May 26, 2021

कोरोना की चाल हॉलीवुड की फिल्म से मिलती क्यों-एक रोचक लेख (Coroan And hollywood film "Kingsman The Golden Circle"-A ariticle)

 कल हमने एक हॉलीवुड फिल्म #Kingsman The Golden Circleदेखी। पता नहीं यह संयोग था या प्रयोग। हम कोरोना तथा उसके प्रचार को जिस तरह देख रहे हैं, इसकी विषय वस्तु हमारी उस राय से मेल खाती है। फिल्म में एक खलनायिका एक खतरनाक ड्रग्स बेचती है जिससे व्यक्ति की त्वचा बिगड़ जाती है और वह मरने का इंतजार करने लगता है। उसके इलाज का भी उसने इंतजाम किया है और वह एक राष्ट्रध्यक्ष को ब्लैकमेल करती है कि यदि वह अपनी जनता को बचाना चाहता है तो एक बड़ी रकम उसके खाते में जमा करे। उसके तत्काल बाद उसके दवाओं से भरे ड्रोन उन ठिकानों पर पहुंच जायेंगे जहां बीमार बंद हैं। ठीक वैसे ही जैसे चीन में कोरोना मरीज बंद किये जा रहे थे।

यह फिल्म 20 जनवरी 2020 में लोड की गयी। हम हॉलीवुड फिल्म देखते रहते हैं तो यूट्यूब हमारे सामने इनका लाता रहता है। यह फिल्म जिस तरह हमारे सामने आयी तो हमने खोलकर देखा। हमने सोचा कुछ देखकर बंद कर देंगे। जैसे फिल्म आगे बड़ी हमें लगा कि ड्रग्स का मामला है। चलो थोड़ा देख लेते हैं। किश्तों में फिल्म देखी।  ऐसा लग रहा था जैसे कोरोना का विषय कुछ इसी तरह चल रहा है। जिस तरह भारत का बीमार बाज़ार विदेशी दवाओं का गुलाम बना है उससे शक होता है कि क्या कोई पटकथा लिखकर फंसाया गया है। कहां हम स्वदेश वैक्सीन की तरफ बढ़ रहे थे और कहां अब विदेशों से भीख मांग रहे हैं। ऐसा लगा रहा था कि फिल्म की खलनायिका कोई अमेरिका, यूरोप, रूस तथा चीन का परिचायक हो। बहरहाल आप मानते हैं कि कोरोना एक बीमारी है तो इसे न देखें पर हम जैस थोड़े सिरफिरे हैं तो यह फिल्म देखें। याद रखें हमारा नजरिया हमेशा ही  उस प्रचार से अलग रहा है जिस पर आप यकीन करते हैं।

कोरोना वायरस के अनुसंधान से इलाज कम भ्रम ज्यादा हो रहा है-1

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कोरोना वायरस को लेकर हमारी सोच अलग है।  जिस तरह अंग्रेजी स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस पर अपना शोध प्रस्तुत कर रहे हैं उससे लगता है कि उनमें भ्रम की स्थिति है। हम अपने भारतीय दर्शन तथा योग के अभ्यास से जब इस संक्रमण को देखते हैं तो लगता है कि अंग्रेजी स्वास्थ्य सोच केवल हवाबाजी है।

इन्हीं अंग्रेजी विशेषज्ञो के अनुसार यह संकमण देह में नमी के अभाव में पनपता है तथा दूसरा यह भी कि अन्य रोग हो तो यह उसके लिये खाद्य पानी का काम करता है। इन्हीं विशेषज्ञों के अनुसार अगर यह संक्रमण हो जाये तो आदमी एकांत में रहकर स्वय से दूसरे के भी बचाये। नियमित भोजन पानी का सेवन करे तो वह पंद्रह दिन में ठीक हो जायेगा।

अब हम आज की स्थिति देखें तो ग्रीष्मकाल है और देह में स्वाभाविक रूप से नमी है तब यह संक्र्रमण कम जानलेवा लग रहा है। संभव है अनेक लोगों में मौजूद हो पर स्वतः ही 14 दिन में समाप्त हो जाये।  समस्या आयेगी जुलाई अगस्त और सिंतम्बर में जब हमारे शरीर में नमी कम हो जाती है। भोजन छोड़िये पानी भी देह कठिनाई से पचाती है।  संक्रमण के क्रम में जब उस समय यह वायरस जिसके शरीर में होगा उसे बहुत मुश्किल होगी। शायद यही कारण है सरकार के कुछ विशेषज्ञ उस समय की तैयारी कर रहे हैं। 

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Sep 16, 2020

भारत-चीन सीमा विवाद पर लिखे गये दो लेख ( Two Hindi Article on India-China Bordet ternsion

