Dec 16, 2010

फ्लेट सोसायटी भारत का पूरा समाज नहीं है-हिन्दी लेख (flat society in not indian society-hindi article)

क्या हमारे यहां फ्लैट सोसायटी ही संपूर्ण समाज बन गयी है? सीधा जवाब है नहीं! मगर टीवी चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा व्यवसायिक प्रकाशनों के कार्यक्रमों या सृजन के स्वरूप से तो ऐसा ही लगता है। स्थिति यह है कि सब टीवी चैनल पर प्रसारित होने वाले मुख्य समय के दौरान हास्य व्यंग्य कार्यक्रमों में लगातार तीन चार कार्यक्रम फ्लैट सोसायटी के सचिवों या रहवासियों के कथानकों पर आधारित होते हैं। उसकी क्या कहें अन्य चैनलों पर भी सामाजिक तथा जासूसी धारावाहिकों में भी इस फ्लेट सोसायटी की पृष्ठभूमि को ही चुनकर कहानियां लिखवाई जा रही हैं।
पता नहीं बड़े शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी समाज को लेकर क्या सोचते हैं? यह भी पता नहीं कि छोटे शहरों में विचर रहे बड़े बुद्धिजीवी अपने यहां की जीवन शैली पर क्या दृष्टिकोण रखते हैं? हमारे दिमाग में यह प्रश्न देश के समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों पर जहां लेखक की रचनाओं के आधार दिखने वाले प्रकाशन तथा कार्यक्रमों का सृजन होता है उनकी विषय सामग्री को लेकर उठता ही है। चाहे हो या नहीं पर यह सच है कि जहां मौलिक रचना है वहां साहित्य की उपस्थिति का आभास होता है। अब हम उसकी उच्च या निम्न कोटि तथा उसमें समाहित सामग्री में समाज के क्षेत्र को लेकर सवाल उठा सकते हैं पर उसे साहित्य मानने से इंकार नहंी कर सकते। ऐसे में जब हम यह मानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है तब टीवी समाचार चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं एवं व्यवसायिक प्रकाशनों की सृजन सामग्री को देखकर तो यह लगता है कि यह दर्पण झूठ भी बोल सकता है।
संक्षिप्त में हम भारत की स्थिति का अवलोकन करें। वैसे तो आर्थिक रूप से हमारे यहां तीन श्रेणियां हैं, उच्च, मध्यम तथा निम्न वर्ग! इसमें भी मध्यम वर्ग में भी अब इस तरह की तीन श्रेणियां बन गयीं हैं। निम्न वर्ग में भी दो श्रेणियां हैं, गरीब और गरीबी की रेखा से नीचे। उच्च वर्ग की श्रेणी पर कोई विवाद नहीं है क्योंकि उसके मायने भी ऊंचे हैं और कम से कम हम जैसा आदमी उसकी व्याख्या करने की औकात नहीं रखता। हमारे हिसाब से तो जिसका पांव ही पूरे दिन जमीन पर न पड़ता हो, कार से चलते हुए उसे केवल स्वर्णिम मय दृश्य ही दिखाई देते हों और जो गरीब के लिये सोचने के साथ ही गरीबी से लड़ने का केवल दंभ भरता हो वही ऊंचा है। तय बात है कि ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है। टीवी चैनलों पर बहुत दिन तक इसी उच्च वर्ग की पृष्ठभूमि पर सास बहु की कहानियों वाले धारावाहिक चले और अब भी चल रहे हैं। अगर विदेशों के लोग इसे देखते होंगे तो उनको तो यह लगता होगा कि भारत में इसी तरह के कारपोरेट घर होंगे। बड़े शहरों में जो बुद्धिजीवी हैं उनका समय ही लंबी दूरियों की यात्रा करने में लगता है। उसके बाद फिर उनको सम्मेलन करने होते हैं। ऐसे में वह शायद ही मध्यप्रदेश के किसी गांव की स्थिति पर विचार कर पाते होंगे, कल्पना करना तो दूर की बात है जो कहानियों, व्यंग्यों या कविताओं के लिए जरूरी होती है। छोटे शहरों के नव बुद्धिजीवी बड़े शहर में जाकर प्रसिद्ध बुद्धिजीवी बनने के चिंतन में अपने आसपास का वातावरण देखते जरूर हैं पर उसे सृजन की दृष्टि से अपनी बुद्धि में स्थान नहंी देते। वैसे छोटे और मध्यम शहरों के अब वातावरण में भी विरोधाभास है। अनेक जगह फ्लैट बने हैं तो वहीं स्वतंत्र रूप से मध्यमवर्गीय लोगों के मकान भी हैं। इन छोटे और मध्यम शहरों में आज भी ऐसे लोग हैं जो फ्लैट में रहना पसंद नहीं करते। इसके बावजूद कुछ लोग हैं जो फ्लैट में रहना चाहते हैं। यही फ्लैट वाली सोसायटी अब इस देश का हिस्सा है पर उतना नहीं जितना हमारे टीवी चैनल, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य प्रकाशनों के कार्यक्रम या सृजन में दिखाई देता है।
बहुत कम बुद्धिजीवी लोग हैं जो छोटे और मध्यम शहरों में रहने वाले मध्यम और निम्न श्रेणी के नागरिकों की मानसिकता पर विचार करते होंगे। मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी हैं पर यह भी बहस का विषय है! भारत की आर्थिक राजधानी कोई एक शहर नहीं हो सकता भले ही वहां दो करोड़ लोग रहते हों! भारत की राजधानियां तो समस्त खेत और खलिहान हैं। जहां के असली नागरिक मज़दूर तथा बेबस लोग हैं। यही लोग हम जैसे मध्यम तथा निम्न लोगों का वह सहारा हैं जिसकी कल्पना तक कोई नहीं करता। जब हम प्रचार माध्यमों पर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि दूसरे देश को देख रहे हैं। जब ज़मीन पर चलते हुए सोचते हैं तो लगता है कि हमारे देश में वह सब नहीं होता जो सृजन के नाम पर हमारे बुद्धिजीवी परोस रहे हैं। जिन्हें यह बात समझ में न आये वह पांच सौ या हजार का नोट लेकर सड़क पर चिंतन करें। वह पेट्रोल पंप, कपड़े, ज्वेलरी तथा इलेक्ट्रोनिक सामान की दुकान पर चल जायेगा पर सब्जी मंडी, पंचर की दुकान या दूध की दुकान पर वह परदेसी मुद्रा की तरह दिखने लगता है। साइकिल में एक रुपये तथा स्कूटर में दो रुपये की हवा भराते हुए बरसों हो गये। पंचर का रेट बड़ा है पर महंगाई के अनुपात में कम! कहने का मतलब है कि जिन आवश्यकताओं का संबंध प्रत्यक्ष रूप से श्रम से है उनकी पूर्ति का मोल अब भी इतना कम है कि पांच सौ या हज़ार का नोट वहां प्रभावहीन हो जाता है। उससे भी ज्यादा यह कि छोटे व्यवसायी इतना बड़ा नोट लेने में डरते हैं क्योंकि नकली होने पर उनका एक या दो दिन नहीं वरन् सप्ताह भर की कमाई का नुक्सान हो जाता है। क्या कभी किसी ने इस अंतर्द्वंद्व को देखने का प्रयास किया है?
उस दिन एक मित्र मिला। उसने पांच साल फ्लेट खरीदा था! उसके मुहूर्त पर हम भी गये। उसने हमारे मकान का हाल हवाल पूछा तो हमने जवाब दिया कि ‘यथावत है, अभी उसे पूरा बनाने का सौभाग्य नहीं मिला! सोच रहे हैं कि तुम्हारी तरह ही कहीं फ्लेट खरीद लें।’
उसने कहा-‘मेरी सलाह है कि तुम उसे ही पूरा बनवाओ! यह फ्लेट सिस्टम बेकार है, क्योंकि वह अपने स्वामित्व से पैदा होने वाला आत्मविश्वास साथ नहीं रहता।’
उस मित्र से अधिक आत्मीयता नहीं है पर उस दिन अपने पुराने मकान मालिक के पास फ्लेट में जाने का अवसर मिला। मित्र न होने के बावजूद उनसे हमारी आत्मीयता है। अब वह मकान बेचकर फ्लेट में रहने लगे हैं। यह आत्मीयता इतनी अधिक है कि हम पिछले पंद्रह वर्षो में शायद सात आठ बार मिले होंगे पर जब मुलाकत होती है तो ऐसा नहीं लगता कि यह अंतराल उसे कम नहीं कर पाया। हम उनके फ्लेट में पहुंचे तो आसपास स्वतंत्र आवास भी बने देखकर अज़ीब लगा। पांचवीं मंजिल पर खड़े होकर देखने से वह स्वतंत्र आवास भले ही अज़ीब लगे पर उन आत्मीय सज्जन से वार्तालाप में फ्लेट सोसायटी का भी आभास हुआ। सोसायटी का सचिव या अध्यक्ष अगर ठीक न हुआ तो अनेक परेशानियां होती हैं। कोई संयुक्त निर्माण कराना हो तो उस पर विवाद होता ही है। इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने फ्लेट लिये हैं पर वह किराये पर चलाते हैं और वहां अगर कोई ऐसा आदमी आ जाये जो प्रतिकूल प्रवृत्ति का हो तो पूरी सोसायटी के लिये संकट खड़ा हो जाता है। कोई मकान बेचकर जाता है तो सोसायटी वालों को यह चिंता होती है कि पता नहीं अब किस तरह का आदमी आयेगा। पूरे पांच घंटे तक वहां गुजारे पर ऐसा लगा कि फ्लेट सिस्टम कम से कम हम जैसे स्वतंत्र और स्वछंद आदमी के लिये अनुकूल नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि इस फ्लेट सिस्टम पर कोई कहानी अपने से लिखते हुए बनेगी भी नहीं, क्योंकि जहां समाज के बहुत बड़े भाग को संबोधित करते हुए लिखने की आदत हो वहां फ्लेट सोसायटी की सोच ही संकुचित मानसिकता के साथ ही चिंतन क्षमता कम होने का प्रमाण लगती है।
जब हम अपने प्रचार माध्यमों में इसी फ्लेट प्रणाली को लेकर सृजन या कार्यक्रम पर दृष्टिपात करते हैं तो लगता है कि जैसे कहीं से हम भटक कर सोच रहे हैं। ऐसे में हम जब भारतीय समाज की बात करते हैं तो लगता है कि अब उसका कोई एक स्वरूप नहीं है। बाहर से एक दिखने वाला यह समाज अंदर से इतना खोखला हो चुका है कि उसके बुद्धिजीवी भी उसे देखना या दिखाना नहीं चाहते। यह अलग बात है कि अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर ही हम उसे देख सकते हैं पर भौतिक आधार पर इसके इतने खंड हो चुके हैं कि इसके लिये बहुत सारा लिखना पड़ेगा। इस पर इतनी कहानियां बन जायेंगी कि फ्लेट सोसायटी के सचिवों पर आधारित कथानकों पर सोचने वाले उसकी कल्पना तक नहीं कर पायेंगे क्योंकि उनके लिये यह असुविधाजनक मार्ग होगा।
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Dec 9, 2010

