Mar 20, 2013

सताने वाला सपना-हिन्दी शायरी satane wala sapana-hindi shayri or poet

झूठ बोलना नहीं आता,
सच सहन कर सके कोई इंसान
सामने नज़र नहीं आता,
पाखंड पसंद जमाने को
लुभाने के लिये ख्वाब बेचना सरल है
आकाश में उड़ने की चाहत लिये
सभी खड़े हैं बाज़ार में
हकीकत की जमीन पर गिरते
जब मदहोश लोग
दिल बहलाने वाले खिलौने का
सच तभी उनके सामने आता।
कहें दीपक बापू
दिल का सच
अंदर ही सांस लेता रहता है
अपने दर्द का इलाज कर लेते है
हम अपनी सांसों से
सता सके कोई सपना
ऐसा कभी अपनी सोच में नहीं आता।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Feb 17, 2013

मन का गुलशन-हिन्दी शायरी (man ka gulshan-hindi shayri

बालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापू
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटे
हैंउनके ख्वाब आंखों से रूठे हैं,
अब तक रहे हैं
जवां शार्गिदों के माटी से बने पत्थर दिल में
कब बहेगी नदी बनकर दया।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Jan 27, 2013

फर्जी फरिश्ते-हिन्दी कविता (farzi farishtey-hindi kavita or poem)


जोश में मिटा रहे
पुराने नाम और निशान,
अपनी बाहों की ताकत
आजमाकर कमजोर पर
दिखा रहे ताकतवद अपनी शान।
कहें दीपक बापू
फर्जी फरिश्ते पर्दे पर रंगीन कपड़ों के साथ चमकते
 सफेद कागजों पर काले अक्षरों में रोज छपते उनके नाम
हकीकत यह है कि
नहीं है बिल्कुल जान,
बेज़ार ज़माना आकाश में ताक रहा है
कोई रहनुमा कभी तो आयेगा
बचायेगा उनकी उनकी जान।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Jan 18, 2013

तस्वीर में मुस्कराता चेहरा-हिन्दी कविता (taswir mein muskarata chehra-hindi kavita or hindi poem)

तस्वीर में मुस्कराते चेहरे देखकर
उनकी दिल में छिपी उदासी का ख्याल आता है,
जिसने उतारा है उनका चेहरा
अपनी आंखों से
कहा होगा उन्हें मुस्कराने के लिये
यह साफ नज़र आता है।
कहें दीपक बापू
जिंदगी का बोझ ढो रहा है पूरा ज़माना
दौलत नहीं है तो दुःख दूर है
अगर हो तो भी सुख कहां निभाता है,
हां, मोहब्बत है जिनके साथ
उनकी सोहब्बत में
न चाहते हुए भी
मुस्कराना सभी को भाता है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
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Jan 6, 2013

विदुर नीति के आधार पर चिंतन-असमय बोलने पर बृहस्पति महाराज का भी अपमान हो सकता है (asamay bolne par brahspati ka bhi apmaan ho sakta hai-vidur neei ke adhar par chinttan)

