Feb 23, 2009

पहले लिखा तो अब क्या लिखते-व्यंग्य आलेख

अब ऑस्कर पर हम क्या लिख सकते हैं? पहले ही एक नहीं तीन तीन आलेख और पता नहीं कितनी हास्य कवितायें लिख कर ठेल दी। एक मित्र ने फोन पर पूछा-‘आज आस्कर पर कुछ लिख रहे हो क्या? मुझे पता है तुम उस पर आज जरूर कुछ लिखोगे। आखिर स्लमडाग को ऑस्कर अवार्ड मिला है।
हमने पूछा-‘बोल कहां से रहे हो?
उसने कहा-‘तुम्हें पता तो होगा कि आज महाशिवरात्रि है? तुमने भी आज सुबह अपने एक ब्लाग पर लिखा है। हम भी यहां मंदिर के बाहर खड़े हैं। नयी मोटर साइकिल है उसकी देखभाल कर रहे है। वैसे यह तो बहाना है वरना यहां स्टेंड भी पर भीड़ में जाकर लाईन में लगने की इच्छा नहीं थी सो पत्नी से कह दिया है कि वह दर्शन कर आये। यहां खाली खड़े थे तो सोचा तुमसे बतिया लें। पूछ लें कि आज ऑस्कर अवार्ड पर कुछ लिख रहे हो क्या?
हमने कहा-‘मित्र तुम हो किस मंदिर पर? यहां एक नहीं चार पांच प्रसिद्ध मंदिर हैं। हम भी एक मंदिर के बाहर ही खड़े हैं और अपनी गाड़ी को शुरू कर चलने वाले हैं।’
इधर हमारी नजर अपने मित्र पर पड़ गयी। हमने गाड़ी वहीं खड़ी की और उसके पास पहुंच गये। वह चैंक गया तो हमने कहा-‘तुम अंदर दर्शन करने जाओ। हम तुम्हारी गाड़ी देख लेते हैं। अर,े कम से कम आज तो अपने भगवान के प्रति समर्पण दिखाओ। यह क्या स्लमडाग स्लमडाग लगा रखी है। वैसे हम इस विषय पर पहले ही लिख चुके हैं।
मित्र ने कहा-‘कुछ ताजा लिखो। उसी में मजा आता है।
हमने कहा-‘देखो लेखक भी दो तरह के होते हैं। एक तो वह जो इलाज करते हैं दूसरे जो पोस्टमार्टम करते हैं। हम पहली वाली श्रेणी के हैं। इस विषय पर हमारा लिखा क्या तुमने पढ़ा नहीं।’
मित्र ने कहा-‘हां, पढ़ा है। एक तो तुमने लिखा था कि ऑस्कर मिलने से कोई फिल्म दीवार और अभिनेता अमिताभ बच्चन तो नहीं बन जाता। दूसरा तुमने अमिताभ बच्चन के इस बयान को भी लिखा था कि आॅस्कर कोई बड़ी चीज नहीं है। मगर यह सब तो पहले की चीज थी।
हमने कहा-‘वही तो हम कह रहे हैं कि हम पहली श्रेणी के ब्लाग लेखक हैं अब दूसरी वाली श्रेणी के ब्लाग लेखक लिखेंगे उनको पढ़ लेना। कोई घटना होती है तो उसके कारणों से अधिक हम भविष्य की संभावनाओं और परिणामों का विश्लेषण करते हैं कारणों का नहीं। इस घटना के साथ देश की कोई संभावना नहीं जुड़ी है इसलिये इस पर क्या लिखें?
मित्र ने कहा-‘यार इतनी बड़ी घटना पर कुछ तो तुम्हें लिखना चाहिये। यह कोई राजनीतिक विषय तो है नहीं जो इस पर लिखने से कतरा रहे हो।’
हमने कहा-‘हमें तो यह एक राजनीतिक और व्यवसायिक विषय ही लगता है। इतना बड़ा भारत, उसमें एक बड़ा शहर और उसमें भी एक कोई बस्ती के कल्पित पात्र की कहानी पर बनी एक फिल्म वह भी विदेशी ने बनायी उस पर क्या लिखा जा सकता है? खासतौर से जब फिल्म कब भारत में आयी और चली गयी। चल रही है कि नहीं। वैसे तुमने यह फिल्म देखी थी?
उसने कहा-‘नहीं, वैसे भी हम कहां फिल्में देख पाते हैं। हां, कभी कभी किसी फिल्म की अच्छी वाली सीडी आती है तो उसे जरूर देख लेता हूं। वैसे भी यार इतने सारे काम रहते हैं फिर टीवी पर भी बहुत सारे सीरियल दिखते हैं। कभी कभी लाफटर शो भी देख लेता हूं। इतने सारे मनोरंजन में कहां फिल्मों का ध्यान रह पाता है?
हमने कहा-‘यही वास्तविकता है। आज की दुनियां में मनोरंजन का क्षेत्र इतना व्यापक हो गया है कि उसमें किसी एक फिल्म पर बहुत समय तक लोग नजर नहीं रख पाते। पहले तो यह कहा जाता था कि भारत के फिल्म उद्योग में नंबर वन का खिताब हर शुक्रवार को नयी फिल्म प्रदर्शित होते ही बदल जाता है पर आजकल तो कुछ ही घंटों में यह काम होता है। यह अलग बात है कि टीवी और अखबार वालों के लिये अब पंद्रह दिन का मसाला मिल गया। पिछले एक महीने से इस विषय को घसीट रहे हैं पर कोई घ्यान नहीं दे रहा। अब सभी लोग शायद ढूंढ लेंगे अपने लिये कुछ नये चेहरे अपने प्रचार और विज्ञापन के लिये।’
मित्र ने हंसते हुए कहा-‘हमें भी अभी तक तुम्हारी वजह से ध्यान रहा था। इसलिये तुम्हें फोन किया वरना कहां याद रहता। आज समाचार देखे थे तो आॅस्कर कम तुम्हारे लिखने की याद अधिक आयी। इसलिये पूछ लिया।

