Oct 21, 2013

ज्ञान से कीमती बड़ा खजाना कहां मिलेगा-हिन्दी व्यंग्य लेख(gyan se kimti bada khazana kahan milega-hindi vyangya lekh)



                        एक संत ने एक सपना देखा कि एक पुराने महल में पंद्रह फुट नीचे  एक हजार टन सोना-जो एक एक स्वर्गीय राजा का है जिसे अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था-दबा हुआ है।  उसने अपनी बात जैसे तैसे भारतीय पुरातत्व विभाग तक पहुंचायी।  पुरातत्व विभाग ने अपनी सांस्कृतिक खोज के तहत एक अभियान प्रारंभ किया।  पुरातत्वविद् मानते हैं कि उन्हें सोना नहीं मिलेगा। मिलेगा तो इतने बड़े पैमाने पर नहीं होगा।  अलबत्ता कोई प्राचीन खोज करने का लक्ष्य पूरा हो सकता है, यही सोचकर पुरातत्व विभाग का एक दल वहां खुदाई कर रहा है।
                        यही एक सामान्य कहानी अपने समझ में आयी पर सोना शब्द ही ऐसा है कि अच्छे खासे आदमी को बावला कर दे। सोने का खजाना ढूंढा जा रहा है, इस खबर ने प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री प्रसारण का वह  अवसर प्रदान किया है जिसकी तलाश उनको रहती है।  भारत में लोगों वेसे काम अधिक होने का बहाना करते हैं पर ऐसा कोई आदमी नहीं है जो टीवी पर खबरें देखने में वक्त खराब करते हुए  इस खबर में दिलचस्पी न ले रहा हो। व्यवसायिक निजी चैनलों ने भारतीय जनमानस में इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि इसके माध्यम से कोई भी विषय सहजता से भारत के आम आदमी के लिये ज्ञेय बनाया जा सकता है।  इस पर खजाना वह भी सोने का, अनेक लोगों ने दांतों तले उंगली दबा रखी है। टीवी चैनलों ने लंबी चौड़ी बहसें चला रखी हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि संत ने सपना देखा है तो तय बात है कि बात धर्म से जुड़नी है और कुछ लोगों की आस्थायें इससे विचलित भी होनी है।  सोना निकला तो संत की वाह वाह नहीं हुई तो, यह बात अनेक धर्मभीरुओं को डरा रही है कि इससे धर्म बदनाम होगा।
                        कहा जाता है कि संत त्यागी हैं। यकीनन होंगे। मुश्किल यह है कि वह स्वयं कोई वार्तालाप नहीं करते और उनका शिष्य ही सभी के सामने दावे प्रस्तुत करने के साथ ही विरोध का प्रतिकार भी कर रहा है। इस पर एक टीवी पर चल रही बहस में एक अध्यात्मिक रुचि वाली संतवेशधारी महिला अत्यंत चिंतित दिखाई दीं। उन्हें लग रहा था कि यह एक अध्यात्मिक विषय नहीं है और इससे देश के भक्तों पर धर्म को लेकर ढेर सारा भ्रम पैदा होगा।
                        एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में कम से कम हमें तो इससे कोई खतरा नहीं लगता।  सच बात तो यह है कि अगर आप किसी को निष्काम कर्म का उपदेश दें तो वह नहीं समझेगा पर आप अगर किसी को बिना या कम परिश्रम से अधिक धन पाने का मार्ग बताओ तो वह गौर से सुनेगा।  हमारे देश में अनेक लोग ऐसे हैं जिनके मन में यह विचार बचपन में पैदा होता है कि धर्म के सहारे समाज में सम्मान पाया जाये।  वह कुछ समय तक भारतीय ज्ञान ग्रंथों का पठन पाठन कर अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। थोड़े समय में उनको पता लग जाता है कि इससे बात बनेगी नहीं तब वह सांसरिक विषयों में भक्तों का मार्ग दर्शन करने लगते है। कुछ चमत्कार वगैरह कर शिष्यों को संग्रह करना शुरु करते हैं तो फिर उनका यह क्रम थमता नहीं।  अध्यात्मिक ज्ञान तो उनके लिये भूली भटकी बात हो जाती है।  लोग भी उसी संत के गुण गाते हैं जो सांसरिक विषयों में संकट पर उनकी सहायता करते हैं।  