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May 1, 2010

ताजमहल और पसीना-मज़दूर दिवस पर कविता(tajmahal aur mazdoor-hindi shayari on mazdoor divas diwas or may day)

ताजमहल प्यार का प्रतीक है
या परिश्रम का
यह समझ में न आया।
शहंशाह ने लूटा गरीब का खज़ाना,
कहलाया वह नजराना,
मजदूरों ने अपना खून पसीना बहाकर
संगमरममर के पत्थर सजाये,
फिर अपने हाथ कटवाये,
कहीं कब्र में दफन था मुर्दा
जिसकी हड्डिया भी धूल हो गयी,
उठकार रख दी वह सभी
नये बने महल के कुछ पत्थरों के नीचे
उसे साम्राज्ञी कहने की इतिहास से भूल हो गयी,
पहले पसीना बहाकर
फिर खून के आंसु रोने वाले
मजदूरों का नाम कोई कागज़ दर्ज नहीं कर पाया।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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