भारत चीन सीमा पर गोली चलाने की खबर सात दिन बाद आये तो समझ लो वहां नित कुछ बड़ा चल रहा है। ------------------ 
          विरोधी नेता एवं पत्रकार एकदम चीन का मोर्चा संभाल रहे हैं। मोदी कभी चीन का नाम नहीं लेते? सीमा में चीन अंदर घुस आया है उसे बाहर कब करोगे? सरकार सीमा की सही स्थिति क्यो नहीं बताती? इन सवालों का जवाब चीन उगलवाना चाहता है। आज विदेशमंत्रालय ने साफ किया कि छह माह से चीन की तरफ से भारतीय सीमा में घुसपैठ नहीं हुई। अब बताईये अगर यह सरकार आधिकारिक रूप से यह बात बाहर कहेगी तो दूसरे सवाल आयेंगे। हमारा मानना है कि भारतीय सेना कुछ ऐसा कर रही है जिसे सार्वजनिक करना शायद अभी ठीक नहीं है। उसने चीन की ताकत सूंघ ली है। चीनी सोशल मीडिया रूस को कोस रहा है, इसका मतलब यह कि कुछ ऐसा हुआ है कि जो चीन के लिये कष्टदायी है। सच यह है कि 1़962 में चीन ने भारतीय नेताओं का दबाकर चीन के सामने घुटने टिकवाये थे वही अब चीन से कह रहा है कि तुम घुटने टेको। उसका हुकुम मानने की ताकत चीन में नहीं है। नहीं मानेगा तो भारत से होने वाली पिटाई से उसकी पूरी इज्जत खराब होगी। कम से कम वह इस बार कैलाश मानसरोवर जरूर गंवायेगा। उसे पहले तय सीमा से काफी पीछे जाना पड़ेगा। शीजिनपिंग के सैनिक अधिकारी उन्हें सही जानकारी नहीं दे रहे। भारतीय सेना बहुत दूर तक निकल गयी है या पहुंचने वाली है। इसका कारण यह है कि स्वयं को एकमेव सर्वोच्च मानने वाले जिनपिंग अपनी सेना और पार्टी के पदाधिकारियों की पदोन्नति के अवसरों को अवरुद्ध कर दिया है वही चाहते हैं कि शीजिनपिंग पिटे तो हमारा रास्ता खुले। भारत में विरोधी सवाल पूछ रहे हैं पर भारत का कोई अधिकारी कैसा बता सकता है कि उसके सैनिक कैसे लड़ रहे हैं? विश्व में सौम्य दिखना है तो अपनी आक्रामकता छिपानी पड़ती है। मोदीजी की जिनपिंग से 18 मुलाकातें की हैं, और वह समझ गये हैं कि इस आदमी का सच क्या है? तानाशाही का यही परिणाम होता है कि एक व्यक्ति सबकुछ होता है उसके दोष का कोई भी फायदा उठाकर पूरे देश को जीत सकता है।
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भारत चीन विवाद में भारत के रणनीतिकार प्रतिकियात्मक बयान दे रहे हैं। सेना से कहते हैं कि आक्रामक रहो स्वयं सुरक्षात्मक रहना चाहते हैं। मोदी जी चीन को यह बता दें कि भारत तिब्बत को उसका हिस्सा नहीं मानता। अभी अरूणांचल के लिये जूझ रहा चीन सीधा हो जायेगा। याद रहे चीन तभी से आक्रामक हुआ है जब से भारत ने तिब्बत पर चीन का आधिपत्य स्वीकार किया है। यह शुभ कार्य स्वयगीय प्रधानमंत्री राजीवगांधी ने किया था। आजतक लोगों का यह समझ में नहीं आया था यह उन्होंने क्यों किया? समझौत में लिया दिया जाता है पर उन्होंने तो सबकुछ दे दिया। चीन को पस्त करने के विषय में एक समस्या मोदी जी के सामने दूसरी भी है। भारत के वार्ताकार नयी शिक्षा से सराबोर हैं। धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहते हैं। चीन तो चार पांच सो साल पुराने कागज ले आता है पर यह वार्ताकार हिन्दूत्ववादी होने के डर से प्राचीन भारतीय ग्रंथ नहीं ले जा सकते जिसमें मानसरोवर स्पष्टत भारत का हिस्सा माना जाता है। एक बार मोदी जी चीन को बता दें कि यह तो हमारे भगवान शिव का स्थाई वास है यह हमारा है पर शायद न कह पायें। इस पर पूरी दुनियां में उन पर हिन्दुत्ववादी होने ठप्पा लग जायेगा। भारत के ही उदारवादी चिल्लायेंगे कि यह कल्पना है। मगर मोदी मोदी हैं। उनके तरकश में उससे ज्यादा वैचारिक तीर हैं जो शायद आज किसी अन्य देश के राष्ट्रध्यक्ष के पास नहीं होंगे। भारत-चीन प्रचार युद्ध में ऐसा पहली बार हो रहा है कि चीन के गलवान टाइम्स की धमकियों का प्रभाव बौद्धिक जनमानस पर नहीं पड़ रहा है। पहले उसकी एक टिप्पणी से यहां लोग सिहर जाते थे। बहरहाल गलवान टाईम्स के बयानों से हम यह समझ में आ रहा है कि चीन भारत से वाकई डर गया है। दोनों में युद्ध अनवरत युद्ध चल रहा है। जिस तरह भारतीय नेता बयान दे रहे हैं वह बड़े ठंडे स्वर में पर गहरी मार वाले हैं। वरना गरजने वाले राजनाथसिंह इतने ठंडे स्वर में चीन पर आरोप नहीं लगाते।

May 28, 2019

मत का अधिकार था भगवान हुए मतदाता-दीपकबापूवाणी (Matadata ka Adhikar thaa Bhagwan hue Matdata-DeepakBapuwani)

