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Jun 9, 2011

हर शख्स अकेला हो गया-हिन्दी शायरी(har shakhs akela ho gaya-hindi shayari)

पहाड़ से टूटा पत्थर
दो टुकड़े हो गया,
एक सजा मंदिर में भगवान बनकर
दूसरा इमारत में लगकर
गुमनामी में खो गया।
बात किस्मत की करें या हालातों की
इंसानों का अपना नजरिया ही
उनका अखिरी सच हो गया।
जिस अन्न से बुझती पेट की
उसकी कद्र कौन करता है
रोटियां मिलने के बाद,
गले की प्यास बुझने पर
कौन करता पानी को याद,
जिसके मुकुट पहनने से
कट जाती है गरदन
उसी सोने के पीछे इंसान
पागलों सा दीवाना हो गया।
अपने ख्यालों की दुनियां में
चलते चलते हर शख्स
भीड़ में यूं ही अकेला हो गया।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

Apr 23, 2010

दौलतमंदों का सजा बाज़ार-हिन्दी शायरी (daulatmandon ka bazar-hindi shayari)

पैसे कमाने का हुनर
दुनियां में सबसे अच्छा माना जाता है,
भले ही कोई फन हो न हो
दौलतमंद खरीद लेता है
सारे फनकार कौड़ी के भाव
इसलिये हुनरमंद भी माना जाता है।
-----------
मयस्सर नहीं हैं जिनको रोटी
उनसे ज़माना खौफ खाता है।
इसलिये फुरसत मिलने पर करते हैं
सभी गरीब का भला करने की बात
बाकी समय तो दौलतमंदों के सजाये
बाजार में ही बीत जाता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Apr 7, 2010

लहु और आंसु-हिन्दी शायरी (lahu aur ansu-hindi shayri)

जमीन पर लहु बिखरा पड़ा है
फिर भी उनका बयान
किन्तु और परंतु शब्दों के साथ खड़ा है।
मरने वालों पर बोले वह कुछ शब्द
पर कातिलों का दर्द भी बयान कर गये
हैवानों के इंसानी हकों के साथ
ज़माने से लड़कर उन्हें जिंदा रखने का जिम्मा
उनकी रोटी के गहने में सच की तरह जो जड़ा है।
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शहीद जो हो गये
उन पर उन्होंने आंसु बहाये,
पर फिर कातिलों के इंसाफ के लिये
खड़े हो गये वह मशाल जलाये।
हैवानों के चेहरे पर फरिश्तों का नकाब
वह हमेशा सजा दी
फिर इंसानी हक के नारे लगाये।
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Feb 20, 2010

सादगी से वार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (sadgi se war-hindi satire poems)

उनकी नज़रों मे आते हैं हमेशा
तलवारें चलने के मंजर
जुबां से
गरीबों और बेसहारों पर
जमाने के दिये घावों का
बयां किये जा रहे हैं।

हर जगह बेसहारों के लिये
हमदर्दी दिखाते हैं,
अमन के लिये जंग करना सिखाते हैं,
अपने हाथ में लिये छुरा कर लिया है
उन्होंने पीठ पीछे
जहां में तसल्ली लाने के लिये
सादगी से वार किये जा रहे हैं।
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वह लोगों के दिल में लगा कर आग
शांति के लिये कर रहे हैं जंग,
गरीब की भलाई का ख्वाब दिखाते
अमीरों के करके रास्ते तंग।
दान लेने से ज्यादा स्वाभिमान
उनको लूटने में लगता है,
जिंदा लोगों से कुछ नहीं सीखते
मरों की याद में उनका ख्याल पकता है,
एक बेहतर ढांचा बनाने की सोच लिये,
उन्होंने कई शहर फूंक दिये,
भूखे के लिये रोटी पकाने के बहाने
शहीदों की चिता पर मेले लगाने का
उनका अपना है ढंग।
यह अलग बात है कि
गरीबों पर नहीं चढ़ता उनका रंग।

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Feb 16, 2010

पसीना और कमाई-व्यंग्य कविता (pasina aur kamai-vyangya kavita)

