हमने देखा था उगता सूरज
उन्होने देखा डूबता हुआ
वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में
जश्न मनाने की तैयारी
पर हमने देखा था पूरा दिन
हमारा मन भी था डूबा हुआ
वह आसमान में टिमटिमाते तारों की
बात करते हुए खुश हो रहे थे
जबकि हमारा बदन था
तब भी पसीने की बदबू लिया हुआ
सबकी जमीन और आसमान
अलग-अलग होते हैं
किसी को रात डराती है तो किसी को दिन
किसी को भूख नहीं लगती किसी को सताती है
इसलिए सब होते हैं अकेले
क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ
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समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
Feb 28, 2008
Feb 1, 2008
क्या तुमने यह ख्वाब देखा है-कविता साहित्य
जाने-पहचाने सफर पर तो
रोज चलते हैं
पर कभी अनजाने सफर पर
चलकर भी देखा है
जान-पहचान के लोगों से
मिलकर तो रोज
कभी जानी हुई बात करते हैं
पर क्या कभी अनजान लोगों से
अपने को अनजानी बाते करते देखा
रोज वही चेहरे और वही स्वर
मन को नहीं लुभा सकते
चाहे कितने दिल और देह के करीब हों
कभी अपने मन को
अनजानों में एक अनजान की तरह
घूमने के लिए तरसते देखा है
जाने-पहचाने लोगों की महफ़िल में
भला कहाँ प्यार मिल पाता है
कभी अनजान चेहरों में
तुमने हमदर्दी का भाव देखा है
दुनिया उससे बहुत बड़ी है
जितनी तुम देखते हो
इस छोर से उस छोर तक
बहुत कुछ है देखने लायक
पर क्या तुमने उसको अपने से
दूर तक देखने का ख्वाब देखा है
रोज चलते हैं
पर कभी अनजाने सफर पर
चलकर भी देखा है
जान-पहचान के लोगों से
मिलकर तो रोज
कभी जानी हुई बात करते हैं
पर क्या कभी अनजान लोगों से
अपने को अनजानी बाते करते देखा
रोज वही चेहरे और वही स्वर
मन को नहीं लुभा सकते
चाहे कितने दिल और देह के करीब हों
कभी अपने मन को
अनजानों में एक अनजान की तरह
घूमने के लिए तरसते देखा है
जाने-पहचाने लोगों की महफ़िल में
भला कहाँ प्यार मिल पाता है
कभी अनजान चेहरों में
तुमने हमदर्दी का भाव देखा है
दुनिया उससे बहुत बड़ी है
जितनी तुम देखते हो
इस छोर से उस छोर तक
बहुत कुछ है देखने लायक
पर क्या तुमने उसको अपने से
दूर तक देखने का ख्वाब देखा है
Jan 24, 2008
अपने आसरे चलना सीख नहीं पाते-कविता साहित्य
कितनी बार टूटता भरोसा
फिर भी हम किये जाते
क्योंकि अपने लिए इसके
अलावा कोई रास्ते नहीं बन पाते
अपने नसीबों पर करते हैं
हमेशा भरोसे की बात
पर दिल से खौफ इंसानों का निकाले नहीं पाते
खडे होते एक जगह
पर भटकता मन कहीं दूर
कोई तो बन जाये हमारा हुजुर
अपने इरादों पर चलने से घबडाते
अपना भरोसा दिखाकर
कितने ढहाते सितम-दर-सितम
पर हम खामोशी से सह जाते
सिलसिला चलता है बरसों तक
फिर भी अपने आसरे चलना सीख नहीं पाते
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फिर भी हम किये जाते
क्योंकि अपने लिए इसके
अलावा कोई रास्ते नहीं बन पाते
अपने नसीबों पर करते हैं
हमेशा भरोसे की बात
पर दिल से खौफ इंसानों का निकाले नहीं पाते
खडे होते एक जगह
पर भटकता मन कहीं दूर
कोई तो बन जाये हमारा हुजुर
अपने इरादों पर चलने से घबडाते
अपना भरोसा दिखाकर
कितने ढहाते सितम-दर-सितम
पर हम खामोशी से सह जाते
सिलसिला चलता है बरसों तक
फिर भी अपने आसरे चलना सीख नहीं पाते
