Oct 31, 2009

जंग और सत्संग-हिंदी कविता (zang aur satsang-hindi kavita)


धर्म के लिए अब नहीं होता सत्संग
हर कोई लड़ रहा है, उसके नाम पर जंग.
किताबों के शब्द का सच
अब तलवार से बयान किया जाता
तय किये जाते हैं अब धार्मिक रंग.

एक ढूँढता दूसरे के किताब के दोष
ताकि बढ़ा सके वह ज़माने का रोष
दूसरा दिखाता पहले की किताब में
अतार्किक शब्दों का भंडार
जमाने के लिए अपना धर्म व्यापार
बयानों का है अपना अपना ढंग..

धर्म का मर्म कौन जानना चाहता है
जो किताबें पढ़कर उसे समझा जाए
पर उसके बिना भी नहीं जमता विद्वता का रंग,
इसलिए सभी ने गढ़ ली अपनी परिभाषाएं,
पहले बढ़ाते लोगों की अव्यक्त अभिलाषाएं,
फिर उपदेश बेचकर लाभ कमाएं,
इंसान चाहे कितने भी पत्थर जुटा ले
लोहे और लकडी के सामान भी
उसका पेट भर सकते हैं
पर मन में अव्यक्त भाव कहीं
व्यक्त होने के लिए तड़पता हैं
जिसका धर्म के साथ बड़ी सहजता से होता संग.
सब चीजों के तरह उसके भी सौदागर हैं
अव्यक्त को व्यक्त करने का आता जिनको ढंग..
कहीं वह कराते सत्संग
कहीं कराते जंग..
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Oct 18, 2009

बड़े दरख्त और इंसान-हिंदी व्यंग्य कविता (darkht aur insan-hindi vyangya kavita)

बड़े दरख्त अपने नीचे
छोटे पौद्यों को नहीं पनपने देते.
उनके मन की हलचल को
चेहरे पर पढना हो तो
ऐसे इंसानों को देख लो
जो गुजार रहे हैं जिंदगी ख़ास शख्सियत बनकर,
खड़े हैं दरख्त की तरह तनकर,
अपनी कम लायकी और औकात की
असलियत उनके जेहन को करती है तंग,
चेहरे का उड़ जाता है रंग,
कोई दूसरा आकर बराबरी न करे
इसी सोच में आँखे आकाश की ओर कर लेते.
अपने से बड़े की करते चाटुकारिता
छोटे को देखकर भी करते अनदेखा
अपने अन्दर बैठे उनके खौफ
खुद को ही घेर लेते.
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Oct 14, 2009

नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)

आशिक ने अपनी माशुका को
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए
अपने ब्लाग पर
पसंद नापसंद का स्तंभ
एक तरफ लगाया।
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर
पाठ को ऊपर चढ़ाता था
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।
अपने पाठों पर फिर तो
फिकरों की बरसात होती पाया
पसंद से कोई नहीं पूछता था
पहले जिन पाठों को
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।
उसने अपने ब्लाग का दर्शन
अपनी माशुका को भी कराया।
देखते ही वह बिफरी
और बोली
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो
शर्म आयेगी अगर अब
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।
हटा दो यह सब
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को
दुबारा अगर इसे लगाया।’’

सुनकर आशिक बोला
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर
घिसते घिसते जन्म गंवाया
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।
खुद ही पसंद बटन पर
उंगली पीट पीट कर
अपने पाठ किसी तरह चमकाये
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।
इस नपसंद ने बिना कुछ किये
इतने सारे पाठक जुटाये।
तुम इस जमाने को नहीं जानती
आज की जनता गुलाम है
खास लोगों के चेहरे देखने
और उनका लिखा पढ़ने के लिये
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती
आम कवि जब चमकता है
दूसरा उसे देखकर बहकता है
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही
यह नापसंद चिपकाया।
अरे, हमें क्या
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये
नायक को मिलता है सब
पर खलनायक भी नहीं होता खाली
यह देखना चाहिये
मैं पसंद से जो ना पा सका
नापसंद से पाया।’’