भूख और जज़्बात-हिन्दी शायरी (bhukh aur jazbat-hindi shayari)

जिंदा रहने के लिये
मरते दम तक वह दौलत का ढेर लगायेंगे,
जिस भूख से पड़ा नहीं कभी वास्ता
उसके आने के शक में
भागते ही जायेंगे।
उनसे हक इंसाफ की
उम्मीद करना बेकार है
अपने खौफ से भागते हुए
जिंदगी गुजारने वाले
अपने पांव तले
आम इंसानों के जज़्बात
यूं ही कुचलते जायेंगे।
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जिनसे चाहा है आसरा जान का
वही छुरा पीठ में घौंप जाते हैं,
फिर अपनी मज़बूरी जताते हैं।
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Dec 5, 2010

पहुंच गये जब मंजिल पर-हिन्दी शायरी (manzil-hindi shayari)

अपने जिंदा इंसाने होने का
अहसास भी अब डराने लगा है,
ज़माने की सच्ची मोहब्बत हो गयी है
लकड़ी, लोहे, और प्लास्टिक के सामनों से
इसलिये किसी की हमदर्दी भी
झूठी होने का ख्याल सताने लगा है।
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ज़माने को अब ख्यालों से
बस में नहीं किया जाता है,
चंद अफसाने सुना दो
उकता चुके दिल को बहलाने के लिये
लोगों का झुंड चला आता है।
अक्ल की बात करो या नहीं
बस, दिल्लगी करना आना चाहिए,
भूखे के रोटी का इंतज़ाम
ऊपर वाला कर लेगा,
अपनी जिंदगी की ऐश के लिये
कोई भी ख्वाब बेचकर, तरक्की पाईये,
पहुंच गये जब मंजिल पर
दुश्मन भी सलाम ठोकने चला आता है।
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Nov 21, 2010

लघु अखबारों के प्रकाशन की आवश्यकता-हिन्दी लेख (laghu akhabaron ki avashkata-hindi lekh)

दक्षिण भारत के लोगों से प्रबंध कौशल के साथ रणनीतियां सीखने की आवश्यकता है। दरअसल भारत में यह पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण का भेद करने की बात कुछ लोगों को अज़ीब लगे पर जब हम गुणों की बात करें तो यह बुरा नहीं है। दरअसल कुछ दिन पहले ही एक दक्षिण भारतीय मित्र से चर्चा हुई थी। आज अचानक एक दक्षिण भारतीय चैनल की विवादास्पद खबर देखकर वह याद आयी। यह आलेख पूरी तरह से उसी चर्चा पर आधारित है।
उस मित्र ने बताया कि दक्षिण भारत में जितने भी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा फिल्मी क्षेत्र के शिखर पुरुष हैं उनके पास अपने निजी टीवी चैनल और अखबार हैं। वह सभी उसके माध्यम से अपना प्रचार करते हैं। ऐसे में यह देखकर हैरानी है कि उत्तर, पश्चिम, मध्य तथा पूर्व क्षेत्र के शिखर पुरुषों के पास ऐसे रत्न क्यों नहीं है? प्रसंगवश एक मित्र ब्लाग लेखक का ब्लाग भी नज़र आया जिसमें अपनी विचाराधारा तथा उससे जुड़े संगठनों से अपना टीवी चैनल न शुरु करने पर उसने सवाल उठाया था। दरअसल आज के युग में जो विचाराधाराओं और संगठनों की आड़ में काम हो रहा है उसके अनुसार संबंधित लोगों के पास इतना धन तो होना चाहिए कि वह अपना निजी टीवी चैनल और अखबार निकाल सकें। आजकल तो धर्म और समाज सेवा भी पेशा हो गया है तब धन की कमी की बात तो मानी ही नहीं जा सकती। ऐसे में तब यह भी विचार आता है कि धर्म और समाज से जुड़े उत्तर और मध्य क्षेत्रीय संगठन तथा उनके शिखर पुरुष खुलकर अपना चैनल क्यों नहीं चलाते? ऐसा लगता है यह लोग नहीं चाहते कि तकनीकी, साहित्य तथा रचना की दृष्टि से समान जातीय, भाषाई या धार्मिक रूप से मध्यमवर्गीय सदस्यों को उभरने नहीं दिया जाये। सच तो यह है कि इनका काम इसके बिना चलने वाला भी नहीं है चाहे जितनी सिद्धांतों की दुहाई देते रहें। यह लोग भूल गये हैं कि मध्यम वर्ग ही अपने धार्मिक तथा सामाजिक संगठन तथा विचाराधारा का संवाहक है जो अब उनसे निराश हो गया है। अगर आप कोई सामूहिक आंदोलन या अभियान शुरु करना चाहते हैं तो न केवल आपके पास अपना एक चैनल होना चाहिए बल्कि इंटरनेट पर भी बकायदा समर्थन होना चाहिए। वरना तो यह माना जायेगा कि आपके प्रयास कभी सफल होने की संभावना नहीं है।
अब आते हैं हिन्दी ब्लागरों की बात पर! लोग झूठ कहते हैं कि हिन्दी ब्लाग कोई नहीं पढ़ता। सच तो यह है कि जिनको हिन्दी में बौद्धिक व्यवसाय करना है उनके लिये अब हिन्दी ब्लाग और वेबसाईट माईबाप हो गये हैं। वह कभी कभी तो पूरा पाठ और कभी विचार चुरा लेते हैं इस लेखक ने कभी यह दावा नहीं किया वह हिन्दी का बहुत बड़ा ब्लागर है पर इतना तय है कि बाज़ार और प्रचार माध्यमों से जुड़े लोग कहीं न कहीं उसके ब्लाग पढ़ते हैं या उसकी कॉपी उनके पास पहुंचती है।
यह बात एक बिग बॉस के अपनी प्रेमिका की पिटाई के समाचार से पता चली जब एक टीवी चैनल उसमें फिक्सिंग का संदेह जाहिर कर रहा था। हर बात में फिक्ंिसग देखने पर इस ब्लाग लेखक ने ही शुरु किया था वरना टीवी चैनल कब इसका उल्लेख कर पाते थे। प्रसंगवश एक टीवी चैनल पर बाज़ार और उसके प्रभाव पर चर्चा हुई और ऐसा लग रहा था कि विषय चयन में इस ब्लाग लेखक का ही प्रभाव था क्योंकि उसका एक कर्मी यहां ब्लाग भी चलाता है और प्रसिद्ध है। श्रीगीता में समाजवाद पर उसकी टिप्पणी भी आयी थी इसका मतलब वह इस ब्लाग को पढ़ता है। सुना है आजकल वह तकलीफ में है और हमारी कामना है कि भगवान उसे उबारे।
इस दावे के प्रमाण में अपने पास कोई प्रमाण नहीं है। हां, तो बात आगे बढ़ायें।
हमने अपने मित्र से कहा कि ‘हिन्दी ब्लाग को मोहल्ले नुमा अखबार के रूप में काग़ज पर प्रकाशित किया जाये तो कैसा रहे?’
वह तत्काल बोला-‘‘यह हो सकता है क्योंकि हमारे दक्षिण भारत में ऐसे बहुत से अखबार हैं जो केवल मोहल्ला स्तर पर ही चलते हैं। वह अपनी कालोनियों और मुहल्लों के व्यवसायियों के विज्ञापन प्रकाशित भी करते हैं।’’
हमें शक हुआ कि कहीं ऐसे समाचार पत्र वहां की क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लाग लेखक तो नहीं चला रहे या हो सकता है कि वह कोई वेबसाईट भी चलाते हों। बहरहाल इस बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
अब आ जायें असली बात पर! हिन्दी ब्लाग लिखने वालों को अब दो तरह से सक्रिय रहकर काम करना चाहिए। वह परंपरागत प्रकाशन जगत से तो कोई आशा करे नहीं पर उनका इसके बिना काम भी नहीं चलने वाला। हमारे मित्र ने बताया कि मोहल्ला या क्षेत्रीय स्तर पर छपने वाले उन अखबारों को विज्ञापन भी मिलते हैं। ऐसे में जिन हिन्दी लेखकों के पास समय और कौशल है वह स्थानीय सीमित क्षेत्र के समाचारों को अपने ब्लाग पर डालें। पूरे पृष्ठ का खाका ब्लाग पर तैयार करें। जिसमें अपने विज्ञापन दाता को अंतर्जाल तथा काग़ज पर प्रकाश का लाभ देकर अपनी कमाई का साधन तथा समाज सेवा का माध्यम बनायें। ऐसे जो ब्लाग लेखक हैं वह एक बात का ध्यान रखें कि अगर किसी की रचना दूसरे से लें तो उसका परिचय दें वरना विज्ञापन दाता और पाठक उनको चोर समझेंगे। यह बात ध्यान रखें कि बिना लेखक के नाम का लेख पाठक को संदेह में डाल देते हैं और आजकल के अनेक नये अखबार इसी कारण पिट रहे हैं। हम तो इसी से ही संतुष्ट हैं कि बस नाम छपना चाहिए। एक ब्लाग लेखक ने हमारी रचनायें छापी। आपत्ति की तो कहने लगा कि मेरा तो ब्लाग ही तमाम रचनाओं का संकलन है। अरे, भई तो नाम क्यों नहीं दे रहे। तुम्हारा ब्लाग है तो इसका मतलब यह नहीं है कि सारे ब्लाग तुुम्हारे बंधुआ हैं।
बड़े बड़े अखबार अपनी छवि खो रहे हैं। उनमें काम करने वालों को हिन्दी नहीं आती। हिन्दी पाठकों पर ही विश्वास नहीं है और देवनागरी में अंग्रेजी लिख रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि लोग अभी तक शहर तक सिमटे थे अब मोहल्ले तक ही सिमट गये हैं। मोहल्ले से मतलब है कि पूरा क्षेत्र न कि एक बाज़ार या कालोनी। सीधी बात कहें कि बृहद अखबार का नहीं लघु अखबार का समय आ गया है। आजकल छोटी छोटी प्रिंटिंग मशीने आ गयी हैं। ऐसे में अपने क्षेत्र के व्यवसायियों के विज्ञापन सस्ती दर पर छापकर उनको भी प्रसन्न किया जा सकता है। एक बात ध्यान रखें कि अपना ब्लाग जारी रखें क्योंकि यह लंबी लड़ाई का मामला है। जब विज्ञापन दाता और समाचार देने वाले अपना नाम अंतर्जाल पर देखेंगे तो खुश होंगे। हम यह काम स्वयं नहीं करने जा रहे पर यह योजना इसलिये प्रस्तुत कर रहे हैं क्योंकि ख्याल आ गया। याद रहे प्रकाशन उद्योग की व्यापकता केवल छलावा है और प्रचार माध्यमों ने जिस तरह संपर्क के माध्यमों के व्यापक किया है उतना ही सोच का दायरा सीमित हुआ है। ऐसे में यह मोहल्ला तक सीमित प्रकाशन जगत पनप सकता है अगर नये लोग इस पर विचार करें।
बात अगर टीवी चैनलों की करें तो अब लगने लगा है कि आगे चलकर टीवी चैनल देश की राजनीतिक स्थिति को बहुत प्रभावित करेंगे। अब अगर प्रकाशन जगत को देखें तो वहां भी या तो ब्लाग की बात होती या टीवी चैनलों की! कालांतर में यही दोनों माध्यम अभिव्यक्ति के माध्यम बनेंगे और ऐसे में लघु अखबार ही अपना अस्तित्व बना सकते हैं।
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Nov 5, 2010

