Aug 29, 2013

रुपये के अंतर्राष्ट्रीय मूल्य से जुड़ा राष्ट्र के सम्मान का प्रश्न-हिन्दी लेख(rupaye ke antarrashtriya mulya se juda rashtra ke samman ka prashna-hindi lekh or article)



                        जिस तरह रुपये की अंतर्राष्ट्रीय कीमत तेजी से गिरी है उससे देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक तरह की आंशकायें जन्म लेने लगी हैं।  फिलहाल इस बात की संभावना नहीं लगती कि रुपया का मूल्य आत्मसम्मान योग्य हो पायेगा। इन आशंकाओं के बीच एक प्रश्न भी उठता है कि आखिर रुपये का आत्मसम्मान योग्य अंतर्राष्ट्रीय मूल्य कितना रहना चाहिये? जहां तक हमारी याद्दाश्त है पंद्रह से बीस वर्ष पूर्व तक एक डॉलर का मूल्य  28 रुपया हुआ करता था।  अब वह 68 रुपये हो गया है।  इस पर हमारे देश की सरकारों का बजट भी घाटे वाला हुआ करता है।  घाटे का बजट होने का मतलब यह है कि सरकार उतनी राशि के नये नोट जारी कर ही  खर्च की पूर्ति करती है।  इसकी कोई सीमा तय नहीं है कि पता नहीं पर नये नोटों से मुद्रास्फीति बढ़ती है।
                        हमारे देश के आर्थिक रणनीतिकार इस घाटे के बजट को विकास के लिये आवश्यक कदम मानते हैं।  हम उनकी बात मान लेते हैं पर ऐसा लगता है कि इस सुविधा को अब एक आवश्यक मजबूरी मान लिया गया है।  अभी तक हमने धन के असमान वितरण को सुना था पर अब वह कदम कदम पर दिखने लगा है।  हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन ने छोटे मूल्य के नोटों के प्रचलन को कम कर दिया है पर फिर भी उनकी आवश्यकता अनुभव होती है।  पहले सौ रुपये का नोट तुड़वाकर उसे दस तथा पांच में सहजता से बदला जा सकता था पर अब पांच सौ नोट पास में है तो साइकिल या गाड़ी में हवा भरवाने के लिये छोटे नोट पहले से ही छांटकर रखने पड़ते हैं।  बाज़ार में खाने पीने का सामान महंगा है, सब्जियां महंगी हैं, दूध भी सस्ता नहीं है पर सीमित मात्रा में क्रय करना हो तो अनेक जगह पांच सौ का नोट बड़ा दिखने लग  जाता है। हजार का नोट किसी को दो तो वह हाथ से पकड़ कर देखने लगता है कि नकली तो नहीं है।  अगर पांच सौ या हजार का नोट पुराना हो तो लेने वाला आदमी संकोच भी करता है।  दस से लेकर सौ तक नोट कोई भी सहजता से लेता है पर उसके आगे का नोट लेने में आदमी सतर्कता बरतता है।
                        नकली नोटों ने असली मुद्रा का सम्मान कम कर दिया है। स्थिति यह है कि बैंकों के एटीएम से भी नकली नोट निकलने की शिकायतें आने लगी हैं। ऐसे में अगर किसी को सौ का नोट हाथ में दो और वह उसे गौर से देखे तो उसके सामने यह दावा करना निरर्थक होता है कि वह एटीएम से निकाला गया है।  लोग कह देते हैं कि एटीएम से नकली नोट निकलते हैं।
                        देश के हालात ऐसे हैं कि समझ में नहीं आता कि महंगाई इतनी तेजी से कब तक बढ़ेगी!  विशेषज्ञ बताते हैं कि विकसित देशों की मुद्रा सौ तक ही होती है।  अमेरिका डॉलर या ब्रिटेन के पौंड में सौ से ऊपर का नोट नहीं छापा जाता है।  भारत में अनेक लोग इसी के आधार पर पांच सौ या नोट छापने का विरोध करते हैं। हम अपनी कोई राय नहीं पा रहे पर इतना तय है कि पांच सौ और हजार के नोटों के प्रचलन के बाद महंगाई ने गुणात्मक रूप से अपने कदम बढ़ाये हैं।  नये नोट प्रचलन में आते ही गायब हो जाते हैं और पुराने बाहर आकर अपना रूप दिखाते हैं।  नये नोटों के आने मुद्रास्फीति के कारण महंगाई बढ़ती है और ऐसे में नोट ज्यादा देने पड़ते हैं।  उनमें पुराने नोटों होने पर  लेने में आनाकानी होती है और यहीं से मुद्रा के सम्मान का प्रश्न उठना प्रारंभ होता है। एकदम नये नोट चल जायें और पुरानों को चलाने में जद्दाजेहद करनी पड़े तक अपनी देश की मुद्रा को लेकर पीड़ा तो होती ही है।
                        कहा जाता है कि देश की आजादी के समय डॉलर का मूल्य एक रुपये के बराबर था। इस हिसाब से तो एक रुपये का यही मूल्य विश्व बिरादरी में हमारा आत्म सम्मान लौटा सकता है।  यह एक कल्पना हो सकती है पर असंभव नहीं है।  अमेरिका के हथियारों के अलावा कोई दूसरी चीज भारत में प्रसिद्ध नहीं है। इस मद में इतना खर्चा नहीं होता कि डॉलर इतना दमदार बना रहे। अलबत्ता अमेरिका जाने वाले भारतीयों नोट के बदले डॉलर खर्च करने के लिये  लगते हैं जिससे शायद इस तरह का असंतुलन पैदा होता हो तो कह नहीं सकते।  इसका कोई तोड़ आर्थिक रणनीतिकारों को ढूंढना चाहिये।  रुपये की गिरती कीमत देश की विश्व पटल पर ही राष्ट्रीय स्तर पर खतरों का संकेत दे रही है।  अमेरिका दुनियां का सबसे शक्तिशाली देश हथियारों की वजह से नहीं डॉलर के सम्मान के कारण माना जाता है। हमारा रुपया अगर सम्मान खोयेगा तो फिर किसी अन्य तरह से सम्मान पाने की आशा करना व्यर्थ होगा।  अध्यात्मिक विषय के कारण हमारी श्रेष्ठता विश्व में मानी जाती है पर जब सम्मान की बात आये तो विश्व का हर समाज केवल धनिकों को ही मानता है। फिर अध्यात्म वाले सम्मान या अपमान की सोचते ही कब हैं? जब हम विश्व में सम्मान पाने की बात करते हैं तो वह सांसरिक विषयों का ही भाग है और उसमें मुद्रा का सम्मान ही देश का सम्मान होता है। जब देश की मुद्रा का मूल्य बढ़ेगा तो विश्व में हमारे समाज का सम्मान निश्चित रूप से बढ़ेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Aug 8, 2013