इधर माशुका ने सोचा
‘मुझे क्या करना
आजकल तो करती हैं
लड़कियां बदमाशों से इश्क
मैंने नहीं लिया यह रिस्क
इसे नापसंद देखकर
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी
क्या हुआ यह नापसंद लेखक
मेरा पसंदीदा आशिक है
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’


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Oct 10, 2009

छोटा रहा दिल और जिगर-व्यंग्य शायरी (Dil aur Zigar-hindi shayri)

इंसान की नज़र में ही बसते, झूठे चमकते शिखर
उस पर चढ़ने को लालायित है, सभी का जिगर।
ऊंची जगह पर पहुंचे, जो नहीं है उसके लायक
बदचलनों का हुआ बाजार पर कब्जा, जंग के बिगर।
कमजोर को हमेशा डराते, हथियारबंद होकर बड़े लोग
दहशतगर्दों के सामने लगती खुद उनको जान की फिकर।
पानी की बहती धार को पत्थर से रोकते, बेचने के वास्ते
तेल के व्यापार मे फायदे में भी आता है उनका जिकर।
कहलाते अमन के पहरेदार, मुजरिमों को देते पनाह
जमाने की जान क्या बचायेंगे, कर लें अपनी फिकर।
‘दीपक बापु’ असलियत जिनकी बौनी रही हमेशा
बड़ी जगहों पर पहुंचे पर छोटा रहा दिल और जिगर।।

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Sep 29, 2009

पसंद नापसंद-हास्य व्यंग्य (pasand napasan-hindi hasya vyangya)

एक सज्जन ने मन्नत मांगी थी कि अगर उनको कभी कहीं से कोई सम्मान प्राप्त होगा तो वह किसी नये कवि का सम्मेलन करायेंगे। इससे तो उनका सम्मान का प्रचार तो होगा ही साहित्य में नयी पीढ़ी को आगे लाने के लिये भी प्रसिद्धि मिलेगी। दरअसल उन्होंने अपने बेकारी के दिनों में अनेक कवितायें लिखी थी जिनका एक किताब के रूप में प्रकाशन कराया। उन्होंने अपने मित्र को वह कविता दिखाई तो उसने कहा-‘‘चुपचाप इनको रख लो। यह कवितायें तुम्हारी मजाक बनवायेंगी। अलबत्ता जब तुम्हारे सपंर्क बन जायें तो इस किताब के सहारे कोई सम्मान वगैरह जुगाड़ लेना क्योंकि तुम जिस तरह अपने व्यवसाय में आगे जा रहे हो तुम्हारे लिये अच्छे अवसर हैं।’’
वह सज्जन अनेक तरह के ठेके लिया करते थे। ढेर सारी किताबें रखने के लिये उन्होंने एक अलमारी बनवायी थी जिस पर रोज अगरबत्ती जलाकर घुमाते।
इधर समय के साथ उनके व्यवसाय के साथ बड़े और प्रतिष्ठित लोगों से संपर्क बढ़ रहे थे। एक कारखाने में निर्माण का ठेका उनको मिला। वह कंपनी अवार्ड वगैरह भी बांटा करती थी। दरअसल उसका यह समाज कल्याण अभियान बड़े लोगों से संपर्क बढ़ाने के लिये था और वह अपने को फायदा देने वालों को सम्मानित भी कर चुकी थी। ठेकेदार सज्जन की उसी कंपनी के प्रबंधक से बातचीत हुई। ठेकेदार सज्जन को मालुम था कि यह कंपनी अवार्ड वगैरह बांटती है इसलिये वह प्रबंधक से अधिक प्रगाढ़ संबंध बनाने लगे। एक दिन उन्होंने प्रबंधक से कहा-‘आप हमें साहित्य के लिये अपना अवार्ड दिलवा दीजिये। आपका कमीशन दुगना कर देता हूं।’
प्रबंधक ने कहा-‘पहले वह किताब दिखाओ। नहीं दिखाना है तो कमीशन तीन गुना करो।’
ठेकेदार सज्जन बहुत खुश हो गये। मन ही मन कहने लगे कि‘यह बेवकूफ है, अगर चार गुना भी कहता तो देता।’
उन्होंने अपनी सहमति दी। इस तरह यह इनाम उनको मिल गया। वह भी साहित्यकार के रूप में। शहर भर के साहित्यकारों को तो मानो सांप सूंध गया। हरेक कोई एक दूसरे से पूछा रहा था कि ‘यह कौन महाकवि इस शहर में रहता है जो हमारी नजर से नहीं गुजरा। कभी किसी मंच पर नही देखा। उसका अखबार में नहीं पढ़ा।’
सम्मान मिलना तो सो मिल गया। एक दो आलोचक उनके घर पहुंच गये और कविता के शीर्षकों से ही समीक्षा अखबारों में लिखकर छाप दी। ठेकेदार सज्जन ने बकायदा आलोचकों की खातिर की। इधर उनके मन में बस एक ही बात थी कि किसी नये लेखक का एकल पाठ कराकर अपनी वह मिन्नत पूरी करूं जो किसी दिन मन में आ गयी थी। भले ही दस वर्ष बाद यह पूरी हुई पर मिन्नत का मान रखना भी जरूरी था। मुश्किल यह थी कि पहले उन्होंने नये कवि को अच्छी खासी रकम देने का विचार रखा था पर इधर खर्चा इतना हो गया कि वह सोच रहे थे कि सस्ते में निपट जाये। इसी चिंता में रहते थे। घर से बाहर एक दिन एक लड़का उनको मिल गया जिसके बारे में उनको पता लगा कि उसकी कोई कविता कहीं छपी थी-यह दावा वह मोहल्ले में करता फिर रहा था।

