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Aug 2, 2011

ख्याली रोटियाँ कभी नहीं पक पाएँगी-हिन्दी व्यंग्य कविता (khyali rotiyan pak nahin paengi-hindi vyangya kavita)

पत्थरों पर है टिकी है आस्था
उन पर पाँव मत रखना
वरना टूट जाएंगी,
धरती को चाहे जितना रौंदते रहो
मगर पर्दे पर चमकने वाली
देवियों पर से नज़र मत हटाना
वरना खुशियां रूठ जाएंगी।
सुना रहे हैं रोज
एक नया आसमानी सच
बाज़ार के सौदागरों के भौपू
उन पर ही कान धरना
वरना तरक्की की उम्मीदें रूठ जाएंगी।
यह अलग बात है
लुटते रहोगे हमेशा
ख्याली रोटियाँ कभी नहीं पक पाएँगी।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Aug 9, 2010

भूख का अक्स-हिन्दी कविता (bhookh ka aksa-hindi kavita)

दुबली, पतली और सांवली
उस गरीब औरत की काम के समय
मौत होने पर
पति ने हत्या होने का शक जताया।
पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिये
अस्पताल भेजा
और एक घर से दूसरे और वहां से तीसरे
घर में काम करती हुई
उस गरीब औरत की मौत को
संदेहास्पद बताया।
गरीब और बीमार की मौत का पोस्टमार्टम
सुनकर अज़ीब लगता है,
पति लगाये तो कभी नहीं फबता है,
एक औरत
जिसने दस दिन पहले गर्भपात कराया हो,
रोटी की आस में घर से भूखी निकली होगी
कमजोर लाचार औरत की क्या बिसात
उमस तो अच्छे खासे इंसान को वैसे ही बनाती रोगी,
हड्डियों के कमजोर पिंजरे से
कब पंछी कैसे उड़ा
उसकी जिंदगी का रथ कैसे मौत की ओर मुड़ा,
इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने की
जरूरत भला कहां रह जाती है,
सारी दुनियां गरीबी को अपराध
औरत उस पर सवार हो तो अभिशाप बताती है,
जाने पहचाने सवाल हैं,
अज़नबी नहीं जवाब हैं,
भूख और मज़बूरी
पहले अंदर से तोड़ते हैं,
तब ही मौत से लोग नाता जोड़ते हैं,
क्या करेंगे सभी
अगर पोस्टमार्टम में
कहीं भूख का अक्स नज़र आया।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Mar 31, 2010

हंसना और रोना भी व्यापार है-हिन्दी शायरी (hansha aur rone ka vyapar-hindi shayri)

दौलत कमाने से अधिक वह
उसे छिपाने के लिये वह जूझ रहे हैं,
उनके अमीर होने पर किसी को शक नहीं
लोग तो बस उनके
काले ठिकानों की पहेली बूझ रहे हैं।
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इतनी दौलत कमा ली कि
उसे छिपाने के लिये वह परेशान है,
खौफ के साये में जी रहा खुद
फिर भी जमाने को लूटने से उसको फुरसत नहीं
उसकी अदाओं पर जमाना हैरान हैं।
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यूं तो दुनियां को वह
ईमान का रास्ता बताते है,ं
पर मामला अगर दौलत का हो तो
वह उसे खुद ही भटक जाते हैं।
-------
उनका हंसना और रोना भी व्यापार है,
पैसा देखकर मुस्कराते है,
कहो तो रोकर भी दिखाते हैं,
अकेले में देखो उनका चेहरा
लोग क्या, वह स्वयं ही डर जाते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Jan 21, 2010

कुछ कम कर लो-हिन्दी शायरी (dost dushman-hindi shayri)