इंडिया और भारत-हिंदी व्यंग्य कविता (india aur bharat-hindi poem)

महंगाई में दिवाली भी मना ली
होली भी मनाएंगे,
लूट जिनका पेशा हैं
उनके कारनामों पर कितना रोयेंगे,
कब तक अपनी खुशियाँ खोएंगे,
जब आयेगा हंसने का मौक़ा
खुद भी हंसेगे दूसरों को भी हंसाएंगे.

देश से लेकर विदेश तक
हैरान हैं लुटेरे और उनके दलाल,
क्यों नहीं हुआ देश बर्बाद
इसका है उनको मलाल,
वैलेन्टाईन डे और फ्रेंड्स डे के
नाम पर मिटाने की कोशिश
होती रही है देश की परंपराएं,
हो गए कुछ लोग अमीर,
गरीब हो गया उनका ज़मीर,
मगर जो गरीब रह गए हैं,
लुटते रहते हैं रोज
पर मेहनत के दम पर वह सब सह गए हैं,
ज़िन्दगी के रोज़मर्रा जंग में
लड़ते हुए भी
होली और दिवाली पर
खुशियाँ मनाएँ,
रौशन इंडिया में
अँधेरे में खड़े भारत को जगमगाएं..
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Oct 29, 2010

उसकी रोटी-हिन्दी व्यंग्य कविता (uski roti-hindi vyangya kavita)

बरसों से उस आदमी को
ठेले पर सामान ढोते देखा है,
गमी, सर्दी और बरसात से
बेखबर वह चलता रहा है।
युवावस्था से वृद्धावस्था तक
उसे जीवन एक संघर्ष की तरह जिया है,
अपना ढेर सारा दर्द उसे खुद पिया है,
उस जैसे लोगों को जगाने,
लिखे गये ढेर सारे गाने,
कई लिखी किताबें उसकी हमदर्दी के लिये,
फिर भी चलता रहा अपने साथ बेदर्दी किये,
बहुत सारे घोषणपत्र जारी हुए,
पर फिर नहीं किसी ने अपने वादे छुए,
उसके पेट भरने के लिये
बड़ी बड़ी बहसें होती हैं,
कई रुदालियां भी नकली आंसु लिये रोती हैं,
उसकी रोटी के नाम पर
कई रसोई घर सज गये,
कई इमारतों के मुहूर्त पर बैंड बज गये,
मगर वह खुले आसमान में खुद पलता रहा है।
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उनके घर में रोशनी इसलिये ज्यादा है,
क्योंकि दूसरों की लूट का भी हिस्सा आधा है,
अंधेरा छा गया है कई घरों में
तब उनके आंगन हुए रोशन
क्योंकि उन्होंने शहर चमकाने का
बेचा वादा है।
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Oct 17, 2010

सही पैमाना-हिन्दी व्यंग्य शायरी (sahi paimana-hindi vyangya shayri)

नैतिकता और बेईमान का पैमाना
पता नहीं कब तय किया जायेगा,
वरना तो हर इंसान सौ फीसदी शुद्धता के फेरे में
हमेशा ही अपने को अकेला पायेगा।
सफेद ख्याल में काली नीयत की मिलावट
सही पैमाना तय हो जाये
तब तोल तोलकर हर कोई
अपने जैसे लोग जुटायेगा।
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कत्ल करने वाला
कौन कातिल कौन पहरेदार
इसका भी पैमाना जब तय किया जायेगा,
तभी ज़माना रहेगा सुकून से
हर कत्ल पर शोर नहीं मचायेगा।
वैसे भी कातिल और पहरेदार
वर्दी पहनने लगे एक जैसी,
अक्लमंदों की भीड़ भी जुटी है वैसी,
कुछ इंसानों का बेकसूर मारने की
छूट भी मिल जाये तो कोई बात नहीं
बहसबाजों को भी अपने अपने हिसाब से
इंसानियत के पैमाने तय करने का
हक आसानी से मौका मिल जायेगा।
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Oct 3, 2010

जिंदगी और ज़ंग-हिन्दी कविता (zindagi aur jung-hindi poem)

जिनको शासन मिला है विरासत में
वह बड़े शासक बनना चाहते हैं,
जो शासित हैं
वह भी शासक बनने का ख्वाब पाले
जिंदगी में लड़े जा रहे हैं,
कमबख्त! जिस जिंदगी को
आसानी से जिया जा सकता है
लोग खुद जंग लड़कर
उसे मुश्किल बना रहे हैं।
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Sep 26, 2010

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ-हास्य कविता (loktantra ka chautha stambh-hasya kavita)

समाज सेवक ने कहा प्रचारक से
‘यार, तुम भी अज़ीब हो,
अक्ल से गरीब हो,
हम चला रहे गरीबों के साथ तुमको भी
करके अपनी मेहनत से समाज सेवा,
वरना नहीं होता कोई तुम्हारा भी नाम लेवा,
हमारी दम पर टिका है देश,
हमारी सुरक्षा व्यवस्था की वजह से
कोई नहीं आता तुमसे बदतमीजी से पेश,
फिर भी तुम हमारे भ्रष्टाचार के किस्से
क्यों सरेराह उछालते हो,
अरे, आज की अर्थव्यवस्था में
कुछ ऊंच नीच हो ही जाता है,
तुम क्यों हमसे बैर पालते हो,
बताओ हमारा तुम्हारा याराना कैसे चल पायेगा।’

सुनकर प्रचारक हंसा और बोला
‘क्या आज कहीं से लड़कर आये हो
या कहीं किसी भले के सौदे से कमीशन नहीं पाये हो,
हम प्रचारकों को आज के समाज का
चौथा स्तंभ कहा जाता है,
हमारा दोस्ताना समर्थन
तुम्हारा विरोध बहा ले जाता है,
फिर यह घोटाले भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिये नहीं
हिस्से के बंटवारा न होने पर
उजागर किये जाते हैं,
मिल जाये ठीक ठाक तो
जिंदा मामले दफनाये भी जाते हैं
तुम्हारे चमचों ने नहीं किया होगा
कहीं हिस्से का बंटवारा
चढ़ गया हो गया मेरे चेलों का इसलिये पारा,
इतना याराना मैंने तुमसे निभा दिया
कि ऐसी धौंस सहकर दिखा दिया,
बांध में पानी भर जाने पर
उसे छोड़ने की तरह
हिस्सा आगे बढ़ाते रहो
शहर डूब जाये पानी में
पर हम उसे हंसता दिखायेंगे
लोगों को भी सहनशीलता सिखायेंगे
पैसे की बाढ़ में बह जाने का
खतरा हमें नहीं सतायेगा,
वह तो रूप बदलकर आंकड़ों में
बैंक में चला जायेगा,
रुक गया तो
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
टूटकर तुम पर गिर जायेगा।’’
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Sep 20, 2010