यहां हम एक अध्यात्मिक चिंतक के रूप में बता दें कि ऐसे संतों के प्रति हमारे मन में कोई दुर्भाव नहीं है। आखिर इस विश्व में आर्त और अर्थाथी भाव के भक्तों को संभालने वाला भी तो कोई चाहिये न! जिज्ञासुओं को कोई एक गुरु समझा नहीं सकता और ज्ञानियों के लिये श्रीमद्भागवत गीता से बड़ा कोई गुरु होता नहीं। आर्ती और अर्थार्थी भक्तों की संख्या इस संसार में सर्वाधिक होती है। केवल भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व में धर्म के ठेकेदारों का यही लक्ष्य होते है। केवल भारतीय धर्म हीं नहीं बल्कि विदेशों में पनपे धर्म भी इन ठेकेदारों के चमत्कारों से समर्थन पाते हैं। जब अंधविश्वास की बात करें तो भारत ही नहीं पूरे विश्व में ऐसी स्थिति है।  जिन्हें यकीन न हो वह हॉलीवुड की फिल्में देख लें। जिन्होंने भूतों और अंतरिक्ष प्राणियों पर ढेर सारी फिल्में बनायी हैं। दुनियां के बर्बाद होने के अनेक संकट उसमें दिखाये जाते हैं जिनसे नायक बचा लेता है। ऐसे संकट कभी प्रत्यक्ष में कभी आते दिखते नहीं।
                        हम संतों पर कोई आक्षेप नहीं करते पर सच बात यह है कि जब वह सांसरिक विषय में लिप्त होते हैं तो उनका कुछ पाने का स्वार्थ न भी हो पर मुफ्त के प्रचार का शिकार होने का आरोप तो उन पर लगता ही है। दूसरी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान साधक स्पष्टतः उनकी छवि को संदेह की नजरों से देखने लगते है।  विदेशी लोग भारत के बारे में कह करते थे  कि यहां हर डाल पर सोने की चिड़िया रहती है।  जब हम मार्ग में गेेंहूं के खेत लहलहाते देखते हैं तो लगता है कि यहां खड़ी फसलें देखकर ही उन्होंने ऐसा कहा होगा।  हो सकता है यह हमारा पूर्वाग्रह हो क्योंकि हमें गेंहूं की रोटी ही ज्यादा पसंद है।  उससे भूख शांत होती है। दूसरी बात यह भी है कि सेोने से कोई अधिक लगाव नहीं रहा।  गेंहूं की रोटी लंबे समय तक पेट में रहती है और दिल में संतोष होता है। संतोषी आदमी को सोना नहीं सुहाता।  मुश्किल यह है कि सोना प्रत्यक्ष पेट नहीं भर पाता।
                        कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने। भारत में सोने की कोई खदान हो इसकी जानकारी हमें नहीं है।  सोना दक्षिण अफ्रीका में पैदा होता है।  तय बात है कि सदियों से यह विदेश से आयातित होता रहा है।  सोना यहां से दूर रहा है इसलिये भारत के लोग उसके दीवाने रहे हैं।  जिस गेंहूं से पेट भरता है वह उनके लिये तुच्छ है।  एक हजार टन सोना कभी किसी राजा के पास रहा हो इस पर यकीन करना भी कठिन है। हीरे जवाहरात की बात समझ में आती है क्योंकि उनके उद्गम स्थल भारत में हैं।  अनेक प्राचीन ग्रंथों में स्वर्णमय हीरे जवाहरात जड़े मुकुटों तथा सिंहासन  की बात आती है पर उनके सोने की परत चढ़ी रही होती होगी या रंग ऐसा रहा होगा कि सोना लगे।  असली सोना यहां कभी इतना किसी व्यक्ति विशेष के पास रहा होगा यह यकीन करना कठिन है।
                        भारत में लोगों के अंदर संग्रह की प्रवृत्ति जबरदस्त है।  कुछ समझदार लोग कहते हैं कि अगर सोने का आभूषण तीन बार बनवाने के लिये किसी एक आदमी के पास ले जायें तो समझ लो पूरा सोना ही उसका हो गयां।  इसके बावजूद लोग हैं कि मानते नहीं। अनेक ढोंगी तांत्रिक तो केवल गढ़ा खजाना बताने के नाम पर धंधा कर रहे हैं। इतना ही नहीं अनेक ठग भी सोना दुगंना करने के नाम पर पूरे गहने ही महिलाओं के हाथ से छुड़ा लेते है।  बहरहाल खुदाई पूरी होने पर सोना मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य ही बतायेगा पर टीवी चैनलों में विज्ञापन का समय समाचार तथा बहस के बीच खूब पास हो रहा है।
                        आखिर में हमारा हलकट सवाल-अरे, कोई हमें बतायेगा कि श्रीमद्भागवत गीता के बहुमूल्य ज्ञान के खजाने से अधिक बड़ा खजाना कहां मिलेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Oct 13, 2013