गाड़िया बहुत हैं

पर सड़कें जाम हैं,

कभी आती तो कभी जाती

बिजली के इंतजार में

खड़े उपकरण तमाम हैं।

तरक्की का मतलब कभी

समझ में नहीं आया,

चीजों की खरीद फरोख्त में ही

ग्राहक और सौदागरों का  बाजार समाया,

अमीरों की चकाचैंध में

गरीबी का अंधेरा नहीं देखायी देता,

खाली है जो हाथ, किसे दिखते

समेट रहा है जो लूट का सामान

बस वही सर्वत्र दिखाई देता,

पसीना बहा रहा है कोई

कमाई किसी दूसरे के नाम है।

कहने को तरक्की तमाम  है।


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Jan 30, 2010

। खिताब बौने लगने लगे हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता (prize culture-hindi comic poem)

चिल्लाने वाले सिरफिरों को

उस्ताद के खिताब मिलने लगे हैं,

दूसरों के इशारों पर नाचने वाले पुतलों में

लोगों को अदाकारी के अहसास दिखने लगे हैं।

बेच खाया जिन्होंने मेहनतकशों का इनाम

दरियादिली के नकाब के वही पीछे छिपने लगे हैं।

औकात नहीं थी जिनकी जमाने के सामने आने की,

जो करते हमेशा कोशिश, अपने पाप सभी से छिपाने की,

खिताबों की बाजार में,  ग्राहक की तरह मिलने लगे हैं।

जिन्होंने पाया है सर्वशक्तिमान से सच का नूर,

अंधेरों को छिपाती रौशन महफिलों से रहते हैं दूर,

दुनियां के दर्द को भी अब हंसी में लिखने लगे हैं।

सच में किया जिन्होंने पसीने से दुनियां को रौशन

सारे खिताब उनके आगे अब बौने दिखने लगे हैं।

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Jan 27, 2010

एक बूंद पानी भी नहीं सह पाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविताएं(ek boond pani-hindi vyangya kavitaen)

अपने गम और दूसरे की खुशी पर मुस्कराकर

हमने अपनी दरियादिली नहीं दिखाई।

चालाकियां समझ गये जमाने की

कहना नहीं था, इसलिये छिपाई।

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अपनी तकदीर से ज्यादा नहीं मिलेगा

यह पहले ही हमें पता था।

बीच में दलाल कमीशन मांगेंगे

या अमीर हक मारेंगे

इसका आभास न था।

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रात के समय शराब  में बह जाते हैं

दिन में भी वह प्यासे नहीं रहते

हर पल दूसरों के हक पी जाते हैं।

अपने लिये जुटा लेते हैं समंदर

दूसरों के हिस्से में

एक बूंद पानी भी हो

यह नहीं सह पाते हैं।

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Jan 24, 2010

केवल दस्तखत का काम किया-हिन्दी शायरियां (kewal dastkhat ka kam-hindi shayriyan)

वफा हम सभी से निभाते रहे

क्योंकि गद्दारी का नफा पता न था।

सोचते थे लोग तारीफ करेंगे हमारी

लिखेंगे अल्हड़ों में नाम, पता न था।

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राहगीरों को दी हमेशा सिर पर छांव

जब तक पेड़ उस सड़क पर खड़ा था।

लोहे के काफिलों के लिये कम पड़ा रास्ता

कट गया, अब पत्थर का होटल खड़ा था।

-------

जुल्म, भूख और बेरहमी कभी

इस जहां से खत्म नहीं हो सकती।

उनसे लड़ने के नारे सुनना अच्छा लगता है

गरीबी बुरी, पर महफिल में खूब फबती।

--------

हमारे शब्दों को उन्होंने अपना बनाया

बस, अपना नाम ही उनके साथ सजा लिया।

उनकी कलम में स्याही कम रही हमेशा

इसलिये उससे केवल दस्तखत का काम किया।

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Dec 12, 2009

ज़माने की बैचेनी बढ़ा देता है-हिन्दी शायरी (zamane ki baicheni-hindi shayri)