पाकिस्तान लातों का भूत है बातों से नहीं मानेगा-हिन्दी संपादकीय (Pakistan laton ka bhoot hai baton se nahin manega-hindi editorial)



    पाकिस्तान एक खत्म हो चुका राष्ट्र है और उनके प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ एक ऐसा लोकतांत्रिक चेहरा हैं जो विश्व को दिखाने भर को है।  उनसे यह आशा करना बेकार है कि पूरे पाकिस्तान पर नियंत्रण कर पायेंगे।  इससे पहले उनकी विरोधी पीपुल्स पार्टी तथा राष्ट्रपति जरदारी को यह श्रेय प्राप्त जरूर हो गया कि उन्होंने वहां की कथित प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अपना कार्यकाल पूरा किया जिसका अवसर वहां किसी को नहीं मिला था।  संभव है नवाज शरीफ भी अपना कार्यकाल पूरा करें। शायद नहीं भी कर सकें। इसका कारण यह है कि नवाज शरीफ का रवैया भारत के प्रति अधिक बदला नहीं लगता और कहीं की कोई कारगिल जैसा युद्ध सामने न आ जाये। युद्ध के बाद पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सत्ता का पतन तय है।
           अभी हाल ही में पांच भारतीय सैनिकों की पूंछ जिले में जिस तरह हत्या हुई है उस पर पूरे देश में गुस्सा है और जिस तरह प्रचार माध्यमों ने पाकिस्तानी प्रवक्ताओं के विषैले वचन इस देश के लोगों को सुनने के लिये बाध्य किया है वह भी कम शर्मनाक नहीं है।  आज तो हद ही हो गयी जब  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के प्रवक्ता ने एक चैनल पर भारत के अंदरूनी मामलों की चर्चा कर जिस तरह अपनी धार्मिक भावनाओं का इजहार किया उसके बाद तो यह आशा करना ही बेकार है कि पाकिस्तान कभी  अपनी विचारधारा बदल सकता है। एक सरकारी प्रवक्ता अपने सरकार की बात अत्यंत सावधानी से बोलता है इसलिये यह मानना गलत होगा कि कोई बात भावावेश में कही गयी होगी।  नवाज शरीफ के मन की बात उनके प्रवक्ता के माध्यम से जिस तरह सामने आयी उससे तो नहीं लगता कि आगे दोनों देशों के संबंध सामान्य  शायद ही रह पायें।
         हालांकि ऊपर हमने यह जरूर लिखा कि  पाकिस्तान के कथित प्रवक्ताओं या रणनीतिकारों को भारतीय चैनल दर्शकों पर थोप रहे हैं पर सच यह भी है इस चर्चा ने हमारे जैसे निष्पक्ष एवं स्वतंत्र  लेखकों को वैचारिक दृष्टिकोण से अत्यंत हैरान कर दिया है।  यह चर्चा सुनते हुए खून जरूर खोलता है पर यह भी सच है कि इससे कुछ ऐसी असलियतों का आभास होता है जिनका पहले अनुमान ही किया जा सकता था। पाकिस्तानी प्रवक्ता अपने धार्मिक एजेंडे को स्पष्ट रूप से बयान कर रहा है और उसका जवाब देने के लिये हम धर्मनिरपेक्ष होने की लाचारी दिखाते हैं।  अगर हम उनके धार्मिक एजेंडे को चुनौती दें तो भारत में लोग नाराज हो सकते हैं।  दूसरी बात यह भी हम देख रहे हैं कि धार्मिक आस्था के नाम ठेस पहुंचाने के नाम पर आजकल जिस तरह दोषारोपण होता है उसके चलते अपने  अलावा किसी अन्य धर्म पर प्रतिकूल बात कहना हमेशा ही विवादास्पद माना जाता है।  पाकिस्तान का निर्माण ही भारतीय धर्मों के मानने वालों के पलायन और तबाही से  हुआ था।  लंबे समय तक हम लोग यह मानते थे कि पाकिस्तान के शासक ही विरोधी हैं पर आम जनता शायद ऐसी न हो  पर जब से आधुनिक प्रचार माध्यमों ने अपना प्रभाव दिखाया है उससे तो यही लगता है कि वहां की जनता में भारत तथा भारतीय धर्मों के विरुद्ध इस तरह विष डाला जा चुका है जिसको निकालना अब आसान नहीं है।  हमने इंटरनेट पर देखा है कि  भारतीय ब्लॉग लेखक कहंी न कहीं पाकिस्तान के लिये दोस्ताना बात कहते हैं पर वहां के ब्लॉग लेखकों ने कभी ऐसा नहीं किया।  दूसरी बात यह भी कि देवनागरी लिपि तथा अरबी लिपि ने ऐसा विभाजन किया है कि अब दोनों के आम लोगों के बीच कभी एका नहीं हो सकता। कम से कम इंटरनेट पर साहित्यक संपर्क तो बन ही नहीं सकता।
      एक बात तय है कि भारत और पाकिस्तान के विभाजन की वह वजहें हमें नहीं लगती जो इतिहास में हमें बतायी जाती हैं।  आज जब प्रचार माध्यम इतने ताकतवर हैं तब हम अनेक राजनीतिक शिखर पुरुषों को लेकर अनेक दर्दनाक टिप्पणियंा आती हैं। कहा जाता है कि पहले के राजनीतिज्ञ आज के राजनीतिज्ञों से बेहतर थे। हम यह नहीं मानते क्योंकि हमारा सवाल यह है कि उस समय क्या प्रचार माध्यम क्या इतने तीव्रगामी थे जो उस समय के राजनीतिज्ञों की श्रेष्ठता स्वीकार की जाये।  हमारा मानना है कि पुराने राजनीतिज्ञों से आज के राजनीतिज्ञ कमतर नहीं है बल्कि अनेक मामलों में पुरानों से अधिक मुखर हैं और सच बात कह ही देते हैं जबकि पुराने दिल की बात दिल ही में रखते थे।  