Oct 1, 2011

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी और भारत की चिंता-हिन्दी लेख (afganisatan,america and india ,milatry action ofr peace-hindi lekh(

         अमेरिका अब अफगानिस्तान से जाने की तैयारी कर रहा है तो भारतीय रणनीतिकारों की सांसें फूल रही हैं। भारतीय प्रचार माध्यमों के सूचीबद्ध बुद्धिजीवियों के लिये यह संभव नही है इस विषय पर वह सार्थक बहस कर सकें। यही सूचीबद्ध बुद्धिजीवी न केवल चैनलों पर आते रहते हैं बल्कि समाचार पत्रों में भी उनके लेख वगैरह छपते हैं। इस बात पर तो बहस हो जायेगी कि अफगानिस्तान ने अमेरिका की सेना वापस जाना चाहिए कि नहीं पर इस पर शायद ही कोई अपनी बात ठोस ढंग से कह सके कि भारतीय रणनीतिकारों की सांस इससे फूल क्यों रही है?
       हम इस पर लिख रहे हैं तो हमारे पास जो जानकारी है वह इन्हीं प्रचार माध्यमों के समाचारों पर आधारित हैं यह अलग बात है कि वह उनको राजनीति, समाज, आर्थिक तथा पत्रकारिता के आधारों पर अलग श्रेणीबद्ध करते हैं पर उनके आपसी संबंध पर उनके सूचीबद्ध बुद्धिजीवी दृष्टिपात नहीं कर। किसी समय अफगानिस्तान पाना अमेरिका का लक्ष्य था और आज वहां बने रहना उसके लिये समस्या बन गया है। अगर हम राष्ट्रीय आधारों पर देखें तो यह समस्या अमेरिका की है कि उसकी सेना वहां रहे या जाये। हमें उसमें दिलचस्पी नहीं लेना चाहिए। जब हमारे रणनीतिकार इस बात से घबड़ाते हैं कि वहां से अमेरिकी सेना जाने के बाद भारत पर संकट आ सकता है तो यह बात माननी पड़ेगी कि वहां हमारे लिये भी समस्या है और हम उससे निपटने में सक्षम नहीं है। दूसरी बात यह है कि हम अगर अपने देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक शक्ति के स्तोत्रों को देखें तो ऐसा नहीं लगता कि हमारे लिये कोई बड़ी समस्या है। सामाजिक और एतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करें तो भी ऐसा नहीं लगता कि वहां की आम जनता हमारे से कोई नफरत करती है। तब सवाल उठता है कि आखिर समस्या क्या और कहां है?
         दरअसल हमारे देश ने चालीस वर्ष से कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा। जब हम अपने अंदर बैठे राष्ट्र की संकल्पना को देखते हैं तो पाते हैं कि हर राष्ट्र को अपनी रक्षा के लिये युद्ध करना ही पड़ते हैं। हालांकि भारतीय परिस्थ्तिियों में युद्ध का मतलब भयावह ही होता है। 1971 में पाकिस्तान से युद्ध में विजय तो पाई पर आर्थिक रूप से यह देश वहां से टूटा तो फिर खड़ा नही हो सका। वहां से महंगाई का जो दौर चला तो फिर आज तक थमा नहीं है। विकास हुआ पर जरूरतों भी बढ़ी। कमाई बढ़ी पर रुपये का मूल्य गिरता गया। समाज में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक शिखरों पर बैठे पुरुषों के लिये अब यही समस्या है कि वह अस्तित्व कैसे बनायें रखें। उनकी दिलचस्पी देश की आम जनता के दोहन में है। वह कमाते हैं पर गुणगान अमेरिका और ब्रिटेन का करते हैं। कभी कभी तो लगता है कि देश के शिखर पुरुषों की आत्मा ही अब पश्चिम में बसती है। ऐसे में युद्ध से होने वाली हानि में वह अपनी हानि देखने के साथ ही अपने अस्तित्व का संकट भी अनुभव करते हैं। यही कारण है कि उनको लगता है कि यह देश सुरक्षित रहे और युद्ध भी न करना पड़े इसलिये अमेरिका से वह यही अपेक्षा करते हैं कि वह अफगानिस्तान में अपनी सेना बनाये रखें।
        एक बात तय है कि अफगानिस्तान के आर्थिक संसाधनों का लाभ भारतीय धनपतियों को कहीं न कहीं मिलता है-भले ही वह वैध व्यापार से हो या अवैध व्यापार से। इसके अलावा अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में सक्रिय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जब बात होती है तो भारतीय आर्थिक विश्लेषक इस बात पर प्रकाश नहीं डालते कि उनमें भारतीय धनपतियों का अंश कितना है? हम जानते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कहीं न कहीं भारतीय पैसा और श्रम लगा हुआ है। यह अलग बात है कि इनके कर्ताधर्ता प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकन या ब्रिटिश पूंजीपति हों। स्पष्टतः वैश्विक उदारीकरण के चलते पूरे संसार के धनपति एक हो गये हैं। यह धनपति चाय की पत्ती से लेकर अंतरिक्ष तकनीकी बेचने तक का काम करते हैं। दूसरी बात यह है कि धनपतियों का कहीं न कहीं अपराधियों से सभी संबंध हो गया है और इसी कारण अवैध हथियारों की तस्करी और मादक द्रव्य का व्यापार भी बढ़ा है। इन्हीं धनपतियों के प्रभाव राज्यों पर स्पष्टतः दिखाई देते हैं। भारतीय धनपतियों का प्रभाव जिस तरह विश्व में बढ़ा है उससे लगता है कि अब अफगानिस्तान में भारतीय धनपतियों के लाभ की शायद अधिक संभावना है और अमेरिकी रणनीतिकार इसे समझ रहे हैं। हालांकि भारतीय धनपतियों की अमेरिकी रणनीतिकार अनदेखी नहीं कर सकते पर भविष्य की अधिक संभावनाओं के चलते वह कुछ भी कर सकते हैं। कहीं न कहीं भारतीय धनपति इस बात की अपेक्षा कर रहे हैं कि अमेरिका अफगानिस्तान में बना रहे ताकि उसके प्रबंधकों के सहारे वहां के संसाधनों का दोहन किया जा सके।
         जिस तरह हमारे देश में भ्रष्टाचार जोर पकड़ चुका है। समाज का आम आदमी टूट रहा है ऐसे में किसी भी युद्ध की संभावना किसी को भी डरा देती है। मुश्किल यह भी है कि जब हम एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो ऐसे युद्ध लड़ना भी पड़ेंगे। देश के शिखर पुरुषों को आम जनता से अधिक खतरे भी उठाने पड़ेंगे। इधर अब देख रहे है कि सभी प्रकार के शिखर पुरुषों के स्वामी आर्थिक शिखर पर बैठे धनपति हो गये है। अब यह अलग बात है कि अपने ही प्रचार माध्यमों की वजह से भारतीय धनपतियों के प्रति आम जनता का उनमें विश्वास नहीं रहा। इस पर जिस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा आतंकवाद को धन देने की बातें सामने आ रही हैं उससे देश का जनमानस अब इस बात को समझने लगा है कि व्यापारियों का काम केवल कमाना है देशभक्ति दिखाना नहीं। जरूरत पड़े तो वह देशभक्ति को पर्दे पर बेचकर वह पैसा भी कमा सकते हैं। इधर भारतीय रणनीतिकारों को भी सुविधायें भोगने की आदत हो गयी है। पड़ोस में इतने बड़े युद्ध हो गये पर उनको अपना दिमाग चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। अगर अमेरिका की सेना अफगानिस्तान से चली गयी तो उनको दिमागी कसरत करनी होगी। आर्थिक लाभ से अधिक सामरिक स्थिति पर अधिक सोचना होगा। सबसे बड़ी बात यह कि इसके चलते भारत के पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान शिखर पुरुषों से दोस्ती निभाने के अवसर कम मिलेंगे। अभी हम देख रहे हैं कि हमारे रणनीतिकार इन दोनों देशों से आर्थिक हितों पर ही बात करते हैं। सामरिक महत्व की कोई चर्चा नहीं होती क्योंकि अमेरिकी सेना के वहां रहते हुए हम ‘बाह्य मामलों में हस्तक्षेप से बचने का बहाना’ बना लेते हैं क्योंकि वहां द्वंद्व अमेरिका की स्थिति को लेकर ही चल रहा है। । इस समय अफगानिस्तान के कथित जुझारु लोग अमेरिका से जूझ रहे हैं उसके जाते ही वह भारत की तरफ मुखातिब होंगें तब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के शिखर पुरुषों से आर्थिक लाभ वाला दोस्ताना खतरे में पड़ सकता है क्योंकि तब सैन्य और सामरिक महत्व के विवादास्पद मामले भी उठ खड़े होंगे। तय बात है कि वह आतंकवाद को लेकर ही होंगे।
       भारतीय रणनीतिकारों की यह चिंता उनकी कमजोरियों को दर्शाती है। वह यह भी दर्शाती है कि सामरिक रूप से शक्तिशाली होते हुए भी हम भारतीयों में वीरता और देश के लिये त्याग करने के संकल्प की कमी है। चालीस साल से शांति भोगते भोगते कहीं न कहीं कायरता का भाव आ गया है। आर्थिक लाभ ही हमारे लिये सर्वोपरि है। हालांकि पहली बात तो यह कि अमेरिका अभी तत्काल अफगानिस्तान से नहंी जाने वाला है इसलिये फिलहाल चिंतायें दूर की हैं। दूसरी बात यह भी है कि जिस तरह अंग्रेज भारत और पाकिस्तान में अपने चरणपुरुष छोड़कर गये वैसे वह अफगानिस्तान में नहीं कर सकता। एक बार वह वहां से निकला तो फिर वहां उसका प्रभाव समाप्त हो जायेगा ऐसे में भारत और पाकिस्तान के धनपतियों के लाभ प्रभावित होंगे। शायद यही कारण है कि भारतीय रणनीतिकार इतने चिंतित है पर जिस तरह भारतीय धनपति देश के प्रति लापरवाह हो गये हैं इस चिंता में आम जनमानस उनके साथ नहीं है।
---------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Sep 16, 2011

