगे,
समझ में नहीं आता
आप लोगों का दर्द कैसे समझ पायेंगे।’’

वह बोले
‘देश विकास की तरफ बढ़ रहा है
चाहे आतंकवाद से लड़ रहा है,
तुमने सुना नहीं हमने चवन्नी बंद कर दी है,
उसी तरह हम चाहते हैं कि
दस, पचास और सौ के नोट को रोने वाले
गरीब लोग
हजार और पांच सौ के नोट पाने लगे,
महंगाई बढ़ेगी तो कमाई भी बढ़ेगी
किसी तरह गरीबी दूर भगे
अमीर भी अपनी दौलत आसानी से
गरीबों में बांटने के साथ ही
इधर उधर ले जायेंगे,
अभी तक अमीर ही देख रहे हैं हजार के नोट
हमारी कोशिश से गरीब भी देख पायेंगे।
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Aug 8, 2011

जनभक्षी-हिन्दी व्यंग्य शायरियाँ (janbhakshi-hindi vyangya shayriyan)

जन जन के भले की बात करते हुए
कई फरिश्ते जनभक्षी हो गए हैं,
दाने खिलाने के लिए हाथ फैलाते हैं
जिनको खिलाने के लिए
वही जन उनके लिए
शिकार करने वाले पक्षी हो गए हैं।
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नरभक्षियों का समय गया
अब खतरा जनभक्षियों का हो गया है,
चेहरे काले नहीं खूबसूरत हैं,
हाथों में तलवार की जगह
जुबान के हर शब्द में प्यार है,
मगर जन जन के भले की बात
करने वाले इन फरिश्तों के लिए
आम इंसान
शिकार करने लायक पक्षियों जैसा हो गया है।
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Jul 12, 2011

हम मुस्करा दिये-हिन्दी कविता (ham muskra diye-hindi kavita)

उसने कहा
‘हम जमाने को बदल देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘हम हर इंसान को खुश कर देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘बस, एक बार पद पर बैठ जाने दो
हम अपनी ताकत दिखा देंगे।’
हम मुस्करा दिये।

बोलने में ताकत कहां लगती है
मगर जब करने की ताकत आती है
तो फिर दिखाता कौन कहां है
पद में मदांध आदमी
एक शब्द बोलने पर भी
कत्ल कर सकता है
इस ख्याल ने डरा दिया
बस, हम यूं ही मुस्करा दिये।
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Jul 5, 2011

जिंदगी का हिसाब किताब-हास्य व्यंग्य कवितायें (jindagi ka hisab kitab-hasya vyangya kavitaen)

हिसाब किताब में
जिंदगी का खेल लोग यूं ही खेलते जाते हैं,
ज्ञान का संदेश सुने
या माया के अंक गुने
बीच रास्ते पर चलते हुए
इसलिये सर्वशक्तिमान का नाम भी
गिन गिनकर लिये जाते हैं।
----------
एक बंदे ने दूसरे बंदे से पूछा
‘सर्वशक्तिमान का नाम
माला फिराते हुए क्यों लेते हो,
क्या डर है कि कहीं गिनती भूल जाओगे,
ज्यादा लेने पर फल नहीं मिलेगा
कम लिया तो शायद कम पाओगे,
इसलिये हिसाब किताब से काम करते हो।

दूसरे बंदे ने कहा
‘‘हमें कच्चा मत समझना,
सर्वशक्तिमान का नाम
माला के साथ जपते हुए भी
गिनती गिनते जाते हैं,
दिन भर दुकान पर
रुपये गिनने का अभ्यास बना रहे
इसलिये मन ही मन अंक भी गाये जाते हैं,
नाम स्मरण तो बचपन की आदत है,
पचपन में बनी मजबूरी बनी यह इबादत है,
लेते हैं सर्वशक्तिमान का नाम
यह सोचकर कि हम रुपये गिने जाते हैं।’’
------------
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Jun 26, 2011

दोस्ती और रिश्तों के चेहरे-हिन्दी कविता (dosti aur riston ki chehare-hindi kavita

जिंदगी में दोस्ती और रिश्तों के चेहरे बदल जाते हैं,
कुदरत के खेल देखिये, नतीजे सभी में वही आते हैं।
कमीज पर क्या, कफन में भी कमीशन की चाहत है,
दवाई लेने के इंतजार मे खड़े, कब हम बीमारी पाते हैं।
हमारी खुशियों ने हमेशा जमाने को बहुत सताया है,
गम आया कि नहीं, यही जानने लोग घर पर आते हैं।
कहें दीपक बापू, भरोसा और वफा बिकती बाज़ार में
इंसानों में जिंदा रहे जज़्बा, यही सोच हम निभाये जाते हैं।
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Jun 22, 2011

योगासन में ‘एक्शन’ अधिक नहीं होता-हिन्दी लेख (yogasan mein action nahin hota-hindi lekh)

