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Feb 28, 2015

ज़माने के नायक-हिन्दी कविता(zamane ke nayak-hindi poem)



समाज सेवा के व्यापार में
धोखे और चतुराई की
कला से होती कमाई।

सच की राह चलकर
कभी किसी ने
प्रतिष्ठा नहीं पाई।

कहें दीपक बापू आजकल
दलाल निभा रहे
ज़माने के सुधार में
नायक की भूमिका,
उनके चमचे निभा रहे
गायक की भूमिका,
समाज पर संकट के बादल
उतना कहर नहीं बरपाते,
जितनी बेशरमी ढहाते,
दर्द झेल रही वाणी ने
कभी आपत्ति नहीं जताई।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Feb 13, 2015

शब्दों के अर्थ तोलने की तराजू-हिन्दी कविता(shabdon ke arth tolne ki taraju-hindi poem)



वाणी से मौन रहें
तो लोग समझते बोलने के लिये
हमारे पास कुछ नहीं है।

शब्द बोलें तो
हमें लगता है कि
अर्थ तोलने की तराजू
उनके पास नहंी है।

कहें दीपक बापू महफिलों में
लगी भीड़ से
जिंदगी का सच रहता दूर
सजे चेहरों की अदायें
भले ही कितना लुभायें
खोलने के लिये नया राज
उनके पास नहीं है।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Feb 5, 2015

आशा की दृष्टि-हिन्दी कविता(asha ki drishti-hindi poem or kaivita)



कोई भी नया सपना
हमें दिखाता है
अपनी दृष्टि बड़ी आशा के साथ
बहुत देर तक
उसकी तरफ लगाते हैं।

होता है हमारे विश्वास का सौदा
अपनी  ही आंखों के  सामने
लुट जाने के बाद
अपनी बुद्धि को जगाते हैं।

कहें दीपक बापू अभाव साथी हैं
तब प्रतिष्ठा का भाव
समाज में ज्यादा नहीं रहता
यही सच जानकर
दिल के सौदागरों की
सजावट से अपनी
नीयत को स्वयं भगाते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Jan 7, 2015

दूसरों के लिये बबूल का जाल-हिन्दी कविता(doosron ke liye babool ka jaal-hindi poem)



नासिका में सुगंध के लिये

हर कोई फूल चुनता है।



कोई दूसरा खुश न रहे

इसलिये कम अक्ल इंसान

ज़माने के लिये

बबूल का जाल बुनता है।



कहें दीपक बापू कातिलों पर

मदद का आसरा

ताकतवर लोग भी करने लगे हैं,

अपनी अय्याशियां छिपाने के लिये

उनकी जेब भरने लगे हैं,

परायों से हादसे पर

दिखावे का गम जताते हैं,

अपनी जिंदगी का जश्न

कमजोर के दर्द पर मनाते हैं,

यह अलग बात है

हथियार की आंख नहीं होती

कभी वह उनके सीने भी

निशाने के लिये चुनता है।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Dec 24, 2014

राजस्वी और तपस्वी-हिन्दी कविता(rajsvi aur tapasvi-hindi poem)



धनस्वी कभी मनस्वी नहीं होते
आत्मविज्ञापन से
यशस्वी जरूरी हो जाते हैं।

राजपद पर तपस्वी
कभी नहीं विराजते
मिलता है जिनको सिंहासन
आत्मविज्ञापन से
तपस्वी जरूर हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू पीड़ा से
कवितायें बनती हैं,
प्रगति के वादे होते
पर दवा नहीं बनती हैं,
ज़माने का दर्द के व्यापार में
लगे लोग हो जाते राजस्वी
आत्म विज्ञापन में
तपस्वी  जरूर हो जाते हैं
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Dec 11, 2014

धर्म कर्म के नाम पर-हिन्दी कविता(dharma karma ke naam par hindi poem)



मनुष्यों के हृदय
खिलौने की तरह टूट जायें
भावनाओं के व्यापारी
कोई हिसाब नहीं रखते।

जहां लाभ का अवसर आये
वहीं लगाते अपने चक्षु
स्वयं धन की चाहत में
दृश्य का स्वाद नहीं चखते।

कहें दीपक बापू अपने वश में
नहीं है पूरा ज़माना,
धर्म और कर्म के नाम पर
केवल जानते हैं लोग कमाना,
विषयों के विशेषज्ञ सभी
उनके मस्तिष्क में प्रज्जवलित
वैचारिक अग्नि पर
मानवीय भाव नहीं पकते।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

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Dec 3, 2014

कहानियों का प्रायोजन-हिन्दी कविता(kahanyon ka prayojan-hindi poem)



प्रचार के भूखे सब
दिल बहलाने के लिये
नायक और खलनायक
मिलकर लड़ते हैं।

किसी के नाम
किसी के बदनाम होने से
बन जाती कहानियां
कभी कभी प्रायोजक
पैसा खर्च कर गढ़ते हैं।