बदहवास होकर भक्ति भाव न दिखायें-हिन्दी लेख(badhawas hokar bhakti bhaav n dikhayen-hindi article or lekh and editorial)




                        रामनवमी के अवसर पर  दतिया के निकट रतनगढ़ माता के मंदिर में भगदड़ में मच जाने से से सौ लोगों के मरने की खबर है। यह संख्या बढ़ने का अनुमान भी है।  प्रशासन के अनुसार कुछ लोगों ने एक पक्के पुल के गिरने की अफवाह फैलाकर मंदिर में स्थित श्रद्धालुओं की भीड़  को उत्तेजित कर दिया। लोग मंदिर से भागकर जल्दी से जल्दी पुल करना चाहते थे पर वह इतना चौड़ा नहीं था कि इतनी भीड़ उसमें समा सके।  ऐसे में यह हादसा हो गया।  सबसे ज्यादा हैरानी की बात है कि लोग भगवान के दर्शन करने तो जाते हैं पर उस पर यकीन कितना करते हैं, ऐसे हादसे देखकर यह प्रश्न मन में उठता है। इस हादसे के बाद भी मंदिर में भक्त दर्शन कर रहे थे तो दूसरी तरफ उससे डेढ़ किलोमीटर दूर पुल पर कोहराम मचा हुआ था। इससे एक बात तो साफ होती है कि वहां उस समय मौजूद लोगों में अफवाह के बाद  घर वापसी की आशंका पैदा हुई होगी या फिर दर्शन कर लौट रहे लोग जल्दी में होंगे इसलिये भागे। यह भी बताया जा रहा है कि मंदिर में दर्शन करने के लिये उतावले युवकों ने ही यह अफवाह फैलायी।  कितनी आश्चर्यजनक बात है कि भगवान के दर्शन करने के लिये कुछ लोग झूठ बोलने की हद तक चले जाते हैं।
                        भक्तों में भी कई प्रकार के भक्त होते हैं।  हमने एक ऐसे भक्त को देखा है कि वह प्रतिदिन नियमपूर्वक एक मंदिर में प्रातः आठ बजे जाते हैं पर विशेष अवसरों पर  वह वहां प्रातः प्रांच बजे होकर ही आ जाते हैं या फिर रात्रि को जाते है जब वहंा भीड़ कम हो।  एक बार हमारी उनसे सामान्य दिनों में ही  हमारी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने पूछा-‘‘आप यहां प्रतिदिन आते होंगे।’’
                        हमने कहा्र-‘‘नही, जब मन कहता है चले आते हैं।’’
                        वह बोले-‘‘आप यहां आकर ध्यान लगाते हैं, यह देखकर अच्छा लगता है।
                        हमने हंसकर पूछा‘‘आप यहां रोज आते होंगे?’’
                        वह बोले-‘‘हां, पर जिस दिन किसी खास अवसर पर भीड़ अधिक हो तो दूसरे मंदिर चला जाता हूं।’’
                        हमने पूछा-‘‘ऐसा क्यों?’’
                        वह बोले-‘‘अरे, जिस भगवान के हमें प्रतिदिन सहजता से दर्शन होते हैं उनके लिये धक्के खाने की आवश्यकता महसूस नहीं करता। आम मजेदार बात सुनिये। हमारे परिवार के लोग खास अवसर पर यहां लाने का आग्रह करते हैं तो मैं मना कर देता हूं, तब वह ताने देते हुए यहां आकर दर्शन करते हैं।  अनेक बार उनके दबाव में आना पड़ता है तो मैं बाहर ही खड़ा हो जाता हूं।’’
                        खास अवसर पर मंदिरों में लगने वाले मेलों के दौरान कुछ लोग खास दिन के  उत्साह में शामिल होते हैं तो अनेक बार कुछ लोगों को पारिवारिक बाध्यता के कारण वहां जाना पड़ता है।  खासतौर से पहाड़ी अथवा एकांत में जलस्तोत्रों के निकट बने मंदिरों को सिद्ध बताकर उनका प्रचार इस तरह किया जाता है कि लोग पर्यटन के मोह में भी वहां आयें।  हमने तो यह भी देखा है कि देश के कुछ मंदिर तो फिल्मों की वजह से लोकप्रियता पाकर भक्तों को धन्य कर रहे हैं।  यह मंदिर भी ऐसे हैं जिनका भारतीय धार्मिक पंरपरा के अनुसार कोई इतिहास नहीं है।  यह मंदिर ही क्या जहां यह स्थित है उस क्षेत्र का भी कोई विशेष महत्व धार्मिक दृष्टि से नहीं रहा।  बहरहाल प्रचार और बाज़ार समूहों ने उनको लोकप्रिय बना दिया है। होता यह है कि कुछ धर्मभीरु इन गैरपरंपरागत स्थानों में जाना नहीं चाहते पर उनके परिवार के सदस्य उन पर दबाव डालते हैं कि वहां चलो क्योंकि भीड़ वहां जाती है।
                        मूलतः धर्म एक हृदय में धारण किया जाने वाला विषय है और वह स्वयं कहीं नहीं चलता बल्कि साधक उसके अनुसार जीवन की राह पर चलकर प्रमाण देता है कि वह धर्मभीरु है। हमारे देश में एक वर्ग रहा है जो धर्म को सक्रिय विषय केवल इसलिये  रखना चाहता है कि उसे लाभ होता रहे।  उसके लाभ के नये क्षेत्र बने इसी कारण अनेक नये भगवान बाज़ार के सौदागरों ने प्रचार प्रबंधकों की मदद से खड़े किये हैं।  आदमी का मन खाली दीवार में नहीं लगता वहीं अगर कोई तस्वीर लगा दी जाये तो वह उसकी तरफ आकर्षित होता है।  हमारे बाज़ार के सौदागर और प्रबंधक संयुक्त प्रयासों से ऐसी तस्वीरें बनाते रहते हैं कि आदमी को धर्म के नाम भटकाया जा सके।  खासतौर से चमत्कारों के प्रति लोग बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं इसलिये कथित सिद्ध स्थानों पर जाने पर जीवन में  चमत्कारी परिवर्तन आने के दावे किये जाते हैं।
            वर्तमान समय में जब भौतिकतावाद ने सभी के मन और बुद्धि पर नियंत्रण कर लिया है तब लोगों में मानसिक तनाव होना स्वाभाविक है। इसमें फिलहाल कमी आती नहीं दिखती।  जिस उपचार से जीवन सुखमय हो सकता है वह ज्ञान अब कम ही लोगों में है। जिनमें है भी तो वह बघारते हैं उस राह पर चलकर नहीं दिखाते।  ऐसे में वह समाज के प्रेरक नहीं बनते इसी कारण वह भटकाव के दौर में है।  यही कारण कि लोग घर से बदहवास होकर बाहर आते हैं और जहां  भी जाते हैं वहां उनकी मानसिक स्थिति पीछा नहीं छोड़ती। यही कारण है कि अनेक अवसरों पर मेलों में भारी भीड़ होने पर ऐसे हादसे पेश आते हैं। इस दुर्घटना में मृत लोगों का हमें बहुत दुःख है और घायलों से भी सहानुभूति है। भगवान दुर्घटना में मृत लोगों के परिवार के सदस्यों को यह हादसा झेलने की शक्ति प्रदान करे तथा घायल जल्दी स्वास्थ लाभ करनें ऐसी कामना है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Oct 4, 2013

द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ-हिन्दी चिंत्तन लेख(dravyamay se gyanmay yagya shreshth)