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ज़माने पर सवाल पर सवालसभी उठाते, अपने बारे में कोई पूछे झूठे जवाब जुटाते।
‘दीपकबापू’ झांक रहे सभी दूसरे के घरों में, गैर के दर्द पर अपनी खुशी लुटाते।।
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मत का अधिकार था भगवान हुए मतदाता, एक बार बटन दबाया बंद हो गया खाता।
‘दीपकबापू’ पांच बरस तक सोये लोकतंत्र, वातानुकूलित कक्ष से फिर नंहीं बाहर आता।।
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अपने मुंह से सौ बार एक झूठ कह देते, भले लोग भी सच मानकर सह लेते।
‘दीपकबापू’ चेतना रख दी लालच में गिरवी, रुपये लेकर मजबूर जैसे रह लेते।।
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जीने के तरीके बदले मगर दिल पुराना चाहें, दिमाग बेकाबू कांप रहीं बेकाम बाहें।
‘दीपकबापू’ बेकार ढूंढते हमदर्द ज़माने में, मिले हमराही वही भटके अपनी जो राहें।।
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इधर उधर की बात पर होते झगड़े, सहने की शक्ति नहीं वाक्प्रहार करते तगड़े।
‘दीपकबापू’ भलाई के लिये निकले वह, जिन्होंने अपने पांव तले कई बेबस रगड़े।।
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जिंदगी में जीत हार के हिसाब लगाते, रुपये के आंकड़े से अपना दिमाग जगाते।
‘दीपकबापू’ हर पल खोये रहते सपनों में, झूठी चिंतओं से स्वयं को सदा ठगाते।।
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गरीब हो या अमीर दिल में अभाव हैं पाले, सब है पर किसी कमी का ताव हैं डाले।
‘दीपकबापू’ घर में कबाड़ भरा छत तक, तब भी नयी चीज खोजने का दाव हैं डाले।।
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कच्चे धागे जैसी जिंदगी पक्के मकान में रखी, सदा धन कमाते रहते रोती सांस सखी।
भटकता मन ढूंढे हर जगह अपने लिये मस्ती, ‘दीपकबापू’ कभी सुख की बूंद न चखी।।
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पद चलें तो छोटे उड़े जो वह लोग बड़े हैं, भगवान के दर लेकर मन के रोग खड़े हैं।
‘दीपकबापू’ भीड़ में तन्हाई से ऊबे सभी, चले जाते वहां जहां भरी पंगत में भोग पड़े हैं।।
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अपने भय से छिपते जमाने को छलिया बतायें, कमजोर छवि अपनी गैरों का दोष बतायें।
‘दीपकबापू’ तकनीकी युग ने बदला चलन, पुरानी चाल से हारें मशीने पर गुस्सा जतायें।।
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Mar 28, 2019

राजकाज की समझ नहीं फिर भी सम्मान चाहें-दीपकबापूवाणी (Rajkar ki Samajh nahin Fir bhee samman chahen)-DeepakBapuWani

मन की बात सभी कर लेते, किसी के कहे पर अपने कान हमेशा फेर लेते।
‘दीपकबापू’ रोना हंसना बेचने में बहुत माहिर, जज़्बात का बाज़ार घेर लेते।।
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विज्ञापन के बीच बहस में चीख मची है, शोर से दिमाग लूटो यही सीख बची है।
पेशेवर लेते भलाई का ठेका, ‘दीपकबापू’ भक्तों को राम नाम भीख ही पची है।।
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राजकाज की समझ नहीं फिर भी सम्मान चाहें, अपनी नाक दिखाते कांपती बाहें।
‘दीपकबापू’ सिंहासनों पर बैठे बरसों बेकार, मन नहीं भरा ढूंढे कुर्सी की नई राहे।।
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बांचा ज्ञान बेचकर भी धंधा होय, वक्ता हुए साहुकार श्रोता भी अश्रोता होय।
‘दीपकबापू’ रोतन की भीड़ लगी सब जगह, एकांत आनंद से हंसे ज्ञानी सोय।।
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अपना काम अपने मुख से सुनाये, किताबी ज्ञान बाज़ार में सुनाकर नाम भुनायें।
‘दीपकबापू’ रातभर जागें सुबह नींद करते, भीड़ में स्वास्थ्य के नुस्खे गुनगुनायें।।

दुधिया रौशनी में पत्थर चमकते लगें, सूरज के उगते अपने सत्य के साथ जगें।
‘दीपकबापू’ दिल बहलाने के लिये भागे फिरें, लौटें घर लोग फिर ऊबें तब भगें।।

Apr 26, 2018

जवानी भी नशे में चूर होती-दीपकबापूवाणी (Jawani Bhi nashe mein chooh hotee=DeepakBapuwani)


जवानी भी नशे में चूर होती
किस्मत है कि जोश में भटके नहीं।
‘दीपकबापू’ साथ ईमान नाम भी खो देते
वह भले जो इश्क में अटके नहीं।
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अन्न जल दे रही धरा आसानी से
इंसान इसका मान नहीं करता
‘दीपकबापू’ आकाश से मांग रहा
मिला जो उसकी शान नहीं करता।
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हम सवाल करें वह भी सवाल करें,
जवाब के बदल आहें भरते हैं।
‘दीपकबापू’ े किताब से कमाई अक्ल
चिंताओं पर बस सलाहें करते हैं।
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शहीदों के याद में मेले लगाते,
आत्मप्रचार के शब्द भी पेले जाते।
कहें दीपकबापू दिल कुर्सी पर
जुबान से सपनों के ठेले लगाते।
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नाग सांप बिच्छू की आपस में लड़ाई,
चिड़िया किसे कोसे किसकी करे बड़ाई।
कहें दीपकबापू अच्छा है दाना चुगे
 ढूंढे अपना चूल्हा अपनी कड़ाई।
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जज़्बातों की गहराई मालुम नहीं
दर्द के अहसास का पैमाना न जाने।
कहें दीपकबापू रसस्वाद रहित दिल
श्रृगार गीत हास्य का ताना न माने।
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जिनसे उन्हें बहुत फायदे हैं,
उनके लिये ढूंढे बहुत वायदे हैं।
कहें दीपकबापू जो कंधा मददगार
उसे गिराने के भी कायदे हैं।
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जब अपना दर्द भूलाना चाहें,
ढूंढते दिल बहलाने की राहें।
कहें दीपकबापू तरीक एक ही
बेचैन गले लग मिलायें बाहें।
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Apr 7, 2018