कहें दीपक बापू मनोरंजन से
कमाते हैं चालाक व्यापारी
समझदार लेते मुफ्त में
हवा और पानी के मजे
मूर्खो की दरियादिली से
दूसरों के खजाने बढ़ते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Oct 5, 2014

मर गयी संवेदना-हिन्दी कविता(mar gayi sanvedna-hindi poem)




हादसों के समाचार पर
लोग आंखों में आंसु लाकर
अपने ही हृदय में बसे
तनाव कम कर जाते हैं।

फिर जुटती कहीं भीड़
पहुंच जाते दर्शक बनकर
जमघट के खतरे
तब वह भूल जाते हैं।

कहें दीपक बापू बेचैन समाज में
अकेलेपन से घबड़ाये सभी,
अपने हाल से छिपते हुए
गैर के हादसे से
सबक लेने की सोचते कभी,
मर गयी संवेदना
दूसरे की मौत पर ही
लोग अपने जिंदा होने का
अहसास कर पाते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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Sep 18, 2014

मनोरंजन का पेशा-हिन्दी कविता(business of entertainment-hindi poem)





आकर्षक शब्द वाचन की
कला में जादू है
मगर सभी को नहीं आती।

लोग मधुर स्वर के
जाल में फंस ही जाते
अर्थ की अनुभूति
सभी  को नहीं आती।

बिना सृजन के
रचयिता  दिखने की छवि
सभी को नहीं बनानी आती।

मनोरंजन के पेशे में
नारा नया होना चाहिये
पुरानी अदाओं पर भी
भीड़ खिंची चली आती।

कहें दीपक सुविधा भोगी
मनुष्य समाज हो गया है,
उपभोग के शोर में खो गया है,
मायाजाल में फंसे सभी
चाहे जिसे बंधक बना लो
नया बुनने की नौबत ही
कभी नहीं आती है।
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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Sep 7, 2014

सांईबाबा के भक्तों की भावना आहत नहीं करना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन(shirdi sa saibaba ke bhkton ki bhawana aahat nahin karna chahiye-hindi thought article)