                        भक्ति भाव  के चार प्रकार हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासा और ज्ञान। श्रीमद्भागवत गीता में ज्ञान भक्ति को सर्वोत्तम माना गया है-इसका यह आशय कतई नहीं है कि बाकी तीन प्रकार की भक्ति को प्रतिबंधित किया गया है। इतना तय है कि कर्म के सिद्धांतों के अनुसार उसके परिणाम भी होते हैं। हम अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली हों तो सांसरिक विषयों पर अपने अनुरूप नियंत्रण कर सकते हैं।
                        हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन सामान्य लोग कम ही करते हैं और इसी कारण कथित संत ही उनके मार्गदर्शक होते हैं। यह संत  पेशेवर होते हैं और उनका लक्ष्य भक्तों के मन में स्थित आर्त और अर्थ भाव को लक्ष्य करना होता है ताकि वह शिष्य संग्रह कर सकें।  जब आदमी परेशान होता  है तब वह भगवान की तरफ देखता है। तब अनेक कथित विद्वान उसे कर्मकांडों के नाम पर व्यय करने के लिये प्रेरित करते हैं।  तय बात है कि जब हताशा, तनाव और निराशा से आदमी भर जाता है तब वह उससे बचने के लिये यह आत्मसंतोष तो करना चाहता ही है कि वह भगवान की भी आराधना कर रहा है और जिनको वह धर्म का ज्ञाता समझता है उनकी बात मानने लगता है। तब कोई विद्वान अपनी तरफ से किसी कर्मकांड का सुझाव देता है तब आदमी उनसे कहता है किहम दूसरी जगह कहां जायें, आप ही करवा दें  उसके बाद उसकी आर्त भाव की भक्ति का दोहन प्रारंभ हो जाता है।  उसी तरह कुछ लोग जीवन में धन, संपत्ति और अन्य उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिये अतिरिक्त प्रयास करना चाहते हैं। उनको भी भगवान से मदद की चाहत होती है और वह इन कर्मकांडी विद्वानों की तरफ बढ़ जाता है।  वह उसे कर्मकांड करने पर अधिक लाभ दिलाने का वादा करते हैं। यह अर्थार्थी भाव की भक्ति है और इसका दोहन सहजता से किया जाता है।
                        हमारे देश में धर्म प्राचीन काल से ही एक तरह  का पेशा बन गया है। जिज्ञासु व्यक्ति भी भक्ति करता है पर हमारे देश के पेशेवर ज्ञानियों का इतना ज्ञानाभ्यास नहीं होता कि वह उसे संतुष्ट कर सकें इसलिये उसे वह आर्त या अर्थार्थी भाव से भक्ति करने के लिये प्रेरित करते है। जहां तक सच्चे ज्ञानी का प्रश्न है उसे यह पेशेवर कभी नहीं सुहाते।  यह अलग बात है कि इन पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने समाज को इस तरह जकड़ रखा है कि लोग कर्मकांड न करने वाले ज्ञानी को ही नास्तिक मानते हैं।  अगर ज्ञानी कुछ लचीला हुआ तो वह दिखावे के लिये इन कर्मकांडों में शािमल हो जाता है और सख्त हुआ तो समाज उसे एक तरह से असामाजिक तत्व मानने लगता है।
                        संत कबीरदास जी ने कहा है कि दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करे न काये, जो सुख में ही सुमिरन करे तो दुःख काहे होय  यह भक्ति के ज्ञान रूप की सर्वोत्तम स्थिति है।  आज जब विश्व की आर्थिक दशा बदली है तो सामाजिक समभाव भी अत्यंत कमजोर हुआ है। लोग टूटे मन लिये फिर रहे हैं। रिश्ते नातों में अर्थ की प्रधानता हो गयी है।  वैसे ही हमारे यहां धर्म के नाम पर इतने पाखंड है कि उनमें पैसे के साथ ही समय भी खर्च होता है।  कुछ लोगों के लिये ऐसे कर्मकांड करना दुष्कर हो गया है पर सामाजिक दबाव के चलते  करते भी हैं।  हैरानी की बात यह है कि कोई भी संत उन्हें इन कर्मकांडों से मुक्त होकर स्वच्छंद जीवन विचरने का सुझाव नहीं देता।  कथित रूप से श्रीगीता का ज्ञान रखने का दावा करने वाले लो भी यह नहीं कहते कि द्रव्यमय इन कर्मकांडों से कोई लाभ नहीं है। विवाह, मृत्यु तथा श्राद्ध जैसे अवसरों पर पैसा खर्च करते हैं। जो लोग  श्राद्ध जैसे  कर्मकांडों को संपन्न कराते हैं उनके पास पितृपक्ष  के समय इतना भोजन आता है कि वह क्या उनके परिवार के लोग भी नहीं खा पाते।  इनका खाया किस तरह पितरों को पहुचंता है यह कोई नहीं बता सकता। इस देश के किसी भी पेशेवर संत में इतनी  हिम्मत नहीं है कि वह इन कर्मकांडों से दूर रहकर लोगों को ज्ञानमय यज्ञ में संलग्न रहने के लिये प्रेरित करे।
                        हिन्दू धर्म के नाम पर एकता दिखाने के लिये यह संत एक हो जाते हैं पर जो कर्मकंाड समाज को खोखला कर चुके हैं उन पर इनका ध्यान नहीं जाता या वह देना नहीं चाहते। एक बात बता दें कि ज्ञान यज्ञ भी एकांत में होता है।  हमने देखा है कि अनेक लोग सामूहिक रूप से ज्ञान यज्ञ आयोजित करते हैं जो कि श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार कतई नहीं कहा जा सकता। शुद्ध तथा समतल स्थान पर आसन बिछाकर प्राणायाम, ओम का जाप तथा  गायत्री मंत्र का जाप करने के बाद ध्यान लगाना ज्ञान यज्ञ का ऐसा प्रकार है जिसे करने पर मन और विचार में शुद्धि होती है। आदमी ज्ञान की बात सुनकर अपने अंदर उसे धारण करते हुए उसे जीवन में उतारता है। जिन लोगों को परिश्रम करने का अवसर कम मिलता है वह चालीस मिनट तक आसन या  प्रातः चालीस मिनट तक ही  घूमने के बाद इस यज्ञ को  कर सकते हैं।  मुख्य बात यह है कि पूर्ण स्वस्थ रहकर ही धर्म का निर्वाह हो सकता है। क्लेश, तनाव या निराशा से मुक्ति पाने के लिये द्रव्य यज्ञ करने से कोई लाभ नहीं होता वरन् तनाव बढ़ता है। सांसरिक विषय समय अनुसार स्वतः संचालित हैं उन्हें इंसान नियंत्रित करते दिखता है पर यह एक भ्रम हैं।  यह ज्ञान तभी हो सकता है जब हम ज्ञानमय यज्ञ करेंगे।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Sep 24, 2013

नैरोबी के मॉल पर हमलाःफिल्म और धारावाहिकों के लिये सामग्री बन ही गयी-हिन्दी लेख(ataick on nerobi in mol:Narobi ke mol par hamla:film aur tv episond ke liye samagri ban he gayee-hindi lekh or article)