पाप पुण्य कभी नहीं मरें, इंसान का पीछा बछड़े जैसे करें-दीपकबापूवाणी (Paap punya kabhi nahin maren-DeepakBapuWani)


अमन का पसंद नहीं उनको राग
वैमनस्य की लगा रहे आग।
कहें दीपकबापू सब देते दगा
मिलजुलकर छिपा रहे अपने दाग।
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घोटाले पर आंदोलन का घेरा है,
अपना हिस्सा मिले तो मुंह फेरा है।
कहें दीपकबापू सच्चा साधु वही
कहें जो माया मेरी राम भी मेरा है।
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माथे पर लगाये हुए चंदन
मन में माया के लिये क्रंदन।
कहें दीपकबापू त्यागी बने पाखंडी
बांध रहे गले राजसी बंधन।
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पाप पुण्य कभी नहीं मरें,
इंसान का पीछा बछड़े जैसे करें।
कहें दीपकबापू बता गये चाणक्य
सच सामने आता झूठ से डरें।
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Mar 17, 2018

सिंहासन मिला अपनों से मुंह फेरा, लगाया इर्दगिर्द चमचों को घेरा-दीपकबापूवाणी (Sinhasan mila apnon se moonh Fera-DeepakBapuWani)


चाहतों का ढेर मन में पड़ा है,
तंत्रमंत्र करें कहीं खजाना गड़ा है।
कहें दीपकबापू मायाजाल में
हर शख्स वीर कैदी जैसे खड़ा है।
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चंद्रमा जैसा कोई मनस्वी नहीं
सूर्य जैसा कोई तेजस्वी नहीं।
कहें दीपकबापू अमीर बहुत मिलते
कुबेर जैसा कोई यशस्वी नहीं।
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श्रृंगार रस में सब मस्त हुए
वीर रस के पियक्कड़ पस्त हुए।
कहें दीपकबापू आभासी संसार में
सत्य के साझेदार अब अस्त हुए।
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सिंहासन मिला अपनों से मुंह फेरा,
लगाया इर्दगिर्द चमचों को घेरा।
कहें दीपकबापू अंधे होकर बांटे रेवड़ी
गाते जायें क्या तेरा क्या मेरा।
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राजपद पर रोगी चेहरे विराजे हैं,
मेकअप ऐसे किया जैसे ताजे हैं।
कहें दीपकबापू क्या हिसाब मांगें
जिनकी सांसों में बेसुर ढोलबाजे हैं।
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भलाई के नाम पर लूट मचायें,
मदद की आड़ बेईमान छूट पायें।
कहें दीपकबापू जो बने धर्मरक्षक
अर्थनीति से समाज में फूट लायें।
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Feb 22, 2018

खजाने का पहरेदार से हिसाब न पूछना-दीपकबापूवाणी (Khazane ka Hisab paharedar se na poochhna-DeepakBapuwani)


हर रोज खजाने लुटने लगे,
पहरेदार हो गये लुटेरों के सगे।
कहें दीपकबापू मुंह बंद रखो
सुनकर हसेंगा जग जो आप ठगे।
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चक्षुदृष्टि क्षीण हो गयी
चश्में सभी ने लगा लिये हैं।
‘दीपकबापू’ पत्थर जैसे पाले दिल
अपने जज़्बातों से ही ठगा लिये हैं।।
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पहले चिड़िया को दाना चुगा देते हैं
फिर कागजी फसल उगा लेते है।
कहें दीपकबापू हिन्दी में सवाल
अंकगणित का उत्तर चुभा देते हैं।
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चंदन के पेड़ से सांप जैसे लिपटे हैं,
राजकाज से वैसे दलाल चिपटे हैं।
कहें दीपकबापू कर अपना भला स्वयं
सारे काम कमीशन से अच्छे निपटे हैं।
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धर्म की रक्षा का भेद न जाने,
अर्थ का संग्रह ही सब माने।
कहे दीपकबापू समाज के ठेकेदार
संपत्ति से चले संस्कार लाने।
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खजाने का पहरेदार से हिसाब न पूछना,
लुटने की देते वह पहले सूचना।
कहें ‘दीपकबापू’ गरीबी पर मत रोना
घरेलू लुटेरों से जो है जूझना।
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Feb 11, 2018

नये ताजा चेहरे समय से पुराने हो गये-दीपकबापूवाणी (naye taza chehahe samay se purane ho gaye-DeepakBapuWani)

आंखें तरेरे मुट्ठी भींचे जंग के लिये दिखें तैयार, थोड़े देर में बनेंगे अमन के यार।
‘दीपकबापू’ वीरता के लंबे चौड़े बयान करें, नकली गुस्सा बेचकर करते झूठ से प्यार।।
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शब्दों का जाल श्रोताओं को फांस रहे हैं, दर्द का इलाज करने वाले खांस रहे हैं।
‘दीपकबापू’ भावनाओं का व्यापार करते, जिंदादिल मतलबपरस्ती में ले सांस रहे हैं।
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नये ताजा चेहरे समय से पुराने हो गये, प्यार के रिश्ते बिछड़कर अनजाने हो गये।
‘दीपकबापू’ जिंदगी में यादों का भंडार भरा है, भुलाने के भी बहुत बहाने हो गये।।
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इधर लात मारे उधर प्यार की माया बुने माला, पीछे लगे बहुत हाथ किसी ने नहीं डाला।
‘दीपकबापू’ झाड़ू घुमायें रोज दीवार पर, मकड़ियां इधर उधर बना लेती फिर नया जाला।
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सफेद वस्त्र भी स्वच्छ चरित्र की पहचान कहां, भरे भंडार पर दानी की शान कहां।
‘दीपकबापू’ ज्ञानचक्षु बंद कर देखें सब, पांव न धरें लालची का होता सम्मान जहां।।
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Oct 16, 2017

आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली,
प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली।
दीपकबापूहम तो चिंगारी लाते रहे
अंधेरापसंदों को नहीं लगी रौशनी भली।
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सिंहासन के सौदे से परे
भले लोग वादे नहीं करते।
जनाब! जीत जाते जो जनमत
पूरे करने के इरादे नहीं करते।

उमस का मौसम बंद हवायें
आओ कुछ पल उदास हो जायें।
दीपकबापूकब तक तक रहें बदहवास
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अपने ही दिल का हाल जाने नहीं,
दिमाग की भी चाल माने नहीं।
दीपकबापूआभासी इलाके के बेगाने
झूठे सौदे का जाल जाने नहीं।
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अपने दिल के किस्से
चौराहों पर क्या बयान करें
लोग कान बंद किये हैं।
आंखें भी मतलब से सिये हैं।
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बदसूरत धोखबाजों का क्यों जिक्र करें,
आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें।
दीपकबापूसपनों के बाज़ार में
लालच से परे दिल बेफिक्र करें।
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Aug 27, 2017

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर।
‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।
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भक्ति व्यापार के लिये जो घर तजे हैं, चंदे से कमाये मुफ्त पर उनके बजे हैं।
‘दीपकबापू’ मेले में भीड़ आती भक्तों की तरह, हर रंग के भगवान वहां सजे हैं।।
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हृदय में रस से पत्थर भी
गुरु हो जाते हैं।
दर्द के मारे रसहीन
जहां कोई मिले
रोना शुरु हो जाते हैं।
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गरीबों के उद्धार के लिये
जो जंग लड़ते हैं।
उनके ही कदम
महलों में पड़ते हैं।
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दिल की बात किससे कहें
सभी दर्द से भाग रहे हैं।
किसके दिल की सुने
सभी दर्द दाग रहे हैं।
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ईमानदारी से जो जीते
गुमनामी उनको घेरे हैं।
चालाकी पर सवार
चारों तरफ मशहूरी फेरे है।
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जहां शब्दों का शोर हो
वह शायर नहीं पहचाने जाते।
जहां जंग हो हक की
वहा कायर नहीं पहचाने जाते।
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समय का खेल 
कभी लोग ढूंढते
कभी दूर रहने के बहाने बनाते।
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राजपथों की दोस्ती
वहम निकलती
जब आजमाई जाती है।
गलियों में मिलती वफा
जहां चाहत जमाई नहीं जाती है।
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कंधे से ज्यादा  बोझ दिमाग पर उठाये हैं,
खाने से ज्यादा गाने पर पैसे लुटाये हैं।
मत पूछना हिसाब ‘दीपकबापू’
इंसान के नाम पशु जुटाये हैं।
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नाम कमाने मे श्रम होता है,
बदनामी से कौन क्रम खोता है।
‘दीपकबापू’ कातिलों की करें पूजा
शिकार गलती का भ्रम ढोता है।।
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हम तेरे दर्शन करते रहेंगे
तू दिख या न दिख।
हम तेरा नाम कहते रहेंगे
तू लिख या न लिख।
तेरी दी जिंदगी तेरे नाम लिखेंगे
तू दिख या न दिख।
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Jul 6, 2017

जेब में पैसा कम पर सपने अमीरी से सजे हैं-हिन्दीक्षणिकायें (zeb mein paisa kam par sapne se saje hain-HindiShort poem}

हमारा विश्वास छीनकर
उन्होंने अपनी आस खोई है।
अपने ही पांव तले
तबाही वाली घास बोई है।
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जेब में पैसा कम
पर सपने अमीरी से सजे हैं।
वातानुकूलित मॉल में
ग्राहक सोचता सामान
देखने में कितने मजे हैं।
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समस्या खड़ी कर
हल का सवाल पूछने आते हैं।
पत्थर दिल के बुत
हवा से जूझने जाते हैं।
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मन में बाज़ार से
खरीददारी की चाहत
पर जेब खाली है।
ज़माने ने जिंदगी
उधार पर ही टाली है।
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मिलती खुशी उधार से
चाहे जहां से हम मांग लेते।
नकद में सस्ता मिला चैन
इसलिये चाहतें यूं ही टांग देते।
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बस्तियों में आग लगा देते हैं
अमन में जंग जगा देते हैं।
जज़्बात के सौदागर
इंसानों को दगा देते हैं।
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Jun 25, 2017

चोर की बारात में प्रहरी में आते हैं-दीपकबापूवाणी (Chor ki barat mein prahari aate hain-DeepakBapuWani0

