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Feb 6, 2010

खेल के खेल का विस्तार-हिन्दी व्यंग्य (game of cricket and sports-hindi article

क्रिकेट खेल की दृष्टि से प्रचार माध्यमों के लिये आज का दिन करुणामय रहा। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई)की टीम-यही इस टीम का वास्तविक परिचय है-के सदस्यों का मैदान में अभिनय अपेक्षानुरूप नहीं रहा। दक्षिण अफ्रीका के पेशेवर खिलाड़ियों के सामने बीसीसीआई के कमाऊ गेंदबाजों का गेंदबाजी अभिनय काम नहीं आया और पूरे दिन के 91 ओवर में वह केवल दो विकेट गिरा सके।  प्रचार माध्यम कल अपनी बीसीसीआई टीम के  कप्तान हीरो की रणनीति का खुलासा कर रहे थे कि उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ अपने गेंदबाजों से ‘राउण्ड द विकेट’ गेंदबाजी करने की जो सफल रणनीति अपनाई थी वही दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध भी आजमायेंगे।  उद्घोषक ऐसा करते हुए ऐसी मुस्कराहट बिखरे रहे थे जैसे कि कोई बड़ा रहस्योद्घाटन कर रहे थे।  उनका मानना था कि इसी रणनीति की वजह से बांग्लादेश हारा था। उद्घोषक घोषणा कर रहे थे कि ‘इस रणनीति के आगे दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज हवा हो जायेंगे।’
यह नहीं हुआ। बरसों से हम क्रिकेट का खेल देख रहे हैं और यह पता है कि ‘ओवर द विकेट’ गेंदबाजी हो या ‘राउण्ड द विकेट’ कुशल और पेशेवर बल्लेबाजों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
हमने मैच नहीं देखा मगर लोग है कि पुराने नशे को भूलने नहीं देते।  सुबह एक ने बताया कि ‘दक्षिण अफ्रीका के दो विकेट 17 रन पर ही गिर गये हैं।’
हमने सोचा कि शायद पटकथा ऐसी रही होगी। फिर भारत में पिचें स्पिन लेती हैं इसलिये संभव है कि सच में ऐसा हुआ हो।
शाम को टीवी चैनलों की नाराजगी साफ दिख रही थी। करुणामय प्रदर्शन पर श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति तो संभव भी नहीं थी।  वैसे यह कोई विश्व कप थोड़े ही है कि लोग नाराज होकर खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापनों का बहिष्कार करेंगे।  मगर बाजार की चिंतायें हैं और प्रचारक भी उससे नहीं बच सकते।
बांग्लादेश से बीसीसीआई क्या जीती? आसमान सिर पर उठा लिया। रेटिंग में नंबर बन हो गयी-और हमारी टीम तो एक तरह से विश्व विजेता है जैसे जुमले सुनाये गये, मगर दक्षिण अफ्रीका टीम कोई ऐसी वैसी टीम नहीं है। शुद्ध रूप से पेशेवर खिलाड़ियों से सुसज्जित यह टीम केवल आस्ट्रेलिया से ही पीछे है।  दरअसल अब क्रिकेट में मजा रह गया है तो वह इन दोनों टीमों के आपसी मैचों में दिखता है।  वह एक दिवसीय मैच हमें अब तक याद है जिसमें चार सौ से अधिक रन आस्ट्रेलिया ने बनाया और दक्षिण अफ्रीका ने उसका पीछा किया। तमाम तरह के रोमांचक उतार चढ़ाव के बाद दक्षिण अफ्रीका ने मैचा जीता।  मेन आफ दि मैच के सम्मान के लिये आस्ट्रेलिया के कप्तान को जब बुलाया गया तो उन्होंने उसे ठुकरा कर अपने ही उस विपक्षी बल्लेबाज को देने के लिये कहा जिसने उनसे केवल एक रन कम बनाया था।  उनका मानना था  कि मैंने तो बिना किसी दबाव के बल्लेबाजी की पर उस विपक्षी खिलाड़ी ने तो दबाव में इतना जोरदार प्रदर्शन किया। क्या जोरदार मैचा था? ऐसे मैच कभी कभी ही देखने को मिल सकते हैं?
बहरहाल बीसीसीआई के  खिलाड़ियों पर जैसे पांच दिवसीय मैच एक बोझा है पर सच यही है कि इसी में खिलाड़ी की काबलियत का परिचय मिलता है।  देशी टीम का प्रदर्शन वालीवुड की फिल्मों की तरह ही लगता है।  जैसे वालीवुड कभी भी हालीवुड का सामना नहीं कर पाता वैसे ही बीसीसीआई की टीम पश्चिमी टीमों के सामने ढेर हो जाती हैं। इसका कारण यह भी है कि भारतीय खिलाड़ी अन्य देशों से अधिक अमीर है इसलिये इस साहबी खेल को अपने ही ढंग से खेलते हैं।  दो की जगह एक रन बनता है और कोई कैच हाथ में आ जाये तो ठीक, नहीं तो ‘अनिश्चिताओं के इस खेल में’ सब चलता है।  खिलाड़ियों का खेल कम अभिनय अधिक इसलिये दिखता है क्योंकि उनके रैम्प पर चलने के कार्यक्रम, विज्ञापन तथा रोमांस के किस्से फिल्म अभिनेताओं की तरह ही होने लगे हैं।  अनेक बार तो उनको टीवी चैनलों के साथ कार्यक्रम करते देखा जा सकता है। कुछ फिल्मी अभिनेत्रियों के साथ नाचते भी देखे जा सकते हैं।
एक पाठक ने इस संबंध में एक बार टिप्पणी करते हुए हमको समझाया था कि क्रिकेट को खेल की तरह देखो।’
हमने इसका जवाब नहीं दिया। देना चाहते थे। वही यहां दे रहे हैं कि क्रिकेट को हमने खेल की तरह उठते देखा है और व्यापार की तरह गिरते भी देखा है।  प्रचार माध्यम इस खेल पर फिदा है पर इसमें फिक्सिंग की आशंकायें भी यही जताते रहे हैं-अनेक बार तो सनसनीखेज स्टिंग आपरेशन इनके द्वारा ही प्रस्तुत किये गये हैं। कुछ खिलाड़ियों को खेल से निकालकर सजा भी दी गयी।  अब उसे माफ करने की बात भी चल रही है। अब यही प्रचार माध्यम मानते हैं कि सब ठीक हो गया है तो हम भी मानते हैं कि हो गया हो होगा, पर एक बार दिल टूटा तो टूट ही गया। अलबत्ता इस खेल को कभी कभार हम देखते हैं पर इससे अब प्रभावित नहीं होते।  यह खेल अब बहुत कुछ हो गया है। नहीं तो इस देश में होने वाली एक मामूली से क्रिकेट प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के न आने पर इतना उत्पात नहीं मचता। एक ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसा न होने से उन लोगों को परेशानी आयेगी जो दोनों देशों में कड़वाहट कम करने का प्रयास कर रहे  हैं।  ऐसे में इस खेल के खेल का विस्तार समझा जा सकता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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