रोटी बहुत हैं तुम्हारे पास

तो भी अपने पेट की भूख

कुछ कम लो।

फैलाते हो पानी सड़क पर

बहुत बुरा है

कुछ अपनी प्यास ही कम कर लो।

चादर से बाहर पांव फैलाओ

दूसरे को आसरा मिले

इसलिये घर की छत कुछ कम लो।

ढेर सारे कपड़े सजाकर

घर में रखने से लाभ नहीं

पहनावे का शौक कुछ कम कर लो।

बांटकर खाना सीखो

अपनी अमीरी का रौब दिखाकर

दोस्त नहीं बनाये जाते

दूसरों का दर्द दूर करना सीखो

अपने दुश्मन जमाने में कुछ कम कर लो

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Apr 6, 2009

अनुभूति के रस का प्रवाह-हिंदी शायरी

प्यार अगर कहीं उगता तो
बरसता हर सावन में
महकता हर बसंत में
हर पल
हर जगह जमीन पर छितरा जाता।
हाथ से पकड़ा न जाये
आंख से देखा न जाये
कान से सुनना है कठिन
मूंह से चूसा न जाये
इंसान के रक्त में
अनुभूतियों के रस का प्रवाह न हो
तो प्यार की पहचान नहीं हो सकती
दिल के अहसास में प्यार अपनी जगह बनाता।
....................



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Aug 22, 2008

देखने वाले सच भूल जाते-हिंदी क्षणिका

टीवी धारावाहिकों के
पारिवारिक क्लेशों पर लोग बतियाते हैंें
असल जीवन में ऐसे खलपात्र नहीं मिलते
जिनको देखकर वह घबड़ाते
झूठी कल्पनाओं और कहानियों के
नायक नायिकाओं
खलनायक खलनायिकाओं
को असल समझ कर
अपना दिल बहलाते
झूठ के पांव नहीं होते
इसलिये जमीन पर नहीं चलता
पर इलैक्ट्रोनिक पंख उसे
रंग बिरंगे रूप में लोगों के आगे इस तरह बिछाते
देखने वाले सच भूल जाते

...............................
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Aug 21, 2008

गुलाम आजाद होकर भी मालिक के लिखे पर चलता है-हास्य व्यंग्य कविता

गुलाम और आजाद में
यही फर्क दिखा है
आजाद चलते हैं अपने ख्याल से
गुलाम आजाद होकर भी
चलता है उस रास्ते पर
जो उसके मालिक ने अपनी किताब में लिखा है
...................................
सर्वशक्तिमान ने
एक आजाद आदमी को
धरती पर भेजते हुए पूछा
‘तू वहां क्या करेगा
किसी की चाकरी या
मालिकी करेगा’
आजाद आदमी ने कहा
‘दोनों में ही गुलामी होगी
गुलामी तो है ही बुरी
मालिकी में भी अपनी संपत्ति की
देखभाल करना गुलामी से क्या कम है
इसलिये वहीं विचरण करूंगा
जहां मेरा मन कहेगा
सर्वशक्तिमान ने धरती पर जाते गुलाम से पूछा
‘क्या तू भी धरती पर
आजादी से विचरण करेगा’
गुलाम ने कहा
‘इस जन्म में आजादी बख्श दें
तो बहुत अच्छा है
पर मालिक का नाम पहले ही बता दें तो अच्छा
वहां जाकर ढूंढना नहीं पड़ेगा
.....................................


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Jul 16, 2008

भीड़ के चैन कहां मिलता है-हिंदी शायरी


शोर में शांति की तलाश
पराये झगड़े में मनोरंजन की आस
आदमी अपने लिये ढूंढता है चैन वहां
मिलती है बैचेनी जहा
....................
शांत करना पड़ता है दिल
तब ही मिलती है शांति
आंखों की दृष्टि हो साफ
तभी सुंदर लगती है कि
किसी सूरत की कांति
केवल तालियां बजाने से
कहीं भला चैन मिलता है
देखा गया दृश्य आंखों से
कानों से निकलकर सुर
तब ही पहुंच सकता है दिल तक
सत्य से परे होने की न हो भ्रांति
..................................................

