Jul 21, 2011

नोएडा एक्सटेंशन एक टेंशन-हिन्दी लेख (tension for noeda extension after court vardict)

               जब हम आधुनिक लोकतंत्र की बात करते हैं तो उसमें अप्रत्यक्ष रूप से धनपतियों की राज्य का उपयोग अपने हित में करने की प्रवृत्ति स्पष्टतः सामने आती है। एक समय तक भारत में कथित मिश्रित अर्थव्यवस्था-साम्यवादी और पूंजीवाद विचारधारा से निर्मित खिचड़ी चिंतन जैसा ही समझें-अपनाया गया। इसी आधार पर हमारे यहां समाजवाद का नारा भी लगा। यहां यह स्पष्टतः कर दें कि समाजवादी विचारधारा भारत में ही पैदा हुई है। अधिकांश विश्व में पूंजीवादी राजकीय व्यवस्था है पर कुछ देशों फिर वामपंथियेां का शासन है जो मूलतः तानाशाही के सिद्धांतों पर आधारित है। हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से ओतप्रोत विद्वानों को कभी भारतीय दर्शन में वैज्ञानिक आधार पर राज्य और समाज के गठन का विचार सूझा ही नहीं। चूंकि विदेशी विचाराधारा लानी थी और जलकल्याण करते दिखना भी था तो वामपंथी विचाराधारा बहुत अच्छी थी। इधर अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में भारतीय धनपतियों के अप्रत्यक्ष सहयोग की वजह से उनको खुश रखने के लिये पूंजी की आजादी का पक्ष भी रखना जरूरी था सो समाजवाद की विचाराधारा बनी।
               संदर्भ हम नोएडा एक्सेंटेशन को लेकर अधिग्रहीत किसानों की जमीन पर बने आवासीय परिसरों को बढ़ते हुए विवादों को लें। यह उस खिचड़ी व्यवस्था से उत्पन्न वह दृश्य है जो कालांतर में आना ही था। भारतीय धनपतियों का प्रभुत्व आजादी से पहले स्थापित हो चुका था और वह देश को अपने ही आर्थिक नियंत्रण में रखकर आजाद देखना चाहते थे। उन्हें समाजवाद बहुत भाया होगा। दरअसल वामपंथ राज्य के समाज की हर गतिविधि पर नियंत्रण करने का मार्ग बतलाता है। पूंजीवाद इसके विपरीत समाज को आजाद देखना चाहता है। समाजवाद बीच की विचारधारा इसलिये बनी क्योंकि भारतीय धनपतियों को यह लगा कि उनकी तो अपनी शक्ति है इसलिये कोई उन पर नियंत्रण करेगा नहीं पर समाज जितना ही अधिक राज्य के नियंत्रण में रहेगा उतना ही अच्छा है क्योंकि अंततः देश की गतिविधियों का नियंता तो उनका ही धन है।
                      किसानों की रक्षा, गरीब का कल्याण, बीमार के लिये इलाज और नारी उद्धार के नारों के चलते जहां अनेक बुद्धिजीवी और समाज सेवक प्रचारक जगत में जननायक बनते रहे वहीं धनपतियों ने भी खूब नामा कमाया। आप आयकर की दरों को ही देख लें। एक समय बहुत अधिक दर थी। ऐसे में इस पर कोई यकीन नहीं कर सकता कि किसी धनपति ने ईमानदारी से यह कर दिया होगा। स्पष्टतः धनपतियों को पता था कि वह अपने दावपैंचों से अपना साम्राज्य बचाते रहेंगे पर कोई दूसरा बड़ा धनपति नहंी बन पायेगा। बन भी गया तो कालाधन होने की वजहा से उनके समकक्ष खड़ा नहीं हो सकेगा।
          इसके अलावा भी कृषि जमीन को आवासीय स्थल में परिवर्तन करने के भी अनेक प्रतिबंध रहे। स्थिति यह हो गयी थी कि देश की अनेक कॉलोनियां केंद्रीय और सरकारी संस्थाओं की छत्रछाया में बनी। निजी क्षेत्र में आवास निर्माण तो बहुत कम ही होता था। देश में आवास समस्या थी पर यह सरकारी संस्थायें धीरे धीरे उसे समायोजित करती रहीं। देश का एक बहुत बड़ा मध्यम वर्ग इन्हीं कॉलोनियों में आया जिनमें बुद्धिजीवी भी थे। तब तक मकान निर्माण लोगों की निजी क्षमताओं के इर्दगिर्द ही सीमित था इसलिये उसमें निजी ठेकेदार और व्यवसायी एक सीमा तक ही लाभान्वित होते थे।
           कालांतर में उदारीकरण के चलते देश की स्थितियां बदली हैं। अब मकान निर्माण एक भारी फायदे का धंधा बन गया है। यह अकेला एसा धंधा है जिसमें कोई योग्यता होना जरूरी नहीं है। बस दावपेंच आना चाहिए। अगर हम कोई हजारों का टीवी या फ्रिज खरीदते हैं तो दुकानदार गारंटी या वारंटी देता है पर मकान निर्माण करने वाला व्यवसायी कोई गारंटी नहीं देता। न इसका कोई कानूनी प्रावधान किया गया है। उपभोक्ता फोरम के अनेक चर्चित निर्णयों में कोई मकान से संबंधित नही होता।
