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Jul 15, 2013

बच्चों का शराब पीना-लघु हिन्दी व्यंग्य (bachcho ka sharab peena-hindi vyangya or satire on sex and smoke parti chiled and student's)



          करीब सौ  बच्चे एक मॉल में शराब की पार्टी में शामिल होने पर पकड़े गये।  यह पार्टी फेसबुक के संपर्कों का उपयोग कर आयोजित की गयी।  पुलिस को पता चला कि अवैध ढंग से यह आयोजन हो रहा है तो वह इन बच्चों का सुधारने के लिये पहुंची।  मॉल के जिस बार में शराब पार्टी थी उसके स्वामी और प्रबंधकों को पुलिस ने पकड़ लिया पर बच्चों के विरुद्ध मामला न दर्ज कर अभिभावकों को  बुलाकर उन्हें सौंपा। हमारे टीवी चैनलों के लिये यह बाल सामग्री अत्यंत उपयोगी थी और तय बात है कि उन्होंने समाज के स्थिति पर किराये के आंसु भी बहाये। चिंता जताई।
            पुलिस ने बच्चों पर प्रकरण दर्ज न कर उनके अभिभावकों को सौंपा यह अच्छी बात है।  तर्क यह दिया कि सभी बालक बालिकायें पंद्रह  से बीस वर्ष तक की आयु वर्ग से संबंधित हैं इसलिये उनके उज्जवल भविष्य की संभावनायें खत्म नहीं की जानी है।  यह तर्क भी ठीक है। प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल और अखबार-कुछ चर्चा सामाजिक अंतर्जालीय संपर्क पर हुई तो कुछ समाज में व्याप्त व्यसनों की बढ़ती प्रवृत्ति  पर भी चिंता जताई गयीं। हिन्दुस्तान बिगड़ रहा है जैसे नारे भी पढ़ने और सुनने  को मिले।  हमने इस घटना के दृश्य टीवी चैनलों पर देखे।  इन दृश्यों में पकड़े गये बच्चों के अभिभावकों में कुछ अपने हाथों से अपनी संतानों पर बरस रहे थे।  इस दृश्य को देखकर हमारे अंदर यह विचार आया कि आखिर यह अभिभावक अपने बच्चों को पीट क्यों रहे हैं? इसकी कुछ वजहें हमारी समझ में आयीं।
            1-अभिभावकों को इस बात का अफसोस था कि बच्चे शराब पीते पकड़े गये न कि इसका कि उनके बच्चे शराब पीते हैं।
            2-पुलिस के हत्थे न चढ़ें इसलिये अपने बच्चों पर हाथ बरसाकर उन्हें बचा रहे थे।
             3-यह बताने के लिये बच्चे बिगड़े जरूर है पर हम तो ठीक प्रकार के अभिभावक हैं।
            यह तीनों बातें कम से कम हमें तो जमती हैं। घर के बच्चे रात को घर से गायब हों और माता पिता उनकी उपस्थिति के स्थान की जानकारी नहीं रखें तो उनको दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।  दरअसल हमारे समाज में आज कमाने की प्रवृत्ति ने लोगों को हर तरफ से अंधा कर दिया है।  अभिभावक स्वयं पैसा कहां से कमा रहे हैं यह वह जानते हैं पर खर्च कैसे हो रहा है इस पर अनेक उनकी दृष्टि नहीं जाती क्योंकि पैसा तो उनके पास बाढ़ की तरह चला आता है। चाणक्य कहते हैं कि अधिक धन हो तो उसे निकालना चाहिये।  हमारे लोग यह नहीं मानते तो पैसा स्वयं ही आगे निकलने लगता है।  जिस तरह बाढ़ का पानी अपने किनारे तोड़ता है उसी तरह पैसा भी अपने ही घर उखाड़ता हैं।  धनलोलुपों का  लक्ष्य एक ही है कि अपने बच्चों को इतना कमा कर दें कि आगे की सात पीढ़ियों तक उनका नाम चलता जाये।  आप अगर किसी से पूछें कि ‘‘आप किसके लिये कमा रहे हैं?’’
           वह फट से जवाब देगा कि ‘‘बच्चों के लिये कमा रहा हूं!’’