बहरहाल हमारे मित्र और हम फिर अन्य विषयों पर कुछ देर चर्चा करने के बाद विदा हुए। अभी आकर घर पर अन्य ब्लाग देखे तो अनेक लोगों ने इस पर लिखा है पर हमारा मन नहीं हुआ। इस फिल्म के साथ भारत की कहानी और अभिनेता जुड़े हुए हैं पर मूलतः यह विदेशी फिल्म है। फिल्म हमेशा निर्देशक की मानी जाती है इसलिये इसे भारत की कहना तो गलत ही होगा। मगर भारत के प्रचार माध्यमों के लिये एक ऐसा विषय मिल गया है जिस पर वह बहुत समय तक कार्यक्रम चला सकते हैं। सच बात तो यह है कि जहां सृजनशीलता के लिये काम होना चाहिये वहां उधार के विषय पर काम चलाया जा रहा है। अपनी तरफ से नये विषय प्रस्तुत करने में मेहनत लगती है या पैसा खर्च होता है। मेहनत करने वाले तो कर भी लें पर उनपर पैसा खर्च करने वाले इसके लिये तैयार नहीं है। इस फिल्म के संगीतकार ए.आर. रहमान बहुत प्रसिद्ध हैं। उनकी काबलियत पर कोई संदेह उठाना नहीं चाहिये पर सच बात तो यह है कि उनको प्रचार बहुत अधिक मिलता रहा है जबकि आम भारतीय उनके संगीत का उतना प्रशंसक कभी नहीं रहा जितना बताया जाता रहा है। हालांकि उनके संगीत से सजे अनेक गाने हमें बहुत पंसद आते हैं पर इस तरह तो बहुत से गाने हम सुनकर आनंद उठाते हैं। उनको इस अवसर पर बधाई देते हमें प्रसन्नता अवश्य हो रही है क्योंकि वह एक सामान्य परिवार के होते हुए भी इतनी ऊंचाई पर पहुंचे। फिर उन्होंने ऑस्कर में अपना भाषण तमिल में दिया। प्रसंगवश हमने स्लगडाग और पिंकी दोनों फिल्में नहीं देखी पर इधर उधर उनकी कहानियों के बारे में पढ़ा और उसमें पिंकी की कहानी पसंद आयी।