              बाबा रामदेव अब राष्ट्रीय प्रचार पटल से एकदम गायब है। अपना अनशन तोड़ने के बाद वह फिर लोगों के सम्मुख नहीं आये। एक अध्यात्मिक योगी के लिये राजयोग करना कोई आसान नहीं है यह अब समझ में आने लगा है। अगर कोई योगी राजयोग करने पर आमदा हो ही जाता है तो समझ लेना चाहिए कि वह राजस भाव के वशीभूत होकर अपनी साधना कर रहा था। यहां हम श्रीमद्भागवत के कर्म तथा गुण विभाग की विस्तृत चर्चा नहीं कर रहे पर इतना बताना जरूरी है कि आदमी सामान्य भक्त हो या योगी या फिर नास्तिक हो पर वह त्रिगुणमयी सृष्टि के चक्कर से नहीं बच सकता। सात्विक, राजस तथा तामस प्रवृत्ति के लोग हर जगह और हालत में मिलेंगे। तीनों गुणों से परे कोई महायोगी होता है हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि वह सामान्य संसार कर्म में अपने देह व्यस्त न रखे और सन्यास लेकर हिमालय पर चला जाये। हमारा कहने का अभिप्राय यह है कि आदमी अपनी इन तीन प्रवृत्तियों से ही कर्म करते हुए लिप्त होता है पर महायोगी केवल काम करना है यही सोचकर काम करता है उसे उसके फल में कदापि रुचि नहीं होती। जिसके मन में संतोष है वही सात्विक है पर संतोष तथा असंतोष से परे है तो वह योगी है।
     आलोचकों का कहना है कि बाबा रामदेव ने लोगों को योग की गलत शिक्षा दी यह अलग से बहस का विषय है क्योंकि इसका निर्णय तो केवल प्रवीण योगशास्त्री ही कर सकते हैं। कुछ योग शास्त्री मानते हैं कि ध्यान और धारणा के पतंजलि योग साहित्य में प्रतिपादित सूत्रों का उनका अध्ययन अधिक नहीं है। उनके विचार, वाणी तथा भाव भंगिमा से यही लगता है। इतना तय ही कि उनकी योग से प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।
                   पतंजलि योग विज्ञान के सूत्र के अनुसार परिणाम से कर्म का ज्ञान हो जाता है। दूसरे शब्दों में अगर किसी की व्यक्ति या उसकी गतिविधि से निकले परिणाम को देखते हुए उसके पूर्व कर्म का आभास किया जा सकता है। यह बहुत गंभीर अध्ययन करने वाला सूत्र है। इससे हम अपनी जिंदगी में किसी कर्म के नाकाम होने पर उसका विश्लेषण करते हुए अपनी गलतियों को ढूंढ सकते हैं। अपनी नाकामी पर हम चिंता में पड़े रहें या दूसरों को उसके लिये जिम्मेदार बताने लगें यह ठीक नहीं है। अपने संकल्प की शुद्धता और शुद्धता पर दृष्टिपात कर सकते हैं। परिणाम से कर्म का ज्ञान होने सूत्र. के लिये हमें जासूसी का नियम भी कह सकते हैं। जिस तरह कोई व्यक्ति कहीं बेहोश होकर घाायल पड़ा है और उसके पास कोई बड़ा पत्थर, चाकू या गोली का खोल पड़ा है। उसका घाव और खून देखकर जासूस यह अनुमान करता है कि उसे कौनसी चीज से मारा गया होगा। अगर आंधी तूफान के बाद राह चलतते हुए हम देखते हैं कहीं पेड़ के नीचे कोई जानवर दबा पड़ा है तो हम सहजता से यह अनुमान करते हैं कि वह पेड़ आंधी में गिरा होगा।
           योग विधा में पांरगत मनुष्य छोटी मोटी घटनाओं से ही नहीं बड़ी बड़ी राजनीतिक और एतिहासिक घटनओं का भी अनुमान कर सकते हैं कि उनमें सक्रिय लोगों की गतिविधियों किससे और कैसे प्रभावित होती होंगी। परिणामों से कार्य का अनुमान करना तभी संभव है जब ध्यान आदि के माध्यम से अपना बौद्धिक चिंत्तन विकसित करे। ज्ञानी लोग अभौतिक क्रियाओं का अनुमान सहजता से कर सकते हैं। बाबा रामदेव चूंकि प्रसिद्ध योग शिक्षक हैं इसलिये उनकी गतिविधियां अनेक ज्ञात अज्ञात योगियों और हम जैसे योग साधकों के लिये बहुत समय से अनुसंधान का विषय रही हैं। दिल्ली में अनशन के दौरान और उसके बाद उनके व्यक्त्तिव का पूरा स्वरूप सामने आ रहा था। उनकी राजनीतिक गतिविधियों में योगियों और योगसाधकों की दिलचस्पी कम थी पर उसके परिणाम और अभियान के संचालन को योग विज्ञान की कसौटी पर कसने का यह स्वर्णिम अवसर था। प्राणायामों तथा योगासनों की शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव ने अपनी साधना से कैसा व्यक्तित्व पाया है यह देखने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था। अभी यह कहना कठिन है कि आगे उनकी क्या योजना है? वह विश्राम करने के बाद फि कौनसा काम करते हैं यह देखने वाली बात होगी पर इतना तय है कि भारतीय अध्यात्म की योग विधा को प्रचार दिलाने में उनका कम अनुकरणीय रहा यह अलग बात है कि बाज़ार और प्रचार के संयुक्त उपक्रम के प्रबंधकों ने उनकी मदद की। बाज़ार और प्रचार में सक्रिय महानुभावों का पूरे विश्व में दबदबा है और वह समय समय पर अपने नायक आम लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। जब भारतीय समाज पर राजकीय विलासिता हावी हो रही है तो वहां राजरोगों का पनपना स्वाभाविक है। ऐसे बाबा रामदेव के योगासन उपयोगी  साबित रहे रहे थे। उनको नायकत्व का दर्जा मिला पर आलोचकों ने आरोप लगाया कि बाबा इस तरह समाज में व्यायाम का प्रचार कर लोगों की उपभोग क्षमता बढ़ा रहे हैं जिससे बाज़ार को अपने उत्पादों के ग्राहक बनाये रखने में मदद मिलेगी। उस समय अनेक लोगों ने इस बात की अपेक्षा की पर योग साधना में दक्ष लोगों ने स्पष्टतः कहा था कि उनकी शिक्षा पूरी तरह से योग विधा का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