उन्होंने पूछा एक पथिक से
‘क्या उस जगह का नाम
बता सकते हो जहां चैन मिलता हो
जहां मिले ऐसे लोगों की संगत
दिल का सुकून जिनसे मिलता हो’
पथिक ने कहा
‘जगह तो बहुत मिलेंगी
पर लोगों की संगत का पता नहीं
मिलते हैं चार जहां
जंग का आलम होता वहां
जहां हो वहीं ढूंढ लो अकेले में
भीड़ लोगों की हो या चीजों की
इनमें भल चैन कहां मिलता है
........................
दीपक भारतदीप

Jun 22, 2008

सापेक्ष मंत्र ही है जीवन का आधार-हिन्दी शायरी


जब दिल में हो अकेले होने को
होता है अहसास
तब बुरे ख्याल आ ही जाते हैं
जब भीड़ में
हो जाते अकेले ही अनायास
तब नापसंद लोग भी
सामने चले आते हैं
हम चाहकर भी सोच नहीं बदल पाते
न आंखे हटा पाते हैं
अपने मन में अंतद्र्वन्द्वों के
जाल में स्वयं ही फंसकर छटपटाते हैं

बुरे ख्याल छोड़ना हो
या नापसंद आदमी से मूंह फेरने की
कोशिश करने से से अच्छा है
किसी अच्छे ख्याल की तरफ चले जायें
किसी पसंद के शख्स को पास बुलायें
उपेक्षा कोई मंत्र नहीं है जो
उबार सके अंतद्र्वंद्वों से
सापेक्ष मंत्र ही है जीवन का आधार
मन जिनमें नही रमता
उनसे दूर हटकर भी कहां जीवन जमता
ऐसे में कोई नया कर दिखायें
बदल दें अपनी दिशायें
जिंदगी में अमन रखना है तो
किसी से दूर रहने के लिये
किसी के पास चले जाते हैं
हम तो इसी सापेक्ष मंत्र से
जीवन के दर्द का इलाज करते जाते हैं
..............................
दीपक भारतदीप

Apr 13, 2008

फिर गुरु की भूमिका में आते हैं-कविता

कई बस्तियां बसीं और उजड़ गईं
राजमहल खडे थे जहाँ
अब बकरियों के चरागाह हो गए

सर्वशक्तिमान अपनी कृपा के साथ
कहर का हथियार नहीं रखता अपने साथ
तो कौन मानता उसे
कई जगह उसका भी प्रवेश होता वर्जित
नाम लिया जाता
पर घुसने नहीं दिया जाता
नरक और स्वर्ग के दृश्य यहीं दिखते
फिर कौन ऊपर देख कर डरता
खडे रहते फ़रिश्ते नरक में
शैतानों के महल होते सब जगह
जो अब इतिहास के कूड़ेदान में शामिल हो गए
--------------------------------------

चंद किताबों को पढ़कर
सबको वह सुनाते हैं
खुद चलते नहीं जिस रास्ते
वह दूसरे को बताते हैं
उपदेश देते हैं जो शांति और प्रेम का
पहले वह लोगों को लडाते हैं
फिर गुरु की भूमिका में आते हैं
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Mar 26, 2008

सोचता हूँ बेनाम हो जाऊं-हिन्दी शायरी

शिखर पर चमकते हुए बहुत देखे सितारों जैसे नाम
पर अपना नाम जमीन पर गिरा पाया
भीड़ से बचने की कोशिश की तो
अपने नाम को ही पाँव में कांटे की तरह चुभा पाया
सोचता हूँ कि इस भीड़ में गुम हो जाऊं
अब बेनाम हो जाऊं

खुशी और दुख के पल तो आते रहेंगे
कभी गर्मी की तपिश में जलेगा बदन
तो कभी बसंत की शीतलता का वरण करेंगे
सुख में तो साथी तो सब होते हैं
दुख में हंसता है ज़माना हमारा नाम लेकर
दर्द बांटे तो किसके साथ
सभी के अपने बडे नाम के साथ बंधे हैं हाथ
सोचता हूँ कि इस भीड़ में गुम हो जाऊं
अब बेनाम हो जाऊं


अपने दर्द पीना जब सीख लिया है
दुख को पीना सीख लिया है
फिर क्यों हंसने का अवसर दूं
क्यों न भीड़ में एक दृष्टा बनकर
दुनिया के नजारों का मजा लूं
किसी का हमदर्द होने के लिए
क्या नाम का होना जरूरी है
किसी का दुख बांटकर
क्या मशहूर होना जरूरी है
सोचता हूँ कि इस भीड़ में गुम हो जाऊं
अब बेनाम हो जाऊं