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Jan 23, 2008
उदास हो जाना कभी अच्छा लगता है-कविता साहित्य
उदास हो जाना कभी अच्छा लगता है
ख़्वाबों को हमेशा टूटे देख
सपनों को बिखरते देख
कब तक और किससे लड़ें
खामोश हो जाना अच्छा लगता है
जमीन और आकाश के बीच
जिन्दगी जब थकती सी लगे
अपनों से दूरी बढ़ने लगे
कुछ पाकर भी दिल होता बेचैन
अपने दर्द से भीग जाएं अपने नैन
उदास हो जाना कभी अच्छा लगता है
कायदों के करें हमेशा अपनी बात
वही फायदे के लिए मारते लात
कभी गुस्सा तो कभी बेचैनी से
भर जाता है मन
बिना आग के ही जलता मन
तब खामोशी ओढ़ना लगता ठीक
उदास हो जाना कभी अच्छा लगता है
ख़्वाबों को हमेशा टूटे देख
सपनों को बिखरते देख
कब तक और किससे लड़ें
खामोश हो जाना अच्छा लगता है
जमीन और आकाश के बीच
जिन्दगी जब थकती सी लगे
अपनों से दूरी बढ़ने लगे
कुछ पाकर भी दिल होता बेचैन
अपने दर्द से भीग जाएं अपने नैन
उदास हो जाना कभी अच्छा लगता है
कायदों के करें हमेशा अपनी बात
वही फायदे के लिए मारते लात
कभी गुस्सा तो कभी बेचैनी से
भर जाता है मन
बिना आग के ही जलता मन
तब खामोशी ओढ़ना लगता ठीक
उदास हो जाना कभी अच्छा लगता है
Jan 22, 2008
अनजाने लोगों के बीच ढूँढें सच्चा प्यार-कविता साहित्य
जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार
पर मिलती है सब जगह से दुत्कार
खुद करो चाहे किसी से भी तुम
मांगो न किसी से इसका उपहार
लोग नहीं निकल पाते अपने दिल से
खरीदा और बिकता पैसे से यहाँ प्यार
भाषा में बहुत होते हैं सुन्दर शब्द
पर बोलने में सब लोग हैं लाचार
अपनों में कितना भी तलाशो नहीं मिलता
गैरों भी नहीं मिल सकता जल्दी प्यार
शब्द में होती ढेर सारी शक्ति
पर पैसे से ही लोग देते-लेते प्यार
बेहतर है निकल पड़े अनजाने सफर पर
शायद कहीं मिल जाये प्यार
अपनों की भीड़ में रहकर ऊबने से अच्छा है
अनजाने लोगों के बीच ढूँढें सच्चा प्यार
पर मिलती है सब जगह से दुत्कार
खुद करो चाहे किसी से भी तुम
मांगो न किसी से इसका उपहार
लोग नहीं निकल पाते अपने दिल से
खरीदा और बिकता पैसे से यहाँ प्यार
भाषा में बहुत होते हैं सुन्दर शब्द
पर बोलने में सब लोग हैं लाचार
अपनों में कितना भी तलाशो नहीं मिलता
गैरों भी नहीं मिल सकता जल्दी प्यार
शब्द में होती ढेर सारी शक्ति
पर पैसे से ही लोग देते-लेते प्यार
बेहतर है निकल पड़े अनजाने सफर पर
शायद कहीं मिल जाये प्यार
अपनों की भीड़ में रहकर ऊबने से अच्छा है
अनजाने लोगों के बीच ढूँढें सच्चा प्यार
Jan 21, 2008
चैन से जिन्दगी की जंग लड़ने भी नहीं देते- कविता साहित्य
हमारे लिए जिनके मन में दर्द है
उनका प्यार हमें डरा देता है
सोचते हैं कि हम ही झेलें अपनी पीडा
किसी दूसरे को क्यों सताएं
हमारे लिए कोई और तडपे
यह ख्याल ही दर्द बढा देता है
समय गुजरता जायेगा
अपने इरादों को हम पहुंचा देंगे
यही सबको बताते
पर लोग हैं कि यकीन नहीं करते
हमें पसीना बहते देख
अपनी आंखों में पानी लाते
अक्ल के अंधे
बेरहम जमाने से लड़ते देख
पल-पल घबडा जाते
हम सोचते हैं कि वह क्यों नहीं होते दूर
चैन से हमें अपने जिन्दगी की जंग
कभी लड़ने क्यों नहीं देते
अपनी जिन्दगी से
पर कह नहीं पाते
फिर ख्याल आता है
जिन्दगी की जंग की हार-जीत से