कश्मीर में पत्थर फैंकने का व्यापार-हिन्दी व्यंग्य (kashmir mein patthar fainkne ka vyapar-hindi vyangya)

पत्रकारिता जगत के गुरुजी और लेखन जगत के एक मित्र ने ऐसा भूसा हमारे दिमाग में भर दिया है कि सम सामयिक घटनाओं पर लिखते ही नहीं बनता क्योंकि जब सभी विद्वान जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रों के आधार पर अपने विचार व्यक्त करते हैं तब हम सोचते हैं कि ‘आखिर, घटनाओं के पात्रों के पास धन कहां से आता है? हालत यह है कि किसी शहर में उपद्रव हो तो हम सोचते हैं कि आखिर दंगाईयों को धन कहां से मिला होगा? किसी टीवी चैनल पर कोई प्रतियोगिता हो तो भी हम अपने हिसाब से जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के आधार विचार करते हुए देखते हैं कि किस समूह का आदमी इसके लिये धन दे रहा है? संभव है यह हमारी संकुचित मानसिकता का प्रमाण हो पर जब कश्मीर में पैसा लेकर सुरक्षा कर्मियों पर पत्थर फैंकने और धर्म आधारित विरोधी नारे लगाने की बात हमारे सामने आई तो ऐसा लगा कि इस पर लिखना चाहिये।
हमने एक मित्र को बताया था कि हमें अंतर्जाल पर लिखने का एक पैसा भी नहीं मिलता तो वह यकीन नहीं कर रहा था। हमने बताया था कि कुछ तो पागल होते हैं जो मुफ्त में काम करते हैं तो कुछ धर्मात्मा भी होते हैं जो यह सोचकर अपना अभियान चलाये रहते हैं कि हमारा क्या जाता है?
यकीनन समाज में इन दोनों की संख्या नगण्य होती है और आज के युग में तो यह सोचना भी मूर्खता है कि कोई बिना पैसे किसी का काम करेगा चाहे वह गोली चलाने का हो या पत्थर फैंकने का! लिखने वाले बहुत लोग हैं जो कश्मीर पर लिखते हैं। पहले जब कश्मीर पर हम लेख पढ़ते थे तो लगता था कि इस मुद्दे को कोई सैद्धांतिक पहलू होगा जो हमारी समझ से परे है।
सच तो यह है कि तब हम सोचते भी नहीं थे पर जब अंतर्जाल पर अपना लिखने का अभियान प्रारंभ किया तो पता चला कि हमारे गुरुजी और मित्र का बताया हुआ फार्मूला हमारे अंदर इस तरह घुसा हुआ है कि उससे मुक्त नहीं हो सकते। लिखते लिखते चिंतन थोड़ा ठीकठाक हो गया पर वह सिमट गया पैसे के इर्दगिर्द! कई बार अपने से पूछते हैं कि बिना पैसे क्यों लिखते हैं? जवाब भी स्वयं को देेते हैं कि अपनी अभिव्यक्ति कई वर्षों से दबी पड़ी है और उसे यहां लाने के लिये प्रायोजक भी स्वयं ही बनना पड़ेगा और सारी दुनियां में चल रहे पैसे के खेल को धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र का शीर्षक देने वाले प्रायोजित विद्वानों को चुनौती देने का यही एक माध्यम है।
जिन लोगों ने हम हमारे फालतु चिंतनों को पढ़ा है वह जानते हैं कि आतंकवाद को हम विशुद्ध व्यापार मानते हैं। चाहे कितना भी समझा लो पर हम यह मानने वाले नहीं है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आंतकवाद से जुड़े पात्र तथा उनके प्रायोजकों को इससे कोई आर्थिक फायदा नहीं होता। नक्सलवाद पर लिखा तो कुछ लोग बुरा मान गये पर इस बात का जवाब नहीं दिया कि ‘आखिर उनके पास बंदूकें कहां से आती है। उनके खाने, पीने और पहनने का खर्चा कौन उठाता है? जो बंदूकें दे रहे हैं वह रोटी क्यों नहीं देते?’
एक ने लिखा कि पड़ौसी देश भारत में अस्थिरता फैलाने के लिये दे रहे हैं। हमारा जवाब है कि पड़ौसी देश जिस तरह भ्रष्टाचार में आकंठ हमारी तरह डूबे हुए हैं उससे यह तर्क भी नहीं जमता क्योंकि उनके साथ हमारे प्रत्यक्ष रूप से एक नंबर के आर्थिक संबंध न हों पर अप्रत्यक्ष रूप से दो नंबर का संपर्क खूब है। सीधी बात यह है कि पुलिस और प्रशासन का ध्यान आतंकवाद की तरफ लगा रहे और दो नंबर के धंधे चलते रहें इसलिये ही यह कथित आतंकवाद खड़ा किया गया है और दुनियां के सभी राष्ट्राध्यक्ष एक होकर उसके मुकाबले की बात करते हैं पर एक होते नहीं क्योंकि दुनियां के एक और दो नंबर के आर्थिक पुरुष कहीं न कहीं उनके भी सहायक हैं। इसलिये आतंकवाद को भी भिन्न भिन्न कोणों से देखा जाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच निजी क्षेत्र में दो नंबर का कितना व्यापार है इसकी जानकारी नहीं मिलती पर यहां की फिल्में वहां दिखाई जा रही हैं जो इस बात का प्रमाण है कि कुछ न कुछ तो है।
हमने यह बात कभी अखबार में ही पढ़ी थी कि जहां आतंकवाद बढ़ता है वहीं तस्करी आदि का काम जोरों पर हो जाता है। इस पर हमने एक लेख लिखा था तो एक विद्वान टिप्पणीकार ने अपनी टिप्पणी में पूर्वोत्तर के आतंकवाद का जिक्र करते हुए बताया था कि वहां ऐसा ही हुआ है। बहस लंबी खींचने की बजाय हम एक कल्पना करें कि भारत में कहीं आतंकवाद न हो तो?
भारत यकीनन विदेशों से हथियार नहीं खरीदेगा?
तस्करों की तस्करी बंद हो जायेगी।
सभी का ध्यान केवल देश के सामान्य मुद्दों पर होगा तो विदेशों से संबंधों पर कौन ध्यान देगा? कौन अमेरिका और ब्रिटेन की परवाह करेगा?
कश्मीर और आतंकवाद पर बनने वाली ढेर सारी फिल्मों को कौन देखेगा? याद रखिये आतंकवाद पर बनी अनेक फिल्में हिट हो गयी और उन्होंने खूब पैसा कमाया। यह फिल्में हॉलीवुड और वॉलीवुड में खूब बनी और अगर यह आतंकवाद न होता दोनों फिल्मी क्षेत्रों का अर्थशास्त्र गड़बड़ा जाता।
क्रिकेट में पाकिस्तान के खिलाफ अन्य देशों के साथ मैच में कौन सट्टे लगायेगा। पाकिस्तान के खिलाड़ी स्वयं हारने के साथ ही दूसरे देशों के खिलाड़ियों को नायक बनाते हैं जो अपने देश की कंपनियों के विज्ञापन कर न केवल पैसा कमाते हैं बल्कि उनका व्यापार भी बढ़ाते हैं। शायद इसलिये उनको फिक्सिंग का पैसा मिलता है?
हमें पैसा नहीं मिलता पर लिखते हैं पर जिस मुद्दे में पैसा न दिखे उस पर नहीं लिखते। कुछ टीवी पर देखा और कुछ अंतर्जाल पर पढ़ा। उससे पता लगा कि पहले कश्मीर में पत्थर फैकने और धर्म आधार पर विरोधी नारे लगाने के लिये दो तीन सौ रुपये मिलते थे अब पंद्रह सौ मिलने लगे है-लगता है कि वहां उनको भी कोई वेतन आयोग होगा। यकीन मानिए इसका कोई आर्थिक लाभ उठायेगा।
प्रसंगवश कश्मीर के बारे में एक जगह पढ़ने को मिला था कि वहां की एक अलगाववादी महिला नेता अपने बच्चे को विदेश में पढ़ने भेजने के लिये भारतीय पासपोर्ट मांग रही है। वह पाकिस्तान से भी पासपोर्ट ले सकती थी पर चूंकि वह देश संदिग्ध है और संभव है कि विदेश में उसे शक की नज़र से देखा जाता इसलिये उसे भारतीय पासपोर्ट चाहिए। यानि अपने काम के लिये उसे भारत नाम की जरूरत है। यह महिला नेता कश्मीर के बच्चों के भारतीय शिक्षा से दूर रहने के लिये कहती थी पर उसका लड़का पढ़ा और विदेश जाना चाहता है। यानि उसका आंदोलन से जुड़ा होना किन्ही स्वार्थों की वजह से ही है।
सीधा मतलब यह है कि कश्मीर मुद्दे में देखने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के आधार देखते फिरें पर हम तो अर्थशास्त्र के अनुसार चलते हैं। यह पत्थर फैंकने या फिंकवाने का काम किसी आर्थिक लाभ के कोई करता होगा इस पर यकीन करना वैसे भी कठिन है। कश्मीर को भारत से अलग करने की कोशिश करने के प्रयास किये जा रहे हैं पर वह धरती से तो अलग नहीं हो सकता और न ही वहां के लोग कोई अलग हैं। भले लोगों की कहीं कमी नहीं है और कश्मीर में भी नहीं होगी पर यकीनन पत्थर फैंकने और फिंकवाने वाले लोगों ने उनके अस्तित्व को नकार रखा है। अगर ईमानदारी से कश्मीर की समस्या का हल करना है तो वहां से विस्थापित पंडितों की वापसी जरूरी है। दूसरी बात यह कि पाकिस्तान के पास कश्मीर के हिस्से के अलावा भी अन्य हिमालयीन क्षेत्र हैं जो बहुत समृद्ध हैं जहां उसने सत्यानाश कर दिया है इसलिये उसके बराबरी के व्यवहार की बजाय ताकत से बात करना चाहिये। वहां के सैन्य शासकों ने अपने धन कमाने और कश्मीर सहित हिमालयीन क्षेत्र के लोगों का शोषण इतना किया है कि वह इन्हीं पत्थर फैंकने के व्यापारियों की वजह से चर्चा में नहीं आ पाता। संभव है हिमालयीन क्षेत्र के शोषक अपना धंधे को दुनियां की नज़र बचाने के लिये यह पैसा देते हों। भारत जो हथियार खरीदता है तो उससे भी दुनियां का बहुत बड़ा व्यापार तो चल ही रहा है। संभव है हथियार बेचने वाले व्यापारी या उनके दलाल भी इस आतंकवाद को जारी रखने के पक्षधर हों। वह मदद करते हैं या नहीं यह तो प्रचार माध्यमों को देखना होगा क्योंकि उनके प्रसारणों पर ही तो आम लेखक लिख पाते हैं।
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Sep 12, 2010