भारत और पाकिस्तान का विभाजन का धार्मिक आधार एक तत्व हो सकता है पर इसका आर्थिक और सांस्कृतिक आधार भी रहा होगा।  अगर हम मान लें कि विभाजन नहीं होता तो भारत की आबादी चीन के बराबर तो होती ही साथ ही क्षेत्रफल भी बढ़ा होता। याद रखें चीन का बढ़ा क्षेत्र तिब्बत पर अनाधिकृत कब्जे के कारण ही दिखता है।  ऐसे यकीनन भारत चीन से कहीं ज्यादा ताकतवर होता। ऐसे में आज चीन से डरने वाले ब्रिटेन और अमेरिका की स्थिति  एशियां इन दो  देशों की ताकत के  आगे क्या होती?  आर्थिक रूप से भारत दोनों देशों से बहुत आगे होता।  दूसरा यह भी कि अंग्रेजों को यह लगा कि कहीं न कहीं भारत के स्वाधीनता आंदोलन में भारतीय धर्मों के लेोगों  का बाहुल्य है और ऐसे में स्वतंत्रता के बाद यहां के धर्म की ताकत अधिक होगी।  उस समय कहीं न कहीं ब्रिटेन और अमेरिका का धार्मिक एजेंडा रहा होगा। तीसरी बात यह है कि उस समय सऊदी अरब से अमेरिका की और ईरान से ब्रिटेन की दोस्ती अच्छी थी जो आज भी कायम है।  पाकिस्तान के रूप में धार्मिक आधार पर एक कॉलोनी इन देशों को दी गयी।  पाकिस्तान एक तरह से उपनिवेश देश ही रहा है। यही कारण है कि आपातकाल में उसके मंत्रिपरिषद की बैठक भी सऊदी अरेबिया में होती है।  एक समाचार पढ़ने को मिला था जिसमें एक भारतीय ईरान में पकड़ा गया पर उसे वापस भारत भेजने की बजाय पाकिस्तान को दिया गया जो वहां जेल में बंद रहा-पता नहीं  वह छूटा या नहीं।  उससे यह तो साफ हो गया कि ईरान भले ही पाकिस्तान का गहरा मित्र न हो पर कम से धार्मिक एकरूपता के कारण भारत से अधिक उसे महत्व देता हैै।  चौथी बात यह कि अगर पाकिस्तान न बनता तो हिन्दी तथा देवनागरी का प्रचार बढ़ता ऐसे में  अंग्रेजी के सहारे भारत को गुलाम बनाये रखने की पश्चिमी देशों  की योजना सफल नहीं होती।
    पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू है जो वहां बोलने वाले बहुत कम है। यह सही है कि सारी भाषायें अरेबिक लिपि की समर्थक हैं। स्वतंत्रता के बाद कुछ भारतीय नेता जब यह आशा कर रहे थे कि एक दिन पाकिस्तान फिर भारत से मिलेगा तब वहां भाषा, धर्म और संस्कृति के नाम पर ऐसी योजना काम रही थी जो कि इस संभावना को सदैव खत्म करने वाली थी और जिसका यहां कोई अनुमान नहीं करता था।  अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा?
        पाकिस्तान का खत्म होना ही भारत के हित में हैं।  वहां की अंदरूनी हालात खराब हैं।  हम पाकिस्तान के जिस शिक्षित समाज से यह आशा करते हैं कि वह वहां के लोगों में भारत के प्रति घृणा का भाव खत्म कर सकता है वही घृण फैला रहा है। यहां फिल्म, क्रिकेट, टीवी धारावाहिकों तथा कला क्षेत्रों में पाकिस्तान के लोग कथित मित्रता के नाम पर बुलाये जाते हैं। उनकी मीठी बातें सुनकर भारतीय लोग खुश होते हैं पर दरअसल यह उनका छलावा है।  दूसरी बात यह कि मूल भारतीय अध्यात्म दर्शन की चर्चा देश में होती रहती है। इस चर्चा को सुनते रहने के कारण भारत में हर धर्म से जुड़ा विद्वान सकारात्मक सोच वाला है। भले ही अन्य धर्मों के लोग भारत के मूल दर्शन का अध्ययन न करें पर सुनते सुनते कहीं न कहंीं उन पर सकारात्मक प्रभाव होता है।  अनेक मुस्लिम तथा ईसाई  विचारक कहीं न कहीं भारतीय धर्मो के विषय का अध्ययन करते हैं। मूल बात यह कि यहां सभी धर्मों के लोग देवनागरी लिपि को आत्मसात कर चुके हैं और भारतीय अध्यात्म दर्शन की पुस्तकों का अध्ययन उनके लिये सहज है।  इसलिये वह विचार फैंकते नहीं है जबकि पाकिस्तान में भारतीय धर्मों  को खूंखार और अंधविश्वास वाला प्रचारित किया जाता है।  वहां श्रीमद्भागवत गीता, पतंजलि योग साहित्य, रामायण या वेदों का अध्ययन करने वाला शायद ही कोई हो।  ऐसे में वहां सकारात्मक सोच वाले विद्वानों को होना संभव नहीं है।  पाकिस्तान के नागरिकों के सहधर्मी भारतीय लोगों को उन जैसा मानना एक तरह भद्दा मजाक लगता  है। सच बात तो यह है कि भारत के सभी जाति, भाषा, धर्म तथा क्षेत्रों में पाकिस्तान की उद्दंडता के प्रति आक्रोश है और हमारे देश के प्रचार माध्यम पाकिस्तानियों को लाकर उनका मजाक उड़ा रहे हैं। हालंाकि यह भी सच यह है कि इस तरह की चर्चा में यह साफ हो गया कि भारत में बैठे कुछ लोग अगर पाकिस्तान से दोस्ताना रखने की आशा कर रहे हैं तो वह  गलत हैं। वहां की सेना और राजनेता लातों के भूत हैं बातों से नहंी मानेंगे।  भारतीय जवानों की जिस तरह हत्यायें हो रही हैं वह बेहद गुस्सा दिलाने वाली हैं और न चाहते हुए भी आगे उस पर लातें बरसानी ही पड़ेंगी।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jul 15, 2013

