Feb 27, 2012

आंदोलन की रेल यार्ड से बाहर आने की तैयारी में-हिन्दी लेख (bhrashtachar virodhi aandolan kee nayi taiyari-hindi lekh)

            टीवी या अखबार पर कोई समाचार देखकर ब्लॉग पर लिखना अपने आप मे एक अजीब परेशानी के साथ ही आश्चर्य भी पैदा करता है। हमने अन्ना हजारे के आंदोलन पर कल एक लेख लिखा था कि प्रचार माध्यमों ने उसे रेल की तरह यार्ड में खड़ा कर दिया है क्योंकि इस समय उत्तरप्रदेश में चुनाव चल रहे हैं जिसके कारण उनके पास विज्ञापन दिखाने के लिये पर्याप्त सामग्री है और जब उनके पास अपने प्लेटफार्म पर कोई सनसनीखेज मनोरंजन समाचार नहीं होगा तब वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को नयी साज सज्जा के साथ लायेंगे। इस लेख को लिखे एक घंटा भी नहीं हुआ था कि अन्ना हजारे साहेब के सेनापति का बयान आया जिसमें जनप्रतिनिधि सभाओं पर ही आक्षेप कर डाले। इसी कारण उनसे अनेक लोग नाराज हो गये। तत्काल इस विषय पर बहस प्रारंभ हो गयी। मतलब यह कि इधर उत्तरप्रदेश में चुनाव समाप्त होने की तरफ हैं तो इधर अब आंदोलन को एक बार फिर चर्चा में लाने का प्रयास भी शुरु हो गया।
इस विवादास्पद बयान को अन्ना साहेब के सेनापति ने ट्विटर पर भी जारी किया। प्रचार माध्यम आम ब्लाग लेखकों के साथ ही ट्विटर तथा फेसबुक वालों की तरफ ताकते नहीं है इसलिये यह कहना पड़ता है कि उनकी नज़र में बाज़ार से प्रायोजित लोग ही महत्वपूर्ण होते हैं। अब अन्ना जी के सेनापति साक्षात्कार भी आने लगे हैं। आरोपी और अपराधी में अंतर होना चाहिए, यह तक अब सुनाया जा रहा हैं। एक उद्घोषक ने सेनानति से पूछा कि-‘‘आप अब चुनाव खत्म होते ही अपनी छबि चमकाने के लिये पुनः अवतरित होने के लिये ऐसा बयान दे रहे हैं।’’
              सेनापति का बयान था कि‘‘इस तरह का बयान तो हम पहले भी दे चुके हैं, अब आप ही इसे तूल दे रहे हैं।’’
इस वार्तालाप से जाहिर है कि अगर अन्ना हजारे के समर्थक प्रचार समूहों से प्रायोजित नहीं है तो यह बात तो प्रमाणित होती है कि प्रचार प्रबंधक कहीं न कहीं स्वतः ही उनका उपयोग करने की कला में माहिर हैं। हम अन्ना हजारे के आंदोलन पर करीब से नज़र रखते रहे हैं। जिस तरह अन्ना के सक्रिय साथी और प्रचार माध्यम    एक साथ सक्रिय हुए इससे फिक्सिंग का संदेह आम आदमी को भी होगा इसमें संशय नहीं हैं।
             देश में भ्रष्टाचार हटना चाहिए इस तर्क से तो सहमति है पर कार्यप्रणाली को लेकर हमारा विचार थोड़ा अलग है। थोड़ा डरते हुए भी लिख रहे हैं बल्कि कहना चाहिए कि हमारी और उनकी सोच में ही मूलभूत अंतर है। बहरहाल अब यह देखना है कि प्रचार प्रबंधक किस तरह इस आंदोलन को भुनाते हैं। कहीं ऐसा न हो कि बिग बॉस की तरह यह भी फ्लाप योजना साबित न हो। इधर कॉमेडी सर्कस भी फ्लाप हो रहा है। सच कहें तो हमारे देश में मसखरे बहुत हैं पर मसखरी लिखना भी एक कला है जो विरलों को ही आती है। प्रचार प्रबंधकों के लिये इस समय सबसे बड़ा संकट यह होगा कि वह किस तरह कोई ऐसा विषय लायें जिससे देश के जनमानस को व्यस्त रखा जा सकें। 
                अन्ना हज़ारे का आंदोलन बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों की सोची समझी योजना का एक भाग है-यह संदेह हमेशा ही अनेक असंगठित स्वतंत्र लेखकों को रहा है। जिस तरह यह आंदोलन केवल अन्ना हजारे जी की गतिविधियों के इर्दगिर्द सिमट गया और कभी धीमे तो कभी तीव्र गति से प्रचार के पर्दे पर दिखता है उससे तो ऐसा लगता है कि जब देश में किसी अन्य चर्चित मुद्दे पर प्रचार माध्यम भुनाने में असफल हो रहे थे तब इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की रूपरेखा इस तरह बनाई कि परेशान हाल लोग कहीं आज के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, कला, टीवी तथा फिल्म के शिखर पुरुषों की गतिविधियों से विरक्त न हो जायेे इसलिये उनके सामने एक जननायक प्रस्तुत हो जो वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने वाले विज्ञापनों के बीच में रुचिकर सामग्री निर्माण में सहायक हो। हालांकि अब अन्ना हज़ारे साहब का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब जनमानस में अपनी छबि खो चुका है पर देखने वाली बात यह है कि प्रचार माध्यम अब किस तरह इसे नई साज सज्जा के साथ दृश्य पटल पटल पर लाते हैं।