सो बहुत सोच विचार कर भी हम ऑस्कर पर कुछ नहीं लिख पाये। सच बात तो यह है कि किसी विषय पर जब आप दो तीन बार लिख जाते हैं तो वह विषय पुराना लगता है। फिर इस पुरस्कार में भारत के लिये प्रशंसा, प्रेरणा या प्रोत्साहन जैसी कोई बात नहीं है इसलिये भी हमारे लिखने का कोई आईडिया नहीं बन पाया। जहां तक दोनों फिल्म की कहानियों की बात है तो संपूर्ण भारत का प्रतिबिंब उसमें नहीं है। अगर गरीबों के संघर्ष कर विजयी होने की बात करें तो बहुत सारी कहानियां देश में हैं। यह जरूरी नहीं है कि गरीब हमेशा गंदी बस्तियों में रहते हैं-बड़े शहरों में यह होता होगा यह अलग बात है। अगर आप किसी नयी बनती काॅलोनी में रहते हैं तो अपने आसपास मजदूर परिवारों का संघर्ष, उनके दुःख और खुशियों के तौर तरीकों पर बहुत कुछ लिख सकते हैं। यह अलग बात है कि अगर पूर्वाग्रह पाल कर देखें तो वह हमेशा दुःखी ही दिखाई देंगे पर अपनी छोटी दुनियां में वह खुशियां भी मनाते हैं और इसके लिये किसी से याचना नहीं करते। शायद मध्यम वर्गीय शहरों के गरीबों पर रोचक कहानियां न लिखे जाने का कारण यह भी हो सकता है कि वह झौंपड़ी में तो रहते हैं पर उनकी बस्तियां गंदी नहीं होती। प्रसंगवश यहां अपनी लिखी एक पुरानी कविता याद आयी जो प्रस्तुत है।
दिन भर ईंट, पत्थर और
सीमेंट के मसाले का तस्सल सिर
पर रखकर ढोती वह औरत
रात्रि में प्लास्टिक की छत से ढंकी
झौंपडी के बाहर आंगन में
बबूल की लकड़ी से
अग्नि जलाकर
उस पर रोटी सेंकती वह औरत

सुबह चाय बनाते हुए
अपने बच्चे को
गोद में बैठाकर
बडे स्नेह से
मुस्कान बिखेरती
और दूध पिलाती वह औरत

अपने अनवरत संघर्ष से
इस सृष्टि में जीवन को ही
सहजता से जीवनदान देती
चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती
अपनी शक्ति और सामर्थ्य का
प्रतीक है वह औरत

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यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Feb 15, 2009

मन के ख्यालों से बनते है प्यार के जज्बात-हिन्दी शायरी

मन में प्यास थी प्यार की
एक बूंद भी मिल जाती तो
अमृत पीने जैसा आनंद आता
पर लोग खुद ही तरसे हैं
तो हमें कौन पिलाता

स्वार्थों की वजह से सूख गयी है
लोगों के हृदय में बहने वाली
प्यार की नदी
जज्बातों से परे होती सोच में
मतलब की रेत बसे, बीत गईं कई सदी
कहानियों और किस्सों में
प्यार की बहती है काल्पनिक नदी
कई गीत और शायरी कही जातीं
कई नाटकों का मंचन किया जाता
पर जमीन पर प्यार का अस्तित्व नजर नहीं आता

गागर भर कर कभी हमने नहीं चाहा प्यार
एक बूंद प्यार की ख्वाहिश लिये
चलते रहे जीवन पथ पर
पर कहीं मन भर नहीं पाता

जमीन से आकाश भी फतह
कर लिया इंसान
प्यार के लिये लिख दिये कही
कुछ पवित्र और कुछ अपवित्र किताबों
जिनका करते उनको पढ़ने वाले बखान
पर पढ़ने सुनने में सब है मग्न
पर सच्चे प्यार की मूर्ति हैं सभी जगह भग्न
लेकर प्यार का नाम सब झूमते
सूखी आंखों से ढूंढते
पर उनकी प्यास का अंत नजर नहीं आता
प्यार कोई जमीन पर उगने वाली फसल नहीं
कारखाने में बन जाये वह चीज भी नहीं
मन में ख्यालों से बनते हैं प्यार के जज्बात
बना सके तो एक बूंद क्या सागर बन जाता
पर किसी को खुश कोई इंसान नहीं कर सकता
इसलिये हर कोई प्यार की एक बूंद के
हर कोई तरसता नजर नहीं आता

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