 अपनी रोटी पकाकर

मेहननकश  इंसान आग बुझा देता है

पर जिस शैतान ने

लालच को लक्ष्य बना लिया

वह पूरे जमाने को

झौंक कर झुलसा देता है।
भर जाता है दो रोटी से पेट,

पर खातों में अपनी रकम को

बढ़ते देखकर भी नहीं सो रहा सेठ,

अपने पास जमा सोने की ईंटों से भी

नहीं भर रहा है दिल उसका

तिनके से बनी झौंपड़ी को खाक कर

उसकी राख में रुपया तलाश लेता है।
फरिश्ते और शैतान

कोई आसमान में नहीं बसते,

इंसानी चेहरों में वह भी संवरते,

पसीने की आग से जो रोटी खा रहे हैं,

अपने दर्द और खुशियों के साथ

जीवन बिता रहे हैं,

मुफ्त में जिनको मिली है विरासत,

जंग की ही करते हैं सियासत,

बनते हैं जो जमाने के खैरख्वाह,

नाम के हैं वह फरिश्ते

उनके आशियाने हैं

इंसानी जज़्बातों की कत्लगाह,

ऐसा हर शैतान

अपनी जिंदगी  के चैन के लिये

जमाने की बैचनी बढ़ा देता है।
 
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Dec 6, 2009

हादसों की तारीख-हिन्दी साहित्य क्षणिकायें (hadson ki tarikh-hindi sahitya kavita)

 वह हर रोज तारीखों पर लिखते हैं।

इसलिए कलेंडर में हमेशा झांकते दिखते  हैं।

बाजार के सौदागरों के लिए दलालों ने

अपने कारिंदों के सहारे

जमाने में किये हैं इतने हादसे कि

पेशेवर कलमकारों के शब्द

उन्हीं पर कहीं रोते तो कहीं हंसते मिलते हैं।

----------

हम हादसों की तारीखें भूल जाते हैं

पर शब्दों के सौदागर

हर तारीख को कब्र से ढूंढ कर लाते हैं।

भूल न जाये जमाना उनके साथ जमाना

शब्दों की जादूगरी और उनका नाम

इसलिये हर रोज की तारीख का

हादसा याद दिलाते हैं।


 
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Nov 29, 2009

आम इंसान की गलती-व्यंग कविता (mistake of comman man-hindi satire poem)

मु्फ्त की हवाओं से
जिंदगी की सांस चलती,
पानी से बुझती प्यास की आग
जब गले में जलती।
सूरज की धूप अपने स्पर्श से
देह को मलती।
कुदरत से जिंदगी के साथ मिले मुफ्त
तोहफों की इंसान कहां करता कदर,
ख्वाब करते हैं उसे दर-ब-दर,
रेत में ढूंढता है पत्थर की कोड़ियां,
भरता है उससे अपनी बोरियां,
आंखों से देखने को आतुर है सोना
नींद बेचकर खरीदता है बिछौना,
कागज के नोटों का बना लिया ढेर,
मन को समझाता है
पूजकर पत्थर के शेर,
लाचार क्या कर सकता है
इसके अलावा,
आजाद अक्ल मिली है
पर साथ मिला जरूरतों की
गुलामी का छलावा,
अपना सोचने में लगती है देर,
अक्लमंद भी सजाते हैं सामने
सपनों का अंधेर
भला कहां है आम इंसान की गलती।।

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Nov 16, 2009

कायरता और बहादुरी-हिंदी कविता (kayrata aur bahaduri-hindi kavita)

सच कहते हैं
जिंदगी के फैसले
कभी जंग से नहीं होते।
पर्दे के पीछे
तय हो जाते फैसले ले देकर
कटवाते है वही सिर अपना
जो इससे बेखबर होते।
कहीं गद्दारी तो
कही वफदारी बिक जाती है
दौलत और शौहरत वह शय है
जो ईमान भी खरीद लाती है
खून खराबे के आदी होते कायर
बहादुर तो जमाने के साथ
बांटकर खाने वाले होते।
जिंदगी की जंग जीतते हैं वही लोग
जो जमाने का दिल जीत चुके होते।