           जब अन्ना हजारे का आंदोलन चरम पर था तब भी हम जैसे स्वतंत्र आम लेखकों के लिये वह संदेह के दायरे में था। यह अलग बात है कि तब शब्दों को दबाकर भाव इस तरह हल्के ढंग से लिखे गये कि उनको समर्थन की आंधी का सामना न करना पड़े। इसके बावजूद कुछ अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि वालों लोगों ने उसे भारी ढंग से लिया और आक्रामक टिप्पणी दी। इससे एक बात तो समझ में आयी कि हिन्दी में गूढ़ विषय को हल्के ढंग से लिखने पर भी यह संतोष मन में नहीं पालना चाहिए कि बच निकले क्योंकि अभी भी कुछ लोग हिन्दी पढ़ने में महारत रखते हैं। अभी अन्ना साहब को कहीं सम्मान मिलने की बात सामने आयी। सम्मान देने वाले कौन है? तय बात है कि बाज़ार और प्रचार शिखर पुरुषों के बिना यह संभव नहीं है। इसे लेकर कुछ लोग अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रायोजित होने का प्रमाण मान रहे तो उनके समर्थकों का मानना है कि इससे- क्या फर्क पड़ता है कि उनके आंदोलन और अब सम्मान के लिये पैसा कहां से आया? मूल बात तो यह है कि हम उनके विचारों से सहमत हैं।
             हमारी बात यहीं से शुरु होती है। कार्ल मार्क्स सारे संसार को स्वर्ग बनाना चाहते थे तो गांधी जी सारे विश्व में अहिंसक मनुष्य देखना चाहते थे-यह दोनों अच्छे विचार है पर उनसे सहमत होने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इन विचारों को वास्तविक धरातल क्रियाशील होते नहीं देखा गया। भ्रष्टाचार पर इंटरनेट पर हम जैसे लेखकों ने कड़ी हास्य कवितायें तो अन्ना हजारे के आंदोलन से पहले ही लिख ली थीं पर उनसे कोई इसलिये सहमत नहीं हो सकता था क्योंकि संगठित बाज़ार और प्रचार समूहों के लिये फोकटिया लेखक और समाजसेवक के प्रयास कोई मायने नहीं रखते। उनके लिये वही लेखक और समाजसेवक विषय वस्तु बन सकता है जिसे धनोपार्जन करना आता हो। सम्म्मान के रूप में भारी धनराशि देकर कोई किसी लेखक को धनी नहीं बनाता न समाज सेवक को सक्रिय कर सकता है। वैसे भी कहा जाता है कि जिस तरह हम लोग कूड़े के डिब्बे में कूड़ा डालते हैं वैसे ही सर्वशक्तिमान भी धनियों के यहां धन बरसाता है। स्वांत सुखाय लेखकों और समाजसेवकों को यह कहावत गांठ बांधकर रखना चाहिए ताकि कभी मानसिक तनाव न हो।
           उत्तर प्रदेश में चुनाव चल रहे हैं। विज्ञापनों के बीच में प्रसारण के लिये समाचार और चर्चा प्रसारित करने के लिये बहुत सारी सामग्री है। ऐसे में प्रचार समूहों को किसी ऐसे विषय की आवश्यकता नही है जो उनको कमाई करा सके। यही कारण है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को वैसे ही यार्ड में सफाई आदि के लिये डालकर रखा गया है कि जब प्लेटफार्म पर कोइ गाड़ी नहीं होगी तब इसे रवाना किया जायेगा। यह गाड़ी प्लेटफार्म पर आयेगी इसकी यदाकदा घोषणा होती रहती है ताकि उसमें यात्रा करने वाले यात्री आशा बांधे रहें-यदा कदा अन्ना हजारे साहब के इस अस्पताल से उस अस्पताल जाने अथवा उनकी अपने चेलों से मुलाकात प्रसारित इसी अंदाज में किये जाते हैं। ऐसा जवाब हमने अपने उस मित्र को दिया था जो अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की स्थिति का आंकलन प्रस्तुत करने को कह रहा था।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Feb 16, 2012