            हमारे देश के किसी पुराने दार्शनिक का कहना है कि पुत्र अगर सुयोग्य है तो वह स्वयं कमा लेगा। अगर नालायक है तो सब गंवा देगा, इसलिये उतना ही कमाओ जितना आवश्यक हो। बेकार में अपनी जिंदगी क्यों केवल सासंरिक विषयों में बर्बाद हो।  सच बात तो यह है कि बच्चों का नाम लेना तो  बहाना है। लोग अपनी सामाजिक स्थिति में चार चांद लगाने के लिये कमाते हैं।  कुछ लोग अपनी विलासिता के लिये कमाते हैं पर नाम बच्चों का लेते हैं।
       बहरहाल उन बच्चो को अपनी भाग्य समझना चाहिये कि पुलिस ने उन्हें वह सबक सिखाया है जिसकी जिम्मेदारी उनके माता पिता की थी। पुलिस वालों को तारीफ करना चाहिये कि वह अपना सामाजिक दायित्व समझने लगे हैं।  हमारा दर्शन तो कहता है  कि शिक्षा के दौरान विलासित से दूर रहना चाहिये पर मुश्किल यह है कि आधुनिक शिक्षा प्रबंधक शिक्षा के दौरान ही छात्रों  को संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वामी बनाने का दावा करते हुए उनको अपनी संस्थाओं के अंतर्गत होने  पर्यटन और पिकनिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये बाध्य करते हैं।  शिक्षा के लिये निर्धारित पाठ्यक्रम  से अलग अन्य  विषयों की जानकारी देकर शिक्षा के स्वामी और प्रबंधक अपने अधिक से अधिक कुशल शैक्षणिक व्यवसायी होने का प्रमाण देना चाहते हैं।  ऐसे में अभिभावक भी यह सोचते हैं कि हमें क्या चिंता  पूरी फीस दे रहे हैं हमारे बच्चे को तो विद्यालय और महाविद्यालय के शैक्षणिक ठेकेदार अपने आप ही एक आदर्श व्यक्तित्व का स्वामी बना देंगे।  ऐसे में  मद्यपान और ध्रुमपान से संयुक्त ढेर सारे आयोजन होने ही जिसमें नवयुवक शामिल हों।  सौ बच्चों को पकड़कर पुलिस ने उन्हें एक सबक सिखाया पर उसे जीवन भर कितने बच्चे याद रखेंगे या इस घटना से पूरे देश कितने भविष्य में ऐसा न करने या होने देने की छात्र और अभिभावक कसम खायेंगे कहना कठिन है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jun 29, 2013

केदारनाथ की त्रासदी का मानसिक प्रभाव लंबे समय तक रहेगा-हिन्दी संपादकीय (kedarnath ki trasdi ka lambe samay es rahega-hindi editorial natural calamity in uttrakhand,hindi sampadkiya)



         उत्तराखंड में जो प्रकृति ने महाविनाशलीला मचायी उसमें भारी जन हानि का अनुमान शायद ही पहले किसी ने किया हो।  दरअसल हमारे देश में अनेक तीर्थ हैं जिनमें लाखों लोग शामिल होते हैं।  उत्तराखंड में चार धाम-गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ, और केदारनाथ। भारतीय जनमानस के हृदय में हैं पर बहुत कम लोग यहां जाने को तैयार होते थे।  गंगा और यमुना अत्यंत पवित्र नदियां मानी जाती हैं पर धार्मिक रूप से अकेले इनकी मान्यता नहीं है। नर्मदा और क्षिप्रा भी भगवत् मान्यता वाली मानी जाती हैं।  हरिद्वार की हर की पैड़ी, दक्षिण में तिरुपति बालाजी, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि, इलाहाबाद का संगम, काशी तथा उज्जैन में लोग तीर्थ करने जाते हैं। कश्मीर में अमरनाथ के दर्शन करने वालों की भी कमी नहीं है। 
      वर्तमान समय में जम्मू का वैष्णोदेवी और शिरडी के सांई बाबा के साथ भी अनेक लोग जुड़े हैं हालांकि इनका भारतीय धार्मिक दृष्टि से सामान्य महत्व है।  वैष्णोदेवी पर फिल्म आशा में गायक चंचल के गाये एक गीत माता ने बुलाया हैकी वजह से वहां के मंदिर का नाम चमक उठा तो सांईबाबा पर फिल्म अमर अकबर ऐंथोनी में उनके मंदिर के  एक गाने में उनके चमत्कारों  गुणगान होने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ी। आमतौर से सांईबाबा को धर्मनिरपेक्ष छवि का माना जाता है पर वास्तविकता यह है कि उनको हिन्दू भक्तों की ही भक्ति प्राप्त है।  वैष्णोदेवी और सांईबाबा पर जो भक्तों की भीड़ बढ़ी है उसका आधार कोई  प्राचीन मान्यता नहीं वरन् आधुनिक बाजा़र और प्रचार समूहों की प्रेरणा उसका एक कारण है। 
       ऐसे में चारो धामों में इतनी सारी भीड़ होने देखकर अनेक लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब हताहतों की संख्या का अनुमान बताया गया।  इन चारों धामों में पहले जो लोग जाते थे उनके परिवार वाले मालायें पहनाकर विदा करते थे।  माना जाता था कि  जीवन के उत्तरार्ध में की जाने वाली इस यात्रा में आदमी वापस लौटा तो ठीक न लौटा तो समझ लोे भगवान के पास चला गया।  महाभारत काल में पांडवों ने भी अपने अंतिम काल में ही हिमालय की यात्रा की थी।  हरिद्वार या ऋषिकेश तक यात्रा करना अनेक लोगों के लिये अध्यात्मिक शांति का उपाय है पर सच यह भी है कि आज भी हरिद्वार जाने की बात किसी से कही जाये तो वह पूछता है कि घर में सब ठीक तो है न! 