Mar 17, 2008

खुद दिखने का अहसास-हिन्दी शायरी

जमाने के देखने के अहसास में संवरता जाता
जमाने में हर कोई खुशफहमी में चलता जाता
सब चल रहे हैं आँखें खोलकर, पर दिखता नहीं
खुद दिखने का अहसास, दूसरे को देख नहीं पाता
अपने आशियाने में हमेशा जुटाता तमाम सहूलियतें
समय के झोंके से पल भर में सब धूल हो जाता
पर जिन्होंने लिखी अपनी पसीने से इबारत
उनको समय चिरकाल तक मिटा नहीं पाता
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Mar 10, 2008

समन्दर गहरा कि मन-हिन्दी शायरी

समन्दर गहरा है कि मन
कोई नहीं जान पाया
जिसने जैसा समझा बताया
दोनों पर इंसान काबू नहीं कर सकता
पर फिर भी इसका उपाय बताया

समन्दर में मीठे पानी की तलाश में
आदमी का मन ललचाया
जहाँ मिलता है मीठा पानी
वहाँ से उसका मन कभी नहीं भर पाया

चारों तरफ रौशनी में बैठा शख्स
अंधेरों में रहने वालों का दर्द बयान कर
लूटता हैं वाह-वाही
पर गली में जाने से उसका मन डरता है
उसके बडे होने के अहसास में
कोई सच उनके सामने कह नहीं पाया
अनजाने खौफ में जीता आदमी का मन
समन्दर की लहरों की तरह उठा और गिरता है
हम उसे नहीं चलाते
हमारी जीवन की नैया का मांझी है मन
भला इस सच को कौन जान पाया

अँधेरे में जिनके घर डूबे हैं
वह फिर भी जिन्दगी से नहीं ऊबे हैं
क्योंकि उम्मीद हैं उनको किसी दिन
रौशनी उनके घर में आयेगी
पर जो पी रहे हैं धरती और आकाश की रौशनी
जीते हैं एक डर में
पता नहीं कब अँधेरा उनके निकट आ जाये
इसके लिए उन्होने षड्यंत्रों को
अपना कवच बनाया
जिन्होंने लांघी मजबूरी की हद
वही जीते हैं जिन्दगी को सहजता से
समन्दर गहरा कि मन
उन्होने ही जान पाया
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Feb 28, 2008

किसी को रात डराती है तो किसी को दिन-हिन्दी शायरी

हमने देखा था उगता सूरज
उन्होने देखा डूबता हुआ
वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में
जश्न मनाने की तैयारी
पर हमने देखा था पूरा दिन
हमारा मन भी था डूबा हुआ
वह आसमान में टिमटिमाते तारों की
बात करते हुए खुश हो रहे थे
जबकि हमारा बदन था
तब भी पसीने की बदबू लिया हुआ
सबकी जमीन और आसमान
अलग-अलग होते हैं
किसी को रात डराती है तो किसी को दिन
किसी को भूख नहीं लगती किसी को सताती है
इसलिए सब होते हैं अकेले
क्योंकि कोई किसी का नहीं हुआ
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Jan 24, 2008

अपने आसरे चलना सीख नहीं पाते-कविता साहित्य

कितनी बार टूटता भरोसा
फिर भी हम किये जाते
क्योंकि अपने लिए इसके
अलावा कोई रास्ते नहीं बन पाते
अपने नसीबों पर करते हैं
हमेशा भरोसे की बात
पर दिल से खौफ इंसानों का निकाले नहीं पाते

खडे होते एक जगह
पर भटकता मन कहीं दूर
कोई तो बन जाये हमारा हुजुर
अपने इरादों पर चलने से घबडाते
अपना भरोसा दिखाकर
कितने ढहाते सितम-दर-सितम
पर हम खामोशी से सह जाते
सिलसिला चलता है बरसों तक
फिर भी अपने आसरे चलना सीख नहीं पाते
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Jan 16, 2008

इतिहास के खंभे खडे हैं उनके नाम-कविता

याचना करने से भीख मिलती हैं
वाचना करने से इनाम
जिन्दगी एक खेल है
चलती है अपनी राह अपनी अदा से
आदमी लिखना चाहता उस पर नाम