भलाई का कम और दाम -हिन्दी शायरी (bhalai ka dam-hindi shayari)

कसाई पशुओं का कत्ल
और वेश्या अपना जिस्म
बेचने के लिए अब भी
यूं ही बदनाम हैं,
पर्दे की पीछे कत्ल और
जिस्मफ़रोशों का धंधा करने वालों को
चौराहे पर मिलता सम्मान है।
कहें दीपक बापू
अब कोई भलाई का काम
बिना दाम लिए नहीं करता,
आँसू पोंछने के लिए हो
या मुस्कराहट बिखेरने के लिए
लोग तभी बाहर आते हैं
जब मिलता नामा और नाम है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Feb 10, 2012

यह दुनियाँ-हिन्दी शायरियाँ (yah duniya-hindi shayriyan, kavitaen or poem)

प्यार के सौदे किए जाते हैं,
खरीद फरोख्त की चीजों को नाम भी
इज्जते वाले दिये जाते हैं।
कहें दीपक बापू
इस दुनियाँ में
इश्क का खज़ाना अपने दिल में देखो
खुद पर मुस्कराओ
अपनी बात पर हंसो
मत बजाओ ताली
उनको देखकर
जो मुस्कराहट का सौदा किए जाते है।
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सभी व्यस्त हैं
मतलबपरस्ती में,
डूबे हैं अपनी मस्ती में,
मगर बेहतर इंसान दिखने के लिए
पाखंड करने का समय निकाल ही लेते हैं।
कहें दीपक बापू
हमने देखा है
पल पल में रंग बदलती इस दुनियाँ को
जहां गिरगिट भी शर्मा जाये
लोग बदलते हैं अपनी नीयत पल पल
जहां तारीफ मिलती हो
वहाँ लूटने के लिए बढ़ाते हाथ
मगर अपने घर के बिगड़े काम का
इल्ज़ाम भी दोस्तों पर डाल देते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Jan 29, 2012

