समसामयिक लेख तथा अध्यात्म चर्चा के लिए नई पत्रिका -दीपक भारतदीप,ग्वालियर
Jul 24, 2007
चुनते हैं भाषा से शब्दों को जो फूल की तरह
प्रशंसा के कुछ शब्द
किस तरह लुभा जाते हैं
जो तुम्हे करते हैं नापसंद
वही तुम्हारे प्रशंसक हो जाते हैं
जुबान का खेल है यह जिन्दगी
कर्ण प्रिय और कटु शब्दों से
ही रास्ते तय हो पाते हैं
जो उगलते हैं जहर अपने लफ्जों से
वह अपने को धुप में खडे पाते हैं
जिनकी बातों में है मिठास
वही दोस्ती और प्यार का
इम्तहान पास कर
सुख की छाया में बैठ पाते हैं
जिन्होंने नहीं सीखा लफ्जों में
प्यार का अमृत घोलना
रूखा है जिनका बोलना
वह हमेशा रास्ते भटक जाते हैं
उनके हमसफर भी अपने
हमदर्द नहीं बन पाते हैं
चुनते हैं भाषा से शब्दों को
फूल की तरह
लुटाते हैं लोगों पर अपनों की तरह
गैरों से भी वह हमदर्दी पाते हैं
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Jul 22, 2007
मन का रिश्ता
दर्द मुझे होता है
यह रिश्ता तन का नहीं
मन का बना होता है
घाव तो कभी न कभी
हर किसी को लगते हैं
गैरों और परायों में भी
कोई न कोई मरहम लगाने
वाला भी होता है
साथ निभाने के लिए
वादा तो बहुत लोग करते हैं
जिन्दगी के इस रास्ते पर
कई लोग साथ चलते हैं
पर हमसफर का हमदर्द होना भी
जरूरी होता है
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तुम्हारी आंखों में
मेरे लिए हमदर्दी
हमेशा दिखती है
तुम्हारी सांसों में
मेरी मदद की चाह
हमेशा पलती है
न चाहूँ मैं प्यार
न चाहूँ अपने लिए हमदर्दी
तुम्हारी जुबान से निकले
शहद जैसे मीठे शब्दों से ही
जीवन में जीतने की इच्छा
मेरे दिल में बढती है
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Jul 12, 2007
सबसे अलग हटकर लिखो
समाज में झगडा
बढाने के लिए लिख
शांति की बात लिखेगा
तो तेरी रचना कौन पढेगा
जहां द्वंद्व न होता वहां होता लिख
जहाँ कत्ल होता हो आदर्श का
उससे मुहँ फेर
बेईमानों के स्वर्ग की
गाथा लिख
ईमान की बात लिखेगा
तो तेरी ख़बर कौन पढेगा
अमीरी पर कस खाली फब्तियां
जहाँ मौका मिले
अमीरों की स्तुति कर
गरीबों का हमदर्द दिख
भले ही कुछ न लिख
गरीबी को सहारा देने की
बात अगर करेगा
तो तेरी संपादकीय कौन पढेगा
रोटी को तरसते लोगों की बात पर
लोगों का दिल भर आता है
तू उनके जज्बातों पर ख़ूब लिख
फोटो से भर दे अपने पृष्ठ
भूख बिकने की चीज है ख़ूब लिख
किसी भूखे को रोटी मिलने पर लिखेगा
तो तेरी बात कौन सुनेगा
पर यह सब लिख कर
एक दिन ही पढे जाओगे
अगले दिन अपना लिखा ही
तुम भूल जाओगे
फिर कौन तुम्हे पढेगा
झगडे से बडी उम्र शांति की होती है
गरीब की भूख से लडाई तो अनंत है
पर जीवन का स्वरूप भी बेअंत है
तुम सबसे अलग हटकर लिखो
सब झगडे पर लिखें
तुम शांति पर लिखो
लोग भूख पर लिखें
तुम भक्ति पर लिखो
सब आतंक पर लिखें
तुम अपनी आस्था पर लिखो
सब बेईमानी पर लिखें
तुम अपने विश्वास पर लिखो
जब लड़ते-लड़ते थक जाएगा ज़माना
मुट्ठी भींचे रहना कठिन है
हाथ कभी तो खोलेंगे ही लोग
तब हर कोई तुम्हारा लिखा पढेगा
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Jul 8, 2007
ज्ञान के चिराग कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं
कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं
सदियों से अपनी जगह खडे बुत भी
लोगों को चलते नजर आ रहे हैं
जिनको नहीं दिखता उनको क्या कहें
जिनको दिखता है वही
हवा में अपने संदेश उडाये जा रहे हैं
इधर है ताज खङा
उधर है हिमालय अड़ा
एक को बनाया गरीब और
मजदूरों ने अपने ख़ून पसीने से
इस बात को जग भूला
दुसरे को सृष्टी ने खुद गडा
जिस पर होता है व्यापार
वहीं लोग अपने जज्बात
बेचने जा रहे हैं
विज्ञान ने की है इतनी तरक्क़ी
कि लोग अपने ज्ञान-चक्षुओं की
रोशनी खोते जा रहे हैं
कहैं दीपकबापू
कभी गर्मी की तीक्ष्ण धुप में जलते
कभी वर्षा की फुहारों में चमकते
कभी सर्दी में ठंड में दमकते
ताज में भला पहिये लग सकते हैं
पर लोग हैं कि लगाए जा रहे हैं
हम ज्ञानी हैं कि अज्ञानी यही
नहीं समझ पा रहे हैं
Jul 7, 2007
क्या वह बचपन का बदला ले रहा था?