खौफजदा शहर-हिन्दी शायरी (khaufzada shahar-hindi shayari)

पूरा शहर खौफजदा लगता है,
कायर बहशियों ताकतवर समझकर
सभी कांप रहे हैं,
अपनी हस्ती मिट जाने का डर
इस कदर लोगों में समा गया है कि
पेड की डाली के गिरने की
आवाज सुनकर ही हांफ रहे हैं।
हैरानी इस बात की है कि
पहरेदार सज रहे उनके घर
जो हैवानियत के सांप पाले रहे हैं।
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Sep 2, 2010

असलियत-हिन्दी शायरी (asliat-hindi shayri)

कुछ लोग
वाह वाह करते हुए
हंसते सामने आते हैं,
कुछ ताने देते हुए
रुंआसे भी नज़र आते हैं।
लगा लिये हैं सभी ने मुखौटे चेहरे पर
अपनी नीयत यूं छिपा जाते हैं,
कमबख्त! यकीन किस पर करें
लोग खुद ही अपनी असलियत छिपाते हैं।
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कोई भी मुखौटा लगा लो अपने चेहरे पर
दूसरा इंसान तुम पर यकीन नहीं करेगा,
मगर तुम अपनी नीयत और असलियत
अपने से छिपा लोगे
तब तुम्हारा ज़मीर किसी का कत्ल करते हुए भी
तुमसे नहीं डरेगा।
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Aug 19, 2010

ऊंची जमात की दावत-हिन्दी व्यंग्य कविता (oonchi jamat ki davat-hindi vyangya kavita)

खज़ाना लूटकर लुटेरे
करने लगे व्यापार,
बांटने लगे उधार,
इस तरह साहुकारों और सौदागरों भी
ऊंची जमात में शामिल हो गये,
क्योंकि उन सामंतों को मिला अपना हिस्सा
जिनको ज़माने की जागीर मिली
विरासत में,
इंसानियत के कायदे रहे जिनकी हिरासत में,
उन्होंने दौलत और शौहरत की ख्वाहिश पूरी करने के लिये
दरियादिली के इरादे कब्र में दफन कर दिये,
और तसल्ली कर ली यह सोचकर कि
वह ऊंची जमात की दावतों में जाने के काबिल हो गये।
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Aug 13, 2010

खिलाड़ी नहायेगा क्या, निचोड़ेगा क्या-हिन्दी हास्य कविता (sport's lovers couple-hindi comic poem)

आशिक ने माशुका से कहा
‘तुम आज जाकर अपने माता पिता से
अपनी शादी की बात करना,
मेरी प्रशंसा का उनकी आंखों के सामने बहाना झरना,
उनको बताना
मेरा आशिक कई खेलों का खिलाड़ी है,
अपने प्रतिद्वंद्वियों की हालत उसने हमेशा बिगाड़ी है,
हॉकी में बहुत सारे गोल ठेलता है,
तो कुश्ती के लिये भी डंड पेलता है,
बहुत दूर तक भाला उछालता है,
तो बॉल भी उछल कर बॉस्केट में डालता है,
देखना वह खुश हो जायेंगे,
तब हम अपनी शादी बनायेंगे।’

जवाब में माशुका बोली
‘‘मैंने उनको यह सब बताया था,
पर उनको खुश नहीं पाया था,
उन्होनें मुझे समझाया कि
‘खिलाड़ी नहायेगा क्या
निचोड़ेगा क्या,
जो क्रिकेट नहीं खेले वह खिलाड़ी कैसा,
पैसा न कमाये वह होता अनाड़ी जैसा,
अगर खेल प्रतियोगिता का ठेकेदार होता
तो बात कुछ बनती,
कहीं मैदान बनवाता तो कहीं खरीदता खेल का सामान
तब कमीशन लेने पर ही जिंदगी उसकी छनती,
हमने तो बड़े बड़े खिलाड़ियों को सोने का पदक
पीतल के भाव बेचते देखा है,
कईयों को ठेला खींचते भी देखा है,
खेलने में मज़दूरी जितनी कमाई,
भला किसके काम आई,
अगर हो कोई खेल प्रबंधक तो ही
रिश्ता मंजूर है,
वरना उसके लिये दिल्ली अभी दूर है,’
इसलिये तुम खेलना बंद करो,
या मुझे भूल जाओ,
कहीं अपनी जुगाड़ लगाओ
इतने सारे संगठन हैं
कहीं सचिव या अध्यक्ष पद पर कब्जा कर
बढ़ाओ अपना सामाजिक सम्मान,
नामा और मिले और नाम,
वरना अपने सपने अधूरे रह जायेंगे।’’
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Aug 9, 2010

भूख का अक्स-हिन्दी कविता (bhookh ka aksa-hindi kavita)

दुबली, पतली और सांवली
उस गरीब औरत की काम के समय
मौत होने पर
पति ने हत्या होने का शक जताया।
पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिये
अस्पताल भेजा
और एक घर से दूसरे और वहां से तीसरे
घर में काम करती हुई
उस गरीब औरत की मौत को
संदेहास्पद बताया।
गरीब और बीमार की मौत का पोस्टमार्टम
सुनकर अज़ीब लगता है,
पति लगाये तो कभी नहीं फबता है,
एक औरत
जिसने दस दिन पहले गर्भपात कराया हो,
रोटी की आस में घर से भूखी निकली होगी
कमजोर लाचार औरत की क्या बिसात
उमस तो अच्छे खासे इंसान को वैसे ही बनाती रोगी,
हड्डियों के कमजोर पिंजरे से
कब पंछी कैसे उड़ा
उसकी जिंदगी का रथ कैसे मौत की ओर मुड़ा,
इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने की
जरूरत भला कहां रह जाती है,
सारी दुनियां गरीबी को अपराध
औरत उस पर सवार हो तो अभिशाप बताती है,
जाने पहचाने सवाल हैं,
अज़नबी नहीं जवाब हैं,
भूख और मज़बूरी
पहले अंदर से तोड़ते हैं,
तब ही मौत से लोग नाता जोड़ते हैं,
क्या करेंगे सभी
अगर पोस्टमार्टम में
कहीं भूख का अक्स नज़र आया।
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Jul 31, 2010

स्वतंत्रता दिवस मनाने की छूट-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (ribet for indepandent day-hindi vyangya kavitaen)

कुछ लोगों ने अपनों को
गुलाम रखने की
स्वतंत्रता पाई है,
वरना तो अपने आकाओं की
अभी भी बजा रहे हैं
बस!
केवल स्वतंत्रता दिवस
हर साल मनाने की छूट उन्होंने पाई है।
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कहते हैं कि अंग्रेज छोड़ गये
पर अपनी अंग्रेजियत छोड़ गये हैं,
यही कारण है कि
गुलामों के सरदार आज भी बंधक है
उनके ख्यालों के
पर उनके प्रजाजन भी
अंग्रेज बनने की होड़ में लग गये हैं।
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वह मुक्तिदाता कहलाये
वरना तो गुलाम आज भी रखते हैं।
अब तलवार और तोप से नहीं
बल्कि खज़ाना अपने यहां रखकर
ख्यालों से दिमाग को ढंककर
गुलामों में भी सरदार बनाकर,
स्वतंत्रता के भ्रमजाल को अधिक घना कर
अपना शासन बनाये हैं,
साथ ही देवता होने का स्वांग भी रचते हैं।
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Jul 23, 2010

गुरू और चेले की योजना-हास्य व्यंग्य (guru chela ki yojana-hasya vyangya)