विकास और महंगाई-हिन्दी हास्य कविता (vikas aur mehangai or mahangai-hindi hasya kavita)

उनसे पूछा गया कि
‘‘आप इस तरह कब तक महंगाई बढ़ायेंगे,
आम आदमी को यूं तड़पायेंगे,
समझ में नहीं आता
आप लोगों का दर्द कैसे समझ पायेंगे।’’

वह बोले
‘देश विकास की तरफ बढ़ रहा है
चाहे आतंकवाद से लड़ रहा है,
तुमने सुना नहीं हमने चवन्नी बंद कर दी है,
उसी तरह हम चाहते हैं कि
दस, पचास और सौ के नोट को रोने वाले
गरीब लोग
हजार और पांच सौ के नोट पाने लगे,
महंगाई बढ़ेगी तो कमाई भी बढ़ेगी
किसी तरह गरीबी दूर भगे
अमीर भी अपनी दौलत आसानी से
गरीबों में बांटने के साथ ही
इधर उधर ले जायेंगे,
अभी तक अमीर ही देख रहे हैं हजार के नोट
हमारी कोशिश से गरीब भी देख पायेंगे।
---------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Sep 9, 2011

हिन्दी का महत्व गरीबों की वजह से ही तो है-हिन्दी व्यंग्य (hindi ka mahatva garibon ki vajah se-hindi vyangya or satire)