बच्चों का शराब पीना-लघु हिन्दी व्यंग्य (bachcho ka sharab peena-hindi vyangya or satire on sex and smoke parti chiled and student's)



          करीब सौ  बच्चे एक मॉल में शराब की पार्टी में शामिल होने पर पकड़े गये।  यह पार्टी फेसबुक के संपर्कों का उपयोग कर आयोजित की गयी।  पुलिस को पता चला कि अवैध ढंग से यह आयोजन हो रहा है तो वह इन बच्चों का सुधारने के लिये पहुंची।  मॉल के जिस बार में शराब पार्टी थी उसके स्वामी और प्रबंधकों को पुलिस ने पकड़ लिया पर बच्चों के विरुद्ध मामला न दर्ज कर अभिभावकों को  बुलाकर उन्हें सौंपा। हमारे टीवी चैनलों के लिये यह बाल सामग्री अत्यंत उपयोगी थी और तय बात है कि उन्होंने समाज के स्थिति पर किराये के आंसु भी बहाये। चिंता जताई।
            पुलिस ने बच्चों पर प्रकरण दर्ज न कर उनके अभिभावकों को सौंपा यह अच्छी बात है।  तर्क यह दिया कि सभी बालक बालिकायें पंद्रह  से बीस वर्ष तक की आयु वर्ग से संबंधित हैं इसलिये उनके उज्जवल भविष्य की संभावनायें खत्म नहीं की जानी है।  यह तर्क भी ठीक है। प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल और अखबार-कुछ चर्चा सामाजिक अंतर्जालीय संपर्क पर हुई तो कुछ समाज में व्याप्त व्यसनों की बढ़ती प्रवृत्ति  पर भी चिंता जताई गयीं। हिन्दुस्तान बिगड़ रहा है जैसे नारे भी पढ़ने और सुनने  को मिले।  हमने इस घटना के दृश्य टीवी चैनलों पर देखे।  इन दृश्यों में पकड़े गये बच्चों के अभिभावकों में कुछ अपने हाथों से अपनी संतानों पर बरस रहे थे।  इस दृश्य को देखकर हमारे अंदर यह विचार आया कि आखिर यह अभिभावक अपने बच्चों को पीट क्यों रहे हैं? इसकी कुछ वजहें हमारी समझ में आयीं।
            1-अभिभावकों को इस बात का अफसोस था कि बच्चे शराब पीते पकड़े गये न कि इसका कि उनके बच्चे शराब पीते हैं।
            2-पुलिस के हत्थे न चढ़ें इसलिये अपने बच्चों पर हाथ बरसाकर उन्हें बचा रहे थे।
             3-यह बताने के लिये बच्चे बिगड़े जरूर है पर हम तो ठीक प्रकार के अभिभावक हैं।
            यह तीनों बातें कम से कम हमें तो जमती हैं। घर के बच्चे रात को घर से गायब हों और माता पिता उनकी उपस्थिति के स्थान की जानकारी नहीं रखें तो उनको दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।  दरअसल हमारे समाज में आज कमाने की प्रवृत्ति ने लोगों को हर तरफ से अंधा कर दिया है।  अभिभावक स्वयं पैसा कहां से कमा रहे हैं यह वह जानते हैं पर खर्च कैसे हो रहा है इस पर अनेक उनकी दृष्टि नहीं जाती क्योंकि पैसा तो उनके पास बाढ़ की तरह चला आता है। चाणक्य कहते हैं कि अधिक धन हो तो उसे निकालना चाहिये।  हमारे लोग यह नहीं मानते तो पैसा स्वयं ही आगे निकलने लगता है।  जिस तरह बाढ़ का पानी अपने किनारे तोड़ता है उसी तरह पैसा भी अपने ही घर उखाड़ता हैं।  धनलोलुपों का  लक्ष्य एक ही है कि अपने बच्चों को इतना कमा कर दें कि आगे की सात पीढ़ियों तक उनका नाम चलता जाये।  आप अगर किसी से पूछें कि ‘‘आप किसके लिये कमा रहे हैं?’’
           वह फट से जवाब देगा कि ‘‘बच्चों के लिये कमा रहा हूं!’’
            हमारे देश के किसी पुराने दार्शनिक का कहना है कि पुत्र अगर सुयोग्य है तो वह स्वयं कमा लेगा। अगर नालायक है तो सब गंवा देगा, इसलिये उतना ही कमाओ जितना आवश्यक हो। बेकार में अपनी जिंदगी क्यों केवल सासंरिक विषयों में बर्बाद हो।  सच बात तो यह है कि बच्चों का नाम लेना तो  बहाना है। लोग अपनी सामाजिक स्थिति में चार चांद लगाने के लिये कमाते हैं।  कुछ लोग अपनी विलासिता के लिये कमाते हैं पर नाम बच्चों का लेते हैं।
       बहरहाल उन बच्चो को अपनी भाग्य समझना चाहिये कि पुलिस ने उन्हें वह सबक सिखाया है जिसकी जिम्मेदारी उनके माता पिता की थी। पुलिस वालों को तारीफ करना चाहिये कि वह अपना सामाजिक दायित्व समझने लगे हैं।  हमारा दर्शन तो कहता है  कि शिक्षा के दौरान विलासित से दूर रहना चाहिये पर मुश्किल यह है कि आधुनिक शिक्षा प्रबंधक शिक्षा के दौरान ही छात्रों  को संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वामी बनाने का दावा करते हुए उनको अपनी संस्थाओं के अंतर्गत होने  पर्यटन और पिकनिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये बाध्य करते हैं।  शिक्षा के लिये निर्धारित पाठ्यक्रम  से अलग अन्य  विषयों की जानकारी देकर शिक्षा के स्वामी और प्रबंधक अपने अधिक से अधिक कुशल शैक्षणिक व्यवसायी होने का प्रमाण देना चाहते हैं।  ऐसे में अभिभावक भी यह सोचते हैं कि हमें क्या चिंता  पूरी फीस दे रहे हैं हमारे बच्चे को तो विद्यालय और महाविद्यालय के शैक्षणिक ठेकेदार अपने आप ही एक आदर्श व्यक्तित्व का स्वामी बना देंगे।  ऐसे में  मद्यपान और ध्रुमपान से संयुक्त ढेर सारे आयोजन होने ही जिसमें नवयुवक शामिल हों।  सौ बच्चों को पकड़कर पुलिस ने उन्हें एक सबक सिखाया पर उसे जीवन भर कितने बच्चे याद रखेंगे या इस घटना से पूरे देश कितने भविष्य में ऐसा न करने या होने देने की छात्र और अभिभावक कसम खायेंगे कहना कठिन है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Jun 29, 2013

केदारनाथ की त्रासदी का मानसिक प्रभाव लंबे समय तक रहेगा-हिन्दी संपादकीय (kedarnath ki trasdi ka lambe samay es rahega-hindi editorial natural calamity in uttrakhand,hindi sampadkiya)