       वहां अपने परिवार के सदस्यों की अस्थियां विसर्जित करने के अलावा किसी अन्य उद्देश्य से यात्रा अधिक लोग नहंी करते। अगर कर आते हैं तो मान लेते हैं कि उन्होंने इस तीर्थ पर भले ही किसी भी उद्देश्य से आये पर सभी तीर्थ का पुण्य कमा लिया।
             ऐसे में चारों धामो में प्रकृति ने कहर बरपाया तो उससे हताहत  लोगों की संख्या से अधिक हैरानी हो रही है।  दरअसल बाज़ार के पेशेवर यात्रा प्रबंधकों ने वहां हुए सड़क विकास का लाभ उठाया और हर शहर से अनेक लोगों को चारों धामों पर ले जाने लगे।  सड़क और रेल मार्ग से वह पूरा एक प्रस्ताव तैयार कर लोगों को अपना ग्राहक बनाते हैं।  उत्तराखंड दुर्गम है पर वहां बनी सड़कों से बसें जाने लगी थीं।  अनेक बस दुर्घटनाओं की खबर आती रहती थी।  वहां का रास्ता दुर्गम था, अब भी है और रहेंगा।  अनेक बसें जाती थीं।  सभी नहीं गिरी पर नियमित रूप से ऐसी बसों की दुर्घटनाओं की खबरें आती रहती थी।  जो यात्रा कर घर वापस लौटे उनके लिये रास्ता सुगम बना और जो नहीं लौटे वह भूत बनकर किसी को बता नहीं सकते थे कि उन्होंने दुर्गम रास्ते का अनुकरण किया था।  इस आवाजाही के बावजूद अनेंक लोग चारों धामों की यात्रा को सुगम नहीं  मानते थे।  यह अलग बात है कि पहले जब मार्ग दुर्गम दिखता था तब कम लोग जाते थे। वहां सड़क, बिजली और होटलों के निर्माण का लाभ उठाकर  बाज़ार और प्रचार समूह ने धार्मिकता के साथ ही पर्यटन का लाभ दिलाने का बीड़ा उठाया।  जिससे वहां भीड़ बढ़ गयी।  बहरहाल चारों धामों का ऐसा कोई प्रचार नहीं हुआ था कि सामान्य लोगों को सहज विश्वास हो कि आपदा के समय वहां  लाखों की संख्या में वहां श्रद्धालू  होंगे। जब प्रचार माध्यमों ने इसकी पुष्टि की तब ही सच्चाई सामने आयी।
           जो हुआ सो हुआ। प्रकृति का यह प्रकोप है जिसे यह प्रथ्वी अनेक बार सह चुकी है।  इतना जरूर है कि हम धर्म के कर्मकांडों मे रुचि लेते हैं क्योंकि वह प्रत्यक्ष दिखते हैं पर उस अध्यात्मिक ज्ञान पर दृष्टिपात नहीं करते जो कि जीवन की वास्तविकता को बताते हैं।  अध्यात्मिक दृष्टि से इन चारो धामों की यात्रा जीवन के सारे सांसरिक दायित्व पूरे करने के बाद की जाती रही है। संभव है कुछ लोग अपनी शक्ति के कारण इसे पर्यटन की दृष्टि से भी पूर्वकाल में करते रहे हों पर सामान्य आदमी कभी इस पर विचार नहीं  करता था।  दूसरी बात यह कि  हमारे देश में धार्मिक आधार पर पर्यटन के लिये यात्रा करने वाले स्थान है जहां यात्रा की परंपरा है। इधर अमरनाथ यात्रा भी चल रही है।  इस यात्रा में जाने वाले यात्री का पहले स्वास्थ्य परीक्षण तक किया जाता है।  तय बात है कि श्रद्धा की दृष्टि से की जाने वाली यात्रा के लिये श्रद्धालू  का स्वस्थ होना आवश्यक है।  चारों धामों की यात्रा के लिये ऐसी कोई शर्त नहीं रही। इसका कारण यह है कि यहां आने वाले श्रद्धालू को जीवन से मुक्त माना जाता रहा होगा।  यही कारण है कि माला पहनकर जाने वाले श्रद्धालु एक तरह से परिवार तथा समाज से विदा लेकर जाते थे।  इसे गर्मियों के लिये पिकनिक जैसा स्थान भी बनाया गया तो यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि पहाड़ियों की यात्रा के लिये जो स्वास्थ्य परीक्षण होना चाहिये वह भी अनिवार्य होना चाहिये था।  