उन्होंने उससे पूछा-‘‘क्यों गंजू उस्ताद, कैसी चल रही है तुम्हारी कवितागिरी।’’
गंजू उस्ताद ने कहा-‘आपसे तो अच्छी नहीं चल रही। अब सोच रहा हूं कि मैं भी ठेकेदारी शुरु करूं। बहुत दिनों से काम तलाश रहा हूं। सोच रहा हूं कि आपको गुरु बना लूं। हो सकता है एक दो अवार्ड अपने किस्मत में भी आ जाये।’
ठेकेदार सज्जन ने कहा-‘अरे, कहां ठेकेदारी के चक्कर में पड़े हो। तुम तो अपनी कविता सविता के साथ आनंद करो।’
गंजू उस्ताद बीच में ही बोल पड़ा-‘‘छि...छि.........चुप हो जाईये। अभी अभी तो मेरी शादी हुई है। किसी ने सुना लिया कि सविता से मेरा चक्कर था तो गड़बड़ हो जायेगी।’’
ठेकेदार ने कहा-‘‘कविता के साथ मैंने तो ऐसे ही सविता जोड़ दिया। इधर मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारा काव्य पाठ करवा दूं। इससे तुम्हें प्रचार मिलेगा और मुझे भी तसल्ली होगी कि साहित्य की सेवा की।’’
गंजू उस्ताद बोला-‘‘हां, पर अब आप मुझे उस्ताद न कहकर कवि नाम से पुकारें। आप अवसर दे रहे हैं तो अच्छी बात है। आप तैयारी करिये मैं अपनी नयी नवेली पत्नी के पास जाकर उसे यह खबर देता हूं। वह मुझे निठल्ला कहने के साथ ही कवितायें जलाने की धमकी देती है। इधर पिताजी भी कह रहे हैं कि अब तेरी शादी हो गयी तो कुछ कमाई करो। आप कितना पैसे देंगे।’’
ठेकेदार ने कहा-‘‘अरे, तुम्हें एक कवि सम्मेलन मिल गया तो फिर रास्ता खुल जायेगा। यही क्या कम है?’’
गंजू उस्ताद मान गया। वह गया तो ठेकेदार सोचने लगा कि ‘कितना बेवकूफ है कि अगर पांच सात सौ रुपये भी मांगता तो मैं देता।’
एक पार्क में बने बनाये मंच पर गंजू उस्ताद का एकल कविता पाठ प्रारंभ हुआ। मगर वह नया था उसे क्या मालुम कि कवितायें ठेली जाती हैं श्रोताओं की परवाह किये बिना। वह हर कविता पर श्रोताओं से पूछता-‘‘आप बताईये कि यह कविता आपको पसंद आयी।’’
लोग चिल्लाये -‘‘नापसंद नापसंद’’।
इस तरह उसने दस कवितायें सुनायी। अब तो हर कविता की समाप्ति पर लोग चिल्लाते-‘‘नापसंद नापसंद।’’
गंजू उस्ताद के बारे में यह कहा जाता है कि जब वह घर में अपने माता पिता से नाराज होता तो अपने कपड़े फाड़ने और बाल नौचने लगता था। इतना ही नहीं फिर घर से बाहर आकर ऐसे ही पत्थर उड़ाने लगता। यह बचपन की बात थी पर जब लोगों ने उसे इस तरह प्रताड़ित किया तो खिसियाहट में अपने बाल्यकाल में चला गया। वह अपने कपड़े फाड़ने लगा। उधर से लोग चिल्लाये ‘‘पसंद पसंद’’।
वह बाल नौचने लगा। लोग चिल्लाये-‘‘पसंद पसंद’’।
वह मंच से उतर गया और पत्थर उछालने लगा। लोग चिल्लाने लगे ‘‘पसंद पसंद।’’
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ठेकेदार सज्जन भाग निकले। उनके पीछे गंजू उस्ताद भी भाग निकला। पीछे से लोग भी चिल्लाते हुए भागे-‘पसंद पसंद’
बाद में वह ठेकेदार सज्जन से मिला-‘‘और कुछ नहीं तो मेरे कपड़े फट गये उसके पैसे दे दो। आपको पता है कि वह शादी में मुझे ससुराल से मिले थे। आपके कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये मैंने उनको फाड़ डाला। तभी तो लोग चिल्ला रहे थे ‘पसंद पसंद’। वरना तो ‘नापसंद नापसंद’ कर पूरा कार्यक्रम ही बरबाद किये दे रहे थे।’’
ठेकेदार सज्जन बोले-‘बेशरम आदमी! तुम्हारी वजह से मेरी बदनामी हुई है। मैंने तुम्हार काव्य पाठ सुनने के लिये कार्यक्रम करवाया था या लोगों की पसंद नापसंद जानने के लिये। अरे, यह भीड़ है इस पर चाहे जितना अपनी कवितायें या कहानी थोप दो चुपचाप झेलती है। अगर बोलने का अवसर दो तो फिर यही करती है जो तुम्हारे साथ किया।’
गंजू उस्ताद उदास होकर चला गया। इधर ठेकेदार सज्जन सोचने लगे कि‘अगर जिद्द करता तो एक दो हजार मैं दे ही देता। चलो अच्छा है चला गया। मुझे तो अपना प्रचार मिल ही गया न!
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Sep 18, 2009