              भारत में उदारीकरण की गति धीमी होने की शिकायत करने वाले उद्योगपति कभी यह मांग नहीं करते कि आम जनता के हितों की रक्षा के लिये उसे आजादी दी जाये। वह मकान बनाना चाहते हैं पर चाहते हैं कि उसके लिये सरकारी संस्थाायें अपनी ताकत से ज़मीन खरीद कर उनको दें। इतना ही नहीं वह कृषि भूमि को आवासीय स्थल में बदलने का कानून रद्द करने की बात भी नहीं करते जिससे निजी लोग स्वयं ही जमीन खरीद कर मकान बनाने लगें। अगर ऐसा हो गया तो इन धनपतियों को थोक में इतनी जमीन नहीं मिलेगी क्योंकि तब सामान्य लोग उसे खरीद चुके होंगे। मकान निर्माण में गारंटी का नियम लागू करने की भी यह मांग नहीं करते। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय धनपति नहीं चाहते कि धन का विकें्रदीयकरण हो क्योंकि उनके आने वाली पीढ़ियां राज्य नहीं कर पायेंगी।
           राजधानी दिल्ली में नोएडा उत्तरप्रदेश का ऐसा शहर है जो दिल्ली का ही हिस्सा लगता है। जिसे दिल्ली में जगह नहीं मिली वह नोएडा में मकान ढूंढ रहा है। तय बात है कि वहां मकानों के लिये कृषि भूमि ही आवासीय स्थल बन सकती है। जैसा कि आरोप लगाया है कि किसानों को कम मुआवजा देकर भूमि ली गयी और वहां महंगे आवास बनाये गये। अब अदालत के निर्णय के बाद औद्योगिक विकास के नाम पर कृषि भूमि को आवासीय स्थल में बदलने पर भी नये सिरे से विचार प्रारंभ हो गया है।
            किसानों को पैसा कम मिला पर उन्होंने लिया। उधर फ्लैट लेने वालों ने बिल्डर को पैसा दिया। अब अदालत के निर्णय से किसानों से जमीन अधिग्रहण रद्द हो गया है। चूंकि अभी निर्णय ऊंची अदालतों में जाना है इसलिये कहना कठिन है कि आगे क्या होगा पर इतना तय है कि इसमें धनपतियों को कोई हानि नहीं है। दरअसल फंसा तो वह निवेशक है जिसने फ्लैट के लिये पैसा दिया है। जिसने अपना पैसा दिया है वह सब्र कर सकता है पर जिसने कर्ज लेकर किश्त दी है उसके लिये भारी संकट बन सकता है। जिस तरह मकान के लिये बैंक कर्ज दे रहे हैं उसे लेने वालों की संख्या बढ़ गयी है। मध्यम वर्ग कर्ज लेने के लिये हमेशा तैयार रहता है।
जहां तक किसानों को जमीन वापस मिलने का सवाल है तो उसमें भी कठिनाई आयेगी। इसका कारण यह है कि अनेक किसानों ने टीवी चैनलों पर बताया कि वह पैसा लेकर खर्च कर चुके हैं इसलिये उसे वापस करने का संकट उनके सामने है। ऐसे में मुआवजे की रकम दिये बिना उनको जमीन वापस मिलना मुश्किल है। इसके अलावा जब उनकी भूमि पर खेती होती थी तो उसका सीमांकन अब कैसे दुबारा होगा। वहां तो अनेक तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। हैरानी की बात है कि अदालत में मामला होते हुए भी वहां निर्माण कार्य होने दिया गया। वैसे देखा जाये तो अदालतों के माननीय न्यायाधीश तो अपने सामने उपस्थित तथ्यों को देखते ही फैसला देते हैं इसलिये उनके निर्णय का समर्थन करना चाहिए। ऐसा लगता है कि भवन निर्माताओं को अपने पक्ष में फैसला होने का कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास रहा होगा। न्यायालय के निर्णय से उनका यह भ्रम टूट गया होगा कि पैसे और ताकत से कुछ भी किया जा सकता है। सुनने में आया है कि अब विनिवेशक भी न्यायालय में जा रहे हैं। अभी तक मामला किसानों की जमीन और उनके अधिग्रहण तक ही सीमित था और न्यायालयों के सामने इसी संदर्भ में तथ्य प्रस्तुत किये गये होंगे तो निर्णय इसी तरह आना था। अब विनिवेशक भी एक पक्ष बन रहे हैं तो न्यायालयों में उनकी बात भी सुनी जायेगी। इस मामले के आगे बढ़ने की संभावना है।
             आगे जो निर्णय होंगे वह तो एक अलग बात है पर मुख्य बात यह है कि एक तरफ बड़े धनपति अपनी ताकत के दमपर चाहे जो हासिल कर लेते हैं पर सामान्य आदमी के लिये हर चीज प्राप्त करना कठिन इसलिये बना दिया गया है ताकि वह मजबूरों की भीड़ का हिस्सा बन रहे। इससे वह भारतीय धनपतियों को अपने उत्पादों, भवनों और अन्य सुविधाओं के लिये प्रयोक्ता के रूप में मिलता रहे। इसलिये धनपति चाहते हैं कि राज्य का समाज पर कठोर नियंत्रण रहे और उस पर तो उनका निंयत्रण अंग्रेजों के समय था और अब भी है।
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Jul 12, 2011