आपने देखा होगा कि अनेक लोग संघर्ष करते हुए पहाड़ से जमीन पर उतर आये पर कुछ लोगों ने अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर पैदल चलने से इंकार कर दिया।  अब प्रशासन कह रहा है कि स्वयं उतर कर आओ पर अनेक यात्री इसके लिये तैयार नहीं है।  यह अजीबोगरीब स्थिति है।  पहाड़ियों पर चढ़ने से अधिक उतरने में संकट पैदा होता है।  ऐसे में अस्वस्थ व्यक्ति से इस आपदा में नीचे आने की आशा करना ही व्यर्थ है। 
     बहरहाल इस आपदा ने देश के लोगों का मनोबल हिलाकर दिया है।  कल हम वृंदावन की यात्रा समाप्त कर मथुरा आये। वहां गोंडवाना एक्सप्रेस की एक सामान्य बोगी में खाली जगह देखी। हमने चढ़ने से पहले बोगी को देखा।  वह सामान्य बोगी लग रही थी फिर भी विश्वास नहीं हुआ तो खिड़की पर  अंदर यात्री से पूछा कि ‘‘क्या यह जनरल बोगी है?’’ 
उसने जब हां कहा तब अंदर बैठे। तब उसने सवाल किया कि आपने यह प्रश्न क्योंकि किया। हमने उसे जब बताया कि हमने कभी सामान्य बोगी को कभी इतना खाली कभी नहीं देखा। तब वह बोला-‘‘केदारधाम की त्रासदी के बाद लोगों का मनोबल गिर गया लगता है जिससे यात्रा कम की जा रही है। शायद यही वजह लगती है।’’
      इसमें सच हो न हो पर इतना तय है कि समाज में इस त्रासदी का मानसिक प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Jan 6, 2013

विदुर नीति के आधार पर चिंतन-असमय बोलने पर बृहस्पति महाराज का भी अपमान हो सकता है (asamay bolne par brahspati ka bhi apmaan ho sakta hai-vidur neei ke adhar par chinttan)

          कुछ लोगों का आदत होती है कि वह हमेशा ही कुछ बोलना चाहते हैं।  हम आपसी वार्तालाप में यह देखते हैं कि अनेक लोग एक तो फालतु बातें करते हैं या फिर असमय ऐसा विषय उठाते हैं जिस पर चर्चा करना व्यर्थ लगता है।  आज के आधुनिक युग में अभिव्यक्ति के साधनों का दायरा बढ़ा है तो यह भी देखने में आ रहा है कि कोई भी किसी भी विषय पर कुछ भी बोल सकता है।  कभी कभी तो कुछ लोगों के बोलने पर हंसी आ जाती है।   हमेशा विज्ञान पढ़ने वाले अर्थशास्त्र पर बोलते हैं तो गणित पढ़ने वाले अध्यात्मिक विषय पर अपना ज्ञान बघारते हैं।
       अगर किसी ने साधु का वेश घारण किया या  समाजसेवक का चोला पहन लिया तो समझ लीजिये वह अपने आपको हर विषय में पारंगत मान लेता है।  आम आदमी की बात छोड़िये समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों में काम करने वाले बुद्धिमान तक उनके दावे को स्वीकार कर उनकी बातों को महत्व देते हैं। यह अलग बात है कि यह बातें विवादास्पर होती हैं जिन पर चर्चा करने से विज्ञापन का समय आसानी से पास होता है।
    आजकल वेश और पद एक तरह से महाविद्वान होने का प्रमाण पत्र बन गये हैं।  सबसे ज्यादा हंसी अध्यात्मिक तथा सामाजिक विषयों पर बोलने वालों पर आती है।  कई लोग तो ऐसे हैं कि जिन्होंने अध्यात्म का ज्ञान रटने के बाद  उसे सुनाने के लिये मैदान में उतर पढ़ते हैं।  कुछ तो शिष्यों का संग्रह कर समाज को सुधारने के लिये अभियान भी छेड़ देते हैं।  उनका सारा प्रयास नारों के सहारे होता है।  यही कारण है कि हमारे देश में कोई धार्मिक या सामाजिक अभियान कभी निर्णायक नहीं बन सका।