गुरुजी के पुराने भूतहे आश्रम  में आते ही चेले ने अपने बिना प्रणाम गुरु जी से कहा-‘गुरूजी जी आज आपकी सेवा में अंतिम दिन है। कल से नये गुरू की चेलागिरी ज्वाइन कर रहा हूं, सो आशीर्वाद दीजिये कि उनकी सेवा पूरे हृदय से कर सकूं और मुझे जीवन में मेवा मिल सके।’
सुबह सुबह यह बात सुनकर गुरूजी का रक्तचाप बढ़ गया। शरीर पसीने से नहा उठा। वह उनका इकलौता चेला था जिसकी वजह से लोग उनको गुरुजी की पदवी प्रदान करते थे। अगर वह इकलौता चेला उनको छोड़कर चला गया तो साथ ही उनकी गुरूजी की पदवी भी जानी थी। बिना चेले भला कौन गुरु कहला सकता है। उन्होंने चेले से कहा-‘यह क्या किसी कंपनी की नौकरी है जो छोड़कर जा रहा है। अरे, कोई  धर्म कर्म को व्यापार समझ रखा है जो नये गुरू की सेवा ऐसे ज्वाइन कर रहा है जैसे नई कंपनी प्रमोशन देकर बुला रही है। तू तो ऐसे बोल रहा है जैसे किसी कंपनी का प्रबंधक अपने प्रबंध निदेशक से बात करता है। सुबह सुबह क्या स्वांग रचा लिया है जो आज धमका रहा है। जो थोड़ी बहुत गुरु दक्षिण आती है उसमें से तुझे ईमानदारी से हिस्सा देता हूं। कभी कभी कोई दो लड्डू चढ़ाकर जाता है तो उसमें से भी आधा तेरे लिये बचा रखता हूं। अभी डेढ़ लड्डू खा जाता हूं अगर चाहूं तो पौने दो भी खा सकता हूं पर मैं ऐसा नहीं कर सकता। इतना ख्याल तेरा कौन रखेगा।’
चेला बोला-‘आपको इस नई दुनियां का नहीं पता। यह धर्म कर्म भी अब व्यापार हो गये है। आश्रम कंपनियों की तरह चल रहे हें। आपका यह पुराना आश्रम पहले तो फ्लाप था अब तो सुपर फ्लाप हो गया है। वह तो में एक था जो किसी नये अच्छे गुरू के इंतजार में आपकी शरण लेता रहा। अब तो फायदा वाले बाबा ने मुझे निमंत्रण भेजा है अपनी चेलागिरी ज्वाइन करने के लिये।’
गुरुजी हैरान रह गये-अरे, यह फायदा वाले बाबा तो बड़े ऊंचे हैं, भला तुझे कैसे निमंत्रण भेजा है? दूसरे हिट बाबाओं को चेले मर गये हैं क्या? सुन इस चक्कर में मत पड़ना। पहली बात तो उनके फाइव स्टार आश्रम में तेरा प्रवेश ही कठिन है फिर चेलागिरी ज्वाइन करने का तो सवाल ही नहीं।‘
चेले ने कहा ‘क्या बात करते हैं आप! इस गुरूपूर्णिमा के दिन वह मुझे दीक्षा देने वाले हैं। अब उनका धंधा बढ़ा गया है और उनको योग्य शिष्यों की जरूरत है। उनमें काले धन को सफेद करने का जो चमत्कार है उसकी वजह से उनको खूब चढ़ावा आता है। उसे संभालने के लिये उनको योग्य लोग चाहिऐं।’
गुरूजी ने कहा-‘भला तुझे काले धन को सफेद करने का कौनसा अभ्यास है?’
चेले ने कहा-‘धन है ही कहां जो सफेद कर सकूं। जब धन आयेगा तो अपने आप सारा ज्ञान प्राप्त होगा। कम से कम आपको इस बात पर थोड़ा शर्मिंदा तो होना चाहिए कि आपके पास कोई काला धन लेकर नहीं आया जिसे आप सफेद कर सकते जिससे मुझे भी अभ्यास हो जाता। वैसे मै वहां काम सीखकर आपके पास वापस भी आ सकता हूं ताकि आपकी गुरुदक्षिणा चुका सकूं।’’
चेला चला गया और गुरुजी अपने काम में लीन हो गये यह सोचकर कि ‘अभी तो फ्लाप हूं शायद लौटकर चेला हिट बना दे। कहीं गुरू गुड़ रह जाता है तो चेला शक्कर बनकर अपने गुरू को हिट बना देता है।’
कुछ दिन बात चेला रोता बिलखता और कलपता हुआ वापस लौटा और बोला-‘’गुरूजी, मैं लुट गया, बरबाद हो गया। आपके नाम पर मैंने अनेक लोगों से चंदा वसूल कर एक लाख एकत्रित किया था वह उस गुरू के एक फर्जी चेले ने ठग लिया। मुझे उसके एक चेले ने कहा कि गुरुजी को एक लाख रुपये दो और दो महीने में दो लाख करके देंगे। वह मुझे गुरूजी के पास ले भी गया। उन्होंने मुझे आशीवार्द भी दिया। बोले कुछ नहीं पर गुरूजी का चेला मुझसे बोला कि जब दो लाख देने के लिये बुलवायेंगे तभी से अपनी चेलागिरी भी प्रदान करेंगे। दो महीने क्या छह महीने हो गये। मैं आश्रम में गया तो पता लगा कि कोई ऐसा ही फर्जी चेला था जो आश्रम आता रहता था। फायदा वाले बाबा के पास कुछ अन्य लोगों को पास ले जाता और आशीर्वाद दिला देता। बाकी वह क्या करता है मालुम नहीं! हम सब बाबा के पास गये तो वह बोले‘कमबख्तों काले धन को सफेद करते उसका चूरमा बन जाता है। वह रकम बढ़ती नहीं घटकर मिलती है, ताकि उसे काग़जों में दिखाया जा सके। तुम लोगों के पहले के कौन गुरू हैं जो तुम्हें इतना भी नहीं समझाया’। अब तो आपकी शरण में आया हूं। मुझे चेलागिरी में रख लें।’’
गुरूजी ने कहा-‘फायदा वाले बाबा को यह नहीं बताया कि तुम्हारे गुरू कौन हैं?’
चेला बोला-‘‘बताया था तो वह बोले ‘कमबख्त! तुम्हारा धन तो काला ही नहीं था तो सफेद कैसे होता’, वैसे तुम्हारी ठगी का वैसा ठगी में गया’।’’
गुरूजी ने कहा-‘अब भई तू किसी तीसरे गुरू की शरण ले, तेरी जगह बाहर चाय की दुकान कााम करने वाले लड़के को पार्ट टाईम चेलागिरी का काम दे दिया है। वह भी मेरे नाम से इधर उधर से दान वसूल कर आता है पर कुछ हिस्सा देता है, तेरी तरह नहीं सौ फीसदी जेब में रख ले। वैसे वह कह रहा है कि ‘काले धन को सफेद करने का काम भी जल्दी शुरू करूंगा’, वह तो यह भी दावा कर रहा है कि इस आश्रम का सब कुछ बदल डालूंगा।’
चेले ने कहा-‘गुरुजी, कहीं वह यहां गुरूजी भी तो नहीं बदल डालेगा।’
गुरूजी एकदम करवट बदलकर बैठ गये और बोले-‘कैसी बातें कर रहा है। गुरूजी तो मैं ही रहूंगा।’
चेले ने कहा-‘गुरूजी, यह माया का खेल है। जब वह कह रहा है कि ‘सब कुंछ बदल डालूंगा तो फिर गुरूजी भी वही आदमी कैसे रहने देगा। ऐसे में आप मुझे दोबारा शरण में लें ताकि उस पर नज़र रख सकूं।’’
गुरूजी सोच में पड़ गये और बोले-‘मुश्किल यह है कि काले धन को सफेद करने का धंधा कभी मैंने किया नहीं। इसलिये उस पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। ठीक है तू अब उपचेला बन कर रह जा।’
चेले ने कहा-‘गुरूजी आप महान हैं जो उपचेला के पद पर ही पदावनत कर रख रहे हैं वरना तो मैं सफाई करने वाला बनकर भी आपकी सेवा करता रहूंगा। आपने न सिखाया तो क्या आपके नये चेले से काला धन सफेद करने का चमत्कार सीख लूंगा।’
इस तरह काले धन का सफेद करने के मामले पर दोनों ने अपने संबंध पुनः जोड़ लिये और उनको इंतजार है कि नया चेला कब से यह काम शुरू करता है।’
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Jul 21, 2010

दिल के घायल होने की शिकायत-हिन्दी शायरी (ghayal ke dil hone ki shikayat-hindi shayari)

जब तक मतलब था
दरियादिली उन्होंने दिखाई
फिर अचानक लापता हो गये,
हमने उनका पता ढूंढ निकाला
जब मिले दोबारा तो
उनकी तंगदिली देखकर हैरान हुए हम
इससे तो उनकी यादें बेहतर थी
पछताये जो फिर उनके पास गये।
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प्यार में धोखा नहीं होता तो
सच्चे प्यार की पहचान कैसे होती,
दौस्ती में गद्दारी न होती तो
वफा की कीमत भला क्या होती,
जिंदगी की असलियत जिसने जान ली
उसे दिल के घायल होने की शिकायत नहीं होती।
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Jul 17, 2010

कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचा जा रहा-हिन्दी लेख (black economy and economics-hindi lekh)