          कुछ लोगों का आदत होती है कि वह हमेशा ही कुछ बोलना चाहते हैं।  हम आपसी वार्तालाप में यह देखते हैं कि अनेक लोग एक तो फालतु बातें करते हैं या फिर असमय ऐसा विषय उठाते हैं जिस पर चर्चा करना व्यर्थ लगता है।  आज के आधुनिक युग में अभिव्यक्ति के साधनों का दायरा बढ़ा है तो यह भी देखने में आ रहा है कि कोई भी किसी भी विषय पर कुछ भी बोल सकता है।  कभी कभी तो कुछ लोगों के बोलने पर हंसी आ जाती है।   हमेशा विज्ञान पढ़ने वाले अर्थशास्त्र पर बोलते हैं तो गणित पढ़ने वाले अध्यात्मिक विषय पर अपना ज्ञान बघारते हैं।
       अगर किसी ने साधु का वेश घारण किया या  समाजसेवक का चोला पहन लिया तो समझ लीजिये वह अपने आपको हर विषय में पारंगत मान लेता है।  आम आदमी की बात छोड़िये समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों में काम करने वाले बुद्धिमान तक उनके दावे को स्वीकार कर उनकी बातों को महत्व देते हैं। यह अलग बात है कि यह बातें विवादास्पर होती हैं जिन पर चर्चा करने से विज्ञापन का समय आसानी से पास होता है।
    आजकल वेश और पद एक तरह से महाविद्वान होने का प्रमाण पत्र बन गये हैं।  सबसे ज्यादा हंसी अध्यात्मिक तथा सामाजिक विषयों पर बोलने वालों पर आती है।  कई लोग तो ऐसे हैं कि जिन्होंने अध्यात्म का ज्ञान रटने के बाद  उसे सुनाने के लिये मैदान में उतर पढ़ते हैं।  कुछ तो शिष्यों का संग्रह कर समाज को सुधारने के लिये अभियान भी छेड़ देते हैं।  उनका सारा प्रयास नारों के सहारे होता है।  यही कारण है कि हमारे देश में कोई धार्मिक या सामाजिक अभियान कभी निर्णायक नहीं बन सका।
महाराज विदुर का कहना है कि
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अप्राप्तकालं वचं बृहस्पतिरपि ब्रुवन।
लभते बृदध्यवज्ञानामानं च भारत।।
      हिन्दी में भावार्थ-असमय अगर स्वयं बृहस्पति भी बोलें तो उन्हें अपमान झेलना पड़ेगा और उनको अपनी बुद्धि का तिरस्कार होगा।
द्वेष्यो न साधुर्भवति न  मेधावी न पण्डितः।
प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेषये पापानि चैव ह।
     हिन्दी में भावार्थ-जिससे मन में द्वेष हो जाता है वह साधु, विद्वान और बुद्धिमान हो तो भी  भारी दोषों से युक्त प्रतीत होता है। जो प्रिय है उसमें ढेर सारे दोष होने पर भी नहीं दिखते पर जिसके शत्रु भाव है उसके सारे काम पापमय दिखते हैं।
               अनेक लोग शोक के अवसर पर हास्य का भाव पैदा करते हैं तो हास्य के भाव पर रुदन करते हैं।  एक दूसरी भी प्रवृत्ति देखी जाती है कि अधिकतर  लोग अपने भावनात्मक दुराग्रहों के साथ जीते हैं।  जिससे स्वार्थ पूरा होता है वह चाहे दुष्ट भाव वाला क्यों न हो, उनके लिये देव है पर  जिससे कोई स्वार्थ नहीं है वह उनके लिये महत्वहीन है।  अगर कोई विद्वान भी किसी व्यक्ति के अहंकार पर बौद्धिक प्रहार करता या  मानसिक आघात पहुंचाता है तो एक तरह वह शत्रु ही मान लिया जाता है।  असली दवा कड़वी होती उसी तरह अहंकार से भरे मनुष्यों के लिये सत्य सुनना कठिन है।  ऐसे में जिन लोगों ने अपने विद्वान होने का प्रमाण पत्र जोड़ लिया है उनसे सत्य पर बहस करना व्यर्थ है।
       बहरहाल जिन लोगों को अपना जीवन संवारना है उन्हें अपने विवेक से काम लेना चाहिये।  अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर ज्ञान और विज्ञान का मस्तिष्क में संग्रह कर अपने जीवन में उस पर अमल करना सहज जीवन जीने का एक सहज उपाय है।  टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में अनेक ऐसे विद्वान भी प्रकट होते हैं जो ज्ञानी हैं पर यकीनन वह अधिक प्रचार नहीं पाते।  वह निर्विवाद तक देते हैं जबकि आज के प्रचार माध्यम विवादास्पद विद्वानों को तरजीह देते हैं ताकि उनके निरर्थक बहसों के चलते उनके साथ बने रहें।
       कहने का अभिप्राय यह है कि हमें स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिये। उचित समय पर बोले और जिस विषय पर आधिकारिक ज्ञान हो उसी पर बोले।  ऐसा न करने पर तिरस्कार और अपमान झेलना पड़ता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Dec 29, 2012

शोक, बहस और विज्ञापन-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (shok, bahas aur vigyapan-laghu hindi hasya vyangya,short hindi satire article