                        कीनिया के नैरोबी में मॉल पर आतंकवाद हमले के जो समाचार प्रचार माध्यमों में देखने, सुनने और पढ़ने को मिले उससे तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में इस पर अनेक फिल्में बन जायेंगी और जमकर व्यवसाय करेंगी।  इसका मुख्य कारण उसकी खलपात्र एक खूबसूरत महिला के होने का जमकर प्रचार होना  है जो ब्रिटेन की गौरवर्ण वर्ग से संबंध रखती थी।  विश्व में आतंकवाद एक पेशा बन गया है।  हम जैसे लोगों का इस बात पर यकीन करना अत्यंत कठिन काम है कि बिना लोभ और लालच के कोई इसमें शामिल हो सकता है। अगर धर्म के लिये युद्ध करते हुए मर जाने पर स्वर्ग मिलने की चाहत है तो वह भी एक भ्रम है पर अंततः वह एक लालच ही है। बहरहाल हम इस मसले पर सामान्य से कुछ हटकर सोच रहे हैं। हमारी सोच का आधार ऐसे मसलों पर होने वाली बहसें तथा अन्य ऐसे समाचार हैं जो कुछ अलग सोचने को विवश करते हैं।
                        पहली बात तो यह है कि कीनिया के इस मॉल पर हमला होते ही इजरायल के कमांडो वहां कार्यवाही के लिये पहुंच गये। उन्होंने बाकी बंधकों को हानि पहुंचे बिना उनको मुक्त करवाने के साथ ही  अंदर मौजूद आतंकवादियों को परास्त किया।  अभी तक ऐसी घटनाओं में कभी इजरायल के ऐसे मामलों में शामिल होने की बात सामने नहीं आयी थी।  मुंबई पर हमले के समय इजरायल से अपने कमांडो भेजने का प्रस्ताव भारत को दिया था पर उसे नहीं माना गया।  उस प्रसंग में यहूदियों को भी लक्ष्य किया गया था और इजरायल अपने धर्म का दुनियां भर में खैरख्वाह होने का दंभ भरता है इसलिये उसने ऐसा प्रस्ताव दिया होगा।  अब इजरायल ने अपनी भड़ास निकाली।  क्या इजरायल किसी ऐसे अवसर के इंतजार में था या फिर उसकी खुफिया एजेंसियों ने कहीं न कहीं अपने सूत्रों से इस तरह की संभावित घटना का अनुमान कर लिया था पर बताया नहीं क्योंकि वह चाहते थे कि उनके देश को अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिले।  वैसे अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि विश्व भर में फैले आतंकवादियों को कहीं न कहीं खुफिया एजेंसियों का संरक्षण मिलता हैै। अफगानिस्तान में अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने तो बकायदा रूस के खिलाफ ऐसे ही आतंकवाद की मुहिम चलायी थी।  इजरायल की खुफिया एजेंसी का नाम कम आता है  पर कहीं न कहीं वह भी अमेरिका के साथ तालमेल करती रही है।
                        एक तरह से एक धर्म विशेष के आतंकवादी दावा तो यह करते हैं कि वह अमेरिका तथा इजरायल के विरुद्ध हैं पर हम देखते हैं कि उनकी वारदातों के बाद इन दोनों देशों को अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिल ही जाता है। ऐसे में अनेक प्रकार के संदेह तो होते ही हैं खासतौर से तब जब  इतिहास इन्हीं आतंकवादियों के साथ उनके रिश्ते होने की बात को प्रमाणित करता है।  इन दोनों देशों के पास नित नये प्रकार के हथियार बनते हैं जिनकी प्रयोगशाला ऐसी ही आतंकवादी घटनायें साबित होती हैं। संभव है इस प्रकार के आतंकवादियों में कुछ  इनकी खुफिया एजेंसियों से जुड़े हों जो समय आने पर इस तरह के छोटे छोटे युद्धों की पटकथा लिखते हों।  दूसरी बात यह है कि पूरे विश्व में काले और सफेद धंधे वालों का समन्वय बन गया है।  सफेद धंधे वाले भी अपनी अपनी शक्ति बढ़ाने के लिये काले धंधे वालों से संबंध बना ही लेते हैं।  फिल्म बनाने का धंधा आजकल चोखा है।  फिल्म न बने तो धारावाहिक भी बन ही जाते हैं। ऐसे में एक खूबसूरत सफेद विधवा के आतंकवादी बनने पर ढेर सारी कहानियां बन सकती है। यह अलग बात है कि अब उसे प्रमाणित करना कठिन काम है। यह अलग बात है कि फिल्म और टीवी धारावाहिकों के लिये एक कीमती मसाला तो मिल ही गया है जिसका लाभ अंततः इन धनपतियों को ही होगा।