                14 सितंबर 2011 बुधवार को हिन्दी दिवस मनाया जाने वाला है। इस अवसर पर देश में हिन्दी बोलो, हिन्दी सुनो और हिन्दी समझो जैसे भाव का बोध कराने वाले परंपरागत नारे सुनने को मिलेंगे। प्रचार माध्यम बतायेंगे कि हिन्दी अपने देश में ही उपेक्षित है। हिन्दी को निरीह गाय की तरह देखा जायेगा भले ही वह असंख्य बुद्धिजीवियों को शुद्ध दूध, देशी की तथा मक्खन खिलाती हो। इसी दिन अनेक कार्यक्रम होंगे तो नाश्ता वगैरह भी चलेगा।
           शायद इस लेखक ने अपने ब्लागों पर कई लेखों मे खुशवंत सिंह नामक अंग्रेजी के लेखक की चर्चा की है। दरअसल उन्होंने एक बार लंदन में कहा था कि ‘ भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है।’ इस पर देश में भारी बवाल मचाया गया। समस्त प्रचार माध्यम राशन पानी लेकर उनके पीछे पड़ गये। उनका बयान यूं सुनाया गया कि खुशवंत सिंह ने कहा है कि हिन्दी गरीबों भाषा है। इस लेखक ने वह समाचार पढ़ा। हिन्दी को गरीब भाषा कहने पर मन व्यथित हुआ था तो एक अखबार में संपादक के नाम पत्र में उनकी खूब बखिया उधेड़ी। उसके बाद कुछ समाचार पत्रों में उनका पूरा बयान भी आया। उससे साफ हो गया कि उन्होंने हिन्दी को गरीबों की भाषा कहा है। तब भी मन ठंडा नहीं हुआ क्योंकि तब जीवन का ऐसा अनुभव नहीं था। समय ने करवट बदली। दरअसल इस प्रचार के बाद से खुशवंत सिंह के लेख हिन्दी भाषा में अनुवाद होकर छपने लगे। तब यह सोचकर हैरानी होती थी कि जिस शख्स पर यह अखबार वाले इस कदर पिल पड़े थे उनके लेख अनुवाद कर क्यों हिन्दी पाठकों के सामने प्रस्तुत कर उनको चिढ़ा रहे हैं? अब यह बात समझ में आने लगी है कि इस तरह के प्रचार से उस समय के बाज़ार प्रबंधक एक ऐसा नायक गढ़ रहे थे जिसे हिन्दी में पढ़ा जाये। उस खुशवंत सिंह को बता दिया गया होगा कि यह सब फिक्स है और अब आपकी रचनायें हिन्दी में छपा करेंगी।
        खुशवंत सिंह ने अपने उसी बयान में हिन्दी भाषा में चूहे के लिये रेट और माउस अलग अलग शब्द न होने पर अफसोस जताया था। इससे उन पर हंसी आयी थी। दरअसल वह अंग्रेजी भाषा के लेखक हैे पर उसका सही स्वरूप नहीं जानते। वह कहते है कि भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है यह हमने मान लिया मगर वह इस लेखक की बात-उनको हिन्दी आती नहीं और हम कोई बड़े लेखक नहीं है कि उन तक पहुंच जायेगी पर इंटरनेट पर यह संभावना हम मान ही लेते हैं कि उनके शुभचिंतक पढ़ेंगे तो उन्हें बता सकते हैं-मान लें कि अंग्रेजी भाषा इस धरती पर दो ही प्रकार के लोग लिखते और बोलते हैं एक साहब दूसरे गुलाम! जिनको अंग्रेजी से प्रेम है वह इन्हीं दो वर्गों में अपना अस्तित्व ढूंढे तीसरी स्थिति उनकी नहीं है। याद रखें यह संसार न साहबों की दम पर चलता है न गुलामों के श्रम पर पलता है। उनके अपने रिश्ते होंगे पर स्वतंत्र वर्ग वाले अपनी चाल स्वयं ही चलते हैं। स्वतंत्र वर्ग वाले वह लोग हैं जो अपनी बुद्धि से सोचकर अपने ही श्रम पर जिंदा हैं। उनका न कोई साहब है न गुलाम।
          बहरहाल हम यह तो मानते हैं कि इस देश में हिन्दी अब गरीबों की भाषा ही रहने वाली है और यहीं से शुरु होता है इसका महत्व! इंटरनेट पर हिन्दी के महत्व पर लिखे गये एक लेख पर अनेक लोग उद्वेलित हैं। वह कहते हैं कि हिन्दी का आपने महत्व तो बताया ही नहीं। उनका जवाब देना व्यर्थ है। दरअसल ऐसे लोग एक तो अपनी बात रोमन लिपि में लिखते हैं। अगर हिन्दी में लिखते हैं तो उनका सोच अंग्रेजी का है। मतलब कहंी न कहंी गुलामी से ग्रसित हैं। हम यह बात स्पष्ट करते रहते हैं कि हिन्दी अनेक लोगों को कमा कर दे रही है। अगर ऐसा नहीं है तो हिन्दी फिल्मों, समाचार पत्रों और टीवी धारावाहिकों में हिन्दी के प्रसारण प्रकाशन में अंग्रेजी शब्द क्यों घुसेड़ते हैं? अपनी बात पूरी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं करते? हिन्दी चैनल चला ही क्यों रहे हैं? अपने चैनल में अंग्रेजी ही चलायें तो क्या समस्या है?