हम मुस्करा दिये-हिन्दी कविता (ham muskra diye-hindi kavita)

उसने कहा
‘हम जमाने को बदल देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘हम हर इंसान को खुश कर देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘बस, एक बार पद पर बैठ जाने दो
हम अपनी ताकत दिखा देंगे।’
हम मुस्करा दिये।

बोलने में ताकत कहां लगती है
मगर जब करने की ताकत आती है
तो फिर दिखाता कौन कहां है
पद में मदांध आदमी
एक शब्द बोलने पर भी
कत्ल कर सकता है
इस ख्याल ने डरा दिया
बस, हम यूं ही मुस्करा दिये।
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Jul 5, 2011

जिंदगी का हिसाब किताब-हास्य व्यंग्य कवितायें (jindagi ka hisab kitab-hasya vyangya kavitaen)

हिसाब किताब में
जिंदगी का खेल लोग यूं ही खेलते जाते हैं,
ज्ञान का संदेश सुने
या माया के अंक गुने
बीच रास्ते पर चलते हुए
इसलिये सर्वशक्तिमान का नाम भी
गिन गिनकर लिये जाते हैं।
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एक बंदे ने दूसरे बंदे से पूछा
‘सर्वशक्तिमान का नाम
माला फिराते हुए क्यों लेते हो,
क्या डर है कि कहीं गिनती भूल जाओगे,
ज्यादा लेने पर फल नहीं मिलेगा
कम लिया तो शायद कम पाओगे,
इसलिये हिसाब किताब से काम करते हो।

दूसरे बंदे ने कहा
‘‘हमें कच्चा मत समझना,
सर्वशक्तिमान का नाम
माला के साथ जपते हुए भी
गिनती गिनते जाते हैं,
दिन भर दुकान पर
रुपये गिनने का अभ्यास बना रहे
इसलिये मन ही मन अंक भी गाये जाते हैं,
नाम स्मरण तो बचपन की आदत है,
पचपन में बनी मजबूरी बनी यह इबादत है,
लेते हैं सर्वशक्तिमान का नाम
यह सोचकर कि हम रुपये गिने जाते हैं।’’
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Jun 26, 2011

दोस्ती और रिश्तों के चेहरे-हिन्दी कविता (dosti aur riston ki chehare-hindi kavita

जिंदगी में दोस्ती और रिश्तों के चेहरे बदल जाते हैं,
कुदरत के खेल देखिये, नतीजे सभी में वही आते हैं।
कमीज पर क्या, कफन में भी कमीशन की चाहत है,
दवाई लेने के इंतजार मे खड़े, कब हम बीमारी पाते हैं।
हमारी खुशियों ने हमेशा जमाने को बहुत सताया है,
गम आया कि नहीं, यही जानने लोग घर पर आते हैं।
कहें दीपक बापू, भरोसा और वफा बिकती बाज़ार में
इंसानों में जिंदा रहे जज़्बा, यही सोच हम निभाये जाते हैं।
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Jun 22, 2011