महाराज विदुर का कहना है कि
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अप्राप्तकालं वचं बृहस्पतिरपि ब्रुवन।
लभते बृदध्यवज्ञानामानं च भारत।।
      हिन्दी में भावार्थ-असमय अगर स्वयं बृहस्पति भी बोलें तो उन्हें अपमान झेलना पड़ेगा और उनको अपनी बुद्धि का तिरस्कार होगा।
द्वेष्यो न साधुर्भवति न  मेधावी न पण्डितः।
प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेषये पापानि चैव ह।
     हिन्दी में भावार्थ-जिससे मन में द्वेष हो जाता है वह साधु, विद्वान और बुद्धिमान हो तो भी  भारी दोषों से युक्त प्रतीत होता है। जो प्रिय है उसमें ढेर सारे दोष होने पर भी नहीं दिखते पर जिसके शत्रु भाव है उसके सारे काम पापमय दिखते हैं।
               अनेक लोग शोक के अवसर पर हास्य का भाव पैदा करते हैं तो हास्य के भाव पर रुदन करते हैं।  एक दूसरी भी प्रवृत्ति देखी जाती है कि अधिकतर  लोग अपने भावनात्मक दुराग्रहों के साथ जीते हैं।  जिससे स्वार्थ पूरा होता है वह चाहे दुष्ट भाव वाला क्यों न हो, उनके लिये देव है पर  जिससे कोई स्वार्थ नहीं है वह उनके लिये महत्वहीन है।  अगर कोई विद्वान भी किसी व्यक्ति के अहंकार पर बौद्धिक प्रहार करता या  मानसिक आघात पहुंचाता है तो एक तरह वह शत्रु ही मान लिया जाता है।  असली दवा कड़वी होती उसी तरह अहंकार से भरे मनुष्यों के लिये सत्य सुनना कठिन है।  ऐसे में जिन लोगों ने अपने विद्वान होने का प्रमाण पत्र जोड़ लिया है उनसे सत्य पर बहस करना व्यर्थ है।
       बहरहाल जिन लोगों को अपना जीवन संवारना है उन्हें अपने विवेक से काम लेना चाहिये।  अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर ज्ञान और विज्ञान का मस्तिष्क में संग्रह कर अपने जीवन में उस पर अमल करना सहज जीवन जीने का एक सहज उपाय है।  टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में अनेक ऐसे विद्वान भी प्रकट होते हैं जो ज्ञानी हैं पर यकीनन वह अधिक प्रचार नहीं पाते।  वह निर्विवाद तक देते हैं जबकि आज के प्रचार माध्यम विवादास्पद विद्वानों को तरजीह देते हैं ताकि उनके निरर्थक बहसों के चलते उनके साथ बने रहें।
       कहने का अभिप्राय यह है कि हमें स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिये। उचित समय पर बोले और जिस विषय पर आधिकारिक ज्ञान हो उसी पर बोले।  ऐसा न करने पर तिरस्कार और अपमान झेलना पड़ता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Nov 27, 2012

मनुस्मृति-भोजन करने के भी नियम हो सकते हैं (manu smriti-bhojan karne Bhi niyam hote hain)

                         भोजन करने के भी नियम होते हैं।  यह नहीं कि पेट भरना है तो चाहे जब खा  लिया और चाहे जब भूखे रह लिये। स्वास्थ्य वैज्ञानिक आजकल खानपान की बदलती प्रवृत्तियों को स्वास्थ्य के लिये खतरनाक बता रहे है।  आजकल आधुनिक युवा वर्ग बाज़ार में बने भोज्य पदार्थों के साथ ही ठंडे पेय भी उपयोग कर रहा है जिसकी वजह से बड़ी आयु में होने वाले विकार अब उनमें भी दिखाई देने लगे है।  जहां पहले युवा वर्ग को देखकर यह माना जाता था कि वह एक बेहतर स्वास्थ्य का स्वामी है और चाहे जो काम करना चाहे कर सकता है।  मौसम या बीमारी के आक्रमण से उनकी देह के लिये कम खतरा है पर अब यह सोच खत्म हो रही है।  अपच्य भोज्य पदार्थों और ठंडे पेयो के साथ ही  रसायनयुक्त तंबाकू की पुड़ियाओं का सेवन युवाओं के शरीर में ऐसे विकारों को पैदा कर रहा है जो साठ या सत्तर वर्ष की आयु में होते हैं।