             आज तक एक बात समझ में नहीं आई कि धर्म और अध्यात्मिक ज्ञान के बीच कोई संबंध है या नहीं? कुछ कथित धर्म विशेषज्ञ अपने अध्यात्मिक ज्ञानी होने का दावा करते हैं पर प्रवचन सांसरिक विषय पर देते हैं। अनेक कथित धर्मभीरु योद्धा  आध्यात्मिक पुरुष होने का दावा करते हुए समाज में अस्त्रों शस्त्रों की मदद से शांति तथा नैतिकता लाने का प्रयास करते हैं।  अनेक लोग द्रव्यमय यज्ञ को ही धर्म का प्रतीक मानते हैं तो अनेक ज्ञान से ही धर्म की रक्षा करना संभव मानते हैं।  कौन धार्मिक और कौन अध्यात्मिक स्वभाव का है यह पहचान किसी को नहीं रही।  इस भ्रमपूर्ण स्थिति ने समाज में अनेक अनेक उपसमूह बना दिये हैं।  श्रीमद्भागवत् गीता ने गुरु महिमा का वर्णन है पर कथित धर्म के ठेकेदार यह पदवी स्वयंभू  धारण कर अपने शिष्यों का एक प्रथक पंथ बना देते हैं। इन्हीं पंथों के बीच श्रेष्ठता की होड़ समाज में तनाव को जन्म देती है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान कहंी एक कोने में पड़ा कराह रहा होता है। यह स्थिति अभी शिरडी के सांई बाबा को भगवान न मानने को लेकर प्रकट हुई है। 
            एक कथित धर्म संसद में शिरडी के सांई बाबा की मूर्तियां उन मंदिरों से हटाने का निर्णय लिया गया जहां भगवान के दूसरे रूपों की मूर्तियां स्थिति हैं।  इनमें से कुछ ऐसे मंदिरों से सांई बाबा की मूर्तियां हटाई गईं जहां मंदिर के निर्माण के समय ही स्थापित की गयीं थी। वहां भगवान के विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमायें स्थापित तो की गयीं पर उस मंदिर की लोकप्रियता बढ़ाने की दृष्टि से सांई बाबा की मूर्ति भी लगाई गयी।  अब यह कहना कठिन है कि ऐसे मंदिरों की लोकप्रियता किस कारण बढ़ी पर एक बात तय है कि अब हटाने से  विवाद बढ़ेगा।
            हम सांई बाबा के भक्त न भी हों पर अगर हमारे अंदर भारतीय अध्यात्म ज्ञान के प्रति रुझान है तो कभी भी किसी की भक्ति पर आक्षेप करना ठीक नहीं लगता।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान की धारा में बहने वाले सकारात्मक विचारक होते हैं। वह अपनी मन की बात कहते हैं पर दूसरे को आघात नहीं पहुंचाते।  दूसरे के दोष निकालकर अपने इष्ट के गुणों का प्रचार करना अहंकार के भाव को दर्शाता है। वैसे भी श्रीमद्भागवत गीता में भक्तों के चार प्रकार बताये गयें हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  इसका मतलब यह है कि अगर हम ज्ञान साधक हैं तो  अन्य तीनों भाव वाले भक्तों की उपस्थिति सहजता से मान्य करनी होगी।
            देश में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में हमेशा ही एक अंतर्द्वंद्व की स्थिति रही है। इसलिये आर्ती तथा अर्थार्थी भाव वाले भक्त जहां अपने मन की शांति मिलने की आशा होती है वहीं जाते हैं।  इन्हें अध्यात्मिक ज्ञान से अधिक अपने सांसरिक विषयों की चिंता रहती है।  उनकी इस प्रवृत्ति का लाभ उठाने वाले कम नहीं हैं।  इस प्रयास में ऐसे लोग भी शािमल होते हैं जिनके हृदय में माया से मिलने का सपना होता हैै पर मुख से राम का जाप करते हुए मिलते हैं। सांई बाबा भगवान नहीं थे हम यह मानते हैं पर  जो भगवान मानते हैं उनका मन दुखाने वालों को ज्ञानी नहीं कह सकते।  ऐसे लोग वेदों से श्लोक लाकर लोगों के बीच अपनी विद्वता प्रचारित कर रहे हैं पर श्रीमद्भावगत् गीता से मुंह छिपा रहे हैं।  उसमें साफ लिखा है कि कुछ भक्त मुझे सीधा न पूजकर देवताओं और प्रेतों की पूजा करते हैं वह अंततः मेरक  ही भक्त हैं और मैं उनको उनकी इच्छानुसार कुशलक्षेम उपलब्ध करा देता हूं। ऐसे भक्तों को ज्ञानी से कमतर अवश्य माना गया है पर हार्दिक भाव होने पर उनके प्रति भी सद्भाव दिखाना आवश्यक दिखाया गया है।
            चाणक्य कहते हैं कि ज्ञानियों का भगवान सर्वत्र व्याप्त है।  हमारा मानना है कि भगवान भी भक्तों से बनता है।  श्रीकृष्ण भगवान ने स्पष्ट कहा है कि सच्चा भक्त मेरा ही रूप है। ऐसे में ज्ञानियों के लिये भी सांई बाबा भगवान नहीं है पर उनके भक्तों को देखकर यह आभास तो होता ही है उनकी पूजा की निंदा करना अपने अज्ञान का प्रमाण देना है।
            हमारा मानना है कि सांईबाबा की लोकप्रियता उनके ज्ञान के नहीं वरन् सांसरिक विषयों में चमत्कार के कारण बनी है। उनके भक्त भी यही मानते हैं कि हम उनकी पूजा अपने जीवन में चमत्कार की आशा या संभावना से ही कर रहे हैं।  वह फकीर थे पर उनके भक्त ही बताते हैं कि अंतिम समय में उन्होंने अपने सोने के सिक्के अपने एक परम भक्त को सौंपे थे।  इसका मतलब वह भी कहीं न कहीं संग्रह करते थे और यह बात फकीर की उपाधि धारण करने वाले व्यक्ति पर जमती नहीं पर बात आकर वहीं अटकती है  कि उनके भक्तों की भक्ति पर हमला करना ठीक नहीं।  सांईबाबा के विरुद्ध चलाया गया अभियान सात्विक कर्म नहीं है। जो इसे चला रहे उनकी प्रवृत्तियां राजसी हैं और कहीं न कहीं अपना अज्ञात लक्ष्य पूरा करने के लिये प्रयासरत हैं। इस विषय में हिन्दू धर्म से जुड़े बुद्धिमान लोगों का मौन रहना अब ठीक नहीं लगता।  हमने देखा है कि हिन्दू धर्म के स्वतंत्र विचारक इस विवाद से दूर रहना चाहते हैं पर उन्हें यह समझना चाहिये कि सांई बाबा के भक्तों के भाव पर आघात भारतवर्ष की एकता को प्रताड़ित करना होगा।  सांई भक्त भारतीय धर्मों से अलग नहीं है।  वह ऐसा कुछ नहीं कर रहे जिसे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन आहत हो जबकि  उनके विरोधी श्रीमद्भागवत गीता और वेदों की चर्चा करते हैं पर आचरण ठीक उसके विपरीत है। हिन्दू धर्म से जुड़े वह विद्वान जिन्हें अपने ज्ञान से दान नहीं चाहिये उन्हें अब अपनी बात स्पष्तः रखनी चाहिये ताकि इस विवाद से समाज में हानि उत्पन्न न हो।


 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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