मवेशी श्रेणी, कीड़ा श्रेणी-हिंदी हास्य व्यंग्य (cattle class, worm class-hindi hasya vyangya)

करें भी तो क्या? अखबार पढ़े और टीवी चैनल देखे बिना चैन ही नहीं पड़ता। अखबार पढ़ने में भी अब प्रथम पृष्ठ की खबरों की बजाय अंदर के पृष्ठ देखते हैं कि शायद कुछ अलग हटकर मिल जाये जबकि ताकि हास्य कविता या व्यंग्य लिख सकें। टीवी चैनलों से तो उकता गये हैं इसलिये अखबार वालों से थोड़ा बहुत लिखने लायक विषय मिलने की संभावना रहती है मगर मुश्किल यह हो गयी है कि वह भी टीवी चैनलों की तरह ‘शब्द पकड़ पाठ लिख’-हमारी मूल शैली भी यही है-नीति पर चलते हैं। इसमें बुरा कुछ भी नहीं है पर मुश्किल तब होती है जब किसी के श्रीमुख से उच्चारित पूर्ण वाक्य से केवल एक शब्द निकालकर उसका भाव भी अपने हिसाब से प्रस्तुत कर दिया जाता है।
अभी कहीं किसी सहृदय सज्जन ने कह दिया कि ‘वायुयान में मितव्ययी श्रेणी (economy class) तो मवेशी श्रेणी (cattle class) है।’
हमने जो अखबार और टीवी चैनलों में यही पढ़ा और सुना। हमें ऐसा नहीं लगा कि उन्होंने इस श्रेणी में यात्रा करने वालों के लिये ऐसे शब्द कहें हों। वैसे हमें बीच बहस में नहीं पढ़ना चाहिए पर कहीं न कहीं इसमें हमारे लिये लिखने लायक कुछ नया आ गया तो सो लिख रहे हैं। वायुयान की किसी श्रेणी में कभी यात्रा नहीं की न करने की संभावना है-क्योंकि लैपटाप नहीं है जो वहां से अंतर्जाल पर लिख सकें। अलबत्ता उन सहृदय सज्जन ने जब वायुयान की मितव्ययी श्रेणी (economy claas) को मवेशी श्रेणी (cattle class)कहा और उस पर जैसे बवाल मच रहा है उसने थोड़ा चक्कर में डाल दिया है।
सुना है अमेरिका में मितव्ययी श्रेणी को ‘मवेशी श्रेणी’ ही कहा जाता है। इधर भी अगर कह दिया तो क्या बुरा किया? मगर नहीं? यहां के संगठित प्रचार माध्यम में काम करने वाले लोग जानते हैं कि जैसा हम कहेंगें जनता मानेगी। वह मान भी लेती है सिवाय हम जैसे अधकचड़े चिंतकों के-जिनको पूरे वाक्य के एक एक शब्द का विश्लेषण न कर लें चैन नहीं पड़ता।
ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों के लोगों को इस श्रेणी में चलने का अवसर मिलता है इसलिये वह अधिक नाराज हैं या अपने मालिकों से इससे बड़ी श्रेणी की चाहत रखते हुए उन्हें हड़का रहे हैं कि देखो हम तुम्हारे वफदार सेवक होकर भी ‘मवेशी श्रेणी’ में यात्रा करते हैं।
दरअसल पिछले कुछ समय से राई का पहाड़ और पहाड़ खोदकर निकली चुहिया को हथिनी बताने वाले यह प्रचार माध्यम अब जिस ‘सनसनीखेज‘ राह पर चल रहे हैं वहां चिंतन या मनन के लिये तो उनके पास समय रह ही नहीं सकता। पूरे वाक्य में एक शब्द मिला नहीं कि ‘यूरेका’ ‘यूरेका‘ कहते हुए दौड़ पड़ते हैं।