उसके यहां जाने के पीछे मेरा यह भी स्वार्थ था कि उसके और मेरे बचपन के रिश्ते को सब जानते थे और मैं वहाँ नहीं जाता तो रिश्तेदार लोग जो कि मुझे पहले मुझे शराबी कहकर बदनाम करते थे उन्हें अपने विरुद्ध बोलने का अवसर देना।
मैंने अपनी वापसी टिकट का इंतजाम कर लिया क्योंकि मैं उसके घर रहने का इच्छुक नहीं था। रिश्ते में वह मेरा चचेरा भाई था और उसका और मेरा बचपन साथ-साथ बीता था और उसके और मेरे पिता आपस में भाई होने के साथ दुकान में साझेदार भी थे।
हम दोनों दुकान पर साथ बैठते, बाहर खेलते और आपस में झगडा करते और साथ-साथ घुमते भी थे। मेरा वह चचेरा भी होने से ज्यादा बडे भाई की तरह हो गया था। वह मुझसे बड़ा था। नौवी कक्षा तक प्रवेश लेने तक उसने उसने मेरे शैक्षणिक जीवन में अपनी भूमिका निभाई - दोनों के पिता की साझेदारी टूटने के साथ ही हम दोनों का बिछोह हो गया पर इसकी पीड़ा मुझे ज्यादा लगती थी उसे कम। मैं शुरू से चिन्तन करने वाला था और वह शुद्ध रुप से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाला। मुझे हमेशा लगता था कि वह केवल मुझे इसीलिये प्रेम करता दिखता है क्योंकि उस समय उसके पास कोई नहीं होता। जब उसे खेलने और घूमने के लिए दुसरे दोस्त मिल जाते तब वह मुझे एक तरह से भूल जाता था। हालांकि इसकी वजह यह भी हो सकती है कि वह आयु में मुझसे आठ वर्ष बड़ा था । मौका पड़ने पर अपनी बदतमीजी दिखाने से बाज नहीं आता था। समय गुजरता गया।
वह शहर से बाहर था और मैं अपने ही शहर में। उसके बाहर रहने से उसके बारे में रिश्तेदार ज्यादा नहीं जानते थे। इधर मैं पीने लगा था तो मेरी छबि उसके मुक़ाबले खराब होती जा रही थी। पीते तो और भी थे पर उसका नाम लेकर जब मेरी तुलना होती तो मुझे उससे कमतर करार दिया जाता ।
हमारी रिश्तेदारी बहुत बड़ी है और अनेक शादी के अवसरों पर उससे मुलाक़ात होती मैं शराब पीता पर उसे कभी शराब पीते नहीं देखा। उसे बदबू न आ जाये इसलिये उसके पास नहीं जाता था पर मुझे शक था कि वह भी पिए रहता था। मैं बचपन से ही अखबार और किताब पढने का शौक़ीन रहा हूँ और वह इसके लिए मेरी खिल्ली भी उडाता था और कहता था यह तो ज्ञानी है। बाद में वह जब मुझसे कोइ ज्ञान वर्द्धक चर्चा होती तो बडे ध्यान से सुनता।
स्टेशन पर उतरते ही मैंने उसको फोन किया तो उसने मुझे अपने घर का पता दिया और हम दोनों आटो से उसके घर पहुंच गये। वह घर पर नहीं था और उसकी पत्नी ने हम दोनों का स्वागत किया। उसके बेटे-जिसकी शादी हो रही थी-और बेटी ने हमारा अभिवादन तक नहीं किया। जब उनसे मुलाकत होती थी तो वह परिचय तक नहीं कराता था क्योंकि अधिकतर मुलाकातें किसी खास अवसर पर लोगों के हुजूम के बीच होतीं-और उसके मेरे संबंध भी ऐसे थे कि उसे लगता होगा कि उसके बच्चे मुझसे परिचित होंगे पर मैं जानता था कि उनसे मेरी दूरी थी-मैं उनके लिए एक तरह से पिता का एक ऐसा मित्र था जिससे उनको परिचय की आवश्यकता नहीं थी।
कुछ देर बाद वह आया और आकर मेरे गले मिला और बोला -"कल तुम काकटेल पार्टी में नहीं आये?ऐसा क्या काम था जो अपने भतीजे की शादी में बिल्कुल उस टाईम आये हो जब बरात निकलने वाली है?"