      नहीं! वह ऐसा कतई नहीं करेंगे! इसका सीधा मतलब है कि अंग्रेजी हमेशा हर जगह कमाने वाली भाषा नहीं हो सकती। दूसरा यह भी कि अंग्रेजी पढ़ने वाले सभी साहब नहीं बन सकते! जो साहब बनते हैं उनके हिस्से में भी ऐसी गुलामी आती है जो पर्दे के पीछे वही अनुभव कर सकते हैं भले उनके सामने सलाम ठोकने वालों का जमघट खड़ा रहता हो। आप किसी माता पिता से पूछिये कि‘‘अपने बच्चे को अंग्रेजी क्यों पढ़े रहे हैं?’
          ‘जवाब मिलेगा कि ‘‘आजकल इसके बिना काम नहीं चलता!’’
         देश के सभी लोग अमेरिका, कनाडा या ब्रिटेन  नहीं जा सकते। जायें भी तो अंग्रेजी जानना आवश्यक नहीं जितनी कमाने की कला उनके होना चाहिए। एक पत्रिका में हमने पढ़ा था कि आज़ादी से पहले एक सिख फ्रांस गया। उसे अंग्रेजी क्या हिन्दी भी नहीं आती थी। इसके बावजूद अपने व्यवसायिक कौशल से वह वहां अच्छा खासा कमाने लगा। अब हो यह रहा है कि लोगबाग अपनी भाषा से परे होकर अंग्रेजी भाषा को आत्मसात करने के लिये इतनी मेहनत करते हैं कि किसी अन्य विषय का ज्ञान उनको नहीं रहता। बस उनको नौकरी चाहिए। सच बात कहें तो हमें लगता है कि हमारी शिक्षा पद्धति में अधिक शिक्षा प्राप्त करने का मतलब है निकम्मा हो जाना। बहुत कम लोग हैं जो अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद निजी व्यवसायों में सफलता प्राप्त कर पाते हैं। उनसे अधिक संख्या तो उन लोगों की है जो कम पढ़े हैं पर छोटे व्यापार कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखते हैं। अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगारी की कोई गारंटी नहीं है पर इससे एक खतरा है कि हमारे यहां के अनेक लोग परंपरागत व्यवसायों को हेय समझ कर उसे करते नहीं या उनको शर्म आती है जिसकी चरम परिणति बेरोजगार की उपाधि है।
        अंग्रेजी पढ़कर कंपनियों के उत्पादों की बिक्री करने के लिये घर घर जाने को भले ही सेल्समेनी कहा जाता हो पर अंततः पर इसे फेरी लगाना ही कहा जाता है। यह काम कम शिक्षित लोग बड़े आराम से कर जाते हैं। अलबत्ता सेल्समेन के बड़े व्यापारी बनने के संभावना क्षीण रहती है जबकि फेरीवाले एक न एक दिन बड़े व्यापार की तरफ बढ़ ही जाता है। न भी बने तो उसका स्वतंत्र व्यवसाय तो रहता ही है।
         पता नहीं हिन्दी का महत्व अब भी हम बता पाये कि नहीं। सीधी बात यह है कि हिन्दी गरीबों की भाषा है और उनकी संख्या अधिक है। वह परिश्रमी है इसलिये उपभोक्ता भी वही है। उसकी जेब से पैसा निकालने के लिये हिन्दी भाषा होना जरूरी है वह भी उसके अनुकूल। अपने अंदर हिन्दी जैसी सोच होगी तो हिन्दी वाले से पैसा निकलवा सकते हैं। उसके साथ व्यवहार में अपने हित अधिक साध सकते हैं। देखा जाये तो इन्हीं गरीबों में अनेक अपने परिश्रम से अमीर भी बनेंगे तब उनकी गुलामी भी तभी अच्छी तरह संभव है जब हिन्दी आती होगी। वैसे तो गुलामी मिलेगी नहीं पर मिल भी गयी तो क्लर्क बनकर रह जाओगे। उसकी नज़रों में चढ़ने के लिये चाटुकारिता जरूरी होगी और वह तभी संभव है जब गरीबों की भाषा आती होगी। अंग्रेजी अब बेरोजगारों की भाषा बनती जा रही है। साहबनुमा गुलामी मिल भी गयी तो क्या? नहीं मिली तो बेरोजगारी। न घाट पर श्रम कर सके न घर के लिये अनाज जुटा सके। इतना लिख गये पर हमारे समझ में नहीं आया कि हिन्दी का महत्व कैसे बखान करें। अब यह तो नहीं लिख सकते कि देखो हिन्दी में इंटरनेट पर लिखकर कैसे मजे ले रहे हैं? यह ठीक है कि इसे गरीबों की भाषा कह रहे हैं। हम इस लिहाज से तो गरीब हैं कि हमें अंग्रेजी लिखना नहीं आती। पढ़ खूब जाते हैं। वैसे लिखना चाहें तो अंग्रेजी में सौ पचास लेखों के बाद अच्छी अंग्रेजी भी लिखने लगेंगे पर यकीनन उसमें मजा हमको नहीं आयेगा। वैसे हिन्दी दिवस पर प्रयास करेंगे कि हिन्दी का महत्व जरूर बतायें। यह लेख तो इसलिये लिखा क्योंकि हिन्दी दिवस के नाम से सर्च इंजिनों पर हमारे पाठ खूब पढ़े जा रहे हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Aug 28, 2011

