Oct 29, 2014

स्वामी बन रहा सेवक-हिन्दी कविता(swami ban raha sewsk-hindi poem)



निर्धन की सेवा
कोई धर्म बताकर
हृदय के  बड़े चाव से
सेवका की भूमिका निभा रहा है।

कोई आधुनिक समय की
आवश्यक परंपरा मानकर
चंदे का ग्राहक 
प्रचार के लिये स्वयं  सेवक की
भूमिका  निभा रहा है।

कहें दीपक बापू सर्वशक्तिमान से
कैसी रची यह माया,
कभी खुश नहीं रही
इसका पीछा करती
मनुष्य की काया,
भाग्य लिख दिये
सभी के अलग अलग
जिसकी जेब खाली
वह दाल रोटी खाकर भी
भजन में मग्न रहता
उसकी चिंता के व्यापार मे
स्वामी दिखाने के लिये
सेवक की भूमिका निभा रहा है।
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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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