वह उस भतीजे की शादी की बात कर रहा था जिसने मेरा अभिवादन तक नहीं किया था। मैंने उससे कहा कि_तुम जानते हो कि मैंने अब पीना छोड़ दिया है, और मुझे लग रहा था कि अगर काकटेल पार्टी में आता तो लोग पीने की लिए दबाव डालते। मैंने सोचा कि ठीक बारात के वक्त ही पहुंचूं , यही अच्छा रहेगा।
वह चुप हो गया। मैंने देखा वहां उस मकान में उसके ससुराल पक्ष का ही कब्जा था-इसका मतलब यह था कि मेरे चाचा, बुआएं तथा उसके बहिन और बहनोई कही और ठहरे थे इस बात को मैं समझ गया। कुछ देर बाद मेरी चाची वहां आयी और उससे पता लगा कि उसने आसपास तीन-चार मकान लिए हैं और वहां बाकी रिश्तेदार भी ठहरे है। मैं अपना सामान लेकर पास लिए एक मकान में चला गया।
थोड़े देर बाद नहा धोकर उसके मकान के बाहर लगे टेंट में आकर बैठ गया तब वह मुझसे बोला-'' अब तुम यहीं जमे रहना और देखभाल करते रहना।"
मैं खुश हो गया कि उसने मुझसे एक काम तो कहा , हालांकि मैं जानता था कि वह कभी भी अपनी बदतमीजी दिखाने से बाज नहीं आयेगा। मुझे लगा कि वह कहीं न कहीं मुझे अपमानित कर मजे जरूर लेगा। इसमें ज्यादा वक्त नहीं लगा।
लडकी वाले बाहर से आये थे और उनसे मिलने के लिए दस लोगों को मिलने के लिए जाना था।मेरे चाचा, उसका ससुर, साडू समेत दस लोगों का चुनाव उसने किया जबकी उसमे मेरी वरीयता तीसरे नंबर की थी, पर उसने एक बार भी मुझसे नहीं कहा। रिश्तेदारों में इसको लेकर कानाफूसी भी हुयी -मैं खामोश रहा। दरअसल वहाँ से रिश्तेदारों को पैसे मिलने वाले थे और वहां हर कोई जाने को उत्सुक्त था। मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थे और अगर वह मुझसे कहता भी तो किसी अन्य का नाम सुझा कर अलग हो जाता।
बारात दोपहर की थी । बारात से पहले नाश्ते में उसने सबसे पहले मुझे आवाज दीं -उस समय ऐसा लगा कि देखो वह मुझे कितना प्यार करता है ,और मैं उसके द्वारा किये गये अपमान को भूलने का प्रयास करना लगा।
पीने वालों के लिए उसने पीने का इंतजाम कर दिया था। सबने पी पर मैंने और मेरे अन्य चचेरे भाई ने पीने से इंकार कर दिया -मैं उसका जिक्र नहीं किया था-वह बचपन से ही हमारे साथ स्टेपनी की तरह रहा था, पर वह चुंकि दुकान पर साथ नहीं रहा था इसीलिये उसे लोग हमसे इस तरह जोड़ कर नहीं देखते थे जैसे हम दोनों को ।
बेंड बजना शुरू हुआ , वह किराए की पगडियां लाया था और सबको पहनने लगा, और मुझे छोड़ गया। मेरे एक चाचा ने उसे इशारा भे किया पर वह अनदेखी कर गया। उसने मेरे साथ उस चचेरे भाई की अनदेखी कर गया। मेरा चचेरा भाई इस बात से नाराज भी हुआ ।