अन्ना हजारे की अनशन समाप्ति के मायने-हिन्दी संपादकीय लेख (anna hazare ka anshan samapt hone ke mayne-hindi sampadkiya lekh)

                अन्ना हजारे का अनशन समाप्त होने पर पूरे देश में जश्न मनाया जा रहा है। कोई इसे लोकतंत्र की जीत बता रहा है तो किसी का दावा है कि इस लोकचेतना का संचार हुआ है। भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल बनाने को लेकर महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे ने 12 दिन तक जमकर अनशन किया। अंततः कुछ आश्वासनों पर हजारे साहब ने बड़े राजनीतिक चातुर्य के साथ आधी जीत बताकर उसे समाप्त कर दिया। संविधान और राजनीतिक विश्लेषकों की बात माने तो आधी जीत तो दूर अभी उनका अभियान अपनी जगह से एक इंच हिला भी नहीं है। इतना ही नहीं अब कथित रूप से गैरराजनीतिक होने का दावा करने वाली उनकी कथित ‘अन्ना टीम’ अंततः परंपरागत राजीनीतिक दलों के शिखर पुरुषों में की दरबार में मदद मांगने भी जा पहंुची। जब देश में कानून बनाने में संसद सर्वोपरि है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दलीय राजनीतिक दलों के आधार पर ही गठित होती है। ऐसे में उनके साथ संवाद करना उस आदमी के लिये भी जरूरी होता है जो स्वयं गैरराजनीतिक है पर किसी जनसमस्या का हल चाहता है। दूसरी बात यह है कि अगर कोई समूह अपने मनपसंद का कानून बनाना चाहता है तो उसके पास चुनाव लड़ना ही एक जरिया है। किसी गैर राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से कानून बनाना एक आत्ममुग्ध प्रक्रिया हो सकती है जिससे परिणाम प्रकट नहीं होता चाहे नारे कितने भी लग जायें। अन्ना की टीम यह जानती है और ऐसा लगता है कि कहंी न कहीं भविष्य के चुनाव उसकी नजर में है।