           बाबा रामदेव ने पतंजलि के आष्टांग योग की चर्चा अनेक बार की पर वह प्राणायाम तथा योगासनों के अलावा बाकी छह भागों में अपनी विशिष्टता प्रमाणित नहीं कर पाये थे। मुख्य बात यह कि ध्यान की शक्ति का महत्व वह सिद्ध नहीं कर पाये जो कि सबसे अधिक आवश्यक था। अगर वह आगे योगशिक्षा जारी रखते हैं तो उनको ध्यान और धारणा का महत्व भी बताना चाहिए।
            अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान उन्होंने राजनीतिक विषयों में अपनी अपरिपक्वता का ही प्रमाण उन्होंने दिया। उनके कुछ बयान तो चौंकाने वाले थे जो कि यह बात साफ करते थे कि अभी उनको अपने ही शब्दों का प्रभाव नहीं मालुम। अपने समकक्ष ही खड़े अन्ना हजारे के आंदोलन के ऐसे मुद्दों पर अपनी असहमति दी जिनकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उनका यह बयान उनके प्रशंसकों चौंकाने वाला लगा था। किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश में चर्चा होती है तो तमाम तरह के पहलू देखकर ही कोई निष्कर्ष निकलता है। ऐसे में अपने बयान सोच समझकर देना चाहिए।
उस समय कुछ लोगों को लगा कि वह अपना गुप्त लक्ष्य लेकर ही वह सत्याग्रह चला रहे हैं। एक मजे की बात यह है कि दिल्ली आने तक यह पता नहीं था कि वह धरना देंगे कि सत्याग्रह करेंगे या आमरण अनशन। वह तीनों का मतलब भी नही जानत लग रहे थे। अनशन तो उनको करना ही नहीं था क्योंकि वह अन्न ग्रहण ही नहीं करते तब उसे छोड़ना कैसा?
                वह शायद श्री अन्ना हजारे का अनशन देखकर वह प्रभावित हुए थे। जब नौ दिन के अनशन से बाबा रामदेव का शरीर अस्थिर हो गया तो उनके सहयोगी एक नेता ने कहा कि उनको तो नीबू पानी पीकर अनशन करना था। कुछ लोग उनको अन्ना हजारे की अपेक्षा दैहिक रूप से कमजोर बता रहे हैं जो कि सोलह दिन तक अनशन कर चुके हैं। चिकित्सकों ने यह बात मानी थी कि उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये उन पर अनशन का बुरा प्रभाव जल्दी पड़ा। दरअसल यह बाबा रामदेव के ही अपरिपक्व होने के साथ ही पतंजलि योग से पूरी तरह अनभिज्ञ होने का प्रमाण है। अन्ना हजारे अन्न खाते हैं इसलिये उनके शरीर में इतनी चर्बी मौजूद रहती है जो अनशन के समय उनकी सहायक बनती है। बाबा रामदेव अन्न नहीं खाते इसलिये उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये भूखे रहना अपने शरीर से खिलवाड़ करने जैसा ही है।
          श्रीमद्भागत गीता में कहा गया है कि न कम खाने वाले का न ज्यादा खाने वाले का, न कम सोने वाले का न अधिक सोने वाले का और न ही असंयमी का कभी योग सिद्ध नहीं होता। ऐसे में अन्न का त्याग कर चुके बाबा रामदेव को सतर्क रहना चाहिए था। स्थिति यह हो गयी कि दूसरों को स्वस्थ रहने के लिये योग शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के वही डाक्टर परामर्श दे रहे थे जिनके बारे में बाबा रामदेव का दावा था कि वह उनके पास कभी नहीं जायेंगे। आधुनिक राजनीतिक क्षेत्र में जय पराजय का महत्व नहीं होता पर योग में यह पराजय बाबा रामदेव के लिये एक चुनौती है। इसे वह योग साधना से ही विजय में बदल सकते हैं। पिछले अनेक दिनों से वह योग शिविरों में नहीं दिख रहे पर इसका मतलब यह नहीं है कि योग शिक्षा का काम कहीं नहीं चल रहा है यह अलग बात है कि उसे प्रचार न मिलता है न जरूरत है।
               इस देश में एक नहीं सैंकड़ों योग शिक्षक हैं। भारतीय योग संस्थान इसके लिये मुफ्त में अनेक शिविर लगाता है। उसके अनेक शिक्षक योग विज्ञान में इतना प्रमाणिक रूप से पारंगत हैं कि अनेक लोग उनका लोहा मानते हैं। समस्या यह है कि योग साधना में सक्रियता यानि एक्शन नहीं है। एक्शन वाले आसन व्यायाम होते हैं। इसके अलावा प्राणायाम, ध्यान, धारणा और समाधि में तो व्यक्ति एकदम निष्क्रिय रहता इसलिये प्रभावी नहीं लगता। जबकि बाबा रामदेव सतत सक्रिय रहते हैं। उनके कई आसान सामान्य व्यायाम की तरह हैं इसलिये ही शायद आलोचना अधिक हो रही है पर सच यह है कि उनके पास आने वाली भीड़ आती भी इसलिये है। बहरहाल आगे वह क्या करेंगे यह देखने वाली बात होगी। अलबत्ता उन्होने अपने आलोचकों को अपने भड़ास निकालने का अवसर दे दिया है। हालांकि इस बात की भी संभावना है कि उन जैसा योगी अधिक समय तक चुप नहीं बैठ सकता।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

