Dec 5, 2015

समविषम का संकट-हिन्दी हास्य कविता (Troble of Odd-Even -Hindi Satire poem)

पैदल चलकर भी खुश हैं
जिनके घर में
अभी तक कार नहीं आई।

पर्यावरण प्रदूषण से जूझते
अभियानों की धमक
उनके द्वार नहीं आई।

कहें दीपकबापू चलते चलते
टांग थक जाती है
फिर भी अब दर्द कम लगता है
समविषम के संकट से
बचने की मनुहार जो नहीं गायी।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Nov 26, 2015

प्रायोजित पूजा-हिन्दी कविता(Prayojit Puja-Hindi Kavita)


 बड़बोले कभी
शब्दवीर नहीं होते।
मति में चिंत्तन से
अधिक चिंतायें पालते
वाणी में तीर नहीं होते।

कहें दीपकबापू दिल के सौदे में
सौदागर हुए मालामाल
तेज घावक बन गये
बिगड़ी थी जिनकी चाल
जूझते दाम के लिये
प्रायोजित पूजा करवाते
मगर वह पीर नहीं होते।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Nov 17, 2015

बौद्धिक विलास-हिन्दी शायरी(bauddhik wilas-Hindi Shayari)

आकाश से फैंके बम
खिलौने की तरह
इंसान तोड़ देते हैं।

सजाते हैं महफिल
अमन के नाम पर
चाय का धुंआ छोड़ देते हैं।

कहें दीपकबापू सिंहासनों पर
विराजे लोग नहीं करते
कभी बौद्धिक विलास
कारिंदों के मस्तिष्क से
अपने कदम जोड़ देते हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Nov 7, 2015

मन का खेल-हिन्दी कविता(Man ka Khel-Hindi Kavita)


विलासिता में जिंदगी
बिताने वाले
दर्द से जल्दी कराहते हैं।

नहीं देखे कभी जिन्होंने
नाकामी के दौर
पसीने को सराहते हैं।

कहें दीपकबापू मन का खेल है
महल में रहने वाले
सड़क पर सोते लोगों को
सुखी मानते
जमीन पर सोने वाले
बिस्तर पाने के लिये
पसीना बहाते हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Oct 30, 2015

मन के अभ्यास से-हिन्दी कविता(Man ke Abhyas se-Hindi Kavita)


दिमाग के भूत से
बचा सके इंसान को
बना कोई ताबीज नहीं है।

बिना श्रम के
सफलता की फसल उगाये
ऐसा कोई बीज नहीं है।

कहें दीपकबापू आत्मविश्वास से
जिंदगी का मार्ग सहज हो जाये
मन के अभ्यास से बुद्धि आये
वरना शिखर तक पहुंचाये
कोई ऐसी चीज नहीं है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Oct 19, 2015

मन के पतंगे-हिन्दी कविता(Man ke Patange-Hindi Kavita)

चंद लोग नारे लगाते
भीड़ वहीं जमा हो जाती है।

भलाई का नारा सबसे महंगा
 बिकने के बाद
छद्म साफ नीयत भी
कमा सो जाती है।

कहें दीपकबापू मन के पतंगे
सपनों में गंवा देते जान
ढूंढते तबाही में शान
झुलसाने के बाद
शमा खो जाती है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Oct 8, 2015

लालच की परत-हिन्दी कविता(Lalch ki parat-Hindi Kavita)


काठ की हांडी एक बार चढ़े
वह जल जाये तो
दूसरी भी चढ़ जाती है।।

एक चढ़ा कर जलाये
दूसरा लेकर आता
कहानी बढ़ जाती है।

कहें दीपकबापू अज्ञानियों से
भरा पूरा समाज
अपने खून से पैदा करता बाज
ज्ञान जुबान पर सभी के
मगर फिर भी हारते
दिमाग पर लालच की
परत चढ़ जाती है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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