            जिस महिला का जिक्र हो रहा है वह ब्रिटेन की है।  उसका पति किसी आतंकवादी घटना को अंजाम देते ही मारा गया था।  उसे दो बच्चे भी हैं।  पति के मरने पर वह स्वतः भी आतंकवादी बनी बल्कि वह चाहती थी कि उसके बच्चे भी आतंकवादी बने।  उसकी सामग्री इंटरनेट पर है जो उसे आतंकवादी प्रमाणित करनी पड़ती है।  कहा गया कि इस हमले का संचालन वही महिला कर रही थी।  अब वह मारी गयी हैं।  मॉल के हमले के बाद उसमें मरे लोगों पर चर्चा कम उस सफेद विधवा की चर्चा अधिक हो रही थी।  एक अलग से कहानी चल रही थी।  प्रश्न यह है कि उस महिला को किसने देखा? क्या वही थी या किसी अन्य महिला के वहां होने पर ऐसा प्रचार किया गया? क्या इंटरनेट पर उसकी सामग्री को प्रमाणिम मान लिया जाये या फिर माना जाये कि उसे भविष्य की खलपात्रा के रूप में स्थापित करने के लिये सृजित किया गया? नैरोबी के मॉल में जब लोग मर रहे थे तब क्या मीडिया में बैठे कुछ बुद्धिमान लोग हॉलीवुड की फिल्म के लिये कोई सामग्री जुटा रहे थे? इस तरह संभावनायें इसलिये लगती हैं क्योंकि हॉलीवुड सत्य घटनाओं पर फिल्म बनाकर जमकर पैसा कमाता है।  वैसे भी पूरे विश्व में अमेरिका की पहचान  आधुनिक हथियारों और फिल्म के निर्माण के कारण ही है। दूसरे यह भी कि काले और सफेद धंधे वालों को कहीं न कहीं से पैसा चाहिये।  विश्व में आतंकवाद बढ़ा है तो हथियारों की बिक्री तथा उस पर बनी फिल्मों के व्यवसाय में वृद्धि हुई है। हम अपने देश में देख लें। मान लीजिये यहां बिल्कुल आतंकवाद न होता तो या कोई ऐसी फिल्में बनाता।  बनाता तो सामान्य एक्शन फिल्म होकर रह जाती।
                        शक का दूसरा कारण यह भी है कि प्रचार माध्यम इन खूंखार  आतंकवादियों को आकर्षण खलपात्र के रूप में प्रचारित करते हैं।  ऐसे प्रचारित करते हैं जैसे कि वह कोई आसमान से उतरे जीव हों।  हम जिस महिला का जिक्र कर रहे हैं वह मारी गयी। तय बात है उस पर अब कोई मुकदमा तो चलेगा नहंी कि यह साबित किया जा सके कि वही थी। प्रचार माध्यम जो कह रहे हैं उस पर इसलिये कोई प्रश्न उठाना संभव नहीं है क्योंकि उसकी प्रमाणिकता के लिये कोई सूत्र उपलब्ध नहीं है। मॉल का प्रसंग तीन दिन चला और उस पर कोई तीन घंटे की रोमांचक फिल्म बनाना कोई बड़ी बात नहीं है।
                        अगर हम देखें तो इस घटना में जो आतंकवादी मरे वह भी कोई संपन्न नहीं थे और जिन निर्दोष लोगों को मारा भी कोई बड़े लोग नहीं थे।  अगर होते तो क्या वह इस मॉल में खरीददारी करने जाते, घर पर ही सामान नहीं मंगवा लेते। इस तरह आम आदमी का आम आदमी के विरुद्ध  यह ऐसा युद्ध था जो अंततः धनपतियों को लाभ देगा।  इस घटना के कारण सुरक्षा के वह उपकरण अवश्य दूसरे देश खरीदेंगे जो इजरायल या अमेरिका बनाते हैं।  हम अपने ही देश में देखेंगे अनेक जगह मॉल, मंदिर और पुरात्तव स्थानों पर पहले अंदर जाने के लिये मेटल डिक्टेटर   लगे फिर जब आतंकवाद के साथ अन्य अपराध बढ़े तो  सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर  सीसीटीवी कैमरे लग गये हैं।  अगर आतंकवाद न आता तो क्या सब बिकते। भारत बड़ा देश है और यह किसी एक वस्तु का जब प्रचलन बढ़ता है तो वह खरबों रुपये का व्यवसाय करती है। यह कारण है कि कुछ बुद्धिमान लोग आतंकवादियों को मिलने वाले धन का पता लगाने की मांग करते हैं।  इस तरह के संदेहों को जन्म अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल के साथ ही उन देशों ने भी दिया है जो आतंकवादियों को अपने यहां पनाह देते हैं या फिर मानवाधिकारेां के नाम उनको संरक्षण प्रदान करते हैं।  अगर आतंकवाद पनपने के बाद हथियारों की बिक्री और उन पर बनी फिल्में खरबों रुपये का व्यापार नहीं करती तो यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण लग सकता था पर कछ बुद्धिमान लोग इसे सत्य वचन कहकर प्रचारित करते हैं।   बहरहाल यह हमारे अनुमान ही है सच क्या है कोई नहीं जानता?  जो जानते हैं वह बतायेंगे नहीं और जो जानते नहीं वह ऐसे अनुमान करते रहेंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Sep 16, 2013