May 25, 2011

बढ़ती महंगाई में इश्क सस्ता-हिन्दी व्यंग्य कविता (badhti mahagai mein ishq sasta-hindi vyangya kavita)

इश्क अब आशिकों के जज़्बात से
नहीं गाड़ियों से नसीब में आता है,
इसलिये ही कई बार माशुका तो
कई बार आशिक का भी मॉडल बदल जाता है।

माशुका की सूरत की असलियत चाहे कुछ भी हो
परिधान और श्रृंगार पर आशिक मिट जाता है
इसलिये ही
कई बार माशुका खुद
तो कई बार उसका आशिक का चेहरा भी
फैशन की तरह बदल जाता है।

केवल पैसे और चेहरे से ही
नहीं आती मोहब्बत दिल में
पेट्रोल का गाड़ियों में बहना भी जरूरी है
फिर बहारों से इश्क की केाई नहीं दूरी है
जिसमें घासलेट की मिलावट तो होगी
पर उसका फर्क कहां नज़र आता है
आग हो रहे आशिक
धुंआ हो रही माशुकाऐं
बढ़ती महंगाई में इश्क हो रहा है सस्ता
आंख की चमक भले ही दिखे
पर उसका दिल से कोई नहीं नाता है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Apr 14, 2011

दैहिक जल विसर्जन-हिन्दी व्यंग्य चिंतन (daihik jal visarjan-hindi vyangya chittan)