प्रकृति और संवेदनाएँ-हिन्दी कविता (prakrati aur samvedanen-hindi kavita or poem)

पत्थरों के घर
दीवारें रंगीन हैं,
लकड़ी और लोहे के सामान से
सजी बैठक,
खिड़की से सर्दी की धूप अंदर झांक रही है,
उसके स्पर्श का आनंद
ले सकता है कौन।
कहें दीपक बापू
जिनके दिल में स्पंदन है
बस अपनी चाहतों के लिए,
दिमाग में बसी है
सामानों को खोजने की योजनाएं,
प्रकृति उनकी  नज़र में एक अमर मुर्दा है
उन मांस के बुतों की
संवेदनाएँ हैं मौन।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Jan 21, 2012

तड़प-हिन्दी शायरियाँ (hindi shayriyan)

भीड़ का शोरशराबा देखकर
अब अपनी तन्हाई की तड़प नहीं सताती है,
कहें दीपक बापू
अकेलेपर से घबड़ाये लोग
ढूंढते हैं मेलों में खुशी का सामान
खरीदते ही हो जाता जो पुराना
फिर दौड़ते हैं दूसरी के लिये
उम्र उनकी भी ऐसे ही
तड़पते बीत जाती है
....................................
उन दोस्तों के लिये क्या कहें
जिनसे छिपने की कोशिश हम करें
वह हमारे ठिकानों को ढूंढ ही डालते हैं,
कहें दीपक बापू
अपना चेहरा लेकर
बदल बदल कर अदाएँ
वह हर जगह सामने आते हैं
जिनसे मिलना हमेशा हम टालते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Jan 10, 2012

सेवक और पहरेदार-हिन्दी हाइकु (sewak aur paharedar-hindi haiku or kaivta)

उनके पेट
कभी नहीं भरेंगे
जहरीले हैं,

रोटी की लूट
सारे राह करेंगे
जेब के लिए,

मीठे बोल हैं
पर अर्थ चुभते
वे कंटीले हैं।
--------------

फिर आएंगे
वह याचक बन
कुछ मांगेंगे,
दान लेकर

वह होंगे स्वामी

हम ताकेंगे,

हम सोएँ हैं
बरसों से निद्रा में
कब जागेंगे,

सेवक कह
वह शासक होते
भूख चखाते

पहरेदार
अपना नाम कहा
लुटेरे बने

लूटा खज़ाना
आँखों के सामने है
कब मांगेंगे।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Jan 7, 2012

श्रीमद्भागवगत गीता और अर्थशास्त्र-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (shri madbhagwat gita and economics or shri madbhagvat geeta aur arthshastra-hindi vyangya chinttan lekh or satire thought article)