जहाँ खामोशी होना चाहिए
वहाँ जोर से चिल्लाता है
जहाँ करना चाहिए आवाज
वहाँ डर कर बंद कर लेता आँख
अनेक दुश्मन मान लेता अनाम
ख्वाहिशें पूरी होने के अनुमान से
चक्कर काटता है नकली मोहब्बत की गलियों में
सोचता है शायद कहीं हो जाये
उसके दिल के पूरे अरमान

रखा जिन्होंने अपने पर भरोसा
जिन्दगी में वही छोड़ते हैं
दूसरों को सीखने के लिए
अपने पैरों के निशान
याचना और वाचना करने वाले
अपने घर भर सकते हैं
दुनिया भर के साजो-सम्मान
जो वक्त के साथ उनके घर का
कबाड़ भी बन जाता है
सस्ते में खो देते हैं स्वाभिमान

जिन्होंने जिया अपनी जिन्दगी को
अपने तरीके से
अपना सम्मान सजाया है दिल में
ईमान के साथ सलीके से
नहीं जुटाया कोई अपने बैठने के लिए फर्नीचर
कई इतिहास के खंभे खडे हैं
लिखा है जिन पर उनका नाम

Jan 13, 2008

अपने-अपने होते हैं अंदाज

यूं तो सपनों में भी वही आते हैं
जिन्हें हम देख पाते है
पर जागते हुए हम
कितना जागरूक रह पाते हैं
आसमान से जमीन पर आती हवाएं
जब सूरज की किरणें
फ़ैल जातीं है चारों ओर
पर इंसान उनके दृश्यों को कितना
अपनी आंखों में समेट पाते हैं
फिर भी अपने शक्तिशाली
और संपन्न होने का भ्रम
कितने लोग छोड़ पाते हैं

हवा तो छूकर निकल जाती है
सूरज की किरणे
चिपकी रहतीं है साथ पर
उनके स्पर्श की आत्मिक अनुभूति
कहाँ कर पाते हैं
जीवन में पल-पल पाने का मोह
हमें दूर कर देता है सुखद
और एकाकी पलों को
जीते कहाँ है
हम तो जिन्दगी को ढोते जाते हैं.
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अपने-अपने होते हैं अंदाज
सबके होते हैं कुछ न कुछ राज
पूरी जिन्दगी गुजर जाते हैं
कुछ बताने और कुछ छिपाने में
जान नहीं पाते अपनी जिन्दगी के राज
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Jan 2, 2008

बिना दर्द के भी इंसान तडपता

कभी-कभी उदास होकर
चला जातो हूँ भीड़ में
सुकून ढूँढने अपने लिए
ढूँढता हूँ कोई हमदर्द
पर वहाँ तो खडा रहता है
हर शख्स अपना दर्द साथ लिए
सुनता हूँ जब सबका दर्द
अपना तो भूल जाता हूँ
लौटता हूँ अपने घर वापस
दूसरों का दर्द साथ लिए

कभी सोचता हूँ कि
अगर इस जहाँ में दर्द न होता
तो हर शख्स कितना बेदर्द होता
फिर क्यों कोई किसी का हमदर्द होता
कौन होता वक्ता कौन श्रोता होता
तब अकेला इंसान तडपता
किसी का दर्द पीने के लिए

Dec 8, 2007

इसे भाग्य कहें या कर्मों का लेखा

पत्थर और कागजों के टुकडों को
जोड़ने में जो अपना मन लगाते
उनको श्रृंगार रस में नहलाए
अलंकार से सजाए
शब्दों के गीत नहीं सुहाते
सुनने के आदी है भयानक शोर
अपने सुर से दूसरे को करते बोर
उन्हें कानों को संगीत के सुर नहीं भाते
इसे भाग्य कहें या कर्मों का लेखा
जन्नत के सुख के लिए आदमी
पूरी जिन्दगी भर लड़ता है
पर इस धरती पर मौजूद
वैसे ही सुनहरे दृश्य उसके नसीब में नहीं आते
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तन की भूख सूखी रोटी खाकर मिट जाये
पर मन की अनंत भूख कहाँ तक थम पाये
जमीन पर पाँव के साथ दिमाग भी रख कर
आदमी अगर सोचे तो कभी नहीं पछताए
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