               गोलगप्पे वाले का स्टिंग आपरेशन कर उस छात्रा ने कमाल ही कर दिया। गोलगप्पे या पानी पुड़ी ठेले पर बेचने वाला वह शख्स अपना मुंह दिखाने लायक नहीं रहा होगा। हुआ यह कि वह लोगों की नज़रे बचाकर उस लोटे में पेशाब कर रहा था जिससे उसके ग्राहक पानी पीते है। दूरदृश्यों में उसका मूत्र विसर्जन का प्रसारण देखकर कोई भी शरमा जाये। अगर किसी भावुक चिंतक ने वह दृश्य देखा होगा तो यकीनन अब राह चलते हुए पेशाब करने के बारे में सोचेगा। उस ठेले वाले ने नीचे बैठकर लोटे में पेशाब किया और थोड़ा दूर चलकर उसे इस तरह फैंका जैसे अपने ठेले से अनुपयोगी जल फैंक रहा हो। कोई कह भी नहीं सकता। अगर वह उतनी दूर जाकर पेशाब करता तो संभव है कि कोई टोक देता। बहरहाल उसने वह लोटा जस का तस उठाकर ठेले पर बिना धोये रख दिया।
             छात्रा और उसके सहयोगियों ने वह दृश्य कैमरे में बंद किया और पहरेदारों को दिखाया। उसे पकड़ा गया और 12 सौ रुपये का जुर्माना देकर वह छूटा। किस्सा छोटा लगता है पर हमें ऐसा लगा कि जैसे उस पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पेशाब पर लिखना कोई अच्छा नहीं लगता मगर देह में उसका अस्तित्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
         स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि पेशाब कभी रोकना नहीं चाहिए। दूसरी तरफ राय देते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए पानी अधिक पीना चाहिये, ऐसे में पेशाब भी तो अधिक आयेगा! न आये तो इसका कोई उपाय नहीं है। प्रकृति ने समस्त प्राणियों की देह इस तरह बनाई है कि उपभोग के द्वार से आगमित वस्तु अंततः निष्कासन द्वारा पर निर्गमन के लिये चली आती है। न आये तो विकट बीमारियां उत्पन्न होती है। वैसे तो इस घटना का प्रसारण देखकर बाज़ार में खाने पीने का सामान बेचने वालों के कामकाज पर ही टिप्पणियां की जा रही थीं पर हमें उस ठेले वाले पर गुस्से के साथ तरस भी आ रहा था। वह फंसा इसलिये कि वह अक्सर ऐसा करता रहा है। छात्रा ने कई दिन उसका कारनामा देखने के बाद ही उसे कैमरे कैद किया। एक बात तय रही कि वह ठेले वाला कोई अच्छी भावना वाला आदमी नहीं रहा होगा। सच बात तो यह है कि खाने का सामान बेचने वाले अनेक लोग ऐसे हैं जो साफ सफाई की बात सोचते तक नहीं है। यही कारण है कि गरीबी और भुखमरी के लिये बदनाम हमारे देश में आज भी भूख से कम गलत सलत खाकर मरने वालों की संख्या अधिक है। ग्राहक को भगवान माना जाता है पर उस ठेले यह साबित किया कि वह तो कमाई को सर्वोपरि मानता है।
          बहरहाल इस घटना से हमारा ध्यान पेशाबघरों की कम होती समस्या की तरफ जा रहा है। देश के शहरों में बढ़ती आबादी के चलते सड़कें सिकुड़ रही हैं। कई पेशाबघर लापता हो गये हैं। कहीं उनके आसपास चाय, पान, तथा चाट ठेलों ने कब्जा किया है तो कहीं बड़े दुकानदार काबिज हो गये हैं। इसके विपरीत भीड़ बढ़ रही है। बाज़ार में खानपान करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे में पेशाब आने पर सबसे बड़ा संकट यह होता है कि उसके लिये स्थान ढूंढें। वैसे हमारे देश में धार्मिक लोग प्याऊ बनवाते रहे हैं पर पेशाबघर बनाने का जिम्मा राज्य पर ही रखा गया है। वैसे प्राचीन समय में पेशाबघर बनवाने की आवश्यकता नहंीं अनुभव होती थी क्योकि इसके लिये तो पूरी जमीन खाली थी पर समय के अनुसार सभ्यता बदली है। गनीमत है कि अनेक स्थानों पर पिशाबघर न दिखने पर भी गंदगी के ऐसे ढेर मिल जाते हैं जहां खड़े होकर अपने को तनाव मुक्त किया जा सकता है। जिस तरह विकास बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि आगे चलकर पेशाब घर कंपनियों को इसका भी ठेका मिलने लगेगा। कई वाहन मोबाईल जलीय विसर्जन-पेशाब के लिये अच्छा साहित्यक शब्द ढूंढना जरूरी है-का काम करेंगे। कहीं कहीं तो एक के साथ एक फ्री जैसे भी नारे लिखे मिलेंगे।
             वैसे तो अनेक शहरों में सुलभ शौचालय हैं पर वहां पेशाब की सुविधा हो यह जरूरी नहीं है। दूसरी बात यह भी कि अंततः वहां कार्यरत कर्मचारी मालिकाना हक की तरह उसका इस्तेमाल करते हुए पैसे मांगते हैं। कुछ लोगों ने तो यह शिकायत भी की है कि वहां पुरुषों के पिशाब घर खुले होने के कारण उनसे पैसे नहीं मांगे जाते पर महिलाओं से पैसा मांगा जाता है। महिला कल्याण समर्थक इस तरफ भ ध्यान दें।
वैसे ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली महिलायें फिर भी परेशान नहीं दिखती पर शहरी क्षेत्र की महिलाऐं बाज़ार में घुमते समय तनाव होने पर दोहरे संकट में आ जाती हैं। एक तो उनको बाज़ार में उनको अपना काम पूरा करना है दूसरा दैहिक तनाव उनके लिये भारी संकट हो जाता है। अपने साथ पुरुष होने पर अपनी बात कह सकती हैं पर दूसरे से तो वह इसमें बात करते हुए संकोच करती हैं।
            एक सभ्य महिला ने एक बार जरूर हमसे कहा था कि ‘महिलाओं के लिये सुविधा बढ़ाने के तो दावे हैं उन पर यकीन कौन करेगा? बाज़ार में भीड़ महिलाओं की संख्या पहले से ज्यादा है पर पिशाबघर पुरुषों के लिए ही अधिक है।’
         बात सही है पर यहां तो अब पुरुषों के पिशाबघर लुप्त होते जा रहे हैं। चिकित्सक कहते हैं कि रुका पिशाब विष हो जाता है। इसके अलावा यह भी कहते हैं कि मधुमेह से ग्रसित लोगों को तत्काल पिशाब करना चाहिए। ऐसे ढेर सारे उपाय वह बताते हैं। देश में कार वालों की संख्या बढ़ती जा रही है उनका बाज़ार में आना जाना मॉलों, बड़े होटलों या ऐसे स्थानों पर होता है जहां पेशाबघर बने रहते हैं मगर समस्या है मध्यम वर्गीय या आधुनिक परिवेश वाले गरीब लोगों के लिये है। कई बार तो ऐसा है कि कुछ लोग बाज़ार से घर इसलिये ही जल्दी घर लौट आते हैं क्योंकि वह देह में पल रहे जलीय तनाव से मुक्ति का स्थान नहीं ढूंढ पाते। बाज़ार में सामान बेचने वालों की यही समस्या होती है कि उनके आसपास पेशाब घर नहीं होते।
           ऐसे में लगता है कि विकास दर वह दीवार है जो आदमी के जलीय तनाव के विसर्जन को रोकने का काम कर रही है। ऊंची और शानदार इमारतें आंखों को भले ही अच्छी लगें पर निष्कासन अंगों का तनाव उसका सुख कम किये दे रहा हैं। हमारे देश में जब कहीं दो लोग आपस में लड़ते हैं तो पिशाब को धमकी के रूप में उपयोग करते हैं। एक तो कहते हैं कि ‘ऐसी हालत करूंगा कि पेशाब बंद हो जायेगी।’ या कहेंगे कि ‘ऐसी हालत करूंगा कि पेशाब निकल आयेगी।’
           मगर हमारे देश में विकास ऐसा हो रहा है कि वह लोगों की पेशाब बंद भी कर सकता है। आमतौर से राह में पेशाब आने पर लोग ऐसे स्थान ढंूढते हैं जो एकांत में और गंदे हों। एकांत में होने के साथ चमकदार भी हों तो कोई जलीय तनाव विसर्जन का साहस नहीं कर सकता। आधुनिक विकास वही चमकदार दीवार है जिस पर कोई वक्र दृष्टि नहीं डाल सकता ऐसे में तनाव तो बढ़ना ही है।
चलते चलते 
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           यह कहना मुश्किल है कि वह पानीपुरी बेचने वाला अपने ठेले पर रखे लोटे में पेशाब करते हुए कैमरे में कैद किस प्रकृति का है पर इस लेखक ने देखा है कि कुछ लोगों की बचपन से ही ऐसी प्रकृति होती है कि वह दूसरे को दुःख देकर या हानि पहुंचाकर खुश होने के आदी हो चुके होते हैं। ऐसे लोग जिंदगी में कुछ नहंी बन पाते। इस लेखक के साथ एक लड़का जूतों की दुकान पर नौकरी करता था। उसका वेतन लेखक के बराबर ही था पर  वह लड़का खराब नीयत का था। अकारण प्लास्टिक के जूते फाड़ता, आर्डर का माल पैक करते समय जिस साइज के जूते कागज पर लिखे होते उससे अलग साईज के भरता। बंडल तीन साइज का होता था पर वह अफरातफरी कर एक ही साईज के बना देता जिससे बाद में दुकानदार परेशान होते। अनावश्यक रूप से दूसरे नौकरों से भी वह लड़ता है। 
       आखिर उसका बाद में क्या हुआ? वह अब सब्जी मंडी में ठेला लेकर सब्जी ढोने का काम करता है। उसके साथ काम कर चुके चार लड़के उसी मंडी में दो कार में दो एक स्कूटर पर सब्जी खरीदने आते हैं। कार वाले तो उसको देखते तक नहीं है पर यह लेखक अनेक बार उसे देखता है पर बात नहीं करता। वह जिंदगी में नहीं बना इसके लिये अन्य कोई नहीं वह स्वयं जिम्मेदार है। यह नीच प्रकृति मनुष्य के विकास का मार्ग अवरूद्ध कर देती है-उस लड़के को देखकर हमारा तो यही मत बनता है।
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कवि, लेखक , संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet,editor,writer and auther-Deepak 'Bharatdee',Gwalior
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Mar 25, 2011

दिल में अमेरिका-व्यंग्य चिंत्तन (america in heart-hindi satire thought)