धन संपदा के लिये भक्ति करें, कामयाबी से अपने ही मन में आसक्ति भरें।
‘दीपकबापू’ चढ़े जाते महंगे मंच पर, स्वार्थ के सिद्ध प्रेम से अनासक्ति करें।।
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खेल में भी जुगाड़ चलने लगी है, सट्टे की झोली में हार जीत पलने लगी है।
‘दीपकबापू’ धरा छोड़ पर्दे पर देव बसाये, नजरों की ही अगरबत्ती जलने लगी है।।
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सलामत है हाथ जिसमें हथियार नहीं है, गद्दारी से बचा जिसके यार नहीं है।
‘दीपकबापू’ सोच रखीं जमीन पर सदा, आकाश का उनके कंधे पर भार नहीं है।।
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चोर की बारात में प्रहरी में आते हैं, फूहड़ों की महफिल अक्लमंद सजाते हैं।
‘दीपकबापू’ चरित्र का प्रमाण नहीं जांचते, सभी अपने गिरेबां से घबड़ाते हैं।।
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आशा निराशा के बीच लोग झूले हैं, बुलाते कमजोरियां अपनी ताकत भूले हैं।
‘दीपकबापू’ दलालों से करते सुलह, मन उड़े पर पांव चले नहीं पेट जो फूले हैं।।
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आतंक के व्यापार में बहुत लोग पलते, हर वारदात पर विज्ञापन के दिये जलते।
‘दीपकबापू’ हथियारों का खोला कारखाना, शांति कराने हवाई जहाज में चलते।।
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पसीने के मालिक खुले आकाश में सोये हैं, पूंजपति वह जो ठगी के बीज बोये हैं।
‘दीपकबापू’ पहरेदार नाम अपना धर लिया, मगर लुटेरों के आभामंडल में खोये हैं।।
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लोहे लकड़ी के सामान में आसक्ति रखते, ऊंचे दाम चुकाकर भक्ति रस चखते।
‘दीपकबापू’ रूप स्वर गंध की पहचान नहीं, चिंत्तन मे अहंकार का भाव रखते।।
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दिल में मजे की आग जला देते हैं, वासना में देशभक्ति भी चला देते हैं।
‘दीपकबापू’ सौदागरों के चालाक ढिंढोरची, इंसान की अक्ल गला देते हैं।।
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चाहतों में हर पल इंसानी मन डूबा है, बहला लो हर तरह फिर भी ऊबा है।
‘दीपकबापू’ विलासिता में सुख ढूंढता, भीड़ में खड़े फिर भी अकेले में डूबा है।
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बाज़ार में लगे खरीददारों के मेले, भीड़ दिखती पर स्वार्थ से खड़े सभी अकेले।
‘दीपकबापू’ जो मिले उसे यार कहें, जानते हुए कि दाम पर वफा के लगे हैं ठेले।।
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अपनी नाकामी पर कसूर पराया बतायें, मन में विष ज़माने का सताया जतायें।
‘दीपकबापू’ मतलब से संबंध जोड़ें तोड़ें, काली नीयत से अपनी काया ही सतायें।।
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Jun 11, 2017

गर्मी की तपती धूप देह को जलाती है-हिन्दी में छोटी क्षणिकायें (Garmi ki Tapti Dhoop deh ko jalate hai-ShortHindiPoem)

मौसम के साथ दिल के
मिजाज भी बदल जाते हैं।
जिंदगी से यूं ही निभायें
हालातों से ख्याल भी
बदल जाते हैं।

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जिंदगी के चलते दौर
हर बार साथी बदल जाते हैं।
कुछ की यादें साथ चलतीं
कुछ भूले में बदल जाते हैं।
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हर बार नयी काठ की हांडी
आग पर चढ़ जाती है।
नया रसोईया देखकर
स्वाद की उम्मीद जो बढ़ जाती है।
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बाज़ार लगा है
पशु पक्षी क्या
इंसान भी बिकते हैं।
दुकानों में अमीर
ग्राहक और विक्रेता
हमेशा ही दिखते हैं।
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नाम के राजा
काज तो ऊपरवाला ही
चला रहा है।
लोभियों ने शहर में लगाई आग
कहते हैं भूखा जला रहा है।

अपना हमारा दुश्मन
एक दिखाकर हाथ मिलाया।
हमारे कंधे पर शिखर चढ़े
उससे अपना गला मिलाया।
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कहीं जीतने की जंग
कहीं खरीद के रंग
जमीन की लड़ाई जारी है।
कभी बंदूकधारी जीते
कभी धनी की बारी है।
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गर्मी की तपती धूप
देह को जलाती है।
पीड़ा इतनी कि
दिल में पल रहे
दर्द को भी गलाती है।
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चिंताओं में डूबे हैं
चित्तक कहलाते हैं।
दुनियां का डर बेचकर
सबका दिल बहलाते हैं।
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उनके नाम के सहारे ही
जिंदगी भर चलते रहे।
हालात बिगड़े तब आया ज्ञान
भारी भ्रम में पलते रहे।

संगमरमर के पत्थर से बने
महलों में भी क्या रखा है।
जब शब्दज्ञान का हर रस
दिल दिमाग ने चखा है।
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पर्दे पर सपने बेचने वाले
हांका लगाते हैं।
लटकायें सुंदर पर खाली झोली
पर चालाकी का टांका लगाते हैं।
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मांगते तो सामनों का
ढेर जुटा लेते।
चाही दर्द की दवा
मिलती जाती बेबसों में
ढेर लुटा देते।
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पैसे पद प्रतिष्ठा के
तख्त पर बैठे
क्या गरीब का भला करेंगे।
वातानुकूलित कक्ष में पैदा ख्याल
धरा पर क्या चला करेंगे।
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आज भी पापों के घड़े
कभीकभी फूट जाते हैं।
यह अलग बात भरने वाले
जमानत पर छूट जाते हैं।
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फरिश्ता बनने की चाहत
बंदे को मसखरा बना देती है।
त्याग के तपयोगी को
आग सोना खरा बना देती है।
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छात्र किसान जवान के नाम
झंडा लगा देते।
भीड़ में इंसान जुटते
भेड़ की तरह
नारा लगाकर जगा देते।

Apr 3, 2017

गज़ब उनकी खामोशी दिल को लुभाती है-हिन्दीक्षणिकायें (Gazab unki Khamoshi lubhati hai-ShortHindiPoem)