किसी भी देश की मुद्रा पर अर्थशास्त्र में अनेक बातें पढ़ने को मिलती हैं पर उसके संख्यांक पर कहीं अधिक पढ़ने को नहीं मिलता अर्थात मुद्रा एक से लेकर एक हजार तक के अंक में छापी जाये या नहीं इस पर अधिक चर्चा नहीं मिलती। हम सीधी बात कहें तो डालर या सौ रुपये से ऊपर हो या नहीं इस पर अर्थशास्त्री अधिक विस्तार से विचार नहीं रखते। वजह शायद यह है कि आधुनिक अर्थशास्त्र की संरचना भी पुरानी है और तब शायद यह मुद्दा अधिक विचार योग्य नहीं था। इसलिये नये संदर्भ ंअब अर्थशास्त्र में जोड़ा जाना आवश्यक लगता है। हम बात कर रहे हैं भारत के सौ रुपये के ऊपर से नोटों की जिनका प्रचलन ऐसी समस्यायें पैदा कर रहा है जिनकी जानकारी शायद अर्थ नियंत्रण कर्ताओं को नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि काली अर्थव्यवस्था के स्वामी अपने काला अर्थशास्त्र भी यहां चलाते हैं।
कुछ समय पूर्व योग शिक्षक स्वामी रामदेव ने बड़े अंक वाली मुद्रा छापने का मसला उठाया था पर उसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने आगे नहीं बढ़ाया। एक दौ टीवी चैनल ने इस पर चर्चा की तो अकेले बाबा रामदेव के मुकाबले अनेक वक्ता थे जो भारत में पांच सौ और हजार के नोटों के पक्षधर दिखाई दिये क्योंकि वह सभी बड़े शहरों के प्रतिबद्ध तथा पेशेवर विद्वान थे जो संभवत प्रचार माध्यमों द्वारा इसी अवसर के लिये तैयार रखे जाते हैं कि कब कोई बहस हो और उनसे मनमाफिक बात कहलवाई जाये। यही हुआ भी! एक ऐसे ही विद्वान ने कहा कि ‘बड़े अंक की मुद्रा से उसे ढोने में सुविधा होती है और महंगाई बढ़ने के कारण रुपये की कीमत गिर गयी है इसलिये हजार और पांच सौ के नोट छापने जरूरी है।’
हैरानी होती है यह देखकर कि एक बहुत ही महत्व के मुद्दे पर कथित बुद्धिजीवी खामोश हैं-शायद कारों में घूमने, ऐसी में बैठने वाले तथा होटलों में खाना खाने वाले यह लोग नहीं जानते कि छोटे शहरों और गांवों के लिये आज भी हजार और पांच सौ का नोट अप्रासंगिक है। अनेक वस्तुऐं महंगी हुईं है पर कई वस्तुऐं ऐसी हैं जो अभी भी इतनी सस्ती हैं कि पांच सौ और हजार के नोट उससे बहुत बड़े हैं। टीवी, फ्रिज, कार, कंप्यूटर खरीदने में पांच सौ का नोट सुविधाजनक है पर सब्जियां तथा किराने का सामान सीमित मात्रा में खरीदने पर यह नोट बड़ा लगता है। दूसरा यह भी कि जिस अनुपात में आधुनिक सामानों के साथ उपभोक्ता वस्तुओं में मूल्य वृद्धि हुई है उतनी सेवा मूल्यों में नहीं हुई। मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि बहुंत कम होती है तथा लघू तथा ग्रामीण व्यवसायों में भी कोई बजट इतना बड़ा नहीं होता। वहां अभी भी सौ रुपये तक का नोट भी अपनी ताकत से काम चला रहा है तब पांच सौ तथा हजार के नोट छापना एक तरह से अर्थशास्त्र को चुनौती देता लगता है।
साइकिल के दोनों पहियों में हवा आज भी एक रुपये में भरी जाती है तो दुपहिया वाहनों के लिए दो रुपये लगते हैं। बढ़ती महंगाई देखकर यह विचार मन में आता है कि कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन योग्य बनाने का प्रयास तो नहीं हो रहा है। कभी कभी तो लगता है कि जिन लोगों के पास पांच सौ या हजार के नोट बहुत बड़ी मात्रा मैं है वह उसे खपाना चाहते हैं इसलिये बढ़ती महंगाई देखकर खुश हो रहै हैं क्योंकि उसकी जावक के साथ आवक भी उनके यहां बढ़ेगी। दूसरी बात यह भी लगती है कि शायद पांच सौ और हजार नोटों की वजह से पांच तथा दस रुपये के सिक्के और नोट कम बन रहे हैं। इससे आम अर्थव्यवस्था में जीने वाले आदमी के लिये परेशानी हो रही है। आम व्यवस्था इसलिये कहा क्योंकि हजार और पांच सौ नोट उसके समानातंर एक खास अर्थव्यवस्था का प्रतीक हैं इसलिये ही अधिक रकम ढोने के लिये जो तर्क दिया जा रहा है जो केवल अमीरों के लिये ही सुविधाजनक है।
अनेक जगह कटे फटे पुराने नोटों की वजह से विवाद हो जाता है। अनेक बार ऐसे खराब छोटे नोट लोगों के पास आते हैं कि उनका चलना दूभर लगता है। उस दिन एक दुकानदार ने इस लेखक के सामने एक ग्राहक को पांच का पुराना नोट दिया। ग्राहक ने उसे वापस करते हुए कहा कि ‘कोई अच्छा नोट दो।’
दुकानदार ने उसके सामने अपनी दराज से पांच के सारे नोट रख दिये और
कहा कि ‘आप चाहें इनमें से कोई भी चुन लो। मैंने ग्राहकों को देने के लिये सौ नोट कमीशन देकर लिये हैं।’
वह सारे नोट खराब थै। पता नहीं दुकानदार सच कहा रहा था या झूठ पर पांच के वह सभी नोट बाज़ार में प्रचलन योग्य नहीं लगते थे। पुरानी मुद्रा नहीं मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है-यह अर्थशास्त्र का नियम है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि नयी मुद्रा पुरानी मुद्रा को प्रचलन में ला देती है पर इसके पीछे तार्किक आधार होना चाहिए। ऐसे पुराने और फटे नोट बाज़ार में प्रचलन में रहना हमारी बैकिंग व्यवस्था के लिये बहुत बड़ी चुनौती है।
हम यहां बड़ी मुद्रा के प्रचलन का विरोध नहीं कर रहे पर अर्थनियंत्रणकर्ताओं को छोटे और बडे नोटों की संरचना के समय अर्थव्यवस्था में गरीब, अमीर और मध्यम वर्ग के अनुपात को देखना चाहिए। वैसे यहां इस बात उल्लेख करना जरूरी है कि जितने भी विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र हैं उनकी मुद्रा का अंतिम संख्यांक सौ से अधिक नहीं है। इसलिये जो देश को शक्तिशाली और विकसित बनाना चाहते हैं वह यह भी देखें कि कहंी यह बड़ी मुद्रा असंतुलन पैदा कर कहीं राष्ट्र को कमजोर तो नहीं कर देगी। कहीं हम आधुनिक अर्थशास्त्र को पढ़कर कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचने जा रहे यह देखना देश के बुद्धिमान लोगों का दायित्व है।
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Jul 11, 2010

आटा और आग को कमीशन में बदल लेते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविताये (aata, aag aur commision-hindi vyangya kavitaen)

गरजने वाले बरसते नहीं,
काम करने वाले कहते नहीं,
फिर क्यों यकीन करते हैं वादा करने वालों का
को कभी उनको पूरा करते नहीं।
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जिनकी दौलत की भूख को
सर्वशक्तिमान भी नहीं मिटा सकता,
लोगों के भले का जिम्मा
वही लोग लेते हैं,
भूखे की रोटी पके कहां से
वह पहले ही आटा और आग को
कमीशन में बदल लेते हैं।
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Jul 4, 2010

परदे के पीछे आका-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (parde ke peechhe aaka-hindi kavitaen)

सामने सजे हैं खूबसूरत चेहरे,
उनकी अदाऐं आजाद दिखती हैं
पर सहमा है उनका दिल देखकर पहरे,
परदे पर चलते फिरते बुत देखकर
उन्हें कभी फरिश्ता नहीं समझना।
अपनी उंगली से ज़माने पर
हुक्मत करते दिखते हैं,
मगर उनकी अदाओं का अंदाज़
परदे के पीछे बैठकर आका लिखते हैं,
शेर की तरह गरजने वाले अदाकारों पर
कभी शाबाशी मत लुटाना,
मुश्किल है उनके लिये
सच में कोई कारनामा जुटाना,
परदे के पीछे चलते खेल को देखना
आम इंसान के वास्ते कठिन है
इसलिये हंसी सपनों को कभी सच समझकर न बहलना।
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हर जगह मुखौटा बैठा है
किस पर यकीन करें कि
ज़माने में बदलाव लायेगा।
परदे के बाहर चलता खेल देखकर
ख्वाब देखना अच्छा लगा,
पर सच कभी न बना अपना सगा,
बिक रहा है भलाई का सामान बाज़ार में
ईमान हार गया है बेईमानों से
मुखौटों पर क्या इल्जाम लगायें
भ्रष्टाचार को कैसे भगायें
परदे के पीछे बैठे आकाओं का चेहरा कौन दिखायेगा।
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Jun 21, 2010

विज्ञापन का पेड़-हिन्दी क्षणिका (tree of adevertisment-hindi short poem)

गरीबी और महंगाई के मुद्दों से
हर जगह मुंह मोड़ लो,
जो बरसों तक रहे बेनतीजा
ऐसी बहसें चलती रहें
बिना मतलब के मुद्दे जोड़ लो,
तभी विज्ञापन का सदाबहार पेड़
बढ़ता रहेगा
चाहे जब फल तोड़ लो।
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Jun 3, 2010

इश्क, एसोसिएशन और विज्ञापन-हास्य कविता (ishq,association and vigyapan)

छद्म नाम बताकर,
पराया फोटो लगाकर,
आशिक और माशुका ने
अपनी इश्क की कहानी रचाई,
हुई दोनों की पहली मीट
जो उनकी पहली और आखिरी मुलाकात का संदेश लाई।
माशुका गरजते बोली
‘हद हो गयी गयी इंटरनेट पर धोखे की,
कंप्यूटर की लोग इज्जत इतनी करते
जितनी कागज के खोखे की,
अब मैं एक माशुका एसोसियेशन बनाऊंगी,
आशिकों के धोखे से बचाने के लिये
नयी पीढ़ी की लड़कियों में
चेतना और जागरुकता पैदा करूंगी
जिसे बुढ़ापे तक चलाऊंगी,
कब तक सहूंगी यह सब
तुम्हारे साथ इश्क कर मैंने छठी बार चोट खाई।’