विश्व का तीसरे नंबर का अमीर और अमेरिका का नागरिक अगर भारत में आकर यहां के धनपतियों को दानवीर होने का संदेश देता है तो यह बात भारत के अध्यात्मिक दर्शन का जिसके पास थोड़ा बहुत भी ज्ञान है उसके लिये मायने अधिक नहीं रखती मगर जिनके जीवन का आधार ही केवल अंग्रेजी भाषा, संस्कृति और विचार हैं और जो मानते हैं कि भारत विदेशियों के आने से पहले असभ्य नागरिकों का निवास था। इतना ही नहीं ऐसे लोग तो अपने पूर्वजों की आलोचना करने से नहीं झिझकते बल्कि अवसर मिले तो अपने जीते जागते बुजुर्गों को भी पुराने फैशन का मानने लगते हैं। उनके हृदय का स्वामी अमेरिका है तो दिमाग में वहां के नागरिकों की छवि विश्व के सबसे सभ्य लोगों की है। अमेरिकी विश्वसनीय, सभ्य और साथ निभाने वाले हैं। भारत में जिसके पास अमेरिका से कोई उपाधि नहीं है और न ही अंग्रेजी आती है वह अप्रतिभाशाली है। मूल बात यह है कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने देश के लोगों की बुद्धि हर ली है तो डालर, पौंड और मुद्रा पाने के मोह ने इतना डरपोक बना दिया है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को शिक्षा पद्धति में शामिल करना ही उनको सांप्रदायिकता की संगत करना लगता है। समाज, प्रचार, शिक्षा, पत्रकारिता, फिल्म और साहित्य के शिखरों पर स्थापित प्रतिष्ठित लोग अज्ञान के अंधेरे में इस कदर गुम हैं कि एक अमीर अमेरिकी नागरिक उनको जब दानवीर होने का उपदेश देता है तो उसकी प्रचार माध्यमों में ऐसे चर्चा होती है जैसे कोई नवीनतम विचार सामने आया हो।
कभी कभी भारत में कुछ लोग कहते हैं कि ‘अंग्रेज चले गये पर औलाद छोड़ गये।’ सच बात तो यह है कि यह उन अंग्रेजों के लिये नहीं कही जाती जो अपने शासकों के जाने के बाद भी यहां से नहीं गये। वह यहीं भारत में रह गये और अब उनके बच्चे यहीं के बाशिंदे हैं। यह वाक्य केवल उन लोगों के लिये कहा जाता है जो अंग्रेजी भाषा और संस्कृति और सभ्यता में रचबसकर यहीं रहते हुए अंग्रेजों की तरह सभ्य दिखना चाहते हैं। खाते हिन्दी का और बजाते अंग्रेजी का हैं। आजादी के शुरुआती दौर में शायद ही किसी ने इस बात की कल्पना की होगी कि किस तरह अंग्रेेजी भाषा और संस्कृति कैसे देश के समाज को खत्म कर रही है पर यह सामने आने लगा है। अब तो ऐसा लगता है कि शुद्ध हिन्दी बोली बोलने या लिखने वालों की संख्या भी बहुत कम रह गयी है। अखबार और पत्रिकओं में देवनागरी भाषा में अंग्रेजी शब्द लिखे मिलते हैं तो ऐसे लोग भी है जो कहते हैं कि रोमनलिपि में हिंदी को लिखा जाना चाहिए।
अमेरिकी अमीर का भारतीय अमीरों को दानवीर होने का संदेश देना इस बात का प्रमाण है कि उसे भारतीय अमीरों के स्वार्थी होने का आभास है। वह मानता है कि यहां के अमीर केवल जनता का शोषण करना ही व्यापार समझते हैं। दरअसल हमारे अध्यात्मिक दर्शन में धनियों को समाज का जिम्मा लेने के लिये कहा जाता है। उनको गरीबों पर दया तथा जरूरतमंदों पर दान करने के लिये कहा जाता है। श्रीमद्भागवत गीता में निष्प्रयोजन दया करने की बात कही है। अन्य धर्मग्रंथों में यह यह दान भी सुपात्र को देने के लिये कहा गया है। अगर हम देखें तो हमारे यहां दान पुण्य के कार्यक्रंम भी बहुत होते हैं। इसके बावजूद देश की गरीबी मिटती नहीं, शोषण है कि बढ़ता ही जा रहा है और टूट रही सामाजिक व्यवस्था विकास के छद्म चेहरे लगाकर सुंदर दिखने की कोशिश कर रही है।
भारत से बाहर भी अनेक संत लोग धर्म प्रचार के लिये जाते हैं कई लोगों ने तो अपने आश्रम भी अमेरिका और ब्रिटेन में बना लिये ताकि देश के लोग उनके विदेशी प्रभाव के कारण सम्मािनत करते रहे पर लगता नहीं कि वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का परचम अमेरिका में फहरा पाये। अगर ऐसा करते तो एक अमेरिकन आकर ऐसी बात नहीं कहता। भारत में राष्ट्रीय स्तर के अमीरों की स्थिति यह है कि वह फिल्म, क्रिकेट और धर्म प्रचार के प्रसंगों में समाज सेवा के लिये रूप में अपना छवि बनाने के लिये टीवी के पर्दे पर अपना चेहरा दिखाते रहते हैं। उनको समाचार पत्रों में अपने प्रभाव की चर्चा बहुत अच्छी लगती है। प्रादेशिक और स्थानीय स्तर के अमीर कुछ स्वास्थ्य शिविर तथा तो कुछ भगवतकथा कराकर अपनी छवि लगाते हैं। वह स्वयं खर्च करते हैं कि चंदे की जुगाड़ करते हैं यह पता नहीं पर इतना तय है कि उनके प्रयोजन निरुद्देश्य नहीं होते। मतलब धर्म का काम होता है वह भी दिखाने के लिये।
समाज की स्थिति यह है कि यहां भगवान श्रीराम और कृष्ण को मानने वाले बहुत हैं पर उनके ज्ञान की समझ कितनों में है यह अलग से विचार का विषय है। इतना तय है कि अगर किसी भक्त की तपस्या से प्रभावित होकर भगवान राम या श्रीकृष्ण यहां साक्षात प्रकट भी हों तो वह उनसे कहेगा कि ‘भगवान, यहां तपस्या जरूर कर रहा हूं पर मेरा दिल अमेरिका में बसता है। अगर आप सच्चे हैं तो मुझे पहले अमेरिका पठाईये फिर आकर वहां दर्शन दीजिये तब तो आपका मानूंगा।’
कभी कभी तो लगता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अगर अमेरिका में लीला की होती तो शायद उनको मानने वाले भारत में ज्यादा ही होते। कम से कम ऐसा न होता तो महाभारत का युद्ध ही अमेरिका में हुआ होता तो श्रीमद्भागवत गीता का तत्व ज्ञान वहीं प्रस्तुत किया जाता। यकीन मानिए तब उसकी चर्चा भारत में घर घर में होती। यह मजाक की बातें हैं पर सच यही है कि भारतीय समाज श्रीमद्भागवत् गीता से भागता है और इस पर उसे शर्मं भी नहीं आती। कम से कम धनपतियों में तो आत्म सम्मान जैसी कोई चीज नहीं है। उनमें यह भाव संभव नहीं है आत्मविश्वास केवल अपना दायित्व निर्वाह करने वालों में ही आता है और भारतीय धनपतियों ने समाज के प्रति अपने दायित्व से मुंह मोड़ लिया है और यही वजह है कि एक अमेरिकन अमीर उनको दानवीर होने का उपदेश दे रहा है। हमें उस अमेरिकन अमीर की सद्भावना देखकर प्रसन्नता होती है पर शर्म नहीं आती क्योकि हम अमीर नहीं है और जो यहां अमीर है उनके दिल में तो अमेरिका बसता है। संभव उस अमेरिका देवता का संदेश यहां के अमीर सुन लें और दया और दान का मार्ग चुने। हालांकि यह दूर की कौड़ी वाली बात लगती है।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Jan 24, 2011

