May 24, 2016

चेतना की रौशनी-हिन्दी कविता (Chetna ki Roshni-Hindi Poem)


अंधेरे में चले तीर
कभी कभी निशाने पर
लग भी जाते हैं।

ढीठों से जूझना कठिन
स्वयं हो जाओ 
वह भग भी जाते हैं।

कहें दीपकबापू आशा से
चल रहा संसार
हताश इंसान मुर्दा होते
चेतना की रौशनी जलाओं
जग भी जाते हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

May 6, 2016

दबंग की उपाधि-हिन्दी कविता (Dabung Ki Upadhi-Hindi poem)

साफसुथरी छवि के
स्वामी को समाज में
पूछता कौन है।

दबंग की उपाधि
धारण करने वाले से
जूझता कौन है।

कहें दीपकबापू जहान में
पराक्रम की अपराध
भद्रता की ठगी
पहचान बनी
जिनके हाथ में हो ताकत
उनसे नैतिकता की
बात करता कौन है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर। ‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।...