          अब हम जो देख रहे हैं तो लग रहा है कि अन्ना हजारे और अन्ना टीम दो अलग अलग केंद्र बन गये हैं। अन्ना टीम के सदस्य पेशेवर अभियानकर्ता हैं जबकि अन्ना स्वयं एक फकीर हैं। अलबत्ता राजनीतिक चातुर्य उनमें कूटकूटकर भरा ही यही कारण है कि उन्होंने पेशेवर अभियानकताओं की दाल नहीं गलने दी। इससे हुआ यह कि एक स्वामी नामधारी एक पेशेवर अभियानकर्ता उनसे नाराज हो गया। उसका सीडी जारी हो गया है जिसमें वह अपने किसी मित्र के साथ सहयोगियों की निंदा कर रहा है। सच तो यह है कि उसके शामिल होने की वजह से लोग इस आंदोलन को अनेक बुद्धिजीवी शक की नजर से देख रहे थे। कहने को वह जोगिया वस्त्र पहनता है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की निंदा उसके श्रीमुख से कई बार सुनी गयी है। उस पर यह आरोप लगता है कि वह समाज सेवा की आड़ के केवल दिखावा करता है। हमारा उसके चरित्र से मतलब नहीं है पर इतना जरूर अब लग रहा है कि आने वाले समय में अन्ना टीम को अनेक तरह के सवालों का सामना करना पड़ेगा।
       अन्ना हजारे ने कहा था कि यह आधी जीत है। लोग फूल रहे हैं। जश्न बनाये जा रहे हैं। विवेकशील लोगों के लिये इतना ही बहुत है कि अन्ना जी ने अनशन तोड़ दिया। दूसरी बात यह भी लग रही है परंपरागत समाज सेवी और राजनीतिक संगठन अब चेत गये हैं। अभी तक वह देश के जनमानस में फैले असंतोष का शायद सही अनुमान नहीं कर पाये थे जो अन्ना के अनशन के लिये शक्ति बना और अन्ना टीम उसके आधार पर ऐसा व्यवहार करने लगी कि वह कोई संवैधानिक संगठन है। वैसे हम यहां साफ कर दें कि इस अनशन की समाप्ति से कोई हारा नहीं है कि किसी को विजेता बताया जाये। अलबत्ता प्रचार माध्यमों के लिये यह अनशन महान कमाई का साधन बन गया। पूरे पंद्रह दिन तक उन्होंने इस प्रकरण को जिस तरह चलाया वह आश्चर्यजनक लगता है। अलबत्ता इस चक्कर में उन्होंने देश के संविधानिक संगठनों के महत्व को कम कर दिखाया। आज तो सारे चैनल दूसरी आजादी का जश्न मना रहे हैं। अब इस आजादी का मतलब कौन पूछे?
        भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के लिये यह एक दो दिन आत्म मंथन का समय है जब उनको प्रचार माध्यम हाशिए पर बैठा दिखा रहे हैं। विवेकवान लोग जानते हैं कि भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान में अनेक बुद्धिमान लोग सक्रिय हैं। शीर्ष पदों पर है और अपनी चतुराई से उन्होंने इस आंदोलन की हवा निकाल दी है। यह अलग बात है कि इस आंदोलन की वजह से उनके मन में अब तेजी से जनकल्याण का भाव आया लगता है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा संविधान हैं तो हम बचे हुए हैं और संसद और सत्ता प्रतिष्ठान कहीं न कहीं हमारे चुने हुए लोगों की सक्रियता के कारण चल रहे हैं।
पिछले 15 दिनों से परंपरागत राजनीतिक संगठन को शीर्ष पुरुषों ने शायद बहुत तनाव झेला होगा पर अब वह यकीनन चेत गये होंगे। अन्ना साहेब भले हैं पर उनकी टीम का का व्यवहार राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अन्ना अकेले अनशन कर रहे थे पर यह अन्ना की टीम केवल राजनीति करती दिखी। ऐसा लगा कि अन्ना का अनशन उनकी निजी जागीर हो। अभी एक स्वामी की हवा निकली है और अब उनका सामना देश के समस्त परंपरागत राजनीतिक संगठनों से होगा तो पता नहीं कितनों की हवा निकल जायेगी।     आखिरी बात यह है कि इस गलत फहमी में किसी को नहीं रहना चाहिए कि अन्ना टीम कोई हाथ पर हाथ धरे बैठेगी। ऐसा लगता है कि अगले चुनाव में इसके लोग मैदान में भी उतर सकते हैं। परंपरागत राजनीतिक दलों को उनकी इस बात पर यकीन नहीं करना चाहिए वह गैरराजनीतिक लोग हैं। दरअसल अन्ना टीम धीरे धीरे परंपरागत राजनीतिक संगठनों को अप्रासंगिक दर्शाते हुए जनता में उनकी छवि खराब करेगी फिर आखिर यही कहेगी कि चुनाव में हमें जितवाने के अलावा जनता के पास कोई चारा नहीं है।
          विवेकशील पुरुष इस बात से खुश हैं कि अन्ना साहेब के अनशन से देश भर में उपजा तनाव खत्म हो गया है पर जिस तरह इसकी कथित विजय पर जश्न मन रहा है वह शक पैदा करता है कि वाकई यह कोई भ्रष्टाचार की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाले हैं। अब तो मामला चुनाव सुधार की तरफ मुड़ गया है। अन्ना साहेब भले हैं पर अपना राजनीतिक इस्तेमाल होने देते हैं। कोई उनको चला नहीं सकता यह सच है पर अपनी राजनीतिक मौज के चलते वह अपने चेलों की सहायता करते हैं। वह कहते हैं कि वह महात्मा गांधी के अनुयायी हैं और यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी छवि राजनीतिक संत की रही है। अन्ना साहब की वाक्पटुता गजब की है और उनका एक एक वाक्य जनमानस में प्रभाव डालता है। जब वह कहते हैं कि अभी अनशन स्थगित किया है खत्म नहीं किया तो समझना चाहिए कि उनकी राजनीतिक मौज का सिलसिला जारी रहेगा। यह स्पष्ट है कि अनशन की समाप्ति पर वह विवेकवान लोगों के नजरिये को समझते हैं पर यह भी जानते हैं कि उनके नाम से जुटी भीड़ नारों पर चलने और वादों में बहने वाली है इसलिये उसे अपने साथ बनाये रखने के लिये यह अहसास दिलाना जरूरी है कि आधी ही सही जीत जरूर हुई है।

