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Nov 11, 2011

रूह और दिमाग-हिन्दी शायरी

मेरे दिल में न खुशी है
न कोई गम है
अपनी हालातों से परेशान लोग
हैरान है यह देखकर
यह कभी रोता नहीं
कभी हंसता भी नहीं
बिचारे नहीं जानते
बाज़ार में बिकने वाले
जज़्बात मैंने खरीदना छोड़ दिया है,
इंसानों के फरिश्ते होने की
उम्मीद कभी नहीं करता
अपनी रूह से दिमाग का
अटूट रिश्ता जोड़ दिया है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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Jul 31, 2010

स्वतंत्रता दिवस मनाने की छूट-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (ribet for indepandent day-hindi vyangya kavitaen)

कुछ लोगों ने अपनों को
गुलाम रखने की
स्वतंत्रता पाई है,
वरना तो अपने आकाओं की
अभी भी बजा रहे हैं
बस!
केवल स्वतंत्रता दिवस
हर साल मनाने की छूट उन्होंने पाई है।
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कहते हैं कि अंग्रेज छोड़ गये
पर अपनी अंग्रेजियत छोड़ गये हैं,
यही कारण है कि
गुलामों के सरदार आज भी बंधक है
उनके ख्यालों के
पर उनके प्रजाजन भी
अंग्रेज बनने की होड़ में लग गये हैं।
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वह मुक्तिदाता कहलाये
वरना तो गुलाम आज भी रखते हैं।
अब तलवार और तोप से नहीं
बल्कि खज़ाना अपने यहां रखकर
ख्यालों से दिमाग को ढंककर
गुलामों में भी सरदार बनाकर,
स्वतंत्रता के भ्रमजाल को अधिक घना कर
अपना शासन बनाये हैं,
साथ ही देवता होने का स्वांग भी रचते हैं।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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May 24, 2010

आवारा जिन्न-हिन्दी शायरी (awara jinna-hindi shayari

जीवन पथ पर धीमे धीमे
कदम बढ़ाना
यह राह कहीं सहज तो कहीं कठिन है,
रात्रि को चंद्रमा की इठलाती किरणों के तले
उतना ही मस्ताना जितना सह सको
क्योंकि आगे सूरज की किरणों से सजा
आने वाला दिन है।

अपने घर के रखवाले
खुद ही बनकर रहना,
किसी दूसरे को नहीं सौंपना
अपने सम्मान कागहना,
काली नीयत की आग
अच्छी नज़र को पिघला देती है
जैसे आग से पानी हो जाता हिम है।

चौराहे पर आकर चमकने की कोशिश
तुम्हें बाज़ार में बिकने वाली आवारा चीज़ बना देगी,

यह दौलत पाने के अनंत इच्छा
केवल जिंदगी ही  नहीं 

मौत को भी सोने के भाव गला देगी,
पैसा है यहां सभी का देवता
जबकि सर्वशक्तिमान ने बनाया उसे आवारा जिन्न है।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Dec 28, 2009

खुशियां और अहसास-हिन्दी शायरी (khushiyan ka ahasas-hindi shayri)

 हाथ में बंधी घड़ी में टंगी सुईयां

चलती जा रही हैं

समय खुद अपने रूप को

दिन, रात, महीना और वर्ष के नाम से

नहीं पकड़ पाया।

इंसान क्यों झूम रहा है

आते हुए दिन को देखकर

गुजरे वक्त के निकल जाने का

गम उसने कभी नहीं मनाया।

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आसमान में कहीं खुशियां नहीं टंगी

जो गिर हाथ में आ जायेंगी,

बाजार में किसी दाम नहीं मिलतीं

जो खरीदने पर घर सजायेंगी।

आंखों से न दिखाई  देती

कानों से सुनाई नहीं देती

और छूकर स्पर्श नहीं करती

मर चुके अहसासों को जिंदा करके देखो

खून मे खुशियां दौड़ती नजर आयेंगी।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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Mar 8, 2009

चमन में कांटो की भीड़ भी होती-व्यंग्य कविता

इश्क एक इबादत होता
गर उसमें खता और बेवफाई नहीं होती।
पर उनके बिना नीयत की
आजमायश भी कैसे होती।
जब इश्क जुनून बन जाता है
तब दुनियांदारी का इल्म नहीं होता
पर महबूब के कदम चलना तो
इस जमीन पर ही हैं
जहां फूलों से खिले
चमन में कांटों की भीड़ भी होती।
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औरत की आजादी का हक
मांगते हैं शादी की बेडि़यों में।
मांस को नौचने की बजाय
सहलाने की बात करते हैं भेडि़यों में।
रस्म रिवाज से दूर रहने का देते फतवा
नये जमाने को नारों से कर लिया अगवा
आदमी को शेर से बकरा बनाने का सपना
औरत का हथियार बनाकर
दुनियां में चला रहे सिक्का अपना
तरक्की पसंदों की बात कौन समझ पाया
पुरानी रस्में उन्हें कभी नहीं भाती
पर शादी की कसमें निभाने की याद आती
सोचते आगे और देखते हैं पीछे
आसमान से करते नफरत, ताकते हैं नीचे
दिमाग दौड़ाते आगे, ख्याल बांध कर बेडि़यों में।

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