नाव चली लहरों से लड़ने
किनारा मिला नहीं
मांझी ने ही किया छेद
इसलिये डूबने का
हुआ गिला नहीं
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गज़ब उनकी खामोशी 
दिल को लुभाती है।
तारीफ  के काबिल
उनका नज़र डालना
जो फूल भी चुभाती है।
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नाम तो बड़े सुने
छोटे दर्शन से सिर धुने।
थक गये यह सोच
कब तक ख्वाब बुने।
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बंद कमरों की गप्पबाजी
कभी बाहर नहीं आती।
राई को ढके पर्वत
यही राजनीति बताती।
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घर से बाहर आते
पर दिमाग के द्वार बंद हैं।
ताजगी की अनुभूति में
उनकी संवेदनायें मंद हैं।


दिल पढ़ा नहीं
आंखें देखकर
श्रृंगार पद रच डाला
अर्थरहित स्पंदहीन
शब्द हुआ मतवाला।
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समाज सेवा के ठेके
वादों पर मिल जाते हैं।
नकली जुबानी जंग से
लोग यूं ही हिल जाते हैं।
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बंदर जैसी उछलकूद
करते रहो
लोग समझें बंदा व्यस्त है।
कुछ नहीं कर पाओगे तुम
इसलिये हौंसला बढ़ाओ
उन लोगों का
जो पस्त है।
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अपनी बात इशारों में
शेर कहकर लिखते हैं।
मन भी होता हल्का
शालीन भी दिखते हैं।
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विकास के रास्ते
तांगे से कार पर
सवार हो गये।
जज़्बातों से ज्यादा
सामानों के यार हो गये।
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एकांत मे भी अकेले
कहां होते हम
अपना अंतर्मन जो साथ होता।
मौन से मिलता वह
वरना कोने में बैठा रोता।


चांद और सूरज से
तुलना न कीजिये।
अंधेरा को चिराग ही पहचाने
रौशनी का मजा यूं ही लीजिये।
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घर सामान से भरे हैं,
दिल जज़्बात से डरे हैं।
शोर करते भीड़ में लोग
अकेलेपन से डरे हैं।

Mar 22, 2017

हर ताबूत में एक बुत भरा है-दीपकबापूवाणी (Har tabut mein ek but Bhara hai-DeepakBapuWani)

जहान के सहारे से अपनी जरुरत धरे, दिल में मदद का ख्याल रखे परे।
‘दीपकबापू’ बंजर जमीन पर खड़े होकर, श्रमहीन सोना पाने की चाह करे।।
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आमजन जन्मदिन याद नहीं रखता, खास की तरफ हर कोई तकता।
‘दीपकबापू’ लिख कथा मिटा देते, प्रेम शब्द कोई हिसाब नहीं रखता।।
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घुमाफिरा कर अपनी बात कहते हैं, सच के साथ डरकर रहते हैं।
‘दीपकबापू’ कायरों के जमघट में, सभी मुर्दों की कहानी कहते हैं।।
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हर ताबूत में एक बुत भरा है, जिंदगी में हारने से हर कोई डरा है।
‘दीपकबापू’ मस्ती खरीदें बाज़ार से, फिर भी दिल बोरियत में मरा है।।
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सच है लातों के भूत बातों से न माने, जब प्यार करो तो घूंसा ताने।
‘दीपकबापू’ मानवाधिकारों के चिंतक, भले बुरे इंसान में फर्क न माने।।
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तिलक लगाकर चलें भक्त कहलाते, नृत्य गायन से दिल आसक्त बहलाते।
‘दीपकबापू’ भक्ति की पहचान रंग बनाये, तस्वीर दिखा सदा वक्त टहलाते।।
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उनके अपने दिमाग एकदम हिले हैं, दूसरे इंसानो से बहुत शिकवे गिले हैं।
‘दीपकबापू’ घर से निकले लालच के साथ, सामने ताकतवर लुटेरे मिले हैं।।
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जीतें तो  तेजी से अपना कोष  बढ़ायें, हारें तो मैदान पर रोष चढ़ायें।
‘दीपकबापू’ खिलाड़ी होकर अक्ल खो दी, कर्म का भाग्य पर दोष मढ़ायें।
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सिंहासन पाने के लिये चलाते अभियान, जलकल्याण पर देते नये बयान।
‘दीपकबापू’ पांव पर चलाते बितायी जिंदगी, दर्द भूल जाते चढ़ते ही यान।।
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Feb 12, 2017

सौदे की वफादारी एक साल-हिन्दी व्यंग्य कविता (saude ki vafadaari ek saal-HindiSatirePoem)


सामानों से शहर सजे हैं
खरीदो तो दिल भी
मिल जायेगा।

इंसान की नीयत भी
अब महंगी नहीं है
पैसा वफा कमायेगा।

कहें दीपकबापू बाज़ार में
घर के भी सपने मिल जाते
ग्राहक बनकर निकलो
हर जगह खड़ा सौदागर
हर सौदे की वफादारी 
एक साल जरूर बतायेगा।
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एक दूसरे पर
सब लफ्जों से बरसे हैं।
जुबान पर गालियों के 
एक से बढ़कर एक फरसे हैं।

नासमझों की भीड़ खड़ी
कब जंग होगी 
कब बहेगा लहू
दूश्य देखने के लिये
सभी बहुत तरसे हैं।
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Jan 16, 2017

फिल्म और क्रिकेट में सब चलता है यार-हिन्दी व्यंग्य (Everithing good in Hindi Film and Cricket Match-Hindi Satire Article)