         उत्तराखंड में जो प्रकृति ने महाविनाशलीला मचायी उसमें भारी जन हानि का अनुमान शायद ही पहले किसी ने किया हो।  दरअसल हमारे देश में अनेक तीर्थ हैं जिनमें लाखों लोग शामिल होते हैं।  उत्तराखंड में चार धाम-गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ, और केदारनाथ। भारतीय जनमानस के हृदय में हैं पर बहुत कम लोग यहां जाने को तैयार होते थे।  गंगा और यमुना अत्यंत पवित्र नदियां मानी जाती हैं पर धार्मिक रूप से अकेले इनकी मान्यता नहीं है। नर्मदा और क्षिप्रा भी भगवत् मान्यता वाली मानी जाती हैं।  हरिद्वार की हर की पैड़ी, दक्षिण में तिरुपति बालाजी, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि, इलाहाबाद का संगम, काशी तथा उज्जैन में लोग तीर्थ करने जाते हैं। कश्मीर में अमरनाथ के दर्शन करने वालों की भी कमी नहीं है। 
      वर्तमान समय में जम्मू का वैष्णोदेवी और शिरडी के सांई बाबा के साथ भी अनेक लोग जुड़े हैं हालांकि इनका भारतीय धार्मिक दृष्टि से सामान्य महत्व है।  वैष्णोदेवी पर फिल्म आशा में गायक चंचल के गाये एक गीत ‘माता ने बुलाया है’ की वजह से वहां के मंदिर का नाम चमक उठा तो सांईबाबा पर फिल्म अमर अकबर ऐंथोनी में उनके मंदिर के  एक गाने में उनके चमत्कारों  गुणगान होने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ी। आमतौर से सांईबाबा को धर्मनिरपेक्ष छवि का माना जाता है पर वास्तविकता यह है कि उनको हिन्दू भक्तों की ही भक्ति प्राप्त है।  वैष्णोदेवी और सांईबाबा पर जो भक्तों की भीड़ बढ़ी है उसका आधार कोई  प्राचीन मान्यता नहीं वरन् आधुनिक बाजा़र और प्रचार समूहों की प्रेरणा उसका एक कारण है। 
       ऐसे में चारो धामों में इतनी सारी भीड़ होने देखकर अनेक लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब हताहतों की संख्या का अनुमान बताया गया।  इन चारों धामों में पहले जो लोग जाते थे उनके परिवार वाले मालायें पहनाकर विदा करते थे।  माना जाता था कि  जीवन के उत्तरार्ध में की जाने वाली इस यात्रा में आदमी वापस लौटा तो ठीक न लौटा तो समझ लोे भगवान के पास चला गया।  महाभारत काल में पांडवों ने भी अपने अंतिम काल में ही हिमालय की यात्रा की थी।  हरिद्वार या ऋषिकेश तक यात्रा करना अनेक लोगों के लिये अध्यात्मिक शांति का उपाय है पर सच यह भी है कि आज भी हरिद्वार जाने की बात किसी से कही जाये तो वह पूछता है कि घर में सब ठीक तो है न! 
       वहां अपने परिवार के सदस्यों की अस्थियां विसर्जित करने के अलावा किसी अन्य उद्देश्य से यात्रा अधिक लोग नहंी करते। अगर कर आते हैं तो मान लेते हैं कि उन्होंने इस तीर्थ पर भले ही किसी भी उद्देश्य से आये पर सभी तीर्थ का पुण्य कमा लिया।
             ऐसे में चारों धामो में प्रकृति ने कहर बरपाया तो उससे हताहत  लोगों की संख्या से अधिक हैरानी हो रही है।  दरअसल बाज़ार के पेशेवर यात्रा प्रबंधकों ने वहां हुए सड़क विकास का लाभ उठाया और हर शहर से अनेक लोगों को चारों धामों पर ले जाने लगे।  सड़क और रेल मार्ग से वह पूरा एक प्रस्ताव तैयार कर लोगों को अपना ग्राहक बनाते हैं।  उत्तराखंड दुर्गम है पर वहां बनी सड़कों से बसें जाने लगी थीं।  अनेक बस दुर्घटनाओं की खबर आती रहती थी।  वहां का रास्ता दुर्गम था, अब भी है और रहेंगा।  अनेक बसें जाती थीं।  सभी नहीं गिरी पर नियमित रूप से ऐसी बसों की दुर्घटनाओं की खबरें आती रहती थी।  जो यात्रा कर घर वापस लौटे उनके लिये रास्ता सुगम बना और जो नहीं लौटे वह भूत बनकर किसी को बता नहीं सकते थे कि उन्होंने दुर्गम रास्ते का अनुकरण किया था।  