हम न तो किसी के समर्थक हैं न विरोधी! हम तो स्वांत सुखाय हैं सो इधर उधर देखते सुनते हैं उसके आधार पर ही लिख रहे हैं और इन्ही संगठित प्रचार माध्यमों में जो सुना और दिखा उसी के आधार पर हमें नहीं लगता कि वायुयान की मवेशी श्रेणी में यात्रा करने वालों को मवेशी कहा गया है। बाकी जानकारी से हम भी बहुत दूर हैं। तिस पर अंग्रेजी से पैदल हैं। इधर हिंदी वालों के यह हाल है कि वह सारी सनसनीखेज बातें अंग्रेजी से उठा लाते हैं।
अब प्रचार माध्यम जोर शोर से विलाप कर रहे हैं कि यहां के लोगों से मवेशी कहा, देश को मवेशी कहा आदि आदि। तर्क वितर्क के शिखर पर खड़े महानुभाव नीचे आने को तैयार ही नहीं है। बहुत दिन से सोच रहे हैं कि आखिर उस वाक्य में ऐसा क्या था जो सभी को परेशान कर रहा है।
कई बार मौसम खराब होता है तो हम कहते हैं कि कितना नारकीय वातावरण है तो क्या हम सब नरकवासी हो गये। अगर हम किसी कुत्ता गाड़ी चलाने वाले व्यक्ति के लिये यह कहें कि ‘वह तो कुत्ता गाड़ी में बैठता है तो क्या उसे कुत्ता समझा जायेगा।’
इससे भी आगे मान लीजिये हमारा कोई मित्र वायुयान की मितव्ययी श्रेणी में जाये और हम उससे कहें कि ‘क्या मवेशी श्रेणी में यात्रा करोगे?‘ तब वह हमसे लड़ने लगे तो..........................हम तो उसे मूर्ख कहेंगे क्योंकि वह श्रेणी अमेरिका में इसी श्रेणी के नाम से जानी जाती है न कि यात्री।
जहां तक मवेशियों का सवाल है पता नहीं अमेरिका में उनको पालने वालों का क्या रवैया है पर भारत में जो मवेशी पालते हैं वह उनकी बहुत साज संभाल करते हैं। बीमार पड़ने पर उसका इलाज करते हैं। यह ठीक है कि उनसे मालिकों को उससे आय होती है पर फिर कहीं न कहीं उनके प्रति अपनी संतान जैसा भाव मन में रहता है और इसे गांवों में जाकर देखा जा सकता है।
इधर जब यात्रा की बात चली तो हमारी सोच टैम्पो, बसों और ट्रेनों से आगे नहीं बढ़ सकती है-कथित रूप से भले ही हम विद्वानों जैसी छबि बनाये बैठे हैं पर अपनी औकात तक ही हमारी भी सोच है यह हम कभी कभार लिखते हैं। संभव है कि अल्पविद्वता या कंजूसी की वजह से हमें भी ऐसा दर्द झेलना पड़ता है या केवल वैसी अनुभूति होती है जब हमारे साथ कीड़ों जैसा व्यवहार होता है। चूंकि विमानों में अगर मवेशी श्रेणी है तो उससे नीचे के वाहनों की श्रेणी भी कुछ नीचे स्तर तक लानी होगी न!
ऐसा अनेक बार होता है कि गर्मी की दोपहर में हम अपने शहर आये-अब तो हम स्कूटर स्टेशन तक ले जाते हैं इसलिये इस समस्या से निजात पा ली है पर बाहर जकार शहरों में यह सब झेलना ही पड़ता है-और टैम्पो में बैठे पर वह जब तक ठसाठस भर नहीं लेगा तब तक नहीं चलेगा। फिर उसके आगे पीछे और दायें बायें बाहर लोग लटके होंगे। उनकी यह यात्रा जान हथेली पर लेकर की जाती है यह हम देखते हैं पर उस समय जो पीड़ा होती है तब ऐसा लगता है कि हम कीड़े मकौड़े श्रेणी के हैं। अगर कोई हमसे कोई कहे कि यह क्या टैम्पो में जा रहे हो कीड़े मकौड़े की तरह....................तो क्या कीड़े मकौड़े हो जायेंगे।