योगासन में ‘एक्शन’ अधिक नहीं होता-हिन्दी लेख (yogasan mein action nahin hota-hindi lekh)

              बाबा रामदेव अब राष्ट्रीय प्रचार पटल से एकदम गायब है। अपना अनशन तोड़ने के बाद वह फिर लोगों के सम्मुख नहीं आये। एक अध्यात्मिक योगी के लिये राजयोग करना कोई आसान नहीं है यह अब समझ में आने लगा है। अगर कोई योगी राजयोग करने पर आमदा हो ही जाता है तो समझ लेना चाहिए कि वह राजस भाव के वशीभूत होकर अपनी साधना कर रहा था। यहां हम श्रीमद्भागवत के कर्म तथा गुण विभाग की विस्तृत चर्चा नहीं कर रहे पर इतना बताना जरूरी है कि आदमी सामान्य भक्त हो या योगी या फिर नास्तिक हो पर वह त्रिगुणमयी सृष्टि के चक्कर से नहीं बच सकता। सात्विक, राजस तथा तामस प्रवृत्ति के लोग हर जगह और हालत में मिलेंगे। तीनों गुणों से परे कोई महायोगी होता है हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि वह सामान्य संसार कर्म में अपने देह व्यस्त न रखे और सन्यास लेकर हिमालय पर चला जाये। हमारा कहने का अभिप्राय यह है कि आदमी अपनी इन तीन प्रवृत्तियों से ही कर्म करते हुए लिप्त होता है पर महायोगी केवल काम करना है यही सोचकर काम करता है उसे उसके फल में कदापि रुचि नहीं होती। जिसके मन में संतोष है वही सात्विक है पर संतोष तथा असंतोष से परे है तो वह योगी है।
     आलोचकों का कहना है कि बाबा रामदेव ने लोगों को योग की गलत शिक्षा दी यह अलग से बहस का विषय है क्योंकि इसका निर्णय तो केवल प्रवीण योगशास्त्री ही कर सकते हैं। कुछ योग शास्त्री मानते हैं कि ध्यान और धारणा के पतंजलि योग साहित्य में प्रतिपादित सूत्रों का उनका अध्ययन अधिक नहीं है। उनके विचार, वाणी तथा भाव भंगिमा से यही लगता है। इतना तय ही कि उनकी योग से प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।
                   पतंजलि योग विज्ञान के सूत्र के अनुसार परिणाम से कर्म का ज्ञान हो जाता है। दूसरे शब्दों में अगर किसी की व्यक्ति या उसकी गतिविधि से निकले परिणाम को देखते हुए उसके पूर्व कर्म का आभास किया जा सकता है। यह बहुत गंभीर अध्ययन करने वाला सूत्र है। इससे हम अपनी जिंदगी में किसी कर्म के नाकाम होने पर उसका विश्लेषण करते हुए अपनी गलतियों को ढूंढ सकते हैं। अपनी नाकामी पर हम चिंता में पड़े रहें या दूसरों को उसके लिये जिम्मेदार बताने लगें यह ठीक नहीं है। अपने संकल्प की शुद्धता और शुद्धता पर दृष्टिपात कर सकते हैं। परिणाम से कर्म का ज्ञान होने सूत्र. के लिये हमें जासूसी का नियम भी कह सकते हैं। जिस तरह कोई व्यक्ति कहीं बेहोश होकर घाायल पड़ा है और उसके पास कोई बड़ा पत्थर, चाकू या गोली का खोल पड़ा है। उसका घाव और खून देखकर जासूस यह अनुमान करता है कि उसे कौनसी चीज से मारा गया होगा। अगर आंधी तूफान के बाद राह चलतते हुए हम देखते हैं कहीं पेड़ के नीचे कोई जानवर दबा पड़ा है तो हम सहजता से यह अनुमान करते हैं कि वह पेड़ आंधी में गिरा होगा।
           योग विधा में पांरगत मनुष्य छोटी मोटी घटनाओं से ही नहीं बड़ी बड़ी राजनीतिक और एतिहासिक घटनओं का भी अनुमान कर सकते हैं कि उनमें सक्रिय लोगों की गतिविधियों किससे और कैसे प्रभावित होती होंगी। परिणामों से कार्य का अनुमान करना तभी संभव है जब ध्यान आदि के माध्यम से अपना बौद्धिक चिंत्तन विकसित करे। ज्ञानी लोग अभौतिक क्रियाओं का अनुमान सहजता से कर सकते हैं। बाबा रामदेव चूंकि प्रसिद्ध योग शिक्षक हैं इसलिये उनकी गतिविधियां अनेक ज्ञात अज्ञात योगियों और