इस आवाजाही के बावजूद अनेंक लोग चारों धामों की यात्रा को सुगम नहीं  मानते थे।  यह अलग बात है कि पहले जब मार्ग दुर्गम दिखता था तब कम लोग जाते थे। वहां सड़क, बिजली और होटलों के निर्माण का लाभ उठाकर  बाज़ार और प्रचार समूह ने धार्मिकता के साथ ही पर्यटन का लाभ दिलाने का बीड़ा उठाया।  जिससे वहां भीड़ बढ़ गयी।  बहरहाल चारों धामों का ऐसा कोई प्रचार नहीं हुआ था कि सामान्य लोगों को सहज विश्वास हो कि आपदा के समय वहां  लाखों की संख्या में वहां श्रद्धालू  होंगे। जब प्रचार माध्यमों ने इसकी पुष्टि की तब ही सच्चाई सामने आयी।
           जो हुआ सो हुआ। प्रकृति का यह प्रकोप है जिसे यह प्रथ्वी अनेक बार सह चुकी है।  इतना जरूर है कि हम धर्म के कर्मकांडों मे रुचि लेते हैं क्योंकि वह प्रत्यक्ष दिखते हैं पर उस अध्यात्मिक ज्ञान पर दृष्टिपात नहीं करते जो कि जीवन की वास्तविकता को बताते हैं।  अध्यात्मिक दृष्टि से इन चारो धामों की यात्रा जीवन के सारे सांसरिक दायित्व पूरे करने के बाद की जाती रही है। संभव है कुछ लोग अपनी शक्ति के कारण इसे पर्यटन की दृष्टि से भी पूर्वकाल में करते रहे हों पर सामान्य आदमी कभी इस पर विचार नहीं  करता था।  दूसरी बात यह कि  हमारे देश में धार्मिक आधार पर पर्यटन के लिये यात्रा करने वाले स्थान है जहां यात्रा की परंपरा है। इधर अमरनाथ यात्रा भी चल रही है।  इस यात्रा में जाने वाले यात्री का पहले स्वास्थ्य परीक्षण तक किया जाता है।  तय बात है कि श्रद्धा की दृष्टि से की जाने वाली यात्रा के लिये श्रद्धालू  का स्वस्थ होना आवश्यक है।  चारों धामों की यात्रा के लिये ऐसी कोई शर्त नहीं रही। इसका कारण यह है कि यहां आने वाले श्रद्धालू को जीवन से मुक्त माना जाता रहा होगा।  यही कारण है कि माला पहनकर जाने वाले श्रद्धालु एक तरह से परिवार तथा समाज से विदा लेकर जाते थे।  इसे गर्मियों के लिये पिकनिक जैसा स्थान भी बनाया गया तो यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि पहाड़ियों की यात्रा के लिये जो स्वास्थ्य परीक्षण होना चाहिये वह भी अनिवार्य होना चाहिये था।  आपने देखा होगा कि अनेक लोग संघर्ष करते हुए पहाड़ से जमीन पर उतर आये पर कुछ लोगों ने अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर पैदल चलने से इंकार कर दिया।  अब प्रशासन कह रहा है कि स्वयं उतर कर आओ पर अनेक यात्री इसके लिये तैयार नहीं है।  यह अजीबोगरीब स्थिति है।  पहाड़ियों पर चढ़ने से अधिक उतरने में संकट पैदा होता है।  ऐसे में अस्वस्थ व्यक्ति से इस आपदा में नीचे आने की आशा करना ही व्यर्थ है। 
     बहरहाल इस आपदा ने देश के लोगों का मनोबल हिलाकर दिया है।  कल हम वृंदावन की यात्रा समाप्त कर मथुरा आये। वहां गोंडवाना एक्सप्रेस की एक सामान्य बोगी में खाली जगह देखी। हमने चढ़ने से पहले बोगी को देखा।  वह सामान्य बोगी लग रही थी फिर भी विश्वास नहीं हुआ तो खिड़की पर  अंदर यात्री से पूछा कि ‘‘क्या यह जनरल बोगी है?’’ 
उसने जब हां कहा तब अंदर बैठे। तब उसने सवाल किया कि आपने यह प्रश्न क्योंकि किया। हमने उसे जब बताया कि हमने कभी सामान्य बोगी को कभी इतना खाली कभी नहीं देखा। तब वह बोला-‘‘केदारधाम की त्रासदी के बाद लोगों का मनोबल गिर गया लगता है जिससे यात्रा कम की जा रही है। शायद यही वजह लगती है।’’
      इसमें सच हो न हो पर इतना तय है कि समाज में इस त्रासदी का मानसिक प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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May 28, 2013