सुबह इंसान को क्या करना चाहिए-हिन्दी रचना (subah aur insaan-hindi rachna)

प्रातः आठ बजे का समय था। हम सुबह घर से बाहर चाय पीकर निकले। पार्क में घूमने जाना था। चाय पीकर बाहर घूमने का यह रोज का हमारा नियम वैसे पुराना है, पर ब्लाग पर लिखने की वजह इसमें व्यवधान आ गया था। जब पहले बिजली कटौती नहीं थी तब यह समय ब्लाग लिखने में लगाते जिससे लिखना बंद हो गया। हालांकि सुबह केवल भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषय पर ही हम लिखते थे पर अब सुबह कभी चार तो कभी तीन बजे से सुबह दस बजे तक बिजली कटौती ने हमारी इस अध्यात्मिक साधना को करीब करीब समाप्त कर दिया है। मगर इससे एक लाभ यह हुआ है कि प्रातःकाल घूमना हमारी दिनचर्या में शामिल हो गया है। जब सुबह घूमने जाते हैं तो राह चलते हुए अनेक दृश्य और लोगों की बातें हमारी आंखों और कानों पर प्रभाव डालती पड़ती हैं जो अब अलग से एक नयी अनुभूति देती थी है। शायद यह अध्यात्मिक साधना का परिणाम भी हो सकता है।
बहरहाल प्रातःकाल घूमने में स्वर्ग जैसा आनंद है। कहना चाहिए कि स्वर्ग में अगर इंसान जाये और दोपहर तक सोता रहे तो उसे वहां भी धरती पर भोगे गये नरक की अनुभूति होगी, यह हमारा दावा है। स्वर्ग एक कल्पना है पर सुबह का भ्रमण अगर नियमित कर उसकी अनुभूति को अपने मन में उतारा जाये तो यकीनन स्वर्ग की कल्पना मिथ्या साबित होगी। शायद अनेक महापुरुष इसलिये यही कहते हैं कि स्वर्ग और नरक इसी धरती पर हैं। यकीनन वह महापुरुष सुबह उठकर ज्ञान तथा ध्यान में संलग्न रहने वाले थे तभी उन्होंने इस सत्य की अनुभूति की। उन्होंने यह सिखाया कि अपने कर्म, आचरण, व्यवहार, तथा दिनचर्या में से यहीं इसी धरती पर स्वर्ग को भोगा जा सकता है।
उस दिन एक सज्जन ने हमसे कहा-‘आप देर से घूमने क्यों निकलते हैं? घूमना तो एकदम सूर्य निकलने से पहले होना चाहिए। यह क्या कि आठ बजे घूमने निकले हैं। इस समय तो चाय और नाश्ते करने का समय है।’
हमने कहा-‘हां, मैं चाय पीकर तफरी करने निकला हूं।’
वह बोले-‘इससे क्या लाभ? सुबह घूमिये तो जरा स्वास्थ लाभ होगा।’
हमने कहा-‘हां, कोशिश करूंगा कि सुबह निकलें, मुश्किल यह है कि हमारा सुबह का एक से डेढ़ घंटा योग साधना, स्नान, पूजा तथा चाय पीने में लग जाता है। योग साधना का समय लंबा हो जाये तो दो घंटे भी ऐसे ही निकल जाते हैं। आपकी राय पर विचार करेंगे और कुछ समय पहले ही उठा करेंगे।’
वह सज्जन हमारी तरफ आंखें फाड़कर देखने लगे और बोले-‘आप वाकई योग साधना करते हैं, मगर आप का पेट बहुत बाहर निकला है। यह देखकर नहीं लगता।’
हमने कहा-‘इसलिये ही सुबह घूमने निकलते हैं ताकि पेट कम हो।’
वह बोले-‘योग साधना वालों के पेट तो अंदर होते हैं। आपने बाबा रामदेव को देखा होगा कितने पतले और सुंदर लगते हैं। आपका पेट तो बहुत बाहर है।’
हमने कहा-‘दरअसल हम खान पान में थोड़े लापरवाह हैं। यह उसी का नतीजा है।’
वह बोले-‘फिर योग साधना करने से क्या फायदा? उसमें तो संयम रखना चाहिए।’
हमने कहा-‘हां, अब रखेंगे।
यह कहकर आगे चल दिये तो पीछे से फिर उन्होंने आवाज दी और कहा-‘मगर आप मोटे नहीं लगते। आपके शरीर का बाकी हिस्सा फिट लगता है। वैसे आप कौनसे आसन करते हैं।’
हमन कहा कि ‘बहुत सारे! पद्मासन, सर्वांगासन तथा सूर्यनमस्कार तथा बहुत सारे आसनों में साथ प्राणायाम भी करते हैं।’
वह बोले-‘आप हमें कोई ऐसा आसन बताईये जिससे हमारी कमर का दर्द चला जाये। कमबख्त, बहुत परेशान हैं।’
हमने कहा-‘उष्टासन करिये।’
वह बोले-‘यह कैसे होता है?’
हमने कहा-‘यह सड़क पर करके कैसे बता सकता हूं।’
वह बोले-‘आपका पद्मासन लगता होगा, इस पर यकीन नहीं होता।’
हमने कहा-‘चलिये, पार्क में करके दिखा देते हैं। पर हां उष्टासन नहीं करके बतायेंगे क्योकि हमारे पास अब चद्दर और दरी नहीं है।’
वह बोले-‘फिर कभी देखेंगे। कल मैं पार्क में आऊंगा तब आप पद्मासन लगाकर बताईयेगा।’
हमने कहा-‘बात तो हमने आज और अभी की कही है। कल की कल देखेंगे।
वह सज्जन चले गये।
उनके जाने के बाद हमें इस बात पर पछतावा हुआ कि किसलिये अपने कीमती दस मिनट उनसे वार्तालाप में बरबाद किये। इससे तो हां जी, हां जी, करते हुए निकल जाना चाहिए था। सारा दिन तो लोगों से बात करते और सुनते हुए बीतता है। मौन रहकर घूमने का आनंद तो प्रातःकाल घूमने में ही हैं।
उस दिन रास्ते पर पड़ने वाले एक मकान के पास से गुजर रहे थे तो एक सज्जन अखबार पढ़ते दिखेे। हमें देखकर बोले-‘नमस्कार, श्रीमान, इधर कैसे निकले हैं।’
हमने कहा-‘‘ जरा तफरी करने निकले हैं।’’
वह बोले-‘हां, अब तो हवा ही रह गयी है खाने को! हर चीज महंगी होती जा रही है। अनाज, सब्जी, दूध और और बिजली भी महंगी हो रही है। देखिए अखबार में क्या दर्दनाक खबरें लिखी हैं। आपने तो अखबार पढ़ा होगा?’
हमने कहा-‘अखबार तो अब जाकर पढ़ेंगे। सुबह क्या दर्दनाक विषयों में अपना कोमल हृदय फंसायें, वह तो सारा दिन ही झेलनेे हैं।’
वह बोले-‘अखबार पढ़ने का मजा तो सुबह ही है।’
हमने कहा-‘आप भी कमाल करते हैं। भला, दर्दनाक खबरों में मजा आता है? यह सब चीजें महंगी हो रही हैं उनको रोकना अपने बस में नहीं है, फिर उनसे उपजा संकट झेलना ही है तब क्यों सुबह का यह कीमती समय इन पर नष्ट करें।’
वह बोले-‘ऐसी बात नहीं है। नई जानकारी भी मिलती है। देखिए, आज मंत्रिमंडल में विस्तार होना है। इधर विश्व कप के लिये क्रिकेट टीम भी घोषित हो गयी है। यह तो रुचिकर विषय हैं।’
हमने कहा-‘हां, यह सही है। कल से सुबह ही अखबार पढ़ा करेंगे।’
हम थोड़ा आगे ही गये होंगे कि बच्चों को ले जानी वाली एक बस हमारे पास से तीव्र गति से धूल उड़ाती हुई निकली जिससे हमारे कानों, आंखों तथा नाक पर बुरा प्रभाव पड़ा। जितनी देर उन सज्जन से हम बात कर रहे थे उतने में हम उस सड़क से पार्क में पहुंच गये होते। मतलब उस वार्तालाप की वजह से धूल ने हम पर प्रहार किया। ऐसे में रुमाल से हमने मुंह ढंका, फिर पौंछा। किसी तरह पार्क में पहुंच गये। मन में पछतावा हो रहा कि बेकार की बातों में क्यों अपना वक्त लगाया।
पार्क में खिले फूलों को देखकर यह लगा कि किस तरह यह इस आशा में खड़े हैं कि लोग उनको देखें। लोग फूलों की पैंटिंग से घर में सजाते हैं। नकली फूलों से गुलदस्ते भी भरते हैं। असली फूल के पास खड़े होकर उसे निहारने का जो आनंद है कितनों के नसीब में होता है। यह जरूरी नहीं है कि फूलों के पास से जो निकले वह उसकी उपस्थिति के आनंद को अनुभव करे, क्योंकि आनंद लेना भी एक कला है जिसके लिये मौन होना जरूरी है। उससे ज्यादा अपने को हमेशा ही अभिव्यक्त होने के भाव से भी मुक्त होना पड़ता है। यह मैं करूं, वह देखूं, वह सुनूं, या मैं किसी से कुछ कहूं-आशय यह है कि अपनी दैहिक सक्रियता का मोह छोड़कर अपना ध्यान अंतर्मन में लगाना पड़ता है। आप सोचते रहिये कि ‘यह करें, वह करें’, मगर यह भी सोचें कि दूसरा उसको कितना भाव देता है। मतलब आपका सुनाना बेकार है क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि सामने वाला आपके विषय को रुचि के साथ सुन रहा है। जैसे कि हमने सुना पर तत्काल उस विषय से निवृत हो गये थे कि ‘सुबह इंसान को क्या करना चाहिए।
कई बार लोगों को यह अनुभव होता है कि हम उनकी बात सुन रहें तो यह भ्रम है और हम सुनकर याद रखेंगे यह तो महाभ्रम है। तय बात है यह बात हमारे कहने पर भी लागू होती है क्योंकि सामने वाले की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Dec 16, 2010