                कथित रूप से एक अर्थशास्त्री और लंदर स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स के एक भारतीय प्रोफेसर का मानना है कि गीता का उदाहरण पेश कर अहिंसा की बात नहीं की जा सकती है। उनका यह भी है कि गीता का अंतिम अर्थ यही निकलता है कि हर आदमी एक दूसरे को मारने के लिये निकल पड़े। योग साधना में रत गीता साधकों के लिये यह बयान हास्यासन करने के लिये एक उपयुक्त विषय हो सकता है। जब गीता के विषय पर किसी के अनर्गल बयान पर लिखने का मन आता है तो लगता है कि एक जोरदार हास्य व्यंग्य लिखा जाये पर यह संभव नहीं होता क्योंकि तब उसमें वर्णित कुछ बातों का अनचाहे जिक्र कर यह बताना पड़ता है कि उसके संदेश आज भी प्रासंगिक हैं तब चिंत्तन अपना काम करने लगता है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान का केवल उनके भक्तों में ही प्रचार करें पर हम इस आज्ञा का यह देखकर उल्लंघन कर जाते हैं कि बरसों से इस संसार में विराजी श्रीमद्भागवत गीता को पहले तो लोग अपने घर में स्वयं के धाार्मिक होने के प्रमाण में ही रखते हैं और भगवान को प्रसन्न करने के लिये हाथ भी लगाते हैं तो अध्ययन करने के बाद उसे नहीं समझ पाते तब हमारे लिखने से कुछ होने वाला नहीं है। हमने लिखा पर मान लेते हैं कि कुछ नहीं लिखा।
              प्रोफेसर साहब महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों पर बोलने के लिये बुलाया गया था। उनका यह मानना था कि जो गांधी श्रीगीता के प्रशंसक थे वह अहिंसा के प्रवर्तक नहंी माने जा सकते क्योंकि वह हिंसा के लिये प्रेरित करती है। एक बात निश्चित है कि भारतीय होकर विदेश के किसी विश्वविद्यालय से जुड़े होने के अलावा उन प्रोफेसर की दूसरी कोई योग्यता नहीं हो सकती। यहां अर्थशास्त्र के ज्ञाता बहुत हैं पर प्रसिद्ध सभी नहीं है। बाज़ार और प्रचार प्रबंधक केवल उन लोगों को अपने मंचों पर स्थान देते हैं जो या तो स्वयं ही कला, साहित्य, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाज सेवा तथा फिल्म में लोकप्रियता कर चुके हों या फिर किसी विदेशी संस्था से जुड़े होने के साथ ही विदेश से सम्मान प्राप्त हों। अपनी तरफ से किसी व्यक्ति को महान बनाना उनका लक्ष्य नहीं रहता। यह प्रोफेसर साहब भी इसी तरह के रहे होंगें। उन्होंने न कभी गीता पढ़ी है न पढ़ेंगे। संभव है कि भारतीय धर्म को बदनाम करने के लिये श्रीगीता पर बहस छेड़ने का नाम इस तरह का तरीका अपनाया गया हो। हमने उन प्रोफेसर साहब का नाम इसलिये नहीं लिखा क्योंकि लगता है कि प्रचार कर्म में फिक्सिंग का खेल भी चलता है और हमें यहां लिखने का कोई आर्थिक लाभ-इसे कर्म फल से मत जोड़ियेगा-नहीं है। इसलिये किसी विषय के समर्थन या आलोचना में किसी का नाम नहीं लिखते।
         श्रीमद्भागवत गीता पर हमारे कई चिंत्तन हमारे बीस ब्लॉग पर लिखे जा चुके हैं। उनमें हम एक जगह लिख चुके हैं कि महाभारत युद्ध के दौरान जितनी भी हिंसा हुई वह भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सिर पर ली थी। गांधारी के शाप को शिरोधार्य किया। उनके द्वारका शहर का पूरा परिवार और प्रजा नष्ट हो गयी। अंततः उन्होंने एक शिकारी का बाण अपने पांव पर लेकर देह यहीं त्याग कर परमधाम गमन किया। श्रीमद्भागवत गीता के उपदेश के समय उन्होंने अर्जुन को यह स्पष्ट कहा था कि इस हिंसा का पाप तुम मुझे समर्पित करो। अर्जुन ने जब परमधाम गमन करते