हम जैसे योग साधकों के लिये बहुत समय से अनुसंधान का विषय रही हैं। दिल्ली में अनशन के दौरान और उसके बाद उनके व्यक्त्तिव का पूरा स्वरूप सामने आ रहा था। उनकी राजनीतिक गतिविधियों में योगियों और योगसाधकों की दिलचस्पी कम थी पर उसके परिणाम और अभियान के संचालन को योग विज्ञान की कसौटी पर कसने का यह स्वर्णिम अवसर था। प्राणायामों तथा योगासनों की शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव ने अपनी साधना से कैसा व्यक्तित्व पाया है यह देखने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था। अभी यह कहना कठिन है कि आगे उनकी क्या योजना है? वह विश्राम करने के बाद फि कौनसा काम करते हैं यह देखने वाली बात होगी पर इतना तय है कि भारतीय अध्यात्म की योग विधा को प्रचार दिलाने में उनका कम अनुकरणीय रहा यह अलग बात है कि बाज़ार और प्रचार के संयुक्त उपक्रम के प्रबंधकों ने उनकी मदद की। बाज़ार और प्रचार में सक्रिय महानुभावों का पूरे विश्व में दबदबा है और वह समय समय पर अपने नायक आम लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। जब भारतीय समाज पर राजकीय विलासिता हावी हो रही है तो वहां राजरोगों का पनपना स्वाभाविक है। ऐसे बाबा रामदेव के योगासन उपयोगी  साबित रहे रहे थे। उनको नायकत्व का दर्जा मिला पर आलोचकों ने आरोप लगाया कि बाबा इस तरह समाज में व्यायाम का प्रचार कर लोगों की उपभोग क्षमता बढ़ा रहे हैं जिससे बाज़ार को अपने उत्पादों के ग्राहक बनाये रखने में मदद मिलेगी। उस समय अनेक लोगों ने इस बात की अपेक्षा की पर योग साधना में दक्ष लोगों ने स्पष्टतः कहा था कि उनकी शिक्षा पूरी तरह से योग विधा का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
           बाबा रामदेव ने पतंजलि के आष्टांग योग की चर्चा अनेक बार की पर वह प्राणायाम तथा योगासनों के अलावा बाकी छह भागों में अपनी विशिष्टता प्रमाणित नहीं कर पाये थे। मुख्य बात यह कि ध्यान की शक्ति का महत्व वह सिद्ध नहीं कर पाये जो कि सबसे अधिक आवश्यक था। अगर वह आगे योगशिक्षा जारी रखते हैं तो उनको ध्यान और धारणा का महत्व भी बताना चाहिए।
            अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान उन्होंने राजनीतिक विषयों में अपनी अपरिपक्वता का ही प्रमाण उन्होंने दिया। उनके कुछ बयान तो चौंकाने वाले थे जो कि यह बात साफ करते थे कि अभी उनको अपने ही शब्दों का प्रभाव नहीं मालुम। अपने समकक्ष ही खड़े अन्ना हजारे के आंदोलन के ऐसे मुद्दों पर अपनी असहमति दी जिनकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उनका यह बयान उनके प्रशंसकों चौंकाने वाला लगा था। किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश में चर्चा होती है तो तमाम तरह के पहलू देखकर ही कोई निष्कर्ष निकलता है। ऐसे में अपने बयान सोच समझकर देना चाहिए।
उस समय कुछ लोगों को लगा कि वह अपना गुप्त लक्ष्य लेकर ही वह सत्याग्रह चला रहे हैं। एक मजे की बात यह है कि दिल्ली आने तक यह पता नहीं था कि वह धरना देंगे कि सत्याग्रह करेंगे या आमरण अनशन। वह तीनों का मतलब भी नही जानत लग रहे थे। अनशन तो उनको करना ही नहीं था क्योंकि वह अन्न ग्रहण ही नहीं करते तब उसे छोड़ना कैसा?