रोने पर जश्न-हिन्दी व्यंग्य कविता (rone par jashna-hindi vyangya kavita, a hindi satire poem)



किसी की कामयाबी पर
कौन जश्न मनाता है,
एक दूसरे की तबाही पर ही
सभी को मजा लेना आता है।
कहें दीपक बापू
दिल बहलाने के लिये
चाहिये लोगों को कोई न कोई बहाना,
चलते को गिराकर
अपनी ताकत का अहसास कराते हैं सभी
वक्त खराब करना लगता है
किसी गिरे इंसान को ऊपर उठाना,
बिक जाती है मनोरंजन के बाज़ार में
इसलिये सरलता से सनसनी,
बनते घर की कोई खबर नहीं,
टूटते पर सभी की भोहें तनी,
कुदरत ने इंसान को दिये
हंसने के कई तरीके
मगर उसे दूसरों के रोने पर ही
जश्न मनाना आता है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Sep 9, 2013

श्रीगणेश जी के स्मरण से आनंद मिलता है-श्रीगणेश चतुर्थी पर विशेष हिन्दी लेख(shri ganesh ji ke smaran se hi anana milta hai-shri ganesh chaturthi par vishesh hindi lekh,special hindi ariticle on ganesh chauth)



       आज पूरे देश में  श्रीगणेश चतुर्थी का पर्व उत्साह से मनाया जा रहा है। साकार रूप में  श्रीगणेश भगवान का चेहरा हाथी और सवारी वाहन चूहा दिखाया जाता है।  सकाम भक्त उनके इसी रूप पर आकर्षक होकर उनकी आराधना करते हैं। आमतौर से हिन्दू धर्म समाज के बारे में कहा जाता है कि वह संगठित नहीं है और भगवान के किसी एक स्वरूप के न होने के कारण उसमें अन्य धर्मों की तरह एकता नहीं हो पाती।  अनेक लोग भारतीय समाज के ढेर सारे भगवान होने के विषय की मजाक बनाते हैं। इनमें भी भगवान श्री हनुमान तथा गणेश जी के स्वरूप को अनेक लोग मजाक का विषय मानते हैं।  ऐसे अज्ञानी लोगों से बहस करना निरर्थक है।  दरअसल ऐसे बहसकर्ता अपने जीवन से कभी प्रसन्नता का रस ग्रहण नहीं कर पाते इसलिये दूसरों के सामने विषवमन करते हैं। यह भी देखा गया है कि गैर हिन्दू विचारधारा  के कुछ  लोगों में रूढ़ता का भाव इस तरह होता है कि उन्हें यह समझाना कठिन है कि हिन्दू अध्यात्मिक दर्शन निरंकार परमात्मा का उपासक है पर सुविधा के लिये उसने उनके विभिन्न मूर्तिमान स्वरूपों का सृजन किया है।  साकार से निराकार की तरफ जाने की कला हिन्दू बहुत अच्छी तरह जानते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि देह की इंद्रियां-आंख, नाक, कान, तथा मन बाह्य विषयों की तरफ सहजता से आकर्षित रहता है।  इसलिये ही बाह्य विषयों में दृढ़ अध्यात्मिक भाव स्थापित किया जाये तो बाद में निष्काम भक्ति का भाव सहजता से अंतर्मन में लाया जा सकता है।
                        भगवान के मूर्तिमान स्वरूपों से अमूर्त रूप की आराधना करने में सुविधा होती है।  दूसरे धर्मों के लोगों के बारे में क्या कहें कुद स्वधर्मी बंधु भी अपने भगवान के विभिन्न स्वरूपों के प्रति रूढ़ता का भाव दिखाते हुए कहते हैं कि हम तो अमुक भगवान के भक्त हैं अमुक के नहीं? इसके बावजूद गणेश जी के रूप के सभी उपासक होते हैं क्योंकि उनके नाम लिये बिना कोई भी शुभ काम प्रारंभ नहीं होता।
                        आमतौर से भगवान श्रीगणेश जी का स्मरण मातृपितृ भक्त के रूप में किया जाता है। बहुत कम लोग उस महाभारत की याद करते हैं जिसके गर्भ से श्रीमद्भागवत गीता जैसे अद्भुंत ग्रंथ  का जन्म हुआ, इसी महाभारत के रचयिता तो महर्षि वेदव्यास हैं पर भगवान श्रीगणेश जी ने हार्दिक भाव के साथ  अपनी कलम से उसे सजाया है।  आम भारतीय के लिये श्रीमद्भागवत गीता एक पवित्र ग्रंथ है पर इसके विषय में  कुछ ज्ञानी और साधक मानते हैं कि यह विश्व का अकेला एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें तत्व ज्ञान के साथ सांसरिक विषयों का विज्ञान भी विद्यमान है।  हाथी जैसे विशाल धड़ को धारण तथा चूहे की सवारी करने वाले भगवान श्रीगणेश जी ने श्रीमद्भागवत गीता की  रचना में अपना योगदान देकर भारतीय तत्वज्ञान को एक ऐसा आधारभूत ढांचा प्रदान किया जिससे भारत विश्व का अध्यात्मिक गुरु कहलाता है।  यही कारण है कि भगवान श्रीगणेश जी के उपासक जहां सकाम भक्त हैं तो निष्काम ज्ञानी और और साधक भी उनका स्मरण करते हुए उनके स्वरूप का आनंद उठाते हैं।
यहां प्रस्तुत है श्रीगणपत्यथर्वशीर्षम् के श्लोक आधार पर उनके स्मरण के लिये मंत्र।

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 ॐ (ओम) नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्व खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्

                        हिन्दी में भावार्थ-गणपति जी आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष तत्व हो, केवल आप ही कर्ता, धारणकर्ता और संहारकर्ता हो। आप ही विश्वरूप ब्रह्म हो और आप ही साक्षात् नित्य आत्मा हो।

ऋतं वच्मिं। सत्यं  वच्मि।।

                        हिन्दी में भावार्थ-यथार्थ कहता हूं। सत्य कहता हूं।
                        हम जैसे योग तथा ज्ञान साधकों के लिये श्रीगणेश भगवान हृदय में धारण करने योग्य विषय हैं।  उन्हें कोटि कोटि नमन करते हैं।  सच बात तो यह है कि इस तरह उनके आकर्षक स्वरूप का स्मरण करने से मन में उल्लास तथा आत्मविश्वास का भाव पैदा होता है उसे शब्दों में व्यक्त करना एक दुष्कर कार्य है।
                        इस गणेशचतुर्थी के पावन पर्व पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकों को हमारी तरफ से बधाई।  भगवान श्रीगणेश जी उनके हृदय में स्थापित होकर उनका जीवन मंगलमय करें। वही हर मनुष्य के  शुभ कमों के प्रारंभ में ही उत्तम फल का सृजन करते हैं जो समय आने पर उसे मिलता है। वही दुष्टों के  दंड का भी निर्धारण करते हैं जिसकी कल्पना अपना दुष्कृत्य करते हुए अपराधी सोच भी नहंी सकता। इसलिये मनुष्य को श्रीगणेश जी पर विश्वास करते हुए तनाव रहित होने का प्रयास करना चाहिये।
 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Aug 29, 2013

रुपये के अंतर्राष्ट्रीय मूल्य से जुड़ा राष्ट्र के सम्मान का प्रश्न-हिन्दी लेख(rupaye ke antarrashtriya mulya se juda rashtra ke samman ka prashna-hindi lekh or article)