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Nov 12, 2009

इज्जतदार लोग-व्यंग्य कविता (ijjatdar log-vyangya kavita)

इंसान के चेहरे बदल जाते हैं
नहीं बदलती चाल।
खून खराबा करने वाले
हाथ बदल जाते हैं
वही रहती तलवार और ढाल।

इंसान से ही उगे इंसान
संभालते उसका खानदान
जमाने को काबू करने का मिला जिनको वरदान,
पांव हमेशा पेट की तरफ ही मुड़ता है,
दौलत से ही किस्मत का साथ जुड़ता है,
बड़े आदमी करते दिखावा
जमाने का भला करने का
मगर लूटते हैं गरीब का दान,
छोटे आदमी के हिस्से आता है अपमान,
थामे अपनी अगली पीढ़ी का झंडा
लुटेरे लूट रहे जमाने को
लगे हैं कमाने को
अपनी दौलत शौहरत देकर
अपनी औलाद में जिंदा
रहने की ख्वाहिश पाले
मौत की सोच पर लगा ताले
दौड़ जा रहे हैं इज्जतदार लोग,
लिये साथ पाप और रोग
वाह री कुदरत! तेरा कमाल।


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Oct 31, 2009

जंग और सत्संग-हिंदी कविता (zang aur satsang-hindi kavita)


धर्म के लिए अब नहीं होता सत्संग
हर कोई लड़ रहा है, उसके नाम पर जंग.
किताबों के शब्द का सच
अब तलवार से बयान किया जाता
तय किये जाते हैं अब धार्मिक रंग.

एक ढूँढता दूसरे के किताब के दोष
ताकि बढ़ा सके वह ज़माने का रोष
दूसरा दिखाता पहले की किताब में
अतार्किक शब्दों का भंडार
जमाने के लिए अपना धर्म व्यापार
बयानों का है अपना अपना ढंग..

धर्म का मर्म कौन जानना चाहता है
जो किताबें पढ़कर उसे समझा जाए
पर उसके बिना भी नहीं जमता विद्वता का रंग,
इसलिए सभी ने गढ़ ली अपनी परिभाषाएं,
पहले बढ़ाते लोगों की अव्यक्त अभिलाषाएं,
फिर उपदेश बेचकर लाभ कमाएं,
इंसान चाहे कितने भी पत्थर जुटा ले
लोहे और लकडी के सामान भी
उसका पेट भर सकते हैं
पर मन में अव्यक्त भाव कहीं
व्यक्त होने के लिए तड़पता हैं
जिसका धर्म के साथ बड़ी सहजता से होता संग.
सब चीजों के तरह उसके भी सौदागर हैं
अव्यक्त को व्यक्त करने का आता जिनको ढंग..
कहीं वह कराते सत्संग
कहीं कराते जंग..
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Oct 18, 2009

बड़े दरख्त और इंसान-हिंदी व्यंग्य कविता (darkht aur insan-hindi vyangya kavita)

बड़े दरख्त अपने नीचे
छोटे पौद्यों को नहीं पनपने देते.
उनके मन की हलचल को
चेहरे पर पढना हो तो
ऐसे इंसानों को देख लो
जो गुजार रहे हैं जिंदगी ख़ास शख्सियत बनकर,
खड़े हैं दरख्त की तरह तनकर,
अपनी कम लायकी और औकात की
असलियत उनके जेहन को करती है तंग,
चेहरे का उड़ जाता है रंग,
कोई दूसरा आकर बराबरी न करे
इसी सोच में आँखे आकाश की ओर कर लेते.
अपने से बड़े की करते चाटुकारिता
छोटे को देखकर भी करते अनदेखा
अपने अन्दर बैठे उनके खौफ
खुद को ही घेर लेते.
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Oct 14, 2009

नापसंद लेखक, पसंदीदा आशिक-हिन्दी हास्य कविता (rejected writer-hindi hasya kavita)

