Mar 14, 2015

भूख की ताकत-हिन्दी कविता(bhookh ki taqat-hindi poem)


यह भूख की ताकत है
टूटे बर्तन में
सूखी रोटी भी
हजम हो जायेगी।

अभाव से लड़ती देह की
परिश्रम करने में
शरम खो जायेगी।

कहें दीपक बापू हमदर्दी से
चलता है जिनका रोजगार
उनसे आशा करना व्यर्थ है,
पाखंड में ही उनका अर्थ है,
अपने पसीने की
बहती धारा पर यकीन रखना
वही मरहम हो जायेगी।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Feb 28, 2015

ज़माने के नायक-हिन्दी कविता(zamane ke nayak-hindi poem)



समाज सेवा के व्यापार में
धोखे और चतुराई की
कला से होती कमाई।

सच की राह चलकर
कभी किसी ने
प्रतिष्ठा नहीं पाई।

कहें दीपक बापू आजकल
दलाल निभा रहे
ज़माने के सुधार में
नायक की भूमिका,
उनके चमचे निभा रहे
गायक की भूमिका,
समाज पर संकट के बादल
उतना कहर नहीं बरपाते,
जितनी बेशरमी ढहाते,
दर्द झेल रही वाणी ने
कभी आपत्ति नहीं जताई।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Feb 13, 2015

शब्दों के अर्थ तोलने की तराजू-हिन्दी कविता(shabdon ke arth tolne ki taraju-hindi poem)



वाणी से मौन रहें
तो लोग समझते बोलने के लिये
हमारे पास कुछ नहीं है।

शब्द बोलें तो
हमें लगता है कि
अर्थ तोलने की तराजू
उनके पास नहंी है।

कहें दीपक बापू महफिलों में
लगी भीड़ से
जिंदगी का सच रहता दूर
सजे चेहरों की अदायें
भले ही कितना लुभायें
खोलने के लिये नया राज
उनके पास नहीं है।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Feb 5, 2015

आशा की दृष्टि-हिन्दी कविता(asha ki drishti-hindi poem or kaivita)



कोई भी नया सपना
हमें दिखाता है
अपनी दृष्टि बड़ी आशा के साथ
बहुत देर तक
उसकी तरफ लगाते हैं।

होता है हमारे विश्वास का सौदा
अपनी  ही आंखों के  सामने
लुट जाने के बाद
अपनी बुद्धि को जगाते हैं।

कहें दीपक बापू अभाव साथी हैं
तब प्रतिष्ठा का भाव
समाज में ज्यादा नहीं रहता
यही सच जानकर
दिल के सौदागरों की
सजावट से अपनी
नीयत को स्वयं भगाते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Jan 27, 2015

अपने घर की रोटी खाते-हिन्दी कविता(apane ghar ki roti khate-hindi poem)



कब तक उनकी
प्रशंसा के गीत गाते
इंतजार करते रहते हम
सुखद अहसास
वह कभी साथ नहीं लाते।

वादों के व्यापारी अतिथि
अनेक बार घर आये,
हर बार नये सपने दिखाये,
ईमानदार इतने जरूर है
कभी पुराने शब्द नहीं बताते।

कहीं दीपक बापू खीजना बेकार
हम भी कभी उनके इंतजार में
अपनी आंखें नही पसारे बैठे
अपने चूल्हे पर पकती रोटी
सादगी से ही खाते।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Jan 17, 2015

दिल किसी से सटा नहीं था-हिन्दी कविता(dil kisi se sata nahin tha-hindi poem)



कांच का बर्तन था
टूट गया
दिल नहीं था कि रोयें।

कपड़ा रुई का था
फट गया
दिल नहीं था कि रोयें।

रुपया कागज का था
जेब से कट गया
दिल नहीं था कि रोयें।

कहें दीपक बापू लाभ हानि से
खुश होना
या रोना
 लोगों के लिये आम बात है
मायावी जगत में
ज़माने  के दांवपैंच को
हमने हंसते हंसते देखा,
अपने जाल में
चालाकों को भी फंसते देखा,
किसी खुशी या गम से सटा
दिल नहीं था कि रोयें।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Jan 7, 2015

दूसरों के लिये बबूल का जाल-हिन्दी कविता(doosron ke liye babool ka jaal-hindi poem)



नासिका में सुगंध के लिये

हर कोई फूल चुनता है।



कोई दूसरा खुश न रहे

इसलिये कम अक्ल इंसान

ज़माने के लिये

बबूल का जाल बुनता है।



कहें दीपक बापू कातिलों पर

मदद का आसरा

ताकतवर लोग भी करने लगे हैं,

अपनी अय्याशियां छिपाने के लिये

उनकी जेब भरने लगे हैं,

परायों से हादसे पर

दिखावे का गम जताते हैं,

अपनी जिंदगी का जश्न

कमजोर के दर्द पर मनाते हैं,

यह अलग बात है

हथियार की आंख नहीं होती

कभी वह उनके सीने भी

निशाने के लिये चुनता है।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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