बरात में सब पिए हुए नाच रहे थे हम दोनों के अलावा । बरात में कुछ देर चलने के बाद फिर हमें बस में बैठना था । बस के पास पहुंचे तो बरसते शुरू हो गयी थी और पीने वाले नाच रहे थे। मैं और मेरा दूसरा चचेरा भाई बारात के पास ही सब देख रहे थे। वह आकर मेरे पास कहने लगा कि तुम लोग क्या मेरी बारात का मजा खराब कराने आये हो जो बस में नहीं बैठ रहे हो।
दूसरा चचेरा भाई बोला -'तेरा दिमाग खराब हो गया है , या बहुत पी ली है जो हमसे कह रहा है कि बारात का मजा खराब करने आये हो।
फिर वह चुप हो गया। बरात जब अपने ठिकाने पर पहुंची तो वहां स्वागत की तैयारी थी। उसने सब पुरुष और महिला रिश्तेदारों को मालाएं दीं लडकी के रिश्तेदारों को पहनाने के लिए हम दोनों चचेरे भाईयों और पत्नियों को इससे भी वंचित कर दिया।
रात को जब देर हो गयी और हम दोनों चचेरे भाईयों को अपने शहरों की तरफ रवाना होना था-उसे बस से और मुझे रेल से जाना था । बस स्टेंड और स्टेशन थोडी दूरी पर थे , हमने उससे विदा मांगी-मैंने उससे कहा"क्या तुम हम लोगों के लिए अपनी गाडी दिलवा दोगे , इस समय बरसात हो रहे है, आटो मिलना मुश्किल है।"
वह बोला-'मेरी गाडी कहीं गयी है। इस समय तो है नहीं।"
वह मुस्करा रहा था। उसके चेहरे पर मैंने पहली बार कुटिलता के भाव देखे थे। हम चारों ने बस में रखे अपने बैग उठाएँ और जाने के लिए जैसे ही नीचे आये तो देखा वह अपने मित्र को गाडी में बिठा रहा था और चालक से कह रहा था_'इन्हें जल्दी स्टेशन पर पहुँचाओ, इनकी गाडी का समय हो रहा है। "
उसकी हमारी तरफ पीठ थी। वह अपनी बात पूरी कर चला गया, और हमें नहीं देख पाया। हम चारों आटो पर रवाना हो गये। बस स्टेंड पर मेरा चचेरा भाई बस स्टेंड पर आटो से उतरा और मुझसे बोला-"बचपने में हमने इसके साथ ऐसा क्या किया था जिसका इसने इस तरह बदला लिया। अब तो इसके पास मैं कभी नहीं आऊंगा। "
मैंने उससे कहा-"तुम अपने मन से यह बातें निकाल दो। हो सकता है कि वह हमसे झिझकता हो। "
मैंने उससे कहा जरूर पर मैं जानता था कि उसने यह सब जानबूझकर बचपन का कोई बदला लेने के लिए ही किया है। स्टेशन पर हमने देखा कि उसका वह मित्र उसी गाड़ी में बैठ रहा था जिसमें हम बैठ रहे थे।
तब में सोचने लगा कि _'क्या वह वाकयी बचपन का बदला ले रहा था?'
(यह एक काल्पनिक कहानी है और इसका किसी व्यक्ति या घटना से कोई सबंध नहीं है)
Jun 29, 2007
याद आते हैं शराब के नशे में गुजरे पल
राहुल ने उसके लिए पूछा था-''आंटी, अंकल की आँखें हमेशा लाल क्यों रहती हैं? क्या वह शराब पीते हैं?
आंटी ने कहा-हाँ, बहुत पीते हैं। बेटा तुम ही उन्हें समझाओ न!