आशिक ने अपनी माशुका को
इंटरनेट पर अपने को हिट दिखाने के लिये लिए
अपने ब्लाग पर
पसंद नापसंद का स्तंभ
एक तरफ लगाया।
पहले खुद ही पसंद पर किल्क कर
पाठ को ऊपर चढ़ाता था
पर हर पाठक मूंह फेर जाता था
नापसंद के विकल्प को उसने लगाया।
अपने पाठों पर फिर तो
फिकरों की बरसात होती पाया
पसंद से कोई नहीं पूछता था
पहले जिन पाठों को
नापसंद ने उनको भी ऊंचा पहुंचाया।
उसने अपने ब्लाग का दर्शन
अपनी माशुका को भी कराया।
देखते ही वह बिफरी
और बोली
‘‘यह क्या बकवाद लिखते हो
कवि कम फूहड़ अधिक दिखते हो
शर्म आयेगी अगर अब
मैंने यह ब्लाग अपनी सहेलियों को दिखाया।
हटा दो यह सब
नहीं तो भूल जाना अपने इश्क को
दुबारा अगर इसे लगाया।’’

सुनकर आशिक बोला
‘‘अरे, अपने कीबोर्ड पर
घिसते घिसते जन्म गंवाया
पर कभी इतना हिट नहीं पाया।
खुद ही पसंद बटन पर
उंगली पीट पीट कर
अपने पाठ किसी तरह चमकाये
पर पाठक उसे देखने भी नहीं आये।
इस नपसंद ने बिना कुछ किये
इतने सारे पाठक जुटाये।
तुम इस जमाने को नहीं जानती
आज की जनता गुलाम है
खास लोगों के चेहरे देखने
और उनका लिखा पढ़ने के लिये
आम आदमी को वह कुछ नहीं मानती
आम कवि जब चमकता है
दूसरा उसे देखकर बहकता है
पसंद के नाम सभी मूंह फुलाते
कोई नापसंद हो उस पर मुस्कराते
पहरे में रहते बड़े बड़े लोग
इसलिये कोई कुछ नहीं कर पाता
अपने जैसा मिल जाये कोई कवि
उस अपनी कुंठा हर कोई उतार जाता
हिट देखकर सभी ने अनदेखा किया
नापसंद देखकर उनको भी मजा आया।
ज्यादा हिट मिलें इसलिये ही
यह नापसंद चिपकाया।
अरे, हमें क्या
इंटरनेट पर हिट मिलने चाहिये
नायक को मिलता है सब
पर खलनायक भी नहीं होता खाली
यह देखना चाहिये
मैं पसंद से जो ना पा सका
नापसंद से पाया।’’

इधर माशुका ने सोचा
‘मुझे क्या करना
आजकल तो करती हैं
लड़कियां बदमाशों से इश्क
मैंने नहीं लिया यह रिस्क
इसे नापसंद देखकर
दूसरी लड़कियां डोरे नहीं डालेंगी
क्या हुआ यह नापसंद लेखक
मेरा पसंदीदा आशिक है
इसमें कुछ बुरा भी समझ में नहीं आया।’


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Oct 10, 2009

छोटा रहा दिल और जिगर-व्यंग्य शायरी (Dil aur Zigar-hindi shayri)

इंसान की नज़र में ही बसते, झूठे चमकते शिखर
उस पर चढ़ने को लालायित है, सभी का जिगर।
ऊंची जगह पर पहुंचे, जो नहीं है उसके लायक
बदचलनों का हुआ बाजार पर कब्जा, जंग के बिगर।
कमजोर को हमेशा डराते, हथियारबंद होकर बड़े लोग
दहशतगर्दों के सामने लगती खुद उनको जान की फिकर।
पानी की बहती धार को पत्थर से रोकते, बेचने के वास्ते
तेल के व्यापार मे फायदे में भी आता है उनका जिकर।
कहलाते अमन के पहरेदार, मुजरिमों को देते पनाह
जमाने की जान क्या बचायेंगे, कर लें अपनी फिकर।
‘दीपक बापु’ असलियत जिनकी बौनी रही हमेशा
बड़ी जगहों पर पहुंचे पर छोटा रहा दिल और जिगर।।