मनु स्मृति में कहा गया है कि
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न भुञ्जीतोद्धतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत्।
नातिप्रगे नातिसायं न सत्यं प्रतराशितः।।
         हिन्दी में भावार्थ-जिन पदार्थों से चिकनाई निकाली गयी हो उनका सेवन करना ठीक नहीं है। दिन में कई बार पेट भरकर, बहुत सवेरे अथवा बहुत शाम हो जाने पर भोजन नहीं करना चाहिए। प्रातःकाल अगर भरपेट भोजन कर लिया तो फिर शाम को नहीं करना चाहिए।
न कुर्वीत वृथा चेष्टा न वार्यञ्जलिना पिवेत्
नोत्सङ्गे भक्षवेद् भक्ष्यान्नं जातु स्वात्कुतूहली।।
               हिन्दी में भावार्थ-जिस कार्य को करने से कोई लाभ न हो उसे करना व्यर्थ है। अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए और गोद में रखकर भोजन नहीं करना चाहिए।
           हम देख रहे हैं कि समाज में एक तरह से बदहवासी का वातावरण बन गया है।  दुर्घटनाओं, हत्यायें तथा छोटी छोटी बातों पर बड़े फसाद होने पर युवा वर्ग के लोग ही सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। युवाओं की मृत्यु दर में वृद्धि का कोई आंकड़ा दर्ज नहीं हुआ है पर जिस तरह के समाचार नित आते हैं वह इसका संदेह पैदा करते हैं।  कहा जाता है कि जैसा खाया जाये अन्न वैसा होता है मन। युवाओं में भोजन की बदलती प्रवृत्ति उनमें बढ़ते तनाव का प्रमाण तो पेश कर ही रही है।  जिस तरह बच्चों की बीमारियों पर अनुसंधान किया जाता रहा है उसी तरह अलग से युवा वर्ग के तनावों और विकारों का भी शोध किया जाना चाहिये।
               स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे  भोजन का परंपरागत स्वरूप ही स्वास्थ्य के लिये उपयुक्त है।  इस संबंध में श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि रस और चिकनाई युक्त, देर तक स्थिर रहने वाले तथा पाचक भोजन सात्विक मनुष्य को प्रिय होता है।  यह भी कहा गया है कि न तो मनुष्य को अधिक भोजन करना चाहिए न कम।  इसकी व्याख्या में हम यह भी मान सकते हैं कि ऐसा करने पर ही मनुष्य सात्विक रह सकता है। हम जब आजकल के दैहिक विकारों की तरफ देखते हैं तो पता लगता है कि चिकित्सक बीमारी से बचने के लिये चिकनाई रहित और हल्का भोजन करने की सलाह देते हैं।  तय बात है कि इससे मनुष्य की मनोदशा में सात्विकता की आशा करना कठिन लगता है।  हालांकि यह भी सच है कि इस तरह का भोजन करने पर शारीरिक श्रम अधिक कर उसको जलाना पड़ता है पर आजकल के रहन सहन में इसकी संभावना नहीं रहती। मगर यह सच है कि खानपान का मनुष्य जीवन से गहरा संबंध है और उसमें नियमों का पालन करना चाहिए।       

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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