राहुल ने कहा-'आंटी, मैं उन्हें कैसे समझा सकता हूँ? वह तो मुझसे बडे हैं उन्हें खुद ही समझना चाहिए। उल्टे हम पीयें तो वह हमें समझायें।"
वह आकर अपने पति से लड़ने लगी-"देखो पड़ोस का बच्चा भी तुम्हें शराबी के तरह देखता है, कितने शर्म की बात है? हम लोगों को क्या समझाएं
वह चुपचाप सुनता रहा। उसने पीना नहीं छोडा। रोज शाम को काम से आने के बाद उसका पीना शुरू हो जाता था । बरसों तक वह दौर चला, परिवार और रिश्तेदारों में भी वह बदनाम हो गया था। एक बार राहुल ने उससे कहा था-" अंकल दिन-ब-दिन आपका चेहरा काला पड़ता जा रहा है । क्या आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, किसी डाक्टर को दिखाईये न !
वह उसका मंतव्य समझ गया, पर फिर भी अपने नशे से उसे इतना प्यार था कि वह हर बात को बेशर्मी से टाल जाता था।
मगर आज वह ऐसा नहीं था। आज राहुल ने उसे वायरलेस इयर फोन देते हुए कहा-"अंकल, लीजिये यह इयर फोन मैं आपके लिए लाया हूँ । अभी तक ईमेल के जरिये ही संपर्क रखते हैं , कितनी बार आपको चैट के लिए ट्राई किया पर आप लाईन पर होते है और अपने लिखने में इतना व्यस्त रहते हैं कि ध्यान ही नहीं देते। अब मैं यह आपके कंप्यूटर में लगा कर जा रहा हूँ , और आप और आंटी मुझसे बात करियेगा। में आपका लिखा इन्टरनेट पर पढता हूँ और चाहता हूँ कि आपसे बात भी करता रहूँ।"
फिर वह आंटी से बोला-"क्या बात है अंकल एकदम बदल गये हैं, कंप्यूटर पर लिखने लगे हैं , और चेहरा तो पहले से कहीं ज्यादा खिलने लगा है । मैं तो अंकल को देखकर हैरान रह गया।
वह बोलीं-"अब तुम्हारे अंकल ने शराब छोड़ दीं है और योग साधना और ध्यान में मस्त रहते हैं , और फिर आजकल यह इण्टरनेट पर लिखने लगे हैं और पीना तो भूल ही गये हैं। काम से वापस आते ही लिखने बैठ जाते हैं।
" हाँ, मैंने इनके लिखे लेखों को देखकर समझ लिया था, इतना लिखते हैं तो पीने के लिए समय ही कहॉ मिलता होगा। "राहुल खुश होकर अंकल की तरफ देखते हुए बोला।
उसने राहुल से वायरलेस इयर फोन हाथ में लिया और मैं उसे देख रहा था, मुझे याद आते हैं वह पल क्योंकि वह मैंने ही जिए थे। मैं खुद हैरान था और सोच रहा था 'क्या वाकई वह मैं ही था।'
Jun 27, 2007
तब भी अकेले नजर आओगे
आगे बढते जाओगे
भीड़ से अलग होकर
अकेले नजर आओगे
बदलाव की हवा के झोंके से भी
लोग घबडा जाते हैं
तुम्हारे तूफ़ान लाने की कोशिश
उनके ठहरे मन को
हिला कर रख देगी
जिनके लिए बदलाव चाहते हो
तुम उनसे ही लड़ते नजर आओगे
हकीकत से परे लोग देखते हैं ख्वाब
सवालों पर सवाल करते हैं
देता नहीं कोई जवाब
जवाब देने की कोशिश में
तुम असंख्य सवालों में
खुद ही घिर जाओगे
फिर भी तुम अपनी कोशिश
कभी मत छोड़ना
बदलाव के तूफान से
कभी मुहँ मत मोड़ना
चलते रहो अपनी राह पर
हर खबर पर तुम्हारा नाम होगा
बनेगी तुम्हारी अलग पहचान
जब तुम जीत जाओगे
भीड़ होगी तुम्हारे पीछे
हालांकि तुम तब भी
अकेले नजर आओगे
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जमीन पर लहु बिखरा पड़ा है फिर भी उनका बयान किन्तु और परंतु शब्दों के साथ खड़ा है। मरने वालों पर बोले वह कुछ शब्द पर कातिलों का दर्द भी बया...
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तुम तय करो पहले अपनी जिन्दगी में चाहते क्या हो फिर सोचो किस्से और कैसे चाहते क्या हो उजालों में ही जीना चाहते हो तो पहले चिराग जलाना सीख...