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Sep 11, 2009

फिल्म और क्रिकेट का रिश्ता-हास्य कविता (film aur cricket-hasya kavita)

नायिका ने बहुत किया अभिनय
पर चलचित्रों में सफलता का
दौर नहीं चल पाया।
नंबर वन की दौड़ में न पहुंचने पर
उसने प्रेमी निदेशक से अफसोस जताया।
तब वह बोला-
‘‘लगता है कि अपना नाम
फिल्म बाजार में ऐसे नहीं चलेगा,
केवल किसी अभिनेता के साथ
तुम्हारे नकली इश्क से मामला नहीं बनेगा,
मेरे अंदर एक नया विचार चल रहा है,
चलचित्र जगत की ऊंचाई पर तुम पहुंचो
यह सपना मेरे अंदर भी पल रहा है,
जिस तरह क्रिकेट और फिल्म का
रिश्ता आपस में बन गया है
उसका लाभ उठाओ,
किसी कुंवारे क्रिकेट खिलाड़ी से
इश्क का प्रचार करवाओ,
घूमते हुए फोटो खिंचवाना और
किसी मैच में जाकर उसके लिये
बजाना जोर से तालियां,
मेरे से प्रेम की बात कोई करे तो
देना चाहे मुझे खुलेआम गालियां,
सर्वशक्तिमान ने चाहा तो
होगी कृपा उनकी
तुम्हारे साथ होगा सफलता का साया।
चलचित्रों से पिटने की हट जायेगी छाया।
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Sep 7, 2009

मन की आंखें-हिंदी कविता (eye of heart-hindi sahityak kavita)

दिल में कुछ
दिमाग में कुछ
जुबां से दूसरे बोल ही निकल आते हैं।
दिल का दिमाग से
दिमाग का जुबां से रिश्ता
भला कितने लोग जान पाते हैं।
दूसरों से संवाद क्या करेंगे
अपने ही भाव नहीं पढ़ पाते हैं।
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अर्थहीन शब्द
औपचारिक संवाद
सुनने की आदत हो गयी है।
दोस्ती और रिश्तों की भीड़ में
आत्मीयता ढूंढती थक चुकीं
मन की आंखें, अब सो गयी हैं।

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Sep 2, 2009

राहत का उदघाटन करायेंगे-हिंदी हास्य कविता

बेटे ने मां से कहा
‘‘मां, मुझे पैसा दो तो
कार खरीद कर लाऊं
कालिज उससे जाकर अपनी छबि बनाऊं
पापा, नोटों की भरी पेटी रखकर
दौरे पर गये हैं
मुझे अपने दोस्तों में रुतवा दिखाना है
क्योंकि सभी नये हैं
पता नहीं पापा कब आयेंगे
तब तक अपनी इस मोटर साइकिल पर जाऊंगा तो
सभी मेरी हंसी उड़ायेंगे।’

सुनकर मां गद्गद्वाणी में बोली
‘बेटा, तुम्हारे पापा समाज सेवक है
सभी जानते हैं
उनको इसलिये मानते हैं
यह पेटी उन्हीं चंदे के नोटों से भरी है
जो सूखा राहत बांटने के लिये यहां धरी है
माल तो यह सभी अपना है
सूखा पीड़ितों के लिये तो बस एक सपना है
पर तुम्हारे पापा कागज पत्रक पूरे करने के लिये
दौरे पर गये हैं
उनका नया होना जरूरी है
क्योंकि यह नोट भी नये हैं
यह दौरा कर वह राहत बंटवा रहे हैं
सच तो यह है कि
बांट सकें जिनको
उन मरे लोगों के नाम छंटवा रहे हैं
अगर अभी पैसा खर्च कर ले आओगे
अपने पापा पर शक की सुई घुमाओगे
इसलिये आने दो उनको
इस भरी पेटी से तुम्हारी कार का पैसा निकालकर
तुम्हारे हाथों से इसका
और तुम्हारी राहत का उद्घाटन करायेंगे।

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