एक नहीं अनेकों बार ट्रेनों, बसों और टैम्पो में सफर के दौरान जो तकलीफ हमने झेली है उस समय ऐसा नहीं लगता कि हमसे पैसे लेने वाले हमें मनुष्य समझ रहे हैं। हां, चिल्ला लो! कितना चिल्लाओगे? किसके लिये चिल्ला रहे हो और कौन सुन रहा है। मवेशी श्रेणी के आगे भी एक क्लास है कीड़ा श्रेणी (worm class)। जो अपने ही देश के लोगों को ऐसा समझते हैं वह भी आम इंसान ही हैं पर उन पर पैसा कमाने का दबाव रहता है और दबाव डालने वाले भी इसी देश के हैं। अब यह तो कोई बात नहीं हुई कि कीड़ों की तरह व्यवहार करो और झेलो पर न कहो न सुनो। सच सुनने और आत्ममंथन से घबड़ाते बुद्धिजीवियों पर तो हंसी आयेगी ही!
यह सब होना ही है। मांग और आपूर्ति का नियम सभी जगह लागू होता है। भारत में मनुष्यों जनंसख्या बढ़ रही है। इस लिये उनका मूल्य कम तो होना ही है। अब कहेंगे कि भला इंसान को भी वस्तु बना दिया! मगर आप जाकर किससे कहेंगे। कभी सोचा है कि इसी कन्या भ्रंुण की गर्भ में हत्या कर दी जाती है या कहीं कहीं तो मां ही उसे रेल से फैंक देती है पर कभी लड़के के बारे में ऐसा सुना है। एक नहीं हजारों बल्कि लाखों ऐसी घटनायें हैं जिसमें लड़कियों को मनुष्य नहीं बल्कि अपना एक उत्पाद समझकर व्यवहार किया जाता है। मतलब यह इस समाज में संवेदनाओं की कमी हो गयी है। लोग अपने अलावा सभी को शय समझते हैं। हां, प्रचार माध्यमों को केवल इसलिये सफलता मिलती है क्योंकि हर व्यक्ति केवल अपने को जीवंत समझता है और उसे जब कोई कीड़ा मकौड़ा या मवेशी कहता है तो उसकी संवेदनायें जाग उठती हैं पर दूसरे के लिये वह कितना संवेदनहीन है इसके लिये ज्यादा क्या लिखें?
हां फिर भी लिख रहे हैं कि आदमी संवदेनहीन हो गया है इसलिये प्रचार माध्यमों की नकली संवेदनायें भी बिक रही हैं वैसे ही जैसे कमी होने जाने के कारण नकली, घी, दूध और पनीर बिक रहा है। लोगों की चिंतन क्षमतायें तो लुप्त हो गयी हैं इसलिये प्रचार माध्यम एक शब्द पकड़ कर ग्रंथ जैसा प्रस्तुत कर देते हैं और एक पंक्ति के समाचार पर तो तीन दिन तक विशेष कार्यक्रम आते हैं। वैसे हमने लिखने में पूरी सावधानी बरती है क्योंकि हमने यहां कीड़ा शब्द अपनी यात्राओं के लिये प्रयोग किया है किसी दूसरे के लिये नहीं। हमें पता है कि इतना बड़ा लेख कौन पढ़ेगा? पढ़ेगा तो समझेगा क्या? अलबत्ता एक शब्द पर कोहराम न मचे इसलिये हम यह साफ कह रहे हैं कि कीड़ा श्रेणी (worm class)तभी होती है जब हम स्वयं टैम्पो, बसों या ट्रेनों में सफर करते हैं। बाकी दिन तो वह खास श्रेणी होती है जैसे कि यहां का हर आदमी अपने बारे में सोचता है।

