Dec 24, 2015

देखने में मजा आता है-हिन्दी शायरी(Dekhne mein Maza aata hai-Hindi Shayari)

जहां रोटियों से पेट भरे
वहां भूख के दृश्य
देखने में मजा आता है।

जहां गरीबी हो
वहां अमीरों की एय्याशी
देखने में मजा आता है।

कहें दीपकबापू दिल पर
कितना शोध करें
माशुका पर आये तो
चेहरा सबसे सुंदर लगता
आशिक पर आये
सबसे ताकतवर लगता
खामोशी से घूमती दुनियां
देखने में मजा आता है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Dec 14, 2015

अहसास-हिन्दी कविता(Ahasas-Hindi Kavita)

नहीं जानते हम
धरती की आकाश से
कितनी दूरी है।

 सतत संघर्ष में चिंता यह
जीवंत आशा से
कितनी दूरी है।

कहें दीपकबापू ऊंचाई से
निहारते हुए
नीचे से ऊपर ताकते हुए
दृश्यों के बीच अहसास
जितनी दूरी है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Dec 5, 2015

समविषम का संकट-हिन्दी हास्य कविता (Troble of Odd-Even -Hindi Satire poem)

पैदल चलकर भी खुश हैं
जिनके घर में
अभी तक कार नहीं आई।

पर्यावरण प्रदूषण से जूझते
अभियानों की धमक
उनके द्वार नहीं आई।

कहें दीपकबापू चलते चलते
टांग थक जाती है
फिर भी अब दर्द कम लगता है
समविषम के संकट से
बचने की मनुहार जो नहीं गायी।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Nov 26, 2015

प्रायोजित पूजा-हिन्दी कविता(Prayojit Puja-Hindi Kavita)


 बड़बोले कभी
शब्दवीर नहीं होते।
मति में चिंत्तन से
अधिक चिंतायें पालते
वाणी में तीर नहीं होते।

कहें दीपकबापू दिल के सौदे में
सौदागर हुए मालामाल
तेज घावक बन गये
बिगड़ी थी जिनकी चाल
जूझते दाम के लिये
प्रायोजित पूजा करवाते
मगर वह पीर नहीं होते।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Nov 17, 2015

बौद्धिक विलास-हिन्दी शायरी(bauddhik wilas-Hindi Shayari)

आकाश से फैंके बम
खिलौने की तरह
इंसान तोड़ देते हैं।

सजाते हैं महफिल
अमन के नाम पर
चाय का धुंआ छोड़ देते हैं।

कहें दीपकबापू सिंहासनों पर
विराजे लोग नहीं करते
कभी बौद्धिक विलास
कारिंदों के मस्तिष्क से
अपने कदम जोड़ देते हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Nov 7, 2015

मन का खेल-हिन्दी कविता(Man ka Khel-Hindi Kavita)


विलासिता में जिंदगी
बिताने वाले
दर्द से जल्दी कराहते हैं।

नहीं देखे कभी जिन्होंने
नाकामी के दौर
पसीने को सराहते हैं।

कहें दीपकबापू मन का खेल है
महल में रहने वाले
सड़क पर सोते लोगों को
सुखी मानते
जमीन पर सोने वाले
बिस्तर पाने के लिये
पसीना बहाते हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Oct 30, 2015

मन के अभ्यास से-हिन्दी कविता(Man ke Abhyas se-Hindi Kavita)


दिमाग के भूत से
बचा सके इंसान को
बना कोई ताबीज नहीं है।

बिना श्रम के
सफलता की फसल उगाये
ऐसा कोई बीज नहीं है।

कहें दीपकबापू आत्मविश्वास से
जिंदगी का मार्ग सहज हो जाये
मन के अभ्यास से बुद्धि आये
वरना शिखर तक पहुंचाये
कोई ऐसी चीज नहीं है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Oct 19, 2015

मन के पतंगे-हिन्दी कविता(Man ke Patange-Hindi Kavita)

चंद लोग नारे लगाते
भीड़ वहीं जमा हो जाती है।

भलाई का नारा सबसे महंगा
 बिकने के बाद
छद्म साफ नीयत भी
कमा सो जाती है।

कहें दीपकबापू मन के पतंगे
सपनों में गंवा देते जान
ढूंढते तबाही में शान
झुलसाने के बाद
शमा खो जाती है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Oct 8, 2015

लालच की परत-हिन्दी कविता(Lalch ki parat-Hindi Kavita)


काठ की हांडी एक बार चढ़े
वह जल जाये तो
दूसरी भी चढ़ जाती है।।

एक चढ़ा कर जलाये
दूसरा लेकर आता
कहानी बढ़ जाती है।

कहें दीपकबापू अज्ञानियों से
भरा पूरा समाज
अपने खून से पैदा करता बाज
ज्ञान जुबान पर सभी के
मगर फिर भी हारते
दिमाग पर लालच की
परत चढ़ जाती है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Oct 2, 2015