                        जिस तरह रुपये की अंतर्राष्ट्रीय कीमत तेजी से गिरी है उससे देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक तरह की आंशकायें जन्म लेने लगी हैं।  फिलहाल इस बात की संभावना नहीं लगती कि रुपया का मूल्य आत्मसम्मान योग्य हो पायेगा। इन आशंकाओं के बीच एक प्रश्न भी उठता है कि आखिर रुपये का आत्मसम्मान योग्य अंतर्राष्ट्रीय मूल्य कितना रहना चाहिये? जहां तक हमारी याद्दाश्त है पंद्रह से बीस वर्ष पूर्व तक एक डॉलर का मूल्य  28 रुपया हुआ करता था।  अब वह 68 रुपये हो गया है।  इस पर हमारे देश की सरकारों का बजट भी घाटे वाला हुआ करता है।  घाटे का बजट होने का मतलब यह है कि सरकार उतनी राशि के नये नोट जारी कर ही  खर्च की पूर्ति करती है।  इसकी कोई सीमा तय नहीं है कि पता नहीं पर नये नोटों से मुद्रास्फीति बढ़ती है।
                        हमारे देश के आर्थिक रणनीतिकार इस घाटे के बजट को विकास के लिये आवश्यक कदम मानते हैं।  हम उनकी बात मान लेते हैं पर ऐसा लगता है कि इस सुविधा को अब एक आवश्यक मजबूरी मान लिया गया है।  अभी तक हमने धन के असमान वितरण को सुना था पर अब वह कदम कदम पर दिखने लगा है।  हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन ने छोटे मूल्य के नोटों के प्रचलन को कम कर दिया है पर फिर भी उनकी आवश्यकता अनुभव होती है।  पहले सौ रुपये का नोट तुड़वाकर उसे दस तथा पांच में सहजता से बदला जा सकता था पर अब पांच सौ नोट पास में है तो साइकिल या गाड़ी में हवा भरवाने के लिये छोटे नोट पहले से ही छांटकर रखने पड़ते हैं।  बाज़ार में खाने पीने का सामान महंगा है, सब्जियां महंगी हैं, दूध भी सस्ता नहीं है पर सीमित मात्रा में क्रय करना हो तो अनेक जगह पांच सौ का नोट बड़ा दिखने लग  जाता है। हजार का नोट किसी को दो तो वह हाथ से पकड़ कर देखने लगता है कि नकली तो नहीं है।  अगर पांच सौ या हजार का नोट पुराना हो तो लेने वाला आदमी संकोच भी करता है।  दस से लेकर सौ तक नोट कोई भी सहजता से लेता है पर उसके आगे का नोट लेने में आदमी सतर्कता बरतता है।
                        नकली नोटों ने असली मुद्रा का सम्मान कम कर दिया है। स्थिति यह है कि बैंकों के एटीएम से भी नकली नोट निकलने की शिकायतें आने लगी हैं। ऐसे में अगर किसी को सौ का नोट हाथ में दो और वह उसे गौर से देखे तो उसके सामने यह दावा करना निरर्थक होता है कि वह एटीएम से निकाला गया है।  लोग कह देते हैं कि एटीएम से नकली नोट निकलते हैं।
                        देश के हालात ऐसे हैं कि समझ में नहीं आता कि महंगाई इतनी तेजी से कब तक बढ़ेगी!  विशेषज्ञ बताते हैं कि विकसित देशों की मुद्रा सौ तक ही होती है।  अमेरिका डॉलर या ब्रिटेन के पौंड में सौ से ऊपर का नोट नहीं छापा जाता है।  भारत में अनेक लोग इसी के आधार पर पांच सौ या नोट छापने का विरोध करते हैं। हम अपनी कोई राय नहीं पा रहे पर इतना तय है कि पांच सौ और हजार के नोटों के प्रचलन के बाद महंगाई ने गुणात्मक रूप से अपने कदम बढ़ाये हैं।  नये नोट प्रचलन में आते ही गायब हो जाते हैं और पुराने बाहर आकर अपना रूप दिखाते हैं।  नये नोटों के आने मुद्रास्फीति के कारण महंगाई बढ़ती है और ऐसे में नोट ज्यादा देने पड़ते हैं।  उनमें पुराने नोटों होने पर  लेने में आनाकानी होती है और यहीं से मुद्रा के सम्मान का प्रश्न उठना प्रारंभ होता है। एकदम नये नोट चल जायें और पुरानों को चलाने में जद्दाजेहद करनी पड़े तक अपनी देश की मुद्रा को लेकर पीड़ा तो होती ही है।
                        कहा जाता है कि देश की आजादी के समय डॉलर का मूल्य एक रुपये के बराबर था। इस हिसाब से तो एक रुपये का यही मूल्य विश्व बिरादरी में हमारा आत्म सम्मान लौटा सकता है।  यह एक कल्पना हो सकती है पर असंभव नहीं है।  अमेरिका के हथियारों के अलावा कोई दूसरी चीज भारत में प्रसिद्ध नहीं है। इस मद में इतना खर्चा नहीं होता कि डॉलर इतना दमदार बना रहे। अलबत्ता अमेरिका जाने वाले भारतीयों नोट के बदले डॉलर खर्च करने के लिये  लगते हैं जिससे शायद इस तरह का असंतुलन पैदा होता हो तो कह नहीं सकते।  इसका कोई तोड़ आर्थिक रणनीतिकारों को ढूंढना चाहिये।  रुपये की गिरती कीमत देश की विश्व पटल पर ही राष्ट्रीय स्तर पर खतरों का संकेत दे रही है।  अमेरिका दुनियां का सबसे शक्तिशाली देश हथियारों की वजह से नहीं डॉलर के सम्मान के कारण माना जाता है। हमारा रुपया अगर सम्मान खोयेगा तो फिर किसी अन्य तरह से सम्मान पाने की आशा करना व्यर्थ होगा।  अध्यात्मिक विषय के कारण हमारी श्रेष्ठता विश्व में मानी जाती है पर जब सम्मान की बात आये तो विश्व का हर समाज केवल धनिकों को ही मानता है। फिर अध्यात्म वाले सम्मान या अपमान की सोचते ही कब हैं? जब हम विश्व में सम्मान पाने की बात करते हैं तो वह सांसरिक विषयों का ही भाग है और उसमें मुद्रा का सम्मान ही देश का सम्मान होता है। जब देश की मुद्रा का मूल्य बढ़ेगा तो विश्व में हमारे समाज का सम्मान निश्चित रूप से बढ़ेगा।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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