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Sep 11, 2009

फिल्म और क्रिकेट का रिश्ता-हास्य कविता (film aur cricket-hasya kavita)

नायिका ने बहुत किया अभिनय
पर चलचित्रों में सफलता का
दौर नहीं चल पाया।
नंबर वन की दौड़ में न पहुंचने पर
उसने प्रेमी निदेशक से अफसोस जताया।
तब वह बोला-
‘‘लगता है कि अपना नाम
फिल्म बाजार में ऐसे नहीं चलेगा,
केवल किसी अभिनेता के साथ
तुम्हारे नकली इश्क से मामला नहीं बनेगा,
मेरे अंदर एक नया विचार चल रहा है,
चलचित्र जगत की ऊंचाई पर तुम पहुंचो
यह सपना मेरे अंदर भी पल रहा है,
जिस तरह क्रिकेट और फिल्म का
रिश्ता आपस में बन गया है
उसका लाभ उठाओ,
किसी कुंवारे क्रिकेट खिलाड़ी से
इश्क का प्रचार करवाओ,
घूमते हुए फोटो खिंचवाना और
किसी मैच में जाकर उसके लिये
बजाना जोर से तालियां,
मेरे से प्रेम की बात कोई करे तो
देना चाहे मुझे खुलेआम गालियां,
सर्वशक्तिमान ने चाहा तो
होगी कृपा उनकी
तुम्हारे साथ होगा सफलता का साया।
चलचित्रों से पिटने की हट जायेगी छाया।
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