फ्लेट सोसायटी भारत का पूरा समाज नहीं है-हिन्दी लेख (flat society in not indian society-hindi article)

क्या हमारे यहां फ्लैट सोसायटी ही संपूर्ण समाज बन गयी है? सीधा जवाब है नहीं! मगर टीवी चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा व्यवसायिक प्रकाशनों के कार्यक्रमों या सृजन के स्वरूप से तो ऐसा ही लगता है। स्थिति यह है कि सब टीवी चैनल पर प्रसारित होने वाले मुख्य समय के दौरान हास्य व्यंग्य कार्यक्रमों में लगातार तीन चार कार्यक्रम फ्लैट सोसायटी के सचिवों या रहवासियों के कथानकों पर आधारित होते हैं। उसकी क्या कहें अन्य चैनलों पर भी सामाजिक तथा जासूसी धारावाहिकों में भी इस फ्लेट सोसायटी की पृष्ठभूमि को ही चुनकर कहानियां लिखवाई जा रही हैं।
पता नहीं बड़े शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी समाज को लेकर क्या सोचते हैं? यह भी पता नहीं कि छोटे शहरों में विचर रहे बड़े बुद्धिजीवी अपने यहां की जीवन शैली पर क्या दृष्टिकोण रखते हैं? हमारे दिमाग में यह प्रश्न देश के समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों पर जहां लेखक की रचनाओं के आधार दिखने वाले प्रकाशन तथा कार्यक्रमों का सृजन होता है उनकी विषय सामग्री को लेकर उठता ही है। चाहे हो या नहीं पर यह सच है कि जहां मौलिक रचना है वहां साहित्य की उपस्थिति का आभास होता है। अब हम उसकी उच्च या निम्न कोटि तथा उसमें समाहित सामग्री में समाज के क्षेत्र को लेकर सवाल उठा सकते हैं पर उसे साहित्य मानने से इंकार नहंी कर सकते। ऐसे में जब हम यह मानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है तब टीवी समाचार चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं एवं व्यवसायिक प्रकाशनों की सृजन सामग्री को देखकर तो यह लगता है कि यह दर्पण झूठ भी बोल सकता है।
संक्षिप्त में हम भारत की स्थिति का अवलोकन करें। वैसे तो आर्थिक रूप से हमारे यहां तीन श्रेणियां हैं, उच्च, मध्यम तथा निम्न वर्ग! इसमें भी मध्यम वर्ग में भी अब इस तरह की तीन श्रेणियां बन गयीं हैं। निम्न वर्ग में भी दो श्रेणियां हैं, गरीब और गरीबी की रेखा से नीचे। उच्च वर्ग की श्रेणी पर कोई विवाद नहीं है क्योंकि उसके मायने भी ऊंचे हैं और कम से कम हम जैसा आदमी उसकी व्याख्या करने की औकात नहीं रखता। हमारे हिसाब से तो जिसका पांव ही पूरे दिन जमीन पर न पड़ता हो, कार से चलते हुए उसे केवल स्वर्णिम मय दृश्य ही दिखाई देते हों और जो गरीब के लिये सोचने के साथ ही गरीबी से लड़ने का केवल दंभ भरता हो वही ऊंचा है। तय बात है कि ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है। टीवी चैनलों पर बहुत दिन तक इसी उच्च वर्ग की पृष्ठभूमि पर सास बहु की कहानियों वाले धारावाहिक चले और अब भी चल रहे हैं। अगर विदेशों के लोग इसे देखते होंगे तो उनको तो यह लगता होगा कि भारत में इसी तरह के कारपोरेट घर होंगे। बड़े शहरों में जो बुद्धिजीवी हैं उनका समय ही लंबी दूरियों की यात्रा करने में लगता है। उसके बाद फिर उनको सम्मेलन करने होते हैं। ऐसे में वह शायद ही मध्यप्रदेश के किसी गांव की स्थिति पर विचार कर पाते होंगे, कल्पना करना तो दूर की बात है जो कहानियों, व्यंग्यों या कविताओं के लिए जरूरी होती है। छोटे शहरों के नव बुद्धिजीवी बड़े शहर में जाकर प्रसिद्ध बुद्धिजीवी बनने के चिंतन में अपने आसपास का वातावरण देखते जरूर हैं पर उसे सृजन की दृष्टि से अपनी बुद्धि में स्थान नहंी देते। वैसे छोटे और मध्यम शहरों के अब वातावरण में भी विरोधाभास है। अनेक जगह फ्लैट बने हैं तो वहीं स्वतंत्र रूप से मध्यमवर्गीय लोगों के मकान भी हैं। इन छोटे और मध्यम शहरों में आज भी ऐसे लोग हैं जो फ्लैट में रहना पसंद नहीं करते। इसके बावजूद कुछ लोग हैं जो फ्लैट में रहना चाहते हैं। यही फ्लैट वाली सोसायटी अब इस देश का हिस्सा है पर उतना नहीं जितना हमारे टीवी चैनल, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य प्रकाशनों के कार्यक्रम या सृजन में दिखाई देता है।
बहुत कम बुद्धिजीवी लोग हैं जो छोटे और मध्यम शहरों में रहने वाले मध्यम और निम्न श्रेणी के नागरिकों की मानसिकता पर विचार करते होंगे। मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी हैं पर यह भी बहस का विषय है! भारत की आर्थिक राजधानी कोई एक शहर नहीं हो सकता भले ही वहां दो करोड़ लोग रहते हों! भारत की राजधानियां तो समस्त खेत और खलिहान हैं। जहां के असली नागरिक मज़दूर तथा बेबस लोग हैं। यही लोग हम जैसे मध्यम तथा निम्न लोगों का वह सहारा हैं जिसकी कल्पना तक कोई नहीं करता। जब हम प्रचार माध्यमों पर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि दूसरे देश को देख रहे हैं। जब ज़मीन पर चलते हुए सोचते हैं तो लगता है कि हमारे देश में वह सब नहीं होता जो सृजन के नाम पर हमारे बुद्धिजीवी परोस रहे हैं। जिन्हें यह बात समझ में न आये वह पांच सौ या हजार का नोट लेकर सड़क पर चिंतन करें। वह पेट्रोल पंप, कपड़े, ज्वेलरी तथा इलेक्ट्रोनिक सामान की दुकान पर चल जायेगा पर सब्जी मंडी, पंचर की दुकान या दूध की दुकान पर वह परदेसी मुद्रा की तरह दिखने लगता है। साइकिल में एक रुपये तथा स्कूटर में दो रुपये की हवा भराते हुए बरसों हो गये। पंचर का रेट बड़ा है पर महंगाई के अनुपात में कम! कहने का मतलब है कि जिन आवश्यकताओं का संबंध प्रत्यक्ष रूप से श्रम से है उनकी पूर्ति का मोल अब भी इतना कम है कि पांच सौ या हज़ार का नोट वहां प्रभावहीन हो जाता है। उससे भी ज्यादा यह कि छोटे व्यवसायी इतना बड़ा नोट लेने में डरते हैं क्योंकि नकली होने पर उनका एक या दो दिन नहीं वरन् सप्ताह भर की कमाई का नुक्सान हो जाता है। क्या कभी किसी ने इस अंतर्द्वंद्व को देखने का प्रयास किया है?
उस दिन एक मित्र मिला। उसने पांच साल फ्लेट खरीदा था! उसके मुहूर्त पर हम भी गये। उसने हमारे मकान का हाल हवाल पूछा तो हमने जवाब दिया कि ‘यथावत है, अभी उसे पूरा बनाने का सौभाग्य नहीं मिला! सोच रहे हैं कि तुम्हारी तरह ही कहीं फ्लेट खरीद लें।’
उसने कहा-‘मेरी सलाह है कि तुम उसे ही पूरा बनवाओ! यह फ्लेट सिस्टम बेकार है, क्योंकि वह अपने स्वामित्व से पैदा होने वाला आत्मविश्वास साथ नहीं रहता।’
उस मित्र से अधिक आत्मीयता नहीं है पर उस दिन अपने पुराने मकान मालिक के पास फ्लेट में जाने का अवसर मिला। मित्र न होने के बावजूद उनसे हमारी आत्मीयता है। अब वह मकान बेचकर फ्लेट में रहने लगे हैं। यह आत्मीयता इतनी अधिक है कि हम पिछले पंद्रह वर्षो में शायद सात आठ बार मिले होंगे पर जब मुलाकत होती है तो ऐसा नहीं लगता कि यह अंतराल उसे कम नहीं कर पाया। हम उनके फ्लेट में पहुंचे तो आसपास स्वतंत्र आवास भी बने देखकर अज़ीब लगा। पांचवीं मंजिल पर खड़े होकर देखने से वह स्वतंत्र आवास भले ही अज़ीब लगे पर उन आत्मीय सज्जन से वार्तालाप में फ्लेट सोसायटी का भी आभास हुआ। सोसायटी का सचिव या अध्यक्ष अगर ठीक न हुआ तो अनेक परेशानियां होती हैं। कोई संयुक्त निर्माण कराना हो तो उस पर विवाद होता ही है। इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने फ्लेट लिये हैं पर वह किराये पर चलाते हैं और वहां अगर कोई ऐसा आदमी आ जाये जो प्रतिकूल प्रवृत्ति का हो तो पूरी सोसायटी के लिये संकट खड़ा हो जाता है। कोई मकान बेचकर जाता है तो सोसायटी वालों को यह चिंता होती है कि पता नहीं अब किस तरह का आदमी आयेगा। पूरे पांच घंटे तक वहां गुजारे पर ऐसा लगा कि फ्लेट सिस्टम कम से कम हम जैसे स्वतंत्र और स्वछंद आदमी के लिये अनुकूल नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि इस फ्लेट सिस्टम पर कोई कहानी अपने से लिखते हुए बनेगी भी नहीं, क्योंकि जहां समाज के बहुत बड़े भाग को संबोधित करते हुए लिखने की आदत हो वहां फ्लेट सोसायटी की सोच ही संकुचित मानसिकता के साथ ही चिंतन क्षमता कम होने का प्रमाण लगती है।
जब हम अपने प्रचार माध्यमों में इसी फ्लेट प्रणाली को लेकर सृजन या कार्यक्रम पर दृष्टिपात करते हैं तो लगता है कि जैसे कहीं से हम भटक कर सोच रहे हैं। ऐसे में हम जब भारतीय समाज की बात करते हैं तो लगता है कि अब उसका कोई एक स्वरूप नहीं है। बाहर से एक दिखने वाला यह समाज अंदर से इतना खोखला हो चुका है कि उसके बुद्धिजीवी भी उसे देखना या दिखाना नहीं चाहते। यह अलग बात है कि अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर ही हम उसे देख सकते हैं पर भौतिक आधार पर इसके इतने खंड हो चुके हैं कि इसके लिये बहुत सारा लिखना पड़ेगा। इस पर इतनी कहानियां बन जायेंगी कि फ्लेट सोसायटी के सचिवों पर आधारित कथानकों पर सोचने वाले उसकी कल्पना तक नहीं कर पायेंगे क्योंकि उनके लिये यह असुविधाजनक मार्ग होगा।
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