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होना स्वागतयोग्य-हिन्दी लेख (end of anna hazare fast and agitation-hindi lekh or article)               
       महाराष्ट्र के समाज सेवी अन्ना हजारे आज पूरे देश के जनमानस में ‘महानायक’ बन गये हैं। वजह साफ है कि देश में जन समस्यायें विकराल रूप ले चुकी हैं और इससे उपजा असंतोष उनके आंदोलन के लिये ऊर्जा का काम कर रहा है। पहले अप्रैल में उन्होंने अनशन किया और फिर अगस्त माह में उन्होंने अपने अनशन की घटना को दोहराया। जब अप्रेल   में उन्होंने अनशन आश्वासन समाप्त किया तब उनका मजाक उड़ाया गया था कि वह तो केवल प्रायोजित आंदोलन चला रहे हैं। अब की बार उन्होंने 12 दिन तक अनशन किया। इस अनशन से भारत ही नहीं बल्कि विश्व जनमानस पर पड़े प्रभावों का अध्ययन अभी किया जाना है क्योंकि इस प्रचार विदेशों तक हुआ है। फिर जिन लक्ष्यों को लेकर यह अनशन किया गया उनके पूरे होने की स्थिति अभी दूर दिखाई देती है मगर देश के चिंतकों के लिये इस समय उनकी उपेक्षा करना ही ठीक है। अन्ना हजारे के अनशन आंदोलित पूरे देश के लोगों ने उसकी समाप्ति पर विजयोन्माद का प्रदर्शन किया पर महानायक ने कहा‘‘यह जीत अभी अधूरी है और अभी मैंने अनशन स्थगित किया है समाप्त नहीं।’ इस बयान से एक बात तो समझ में आती है कि अन्ना साहेब में राजनीतिक चातुर्य कूट कूटकर भरा है।
              अन्ना साहेब के बारह दिनों तक चले अनशन में तमाम उतार चढ़ाव आये और अगर उनका उसे छोड़ना ही सफलता माना जाये तो कोई बुरी बात नहीं है। साथ ही लक्ष्य से संबंधित परिणामों पर दृष्टिपात न करना भी ठीक है। पूरे देश का जनमानस ही नहीं जनप्रतिनिधियों के मन में जो भारी तनाव इस दौरान दिखा वह चौंकाने वाला था। इसका कारण यह था कि हिन्दी प्रचार माध्यम निरंतर इससे जुड़े छोटे से छोटे से घटनाक्रम का प्रचार क्रिकेट मैच की तरह कर रहे थे गोया कि देश में अन्य कोई खबर नहीं हो।
            अगर हम तकनीकी दृष्टि से बात करें तो अन्ना साहेब के प्रस्तावित जनलोकपाल ने अभी एक इंच कदम ही बढ़ाया होगा पर अन्ना साहेब की गिरते स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह भारी सफलता है। हम तत्काल इस आंदोलन के परिणामों पर विचार कर सकते हैं पर ऐसे में हमारा चिंत्तन इसके दूरगामी प्रभावों को देख नहीं पायेगा।  इस आंदोलन के लेकर अनेक विवाद हैं पर यह तो इसके विरोधी भी स्वीकारते हैं कि इसके प्रभावों का अनदेखा करना ठीक नहीं है।
         प्रधानमंत्री श्रीमनमोहन सिंह की चिट्ठी मिलने के बाद श्री अन्ना साहेब न अनशन तोड़ा। अपने पत्र में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यह अच्छी बात कही है कि ‘संसद ने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है जो कि देश के लोगों की भी है।’’
           उनकी इस बात में कोई संदेह नहीं है और इस विषय पर संसद के शनिवार को अवकाश के दिन विशेष सत्र में सांसदों ने जिस तरह सोच समझ के साथ ही दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने विचार जिस तरह दिये वह इसका प्रमाण भी है। संभव है विशेषाधिकार के कारण कुछ सांसदों के मन में अहंकार का भाव रहता हो पर कल सभी के चेहरे और वाणी से यही भाव दिखाई देता कि किस भी भी तरह इस 74 वर्षीय व्यक्ति का अनशन टूट जाये जो कि इस देश के जनमानस का ही भाव है। सच बात तो यह है कि इस बहस में आंदोलन से जुड़े संबंधित सभी तत्वों का सार दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रचार माध्यमों के सहारे इस आंदोलन की सफलता की बात कही गयी। अनेक सांसदों ने इस आंदोलन के उन देशी विदेशी पूंजीपतियों से प्रायोजित होने की बात भी कही जो भारत की संसदीय प्रणाली पर नियंत्रण करना चाहते हैं। इसके बावजूद सभी ने श्री अन्ना हजारे के प्रति न केवल सभी ने सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके चरित्र की महानता को स्वीकार भी किया। देश के जनमानस का अब ध्यान करना होगा यह बात कमोबेश सभी सांसदों  ने स्वीकार की और इस आंदोलन के अच्छे परिणाम के रूप में इसे माना जा सकता है।
           देश के जिन रणनीतिकारों ने इस विषय पर संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बनाई हो वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि श्री अन्ना साहेब की वजह से देश के युवा वर्ग ने उसे देखा और यकीनन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रुचि बढ़ेगी। देश के संासदों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इस बात को अनुभव किया कि अन्ना साहेब की देश में एक महानायक की छवि है और उन पर आक्षेप करने का मतलब होगा देश की आंदोलित युवा पीढ़ी के दिमाग में अपने लिये खराब विचार करना इसलिये शब्दों के चयन में सभी ने गंभीरता दिखाई। बहरहाल कुछ सांसदों ने प्रचार माध्यमों पर आंदोलन को अनावश्यक प्रचार का आरोप लगाया पर उन्हें यह भी याद रखना होगा इसी विषय पर हुए विशेष सत्र के बहाने उन्होंने पूरे देश को संबोधित करने का अवसर पाया जिसे इन्हीं प्रचार माध्यमों ने अपने समाचारों में स्थान दिया। यह अलग बात है कि इस दौरान उनके विज्ञापन भी अपना काम करते रहे। वैसे तो संसद की कार्यवाही चलती रहेगी पर इस तरह पूरे राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर सांसदों के पास बहुत समय बाद आया। उनको इस बात पर भी प्रसन्न होने चाहिए कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र को संबोधित न करने के कारण जनप्रतिनिधियों पर देश के जनमानस की उपेक्षा का आरोप लगता है वह इस अवसर के कारण धुल गया क्योंकि उन्होंने देश की इच्छा को ही व्यक्त किया।
         हम जैसे आम लेखकों के पास इंटरनेट और प्रचार माध्यम ही है जिसके माध्यम से विचारणीय सामग्री मिलती है यह अलग बात है कि उसे छांटना पड़ता है। होता यह है कि समाचार पत्र और टीवी चैनल अपनी रोचकता का स्तर बनाये रखने के लिये किसी एक घटना में बहुत सारे पैंच बना देते हैं और फिर अलग अलग प्रस्तुति करने लगते हैं। सामग्री में दोहराव होता है और जब पाठकों और दर्शकों के अधिक जुड़ने की संभावना होती है तो उनके विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं। समस्त प्रचार माध्यम धनपतियों के हाथ में और यही कारण है कि अन्ना साहेब के आंदोलन के प्रायोजन की शंका अनेक बुद्धिमान लोगों के दिमाग में आती है। इसमें कुछ अंश सच हो सकता है पर एक बात यह है अन्ना साहेब एक सशक्त चरित्र के स्वामी हैं।
             आखिरी बात यह है कि भोगी कितना भी बड़ा पद पा जाये वह बड़ा नहीं कहा जा सकता। बड़ा तो त्यागी ही कहलायेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना साहेब ने अन्न का त्याग किया था। पूरे 12 दिन तक अन्न का त्याग करना आसान काम नहीं है। हम जैसे लोग तो कुछ ही घंटों में वायु विकार का शिकार हो जाते हैं। अन्ना साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना लोगों के सामने प्रस्तुत की है जो अभी स्वप्न ही लगता है पर सबसे बड़ी बात वह अभी अपने प्रयास जारी रखने की बात भी कह रहे हैं। मुश्किल यह है कि वह अनशन शुरु कर देते हैं तब आदमी का हृदय कांपने लगता है। यही कारण है कि उनका अनशन टूटना भी ही लोगों में विजयोन्माद पैदा कर रहा है। उन्होंने जिस तरह आज की युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त बनाया उसकी प्रशंसा तो की ही जाना चाहिए जो कि अंततः हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वाहक हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