            पहलवानी पर बनी फिल्म में नायिका का अभिनय करने वाली ने कहा है कि ‘मुझे कश्मीर के युवा अपना आदर्श न समझें।’
           उसने इस फिल्म को नारी विषयों पर प्रेरक मानने वाले लोगों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा है। हमने टीवी, अखबार तथा सामाजिक जनसंपर्क पर इस फिल्म के गुणगान करने वालों पर तरस आ रहा है।  बिचारे क्या कह रहे थे कि इस प्रेरणा से नारियों को प्रेरणा लेनी चाहिये और अभिनय करने वाली नायिका ने ही कहा दिया कि ‘इस फिल्म को भूल जाओ।’
          उसने बहुत समय बाद यह बात कही है। अब तक भारतीय दर्शक अपना पैसा खर्च कर चुके हैं।  निर्माता निर्देशक पैसा वसूल कर चुके हैं। यही लोग दांव पैंच लगाकर उसे पुरस्कार भी दिलाते रहेंगे। इस फिल्म का चाकलेटी नायक अंतर्राष्ट्रीय पहुंच वाला है इसलिये संभावना है कि यह ऑस्कर भी चली जाये।  हमें शुरु से ही पर्दे पर अभिनय करने वालों की वक्तव्यकला के साथ बौद्धिक क्षमता पर भरोसा नहीं है। वह दूसरे का लिखा पढ़ते हैं जिसकी कीमत भी वसूल करते हैं। उनमें आदर्श या प्रेरणा ढूंढने वाले भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में वर्णित सिद्धांतों को नहीं जानते। हम तो देह सहित उपस्थित मनुष्य को ही कल्पित मानते हैं तो फिर पर्दे के पात्रों में सत्य ढूंढने की तो सोच भी नहीं सकते। 
                  उस नायिका ने वहां की मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद-जिसके बाद सामाजिक संपर्क प्रचार माध्यमों में उस पर छींटाकसी हुई थी-उठे बवाल पर उसने माफी मांगी है। दरअसल उसने वहां की मुख्यमंत्री से मुलाकात पर माफी मांगी है-जिसे प्रचार माध्यमों के विद्वान अपने अपने ढंग से ले रहे हैं। तय बात है कि हम भी अपनी ढंग से ही लेंगे।
              हमें उसका माफीनामा उसकी फेसबुक पोस्ट की तरह  शुद्ध रूप से राजनीति से प्रेरित लगता है। अगर कश्मीर के युवा युवतियां उसे आदर्श मान रहे थे तो  वहां उपस्थिति धार्मिक विघटनकारियों के लिये चिंता की बात हो सकती -जिन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिये  भारत में मौजूद तत्वों से भी मदद मिलती है। वह एक सफल फिल्म की अभिनेत्री है अतः उसके पास इतना धन तो आ गया होगा कि वह मुंबई में बस जाये पर जैसा कि उसने माना कि वह आयु में छोटी है इसलिये माता पिता के बिना यह संभव नहीं है।  यकीनन उसके माता पिता पर भी कहीं से दबाव आया होगा-अब भले ही उस नायिका के बयान में कहा जाये कि उस किसी का दबाव नहीं है। उसने अपने बयान में पिछले छह महीनों की हालत का जिक्र किया है-अधिक विवरण नहीं दिया-जिससे यह साफ लगता है कि पत्थरबाजी की घटना के बाद वहां जो तनाव व्याप्त हुआ है वह उसकी तरफ इशारा था।
                 इस बात की संभावना भी लगती है कि उसके संरक्षक अब फिल्म उद्योग को अप्रत्यक्ष रूप से यह समझा रहे हों कि अब दूसरी फिल्में भी दो वरना हमारी अपनी एक मौलिक विचाराधारा भी है जिस पर हम चल सकते हैं। उसे कोई दूसरी फिल्म मिली है इसकी जानकारी नहीं है इसलिये अनुमान के आधार पर यह हम कह रहे हैं।  पहलवानी में भारत के लिये नाम रौशन करने वाली जिस वास्तविक नायिका की कहानी पर यह फिल्म बनायी गयी थी उसने भी मामला समझे बिना पर्दे की नायिका को समर्थन दिया पर हमारी समझ में नहीं आया कि इसकी जरूरत क्या थी जो प्रचार प्रबंधकों ने उससे सवाल किये। धरातल के यह वास्तविक नायक पर्दे के अभिनेताओं का खेल नहीं जानते-यह बात तय है। 
               हमें तो फेसबुक पर पहले पोस्ट डालने फिर उसे हटाने के प्रकरण में नारियों की समस्याओं से अधिक राजनीति  के साथ ही व्यवसायिक कौशल की चाल भी दिख रही है और भाई लोग इसे परंपरागत ढंग से वहीं ले जा रहे हैं। अभी बताया जा रहा है कि उसने फेसबुक से अपनी इस संबंध में सारी पोस्ट हटा ली है। तब सवाल आता है कि दबाव पहले था या अब है।  समझना मुश्किल हो रहा है कि अगर पहले यह दबाव नहीं होता तो फेसबुक पर माफीनामें वाली  पोस्ट डालती क्यों? या अब यह समझाया जा रहा है कि अब दबाव पड़ा तो हटाई है। वरना अगर पहले दबाव इतना प्रभावी होता तो अब हटाती क्यों?  कहीं यहां प्रचार माध्यमों में अपना नाम लाने की कोशिश नहीं है। सच यह है कि हम इस फिल्म की नायिका का नाम तक नहीं जानते थे। न फिल्म देखी न देखने का इरादा है।  ज्यादा माथापच्ची करने पर हमारे दिमाग में एक ही नारा आता है जिसके जनक हम ही हैं-फिल्म और क्रिकेट में सब चलता है यार!