बहुत बड़ी है हमदर्दी और प्यार
जो हम अपने चाहने वालों से पाते हैं
यही ख्याल हमें अपने से दूर हटा देता है
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उनका प्यार हमें डरा देता है
सोचते हैं कि हम ही झेलें अपनी पीडा
किसी दूसरे को क्यों सताएं
हमारे लिए कोई और तडपे
यह ख्याल ही दर्द बढा देता है
समय गुजरता जायेगा
अपने इरादों को हम पहुंचा देंगे
यही सबको बताते
पर लोग हैं कि यकीन नहीं करते
हमें पसीना बहते देख
अपनी आंखों में पानी लाते
अक्ल के अंधे
बेरहम जमाने से लड़ते देख
पल-पल घबडा जाते
हम सोचते हैं कि वह क्यों नहीं होते दूर
चैन से हमें अपने जिन्दगी की जंग
कभी लड़ने क्यों नहीं देते
अपनी जिन्दगी से
पर कह नहीं पाते
फिर ख्याल आता है
जिन्दगी की जंग की हार-जीत से
बहुत बड़ी है हमदर्दी और प्यार
जो हम अपने चाहने वालों से पाते हैं
यही ख्याल हमें अपने से दूर हटा देता है
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Jan 19, 2008
ऐसी कविता मत लिखो-कविता साहित्य
जो तुम्हारे मन की घुटन को
कभी दूर न कर श्के
जो तुम्हें दर्द देने वालों को
कदम पीछे हटने के लिए
मजबूर न कर सके
ऐसी कविता मत लिखो
शब्दों के दलालों की मंडी
सजी है सब जगह
कान और आँख खडे राशन में
एक लाइन की मजबूर की तरह
जो मिलेगा वही पढेंगे और सुनेंगे
भेद न सके गिरोह की चालों को
ऐसी कविता मत लिखो
तुम्हारे अन्दर की पीडा
बन जाये दूसरे के लिए अमृत तो ठीक
जहर बनकर किसी को डसे
तुम्हारे शब्द किसी को कर सकें
उसके मानसिक अंतर्द्वंद से मुक्त तो ठीक
पर वह भ्रम में जाकर फंसे
ऐसी कविता मत लिखो
तुम जिन हांड-मांस के पुतलों को
बोलते, देखते और सुनते देख रहे हो
अपने स्वार्थों की चाबी के भरे
रहने तक ही चलते हैं
खतरनाक चेहरे और आवाजों को
देखकर सहमते हैं
जो नहीं भर सकें उनमें
इंसानों जैसी संवेदनाएं
ऐसी कविता मत लिखो
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कभी दूर न कर श्के
जो तुम्हें दर्द देने वालों को
कदम पीछे हटने के लिए
मजबूर न कर सके
ऐसी कविता मत लिखो
शब्दों के दलालों की मंडी
सजी है सब जगह
कान और आँख खडे राशन में
एक लाइन की मजबूर की तरह
जो मिलेगा वही पढेंगे और सुनेंगे
भेद न सके गिरोह की चालों को
ऐसी कविता मत लिखो
तुम्हारे अन्दर की पीडा
बन जाये दूसरे के लिए अमृत तो ठीक
जहर बनकर किसी को डसे
तुम्हारे शब्द किसी को कर सकें
उसके मानसिक अंतर्द्वंद से मुक्त तो ठीक
पर वह भ्रम में जाकर फंसे
ऐसी कविता मत लिखो
तुम जिन हांड-मांस के पुतलों को
बोलते, देखते और सुनते देख रहे हो
अपने स्वार्थों की चाबी के भरे
रहने तक ही चलते हैं
खतरनाक चेहरे और आवाजों को
देखकर सहमते हैं
जो नहीं भर सकें उनमें
इंसानों जैसी संवेदनाएं
ऐसी कविता मत लिखो
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जमीन पर लहु बिखरा पड़ा है फिर भी उनका बयान किन्तु और परंतु शब्दों के साथ खड़ा है। मरने वालों पर बोले वह कुछ शब्द पर कातिलों का दर्द भी बया...
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तुम तय करो पहले अपनी जिन्दगी में चाहते क्या हो फिर सोचो किस्से और कैसे चाहते क्या हो उजालों में ही जीना चाहते हो तो पहले चिराग जलाना सीख...