हुए युधिष्ठर से अपनी गति का कारण पूछा तो उसके उत्तर में उन्होंने यह नहीं कहा कि महाभारत युद्ध की हिंसा का अपराध उनकी दुर्दशा का कारण है। स्पष्टतः श्रीकृष्ण ने उस हिंसा को अपनी अवतारी देह पर इसलिये लिया क्योंकि वह उन्होंनें धारण की थी। अब भगवान श्रीकृष्ण ऐसी हिंसा का अपराध लेने के लिये कोई सदेह उपस्थित नहीं है-यह अलग बात है कि वह आज भी भारतीय जनमानस में विराजे हैं-जिससे कि वह अपने भक्तों की हिंसा का हिसाब चुकायें। इतनी बात तो हर भारतीय ज्ञानी जानता है इसलिये कभी अपने संदेश से किसी को हिंसा के लिये प्रेरित नहीं करता।
        जब वह प्रोफेसर विदेश में कार्यरत हैं तो तय बात है कि वहां के वातावरण का ही उन पर प्रभाव होगा। चेले चपाटे और संगी साथी भी ऐसे ही होंगे जो श्रीगीता के बारे में इधर उधर से सुनकर अपनी राय बनाते होंगे। उनकी सोच महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण के अर्जुन को युद्ध के लिये प्रेरित करने के लिये उपदेश देने की घटना लगने के साथ ही युद्ध के बाद हुए परिणामों पर ही केंद्रित होती है। ऐसे में उनकी बात पर बहस छेड़ना भी मूर्खता है। यह अलग बात है कि कहीं भारतीय धर्म गंथों कोे बदनाम करने के लिये कहीं कोई प्रचार योजना फिक्स हुई हो। अभी रूस में इस्कॉन के संस्थापक के गीता संस्करण पर रोक का मामला सामने आया था तब प्रचार तंत्र ने खूब उसे भुनाया।
     सच बात कहें तो आधुनिक अर्थतंत्र और अर्थशास्त्रियों के लिये श्रीगीता के संदेश विष की तरह हैं। अर्थशास्त्रियों के लिये हीं वरन् शारीरिक विज्ञान शास्त्र, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान शास्त्र तथा तमाम शास्त्रों का ज्ञान भी श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित है। अगर श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने वाले कहंी लोग पूरे विश्व में अधिक हो गये तो आधुनिक ज्ञान शास्त्रियों को मूर्ख समझने लगेंगे। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उपदेशों में योग का प्रचार किया है जिसके आठ भाग हैं। उनमें एक यम भी है जिसमें अहिंसा तत्व प्रमुख रूप से बताया जाता है। ऐसे में श्रीगीता के साथ महाभारत युद्ध को जोड़ना गलत है।
        अपने को लेकर हमें कोई खुशफहमी नहंी है पर हम भी क्या करें? जब श्रीगीता को लेकर विवाद उठता है तो हमारा ध्यान उस आदमी के नित्य कर्म की तरह जाता है। वह जिस विषय या विद्या का ज्ञाता हो हम उसे श्रीगीता के संदेशों में देखने लगते हैं। तब लगता है कि जैसे सारे विषय श्रीमद्भागवत गीता में समाहित हैं।
आखिरी बात यह कि आधुनिक अर्थशास्त्र में कहा जाता है कि उसमें दर्शनशास्त्र का अध्ययन नहीं किया जाता। इसका सीधा मतलब यह है कि उन प्रोफेसर साहब ने गीता को नहीं पढ़ा। हमने उनका नाम इसलिये भी नहीं लिखा क्योंकि अगर हमारा यह विचार कोई उनको बता दे कि श्रीमद्भागवत् गीता का ज्ञान हो जाये तो सारे एक ही आदमी सारे शास्त्रों का ज्ञाता हो जाता है। उसमें कहीं दर्शनशास्त्र भी हो सकता है पर इतना तय है कि उसमें जो अर्थशास्त्र के सिद्धांत है वह कहीं अन्यत्र नहीं मिल सकते। ऐसे में प्रोफेसर के प्रायोजक और समर्थक कहीं उनको सही साबित करने के लिये कोई बड़ी प्रायोजित बहस न करा दें। बहरहाल जिन लोगों को श्रीमद्भागवत गीता पर हमारे विचार पढ़ना हो वह दीपक भारतदीप और श्रीमद्भागवत गीता शब्द डालकर सर्च इंजिनों मे ढूंढ सकते