क्रिकेट में अब फिर फिक्सिंग-वीडियो पर चर्चा (crciket match mein fixing-disscusion on veedion

क्रिकेट में अब फिर फिक्सिंग का विवाद चल रहा है| हम यहाँ पर खिलाडियों या बुकियों पर कोई टिपण्णी न कर आम लोगों को या बताना चाहते हैं कि वह खेल दिखें कोई बात नहीं  पर अपनी जेब से इसमें पैसा न लगाएं| प्रस्तुत है इस पर चर्चा करता हो यह वीडियो|
ttp://youtu.be/7dcBPd1gCYw

May 11, 2013

वादे की असलियत-हिन्दी कविता (vade ki asaliyat-hindi kavita



जिंदगी में ठंडक देने के उन्होंने इतनी बार तोड़े कि
अब यकीन कर दिल जलाने से
धूप में तपना अच्छा लगता है,
नहीं है आसरा कहीं से
दिल को यह समझा लिया
जिंदा रहने की ख्वाहिश
इतनी दमदार हो गयी
हर हाल खूबसूरत लगता है।
कहें दीपक बापू
वादे कांच के बर्तन जैसे
कभी न कभी टूट जायेगा
कितना भी चमकता झूठ दिखाये
कड़वा सच कहीं ज्यादा अच्छा लगता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर मध्यप्रदेश
              


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Apr 14, 2013

पैसा कभी गर्मी तो कभी ठंड भी देता है-हिन्दी विशेष रविवारीय लेख (paisa kabhi garmi to kabhee thand deta hai-specail hindi sanday article

