तस्वीरों को दिखाकर मत बहलाओ
जो छिपा रहे हो
पहले वह सच बताओ
आहिस्ता-आहिस्ता अपने शब्दजाल में
लोगों को फंसाने की कोशिश करते हुए
दूसरों की सोच को न भूल जाओ
सामने से सभी तस्वीरें
दिल को छू जातीं है
पर अपने पीछे से
कभी किसी को सूंदर नहीं लगतीं
इसलिये सामने ही लगायी जातीं हैं
शब्दों के अर्थ भी कई होते हैं
तुम खुद हो एक भ्रम में
दूसरों को न उलझाओ
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ऊंची इमारतों, होटलों और पार्कों की तस्वीर
नहीं होती किसी शहर की तकदीर
भूख, गरीबी और बीमारी की
बस्तियां सभी जगह होती हैं
जिन पर टिकी है शहर की चमक
गरीब के अंधेरे भी वहीं होतें
लिखें किसी शहर की तारीफ में जो शब्द
उसमें क्यों नहीं आया किसी गरीब का दर्द
यह तुम्हारी चालाकी है या अनजानापन
तुम्हारी तस्वीर और शब्दों में
कभी पूरी हकीकत बयान नहीं होती है
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समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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