जिंदगी का सफर-हिन्दी कविता(Zidagi ka Safar-HindiKavita)


जिंदगी के सफर में
हर लम्हे
नये हमसफर आते हैं।

चेहरे बदलते हैं
मगर हालात पुराने ही
साथ में घर लाते हैं।

कहें दीपकबापू नयी खबर से
वास्ता अब नहीं पड़ता
लोग नये ख्याल देखते
दिमाग में बरसों पुराने
इरादे भर आते हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Sep 27, 2015

दीपकबापू वाणी (Deepak bapu wani on Super Sunday Great Funday


दर्शक रहने की आदत हो गयी, अपना कत्ल भी यूं ही देखेंगे।
दीपकबापू पर्दे पर लटका दिमाग, लोग भीड़ में भेड़ ही दिखेंगे।।
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पर्दे पर कत्ल के दृश्य देख, सड़क पर भी दर्शक हो जाते हैं।
दीपकबापू आंखे सोचती नहीं, लोग मजे लेते खो जाते हैं।
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शराब करती दिमाग का दही, जिसने पी समझो कायर हो गया।
दीपकबापूग्लास छोड़ कलम पकड़ी, समझो वह शायर हो गया।।
--------------

झूठा करे या सच्चा वादा, हम सभी पचा जाते हैं।
दीपकबापू किसकी पोल खोले, सभी नज़र बचा जाते हैं।
.................
कमान से तीर जैसे शब्द निकलते, वीर हो तभी बात बजाना।
दीपकबापूमृत संवेदना के घर, चेतना सभा नहीं सजाना।।
--------------
स्वर्ग की चाहत में इंसान, नरक बना देता यह जहान।
दीपकबापू बेबस फरिश्ते हैं, खामोशी से बचाते जान।।
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जिंदगी के महंगे सुंदर पल, गुनाह पर क्यों खर्चा करें।
दीपकबापूजुबान देवता है, मसखरी की क्यों चर्चा करें।।
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Sep 19, 2015

चेतना कब लायेंगे हम-हिन्दी कविता(Chetna kab layenge ham-hidi poem)

पुरानी कहानियों से
 कब तक सीखेंगे
फिर सिखायेंगे हम।
धरती पर इतिहास की
धारा अनवरत प्रवाहित
नई कहानियां के दान से
कब तक कतरायेंगे हम।

कहें दीपकबापू जड़ समाज पर
कब्जा रखने वाले
मरे भूत के भय का
दंड बनाकर बदलाव रोके हैं।
जिंदा लोगों में
चेतना कब लायेंगे हम।
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Sep 12, 2015

साहित्य सौदा हो जाता है-हिन्दी दिवस पर कविता(sahitya sauda hog jata hai-Hindi Kavita on HindiDiwas)


मशहूर लेखक के
शब्द बाज़ार में
महंगे बिक जाते हैं।

चौराहे तक लेकर नहीं गये
अपने भारी भरकम शब्द
ऐसे लेखक अर्थ के बाज़ार में
कहां टिक पाते हैं।
 ‘कहें दीपक बापू बाज़ार के खेल से
साहित्य सौदा हो जाता है
मनोरंजन पहला मसौदा हो जाता है
सत्य से सजे  शब्द
वहां नहीं टिक पाते हैं।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Sep 6, 2015

हृदय के भाव-हिन्दी कविता(hridya ki bhav-hindi poem)


जुबान चलती जब कैंची की तरह
अक्ल के दरवाजे
बंद हो जाते हैं।

मतलबपरस्त करते शोरशराबा
वफा चाहने वालों के शब्द
मंद हो जाते हैं।

कहें दीपकबापू भीड़ से दूर
 अकेले में सोच से होता अहसास
कौन कितने पानी में हैं
तब हृदय के भाव
धारा में बहकर
छंद हो जाते हैं।
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Aug 30, 2015

हमने भी बांची है किताबें-हिन्दी कविता(hamane bhi baanchi hai kitaben-hindi poem)

ढेर सारी किताबें
ज्ञान बेचना नहीं आया,
चेलों को सजा देते
हम भी दुकान पर
सच की तरह झूठ
बेचना नहीं आया।
.................
खत का ज़माना
अब कहां रहा
बेतार से बात
यूं ही हो जाती है।
ढेर सारे शब्द बहते
समझ के झरने में
अर्थ की बूंदें खो जाती हैं।
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Aug 25, 2015

दो क्षणिकायें(two short poem)


रास्ते पर जरा संभलकर चला करो।
विकास के पहिये कभी
बहक भी जाते हैं, जरा डरा करो।
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हिन्दी दिवस आ रहा है
हमें भुला देना।
 अंग्रेजी राईटर्स से स्पीच दिलाकर
लोगों को सुला देना
उनके सम्मान का खाता भी खुला देना।
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आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली , प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली। ‘ दीपकबापू ’ हम तो चिंगारी लाते रहे अंधेरापसंदों को नह...