               आजकल भारत में बेमौसम क्रिकेट मैच के आयोजन हो रहे हैं।  पहले जब भारत में कोई विदेशी क्रिकेट टीम आती थी तो उसके लिये सर्दी का मौसम तय हुआ करता था। उस काल में  नवंबर से फरवरी तक ही टेस्ट मैचों का आयोजन होता था। भारतीय टीम भी तभी विदेशों में जाती थी जब वहां का मौसम इस खेल के अनुकूल होता था।  जब से इस खेल ने फिल्म और टीवी की तरह मनोरंजक के साथ ही व्यवसायिक रूप लिया है तब से इसका कोई मौसम नहीं रहा।
             कभी देश भक्ति का वास्ता देकर क्रिकेट प्रेमियों को आकर्षित किया गया था। अब शहरों की प्रतिष्ठा का विषय बनाया गया है। तय बात है कि बड़े शहरों के नाम पर बने इन क्लबों के बीच होने वाले व्यवसायिक मैचों को वैसह हार्दिक अभिनंदनीय मान्यता नहीं है जैसे दो देशों के बीच होने वाले मैचों को मिलती थी।  एक सज्जन उस दिन कह रहे थे कि यह क्लबस्तरीय प्रतियोगिता होना देश का गौरव है।  होगी भई, कौन इसका विरोध कर सकता है?  फिर छोटे शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी इस पर अपनी प्रतिकूल टिप्पणियां दे भी तो उसे सुनने वाला कौन है?  क्लब स्तरीय इस प्रतियोगिता से खेल का क्या लेना देना है, यह आज तक समझ में नहंी आया।  कुछ लोगों इसे खेल के विकास के लिये अत्यंत उपयुक्त बताया है। इस पर हंसी आती है।  खेलों का विकास कैसे होता है यह आज तक समझ में नहीं आया।  अगर अधिक से अधिक लोगों उसे खेलने लगें और उसे ही विकास कहा जाये तो भी बात जमती नहीं क्योंकि क्रिकेट खेलने वाले हमारे देश में बहुत सारे लोग हैं।   वह सारे लोग क्रिकेट खेलते हैं जिन्हे मैदान और साथ मिल जाते हैं। अगर खिलाड़ियों को अधिक पैसा मिलना ही विकास है तो फिर प्रश्न आता है कि कितने खिलाड़ियों को यह पैसा मिल रहा है?  पैसा कमाने वालों की संख्या हजार या डेढ़ हजार से ऊपर दिख नहीं सकती। जिस देश में करोड़ों बेरोजगार हों वहां यह संख्या विकास का स्वरूप नहीं दिखाती।
      यह प्रतियोगिता शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये है।  अगर अपने पास समय है।  टीवी पर कोई ढंग का कार्यक्रम नहीं आ रहा हो तब अगर क्रिकेट का अभिनय करते क्रिकेट खिलाड़ियों को देखना बुरा नहीं है।  बीच बीच में विज्ञापनों का भी मनोंरजन आ ही जाता है।  कुछ बिफरे हुए आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के साथ मनोरंजन के क्षेत्र जैसा व्यवहार होना चाहिये।  यह उनका अपना नजरिया है पर एक बात तय है कि गर्मी के मौसम में इस खेल का आयोजन करना कोई सरल काम नहीं है। कहते हैं कि पैसा आदमी में गर्मी पैदा करता है पर जब इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन इस तर्क का जनक भी है कि यही पैसा ठंड का काम भी करता है।
   टीवी की बात हो रही है तो आजकल दो कॉमेडी धारावाहिक आते हैं।  दोनों का समय टकराता है। तब चैनल बदल बदल कर उनको देखना पड़ता है।  हमेशा ही अपने साथ बोरियत का सामान लेकर चलने वाले लोगों के लिये  कॉमेडी  अच्छा विषय है।  यह अलग बात है कि कॉमेडी प्रस्तुत करने वाले को भी कुछ विनोदप्रिय होना चाहिये। दोनों कॉमेडी धारावाहिक देखकर लगता नहीं है कि उनके साथ कोई लेखकीय न्याय हो रहा है।  हमारे देश के धनपति साहित्य, कला, खेल, फिल्म और अन्य मनोरंजक व्यवसायों से पैसा तो कमाना चाहते हैं पर उसके लिये प्रतिभाओं की खोज उनके बूते का नहीं है। सच बात तो यह है कि पाश्चात्य व्यवसायी भी पैसा कमाते हैं पर उनकी अपने काम से प्रतिबद्धता होती है। कुछ नया करना उनका मौलिक स्वभाव है।  उनकी यह प्रवृत्ति उनका प्रबंध कौशल बढ़ाती है।  इसके विपरीत भारतीय व्यवसायी पैसा कमाते हैं पर उनकी काम से अधिक कमाई से प्रतिबद्धता रहती है। कुछ नया करने की बजाय वह उपलब्ध व्यवस्था और साधनों का ही उपयोग करते हैं। यही कारण है कि फिल्म और टीवी प्रसारणों में अंग्रेजी फिल्मों और धारावाहिकों की नकल दिखती है।  खास बात यह कि भारत में लेखक को एक दोयम दर्जे का जीव माना जाता है। दूसरी बात यह कि हमारे देश में हिन्दी  मनोरंजक  कार्यक्रम मुबंई में बनते जहां की मूल भाषा भले ही मराठी है पर हिन्दी एक तरह से खिचड़ी भाषा बन गयी है।  यही कारण है कि मुंबईया फिल्म और धारावाहिकों की हिन्दी उत्तर भारत की मूल हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इन दोनों कारणों से हिन्दी कार्यक्रम अमौलिक हो जाते हैं।  बड़े बड़े दिग्गज हिन्दी लेखक हिन्दी फिल्मों में काम करने गये पर बेरंग वापस लौटे आये। इसका कारण यह कि मुंबई के थैलीशाह हिन्दी लेखक के मनोविज्ञान को नहीं समझते।  स्थिति यह है कि इतने सारे हिन्दी धारावाहिक तथा फिल्मों के पुरस्कार वितरण समारोह होते हैं वहां उसे लिखने वाले को सम्मान मिलने वाली घटना सामने नहीं आती। सच बात तो कहें कि हमें लगता है कि इन फिल्मों और धारावाहिकों के कथा, पटकथा और संवाद लेखकों की हैसियत स्पॉट बॉय से अधिक नहीं होगी।  यही कारण है कि भाषा की दृष्टि से हिन्दी कार्यक्रम स्तरीय नहीं होते।  कल्पनाशक्ति का अभाव साफ दिखता है। यही कारण है कि कॉमेडी कार्यक्रमों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर हास्य का भाव पैदा किया जाता है।
               पहले कहा जाता था कि हिन्दी गरीबों की भाषा है। यह अलग बात है कि ऐसा कहने वाले प्रसिद्धि भी हिन्दी में अधिक पाते रहे हैं।  अब हिन्दी वालों के पास पैसा भी खूब है।  यही कारण है कि अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रसारण हिन्दी में भी हो रहा है। यह भी एक तरह से अंग्रेजी व्यवसायियों की प्रबंध कुशलता का परिणाम है।  जबकि भारतीय मनोरंजन व्यवसायी हिन्दी का खाकर उसे दुत्कारते भी हैं। हिन्दी लेखकों के प्रति असम्मान का भाव रखन उसकी भाषा को दुत्कारने जैसा ही है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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