Oct 5, 2014

मर गयी संवेदना-हिन्दी कविता(mar gayi sanvedna-hindi poem)




हादसों के समाचार पर
लोग आंखों में आंसु लाकर
अपने ही हृदय में बसे
तनाव कम कर जाते हैं।

फिर जुटती कहीं भीड़
पहुंच जाते दर्शक बनकर
जमघट के खतरे
तब वह भूल जाते हैं।

कहें दीपक बापू बेचैन समाज में
अकेलेपन से घबड़ाये सभी,
अपने हाल से छिपते हुए
गैर के हादसे से
सबक लेने की सोचते कभी,
मर गयी संवेदना
दूसरे की मौत पर ही
लोग अपने जिंदा होने का
अहसास कर पाते हैं।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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