                     दो प्रचार प्रबंधक एक बार में सोमरस का उपभोग करने के लिये   गये। बैरा उनके कहे अनुसार सामान लाता और वह उसे उदरस्थ करने के बाद इशारा करके पास दोबारा बुलाते तब फिर आता। दोनों आपस में अपने व्यवसाय से संबंधित बातचीत करते रहे।  एक प्रचार प्रबंधक ने दूसरे से कहा‘-‘‘यार, मेरे चैनल का मालिक विज्ञापनों का भूखा है।  कहता है कि तुम समाचार अधिक चलाते हो विज्ञापन कम दिखाते हो।’’
      दूसरा बोला-‘‘यार, मेरे चैनल पर तो समाचारों का सूखा है।  इतने विज्ञापन आते हैं कि समझ में नहीं आता कि समाचार चलायें कि नहीं। जिन मुद्दों पर पांच मिनट की बहस होती है  हम पच्चपन मिनट के विज्ञापन चलाते हैं।  हालांकि इस समय मुसीबत यह है कि हर रोज कोई मुद्दा मिलता नहीं है।’’
      पहला बोला-‘‘अरे, इसकी चिंता क्यों करते हो? हम और तुम मिलकर कोई कार्यक्रम बनाते हैं। राई को पर्वत और रस्सी को सांप बना लेंगे। अरे दर्शक जायेगा कहां? मेरे चैनल  या तुम्हारे चैनल पर जाने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है।
   इतने में बैरा उनके आदेश के अनुसार सामान ले आया।  उसकी आंखों में आंसु थे। यह देखकर पहले प्रचार प्रबंधक ने उससे पूछा कि ‘‘क्या बात है? रो क्यों रहे हो? जल्दी बताओ कहीं हमारे लिये जोरदार खबर तो नहीं है जिससे हमारे विज्ञापन हिट हो जाये।’’
            बैरा बोला-‘‘नहीं साहब, यह शोक वाली खबर है।  वह मर गयी।’’
           दोनों प्रबंधक उछलकर खड़े हुए पहला बोला-‘‘अच्छा! यार तुम यह पैसा रख लो। सामान वापस ले जाओ। हम अपने काम पर जा रहे है। आज समाचार और बहसों के लिये ऐसी सामग्री मिल गयी जिसमे हमारे ढेर सारे विज्ञापन चल जायेंगे।’’
           दूसरा बोला-‘‘यार, पर शोक और उसकी बहस में विज्ञापन! देखना लोग बुरा न मान जायें।’’
           पहला बोला-‘‘नहीं यार, लोग आंसु बहायेंगे। विज्ञापन देखकर उनको राहत मिलेगी। हम फिर उनको रुलायेंगे। देखा नहीं उसके  बस से लेकर उसके अस्पताल रहने तक  हमने समाचार और बहस में कितने विज्ञापन चलाये।’’
            दूसरा बोला-‘‘पहले यह तो इससे पूछो मरी कौन है?’’
           पहले ने बैरे से पूछा-‘‘यह तो बताओ मरी कौन है?’’
          बैरा रोता रहा पर कुछ बोला नहीं। दूसरे ने कहा-‘‘यार, यह तो मौन है।’’
               पहला बोला-‘‘चलो यार, अपने विज्ञापन का काम देखो।  यह हमारा कौन है?’’
दोनों ही बाहर निकल पड़े। पहले ने एक विद्वान को मोबाइल से फोन किया और बोला-‘‘जनाब, आप जल्दी आईये।  अपने साथ अपनी मित्र मंडली भी लाना। सभी अच्छा बोलने वाले हों ताकि दर्शक अधिक से अधिक हमने चैनल पर बने रहें। हमारा विज्ञापन का समय निकल सके।’’
            दूसरे ने भी मोबाईल निकाला और अपने सहायक से बोला-‘‘सुनो, जल्दी से विज्ञापन की तैयारी कर लो। एक खबर है जिस पर लंबी बहस हो सकती है। इसमें अपनी आय का लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलेगी।’’
दोनों अपने लक्ष्यों की तरफ चल दिये। उन्होंने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि ‘मरी कौन है’। इससे उनका मतलब भी नहीं था।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
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Dec 22, 2012

ज़माना अंधकार से बाहर न आया-हिन्दी कविता (Zamana andhkar se bahar n aaya-hindi kavita)

किस पर भरोसा करें
यहां हर कदम पर धोखा खाया,
हुकूमत पर क्या इल्जाम डालें
जनता के  हाथ पांव के साथ
दिमागी सोच को भी
पुरानी जंजीरों में बंधा पाया।
कहें दीपक बापू
हाथ में तख्तियां और मशाल
लेकर  बहुत लोग चले जुलूसों में
नारों से गूंजा बहुत बार आकाश
फिर भी ज़माना अंधकार से बाहर न आया,
शिकारी भीड़ में भेड़ों के साथ शामिल रहे
अकेले में भेड़िये बन गये
हालातों में बदलने की बात
सुनते सुनते पक गये कान
अच्छे समय की आस बनी रही
अलबत्ता ईमानदारी और यकीन को
हर दिन गर्त में जाते पाया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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