--------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Aug 16, 2011

अन्ना हजारे (अण्णा हजारे) की ध्यान मुद्रा दिलचस्प रही-हिन्दी लेख (anna hazare kee dhyan mudra-hindi lekh)

         समसामयिक विषयों पर लिखना इसलिये भी व्यर्थ लगता है क्योंकि उसको कुछ समय बाद पढ़ने पर ही बासीपन का अहसास होता है। किस्सा अन्ना हजारे साहेब की गिरफ्तारी और रिहाई का है। सुबह उनकी गिरफ्तारी की खबर पर उस पर लिखने की बात समझ में नहीं आयी क्योंकि हमें पता था कि समसामयिक घटनाओं में दिन भर में बहुत सारा बदलाव आता है। शाम को जब लौटे तो उनके रिहा होने की खबर मिली। इसका मतलब गिरफ्तारी पर लिखते तो वह शाम तक बासी हो जाता।उससे पहले भी उन्होंने एक आंदोलन किया था जिस पर हमने लिखा। वह सामयिक था पर अभी भी पढ़ा जा रहा था। इंटरनेट पर जहां यह सुविधा कि किसी विषय पर आपके हाथ से लिखा कभी पढ़ा जा सकता है तो यह समस्या भी है कि वह तब भी पढ़ा जायेगा जब उसे पढ़ने की अवधि निकल चुकी हो।
           इधर अन्ना साहेब का भारतीय प्रचार माध्यमों पर फिर जोरदार ढंग से अवतरण हुआ। उनके आंदोलन की बात सामने आयी। तब समझ में नहीं आ रहा था कि उसके परिणामों पर क्या अनुमान जतायें। इस पर एक लेख तीन चार दिन पहले तब लिखा था जब उनके प्रचार ने अभी गति नहीं पकड़ी थी। जैसे ही प्रचार ने जोर पकड़ा तो एकदम उस पर पाठक आ गये। अन्य कई लेख भी आये पर उनकी अवधि बीत चुकी थी। इस आंदोलन को लेकर हमारा नजरिया दूसरा है। अगर अन्ना हज़ारे साहब के आंदोलन से देश में कुछ बदलाव आये तो हम खुश होंगे पर अभी निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना नहीं है। उनकी मांगों पर विवाद है और इस देश की समस्या यही है कि यहां आदमी समाज हित की बात इसी शर्त पर सोचता है कि उसे नाम या नामा मिले तभी करेगा। खास आदमी अधिक चाहता है तो आम आदमी भी कम से कम चाहता है। सीधी बात कहें तो समाज की सोच में ही दोष है इसलिये जब तक उसमें बदलाव नहीं आयेगा सारी बातें हवा होती दिखेंगी। बहरहाल अन्ना साहेब के प्रयासों से उनको उनको देश में अच्छी खासी लोकप्रियता मिली। 15 अगस्त से पूर्व गांधी समाधि पर जाकर उन्होंने जाकर जो ढाई घंटे तक ध्यान लगाया वह दर्शनीय था। देखा जाये तो उनको भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सांसरिक विषय है पर ध्यान एकदम अध्यात्मिक क्रिया है। अन्ना की देश में लोकप्रियता है और अगर इस बहाने ध्यान पद्धति का प्रचार हो जाये तो बहुत अच्छा रहेगा। सांसरिक विषय कभी समाप्त नहीं होते पर ध्यान सिद्धि हो तो वह आदमी को अनेक पीड़ाओं से मुक्ति दिलाती है।
            इस प्रसंग में बाबा रामदेव की बात की जाये। अभी तक उनकी लोकप्रियता उनके योग प्रशिक्षण की वजह से थी और राजनीतिक दल बनाने या भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उसमें एक प्रतिशत भी वृद्धि नहीं हुई। हम जैसे लोग उनकी अध्यात्मिक छवि की प्रशंसा करते हैं। योग साधना से व्यक्ति निर्माण होता है यह अलग बात है कि उसका अहसास नहीं होता। व्यक्ति निर्माण से समाज में स्वतः स्फृर्ति का संचार होता है। वैसे बाबा रामदेव के आलोचक उनको व्यायाम शिक्षक की उपाधि तक ही सीमित मानते हैं। दरअसल बाबा रामदेव अपने प्रशिक्षण में ध्यान की उस शक्ति की बात नहीं करते जो वाकई मनुष्य को तेजस्वी बनाती है। हमें यह पता नहीं था कि अन्ना हजारे साहिब भी ध्यान की कला में दक्ष हैं। देखा तो अच्छा लगा।
              उनके ध्यान की मुद्रा वाकई बहुत दर्शनीय थी। हमारी अनुभूति के अनुसार ध्यान के बाद संविधान क्लब पर उनका जो भाषण हुआ वह अन्य भाषणों से अलग था। उन्होंने इस भाषण में जनलोकपाल की ही नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की बात भी कही जो शायद हमने अभी तक उनके मुख से नहीं सुनी थी। तब हम सोच रहे थे कि उनके अंदर इस नवीन विचार का संचार क्या यह उनके ध्यान का परिणाम था?
          मान लीजिये वह अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से विख्यात नहीं भी होते और ध्यान की कला का प्रशिक्षण देते होते तो शायद वह बाबा रामदेव की तरह ही लोकप्रिय होते। बहरहाल इन दोनों  महानुभावों के प्रति हमारे मन में आकर्षण उनके सांसरिक विषयों से अधिक योग साधना और ध्यान की वजह से अधिक है। हमारा मानना है कि अध्यात्मिक विषयों में पारंगत विषय सांसरिक विषयों से परे तो नहीं भागता पर उन पर इस तरह नियंत्रण रखता है कि उनमें ऊंच नीच की चिंता उनको नहंी होती। बहरहाल जब हम सांसरिक विषयों पर लिखते हैं तो इस बात को नहीं भूलते कि उसका अध्यात्मिक पक्ष भी लिखना चाहिए। हमारा देश लोकतांत्रिक है इसलिये यहां आंदोलन तो चलते ही रहेंगे। विवाद भी होंगे पर उनसे जुड़े पात्रों का अध्यात्मिक पक्ष देखन रुचिकर लगता है। सच बात तो यह है कि जब हमने उनको ध्यान लगाते देखा तो फिर उनके सांसरिक विषयों से ध्यान हटकर उनकी अध्यात्मिक शक्ति की तरफ आकृष्ट हो गया। यही कारण है कि इस लेख में उनके सांसरिक विषय से अधिक ध्यान की मुद्रा पर लिखने की प्रेरणा मिली।
-----------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Aug 8, 2011

जनभक्षी-हिन्दी व्यंग्य शायरियाँ (janbhakshi-hindi vyangya shayriyan)

जन जन के भले की बात करते हुए
कई फरिश्ते जनभक्षी हो गए हैं,
दाने खिलाने के लिए हाथ फैलाते हैं
जिनको खिलाने के लिए
वही जन उनके लिए
शिकार करने वाले पक्षी हो गए हैं।
-----------------------
नरभक्षियों का समय गया
अब खतरा जनभक्षियों का हो गया है,
चेहरे काले नहीं खूबसूरत हैं,
हाथों में तलवार की जगह
जुबान के हर शब्द में प्यार है,
मगर जन जन के भले की बात
करने वाले इन फरिश्तों के लिए
आम इंसान
शिकार करने लायक पक्षियों जैसा हो गया है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Aug 2, 2011

ख्याली रोटियाँ कभी नहीं पक पाएँगी-हिन्दी व्यंग्य कविता (khyali rotiyan pak nahin paengi-hindi vyangya kavita)

पत्थरों पर है टिकी है आस्था
उन पर पाँव मत रखना
वरना टूट जाएंगी,
धरती को चाहे जितना रौंदते रहो
मगर पर्दे पर चमकने वाली
देवियों पर से नज़र मत हटाना
वरना खुशियां रूठ जाएंगी।
सुना रहे हैं रोज
एक नया आसमानी सच
बाज़ार के सौदागरों के भौपू
उन पर ही कान धरना
वरना तरक्की की उम्मीदें रूठ जाएंगी।
यह अलग बात है
लुटते रहोगे हमेशा
ख्याली रोटियाँ कभी नहीं पक पाएँगी।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।