                वह शायद श्री अन्ना हजारे का अनशन देखकर वह प्रभावित हुए थे। जब नौ दिन के अनशन से बाबा रामदेव का शरीर अस्थिर हो गया तो उनके सहयोगी एक नेता ने कहा कि उनको तो नीबू पानी पीकर अनशन करना था। कुछ लोग उनको अन्ना हजारे की अपेक्षा दैहिक रूप से कमजोर बता रहे हैं जो कि सोलह दिन तक अनशन कर चुके हैं। चिकित्सकों ने यह बात मानी थी कि उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये उन पर अनशन का बुरा प्रभाव जल्दी पड़ा। दरअसल यह बाबा रामदेव के ही अपरिपक्व होने के साथ ही पतंजलि योग से पूरी तरह अनभिज्ञ होने का प्रमाण है। अन्ना हजारे अन्न खाते हैं इसलिये उनके शरीर में इतनी चर्बी मौजूद रहती है जो अनशन के समय उनकी सहायक बनती है। बाबा रामदेव अन्न नहीं खाते इसलिये उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये भूखे रहना अपने शरीर से खिलवाड़ करने जैसा ही है।
          श्रीमद्भागत गीता में कहा गया है कि न कम खाने वाले का न ज्यादा खाने वाले का, न कम सोने वाले का न अधिक सोने वाले का और न ही असंयमी का कभी योग सिद्ध नहीं होता। ऐसे में अन्न का त्याग कर चुके बाबा रामदेव को सतर्क रहना चाहिए था। स्थिति यह हो गयी कि दूसरों को स्वस्थ रहने के लिये योग शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के वही डाक्टर परामर्श दे रहे थे जिनके बारे में बाबा रामदेव का दावा था कि वह उनके पास कभी नहीं जायेंगे। आधुनिक राजनीतिक क्षेत्र में जय पराजय का महत्व नहीं होता पर योग में यह पराजय बाबा रामदेव के लिये एक चुनौती है। इसे वह योग साधना से ही विजय में बदल सकते हैं। पिछले अनेक दिनों से वह योग शिविरों में नहीं दिख रहे पर इसका मतलब यह नहीं है कि योग शिक्षा का काम कहीं नहीं चल रहा है यह अलग बात है कि उसे प्रचार न मिलता है न जरूरत है।
               इस देश में एक नहीं सैंकड़ों योग शिक्षक हैं। भारतीय योग संस्थान इसके लिये मुफ्त में अनेक शिविर लगाता है। उसके अनेक शिक्षक योग विज्ञान में इतना प्रमाणिक रूप से पारंगत हैं कि अनेक लोग उनका लोहा मानते हैं। समस्या यह है कि योग साधना में सक्रियता यानि एक्शन नहीं है। एक्शन वाले आसन व्यायाम होते हैं। इसके अलावा प्राणायाम, ध्यान, धारणा और समाधि में तो व्यक्ति एकदम निष्क्रिय रहता इसलिये प्रभावी नहीं लगता। जबकि बाबा रामदेव सतत सक्रिय रहते हैं। उनके कई आसान सामान्य व्यायाम की तरह हैं इसलिये ही शायद आलोचना अधिक हो रही है पर सच यह है कि उनके पास आने वाली भीड़ आती भी इसलिये है। बहरहाल आगे वह क्या करेंगे यह देखने वाली बात होगी। अलबत्ता उन्होने अपने आलोचकों को अपने भड़ास निकालने का अवसर दे दिया है। हालांकि इस बात की भी संभावना है कि उन जैसा योगी अधिक समय तक चुप नहीं बैठ सकता।
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Jun 14, 2011

तेल उधार लेकर चिराग न जलाएँ-हिन्दी साहित्यक कविता

तेल उधार लेकर

घर के चिराग न जलाएँ,

मांगी मिठाई से

दिवाली न मनाएँ,

अँधेरों में जीना,

जुबान चाहे मांगे स्वाद

अपने होंठ भूख से सीना,

वरना गुड़ बनकर

अमीरों के हत्थे चढ़ जाओगे।

फिर गुलामी की जज़ीरों से

लड़ते रहोगे

आज़ादी के लिए छटपटाओगे।

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मांगने से मिलती नहीं अमीरी

छीनने से सिंहासन नहीं मिल जाता है।

अपनी दौलत, शौहरत और ताकत

पर भले ही तुम इतराते रहो

अपने घमंड से काँपते देखो ज़माना

सच यह है कि

तुम्हारी ताकत से

क्या हिलेगा देश में कोई पेड़

किसी शहर का पत्ता तक हिल नहीं पाता है।


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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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