हैं। एक गीता साधक के रूप में हमेशा ही ऐसे लोगों की बातें हैरान करती हैं जो उसे पढ़ते बिल्कुल नहीं और पढ़ते हैं तो समझते नहीं और समझते हैं तो सही रूप में व्यक्त नहीं कर पाते क्योकि वह उनकी धारणा शक्ति से परे होती है। हम परेशान नहीं होते क्योंकि एक गीता साधक में इतनी शक्ति तो आ ही जाती है कि वह ऐसी बातों से विचलित नहीं होता। ब्लॉग पर श्रीमद्भागत गीत के विषय पर लिखने का जब अवसर उपस्थित होता है तो लगता है कि यह सौभाग्य हमें ही मिल सकता है।
इस विषय पर इस लेखक का यह ब्लॉग और उसका पाठ अवश्य पढ़ें।  
सामवेद से संदेश-तुम प्रतिदिन युद्ध करते हो (samved-tum pratidin yuddh karte ho-samved se sandesh)
           श्रीमद्भागवत गीता के आलोचक उसे युद्ध से उपजा मानकर उसे तिरस्कार करते हैं पर शायद वह नहीं जानते कि आधुनिक सभ्यता में भी युद्ध एक व्यवसाय है जिसे कर्म की तरह किया जाता है। सारे देश अपने यहां व्यवसायिक सेना रखते हैं ताकि समय आने पर देश की रक्षा कर सकें।
         भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय श्री अर्जुन से कहा था कि अभी तू युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव इसके लिये फिर विवश करेगा। अर्जुन एक योद्धा थे और उनका नित्य कर्म ही युद्ध करना था। जब श्रीकृष्ण उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे तो एक तरह से वह कर्मप्रेरणा थी। मूलतः योद्धा को क्षत्रिय माना जाता है। इसे यूं भी कहें कि योद्धा होना ही क्षत्रिय होना है। इसलिये श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म प्रेरणा दी है यह अलग बात है कि युद्ध करना उसका स्वाभाविक कर्म था। श्रीमद्भागवत में कृष्ण यह भी कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्म में लगा कोई भी व्यक्ति हो-कर्म के अनुसार क्षत्रिय, ब्राह्मण वैश्य और शुद्र का विभाजन माना जाता है-मेरी भक्ति कर सकता है। इस तरह श्रीमद्भागवत गीता को केवल युद्ध का प्रेरक मानना गलत है बल्कि उसके अध्ययन से तो अपने कर्म के प्रति रुचि पैदा होती है। इसी गीता में अकुशल और कुशल श्रम के अंतर को मानना भी अज्ञान कहा गया है। आजकल हम देखते हैं कि नौकरी के पीछे भाग रहे युवक अकुशल श्रम को हेय मानते हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
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अभि विश्वानि काव्या
‘‘सारे सुकर्म कर।’
दिवे दिवे वाजं सस्निः।
‘‘प्रतिदिन तुम युद्ध करते हो।’’
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रर्भवो।
‘‘आत्मज्ञानी बनकर कभी आलसी मत बनना।’’
             मनुष्य अपनी देह पालन के लिये कर्म करता है जो युद्ध का ही रूप है। हम आजकल सामान्य बातचीत में यह बात मानते भी हैं कि अब मनुष्य का जीवन पहले की बनस्पित अधिक संघर्षमय हो गया है। जबकि हमारे वेदों के अनुसार तो हमेशा ही मनुष्य का जीवन युद्धमय रहा है। जब हम भारतीय अध्यात्म में वर्णित युद्ध विषयक संदर्भों का उदाहरण लेते हैं तो यह भी देखना चाहिए कि उन युद्धों को तत्कालीन कर्मप्रेरणा के कारण किया गया था। इतना ही नहीं इन युद्धों को जीतने वाले महान नायकों ने अपने युद्ध कर्म का नैतिक आधार भी प्रस्तुत किया था। वह इनको जीतने पर राजकीय सुविधायें भोगने में व्यस्त नहीं हुए वरन् उसके बाद समाज हित के लिये काम करते रहे।
      संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।