सुनकर आशिक भी दहाड़ा,
कविता ऐसे सुनाने लगा जैसे पहाड़ा,
आंखों से खून की धारा बह आई।
वह बोला
‘तुम्हारी एसोसिएशन के जवाब में
मैं भी आशिक एसोसिएशन बनाऊंगा,
छद्म नाम और पराये फोटो वाली
फर्जी माशुकाओं के जाल से बचाऊंगा,
इश्क के धोखे की इंटरनेट से कर दूंगा सफाई।’

सुन रहा था पास में एक
वेबसाईट लिखने वाला
उसके दिमाग में भी एक योजना आई।
मन ही मन कहने लगा
‘अच्छा है जो मेरे सामने हुई यह लड़ाई,
अब दोनों के पाठों का अपनी ’इश्क साईट’ पर लिंक दूंगा,
यह दोनों तो ठहरे फोकटिया,
मैं ठहरा पुराना पोपटिया,
इनका लिखा मजेदार होगा
पाठक मिलेंगे ज्यादा
जिससे अपने विज्ञापनों से चार पैसे कमा लूंगा,
फिर दावा करूंगा कि
इश्क जगत में कचड़ा साफ कर ला रहा हूं सफाई।
इसलिये आशिक माशुका एसोसिशन को
अपनी साईट से जोड़ रहा हूं
लोग पढ़ें और समझें
करें न एक दूसरे से बेवफाई।
अंतर्जाल लेखकों में माननीय भी हो जाऊंगा
इधर करूंगा कमाई।’
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May 28, 2010

खूनखराबे का रोग-हिन्दी शायरी (khoonkharabe ka rog-hindi shayari)

वह खून की होली खेलकर
लाल क्रांति लाने का सपना दिखा रहे हैं,
भरे पेट उनके रोटी से
खेल रहे हैं
बेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,
हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके
वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं।
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गोली का जवाब गोली ही हो सकती है
जानवरों से दोस्ती संभव है,
अकेले आशियाना बनाकर
जीना भी बुरा नहीं लगता
जहां पक्षी करते कलरव हैं,
पर हैवानों से समझौता कर
अपनी अस्मिता गंवाना है,
लड़ने के लिये उनको
फिर लाना कोई नया बहाना है,
कत्ल करने के लिये तत्पर हैं जो लोग,
उनको है खूनखराबे का रोग,
कत्ल हुए बिना वह नहीं मानेंगे,
जिंदा रहे तो फिर बंदूक तानेंगे,
सज्जन होते हैं ज़माने में
असरदार उन पर ही मीठी बोली हो सकती है।
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May 24, 2010

आवारा जिन्न-हिन्दी शायरी (awara jinna-hindi shayari

जीवन पथ पर धीमे धीमे
कदम बढ़ाना
यह राह कहीं सहज तो कहीं कठिन है,
रात्रि को चंद्रमा की इठलाती किरणों के तले
उतना ही मस्ताना जितना सह सको
क्योंकि आगे सूरज की किरणों से सजा
आने वाला दिन है।

अपने घर के रखवाले
खुद ही बनकर रहना,
किसी दूसरे को नहीं सौंपना
अपने सम्मान कागहना,
काली नीयत की आग
अच्छी नज़र को पिघला देती है
जैसे आग से पानी हो जाता हिम है।

चौराहे पर आकर चमकने की कोशिश
तुम्हें बाज़ार में बिकने वाली आवारा चीज़ बना देगी,

यह दौलत पाने के अनंत इच्छा
केवल जिंदगी ही  नहीं 

मौत को भी सोने के भाव गला देगी,
पैसा है यहां सभी का देवता
जबकि सर्वशक्तिमान ने बनाया उसे आवारा जिन्न है।
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May 16, 2010

वफा सस्ती कब थी-हिन्दी शायरी (vafaa sasti aur mahangi-hindi shayari)

वफा न कभी सस्ती थी
जो कहें अब महंगी हो गयी,
बाज़ार से हो गयी लापता बरसों से
खरीदने वालों की जो तंगी हो गयी।
दाम चुकाकर वफा खरीद सकते हैं,
पर उसके खालिस होने का नहीं दम भरते हैं,
जब जब कीमत का नकाब उतरा
तब असलियत नंगी हो गयी।
-------------
कई अक्लमंद लगे हैं काम पर
दुनियां के आम इंसान जगाने के लिये,
इसलिये कोई दे रहा है खूनी तकरीर
कोई बांट रहा हथियार  लोगों में, लड़ने के लिये।
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May 10, 2010

समाज एक कारखाना-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (society is a factory-hindi satire poem)

समाज एक कारखाना और
परिवार एक उत्पादित है
उन बुद्धिजीवियों के लिये
जो सजाते हैं अपने ख्यालों में
बड़े करीने से,
ढूंढते हैं परिवारों में
टूटने बिखरने की कहानियां
वाद और नारे से आगे उनकी सोच नहीं जाती,
जिसे कई बार दोहराते
इनामों की थाली उनके घर सजकर आती,
जगा रहे हैं श्रम के लिए इंसाफ की रौशनी
ऐसे लोग
जिनका बदन नहीं नहाया कभी पसीने से।
-------------
कभी ढूंढते हैं लड़खड़ाती प्रेम कहानी में
आजादी का सवाल,
दुनियां में सच की जंग के लिये
तब मचाते हैं  इंसानियत के आशिक की तरह बवाल।
कहीं  खूनखराबे में
इंसाफ की जंग के कायदे बतलाते
देश के पहरेदारों की शहादत से
अपना मुंह छिपाते
कलम के वीरों की तरह ठोकते ताल।
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May 6, 2010

जज़्बात सौदे की तरह बांटते-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (jazbat saude ki tarah bantte-hindi vyangya kavitaen)

इतिहास के पन्नों में
दर्ज खूनखराबे के हादसो में से
वह अपने ख्याल के मुताबिक
पढ़कर आते हैं।
बैठकर महफिलों में
फिर उन पर आंसु बहाते है,
खून का रंग एक जरूर मानते पर
ख्यालों न मिलते हों तो
कई इंसानों के खून भी
उनको पानी की तरह मानकर नज़र फेर जाते हैं।
-------
कुछ तारीखों को
हमेशा वह दोहराते,
कुछ को भूल जाते।
दर्द का व्यापार करने वाले
अपने जज़्बात सौदे की तरह बांटते
जहां न मिलें दाम,
न मिलता हो इनाम,
वहां से अपनी सोच सहित लापता हो जाते।
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May 1, 2010

ताजमहल और पसीना-मज़दूर दिवस पर कविता(tajmahal aur mazdoor-hindi shayari on mazdoor divas diwas or may day)

ताजमहल प्यार का प्रतीक है
या परिश्रम का
यह समझ में न आया।
शहंशाह ने लूटा गरीब का खज़ाना,
कहलाया वह नजराना,
मजदूरों ने अपना खून पसीना बहाकर
संगमरममर के पत्थर सजाये,
फिर अपने हाथ कटवाये,
कहीं कब्र में दफन था मुर्दा
जिसकी हड्डिया भी धूल हो गयी,
उठकार रख दी वह सभी
नये बने महल के कुछ पत्थरों के नीचे
उसे साम्राज्ञी कहने की इतिहास से भूल हो गयी,
पहले पसीना बहाकर
फिर खून के आंसु रोने वाले
मजदूरों का नाम कोई कागज़ दर्ज नहीं कर पाया।
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Apr 26, 2010

बेबस की आग-हिन्दी शायरी (bebas ki aag-hindi shayri)

अपनी जरूरतों को पूरा करने में लाचार,
बेकसूर होकर भी झेलते हुए अनाचार,
पल पल दर्द झेल रहे लोगों को
कब तक छड़ी के खेल से बहलाओगे।
पेट की भूख भयानक है,
गले की प्यास भी दर्दनाक है,
जब बेबस की आग सहशीलता का
पर्वत फाड़कर ज्वालमुखी की तरह फूटेगी
उसमें तुम सबसे पहले जल जाओगे।
---------
वह रोज नये कायदे बनवाते हैं,
कुछ करते हैं, यही दिखलाते हैं,
भीड़ को भेड़ो की तरह बांधने के लिये
कागज पर लिखते रोज़ नज़ीर
अपने पर इल्ज़ाम आने की हालत में
कायदों से छुट का इंतजाम भी करवाते हैं।
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Apr 23, 2010

दौलतमंदों का सजा बाज़ार-हिन्दी शायरी (daulatmandon ka bazar-hindi shayari)

पैसे कमाने का हुनर
दुनियां में सबसे अच्छा माना जाता है,
भले ही कोई फन हो न हो
दौलतमंद खरीद लेता है
सारे फनकार कौड़ी के भाव
इसलिये हुनरमंद भी माना जाता है।
-----------
मयस्सर नहीं हैं जिनको रोटी
उनसे ज़माना खौफ खाता है।
इसलिये फुरसत मिलने पर करते हैं
सभी गरीब का भला करने की बात
बाकी समय तो दौलतमंदों के सजाये
बाजार में ही बीत जाता है।
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Apr 16, 2010

अपना भला काम भुनाना नहीं-हिन्दी शायरी (bhala kam-hindi shayri)

बड़े बुजुर्ग सच कह गये कि
किसी का भला कर
फिर किसी को सुनाना नहीं।
भलाई का व्यापार
शायद पहले भी इसी तरह
चलता रहा होगा,
करते होंगे कम
लोग सुनाते होंगे अपने किस्से ज्यादा,
बिकता होगा पहले भी
बाज़ार में इसी तरह भलाई का वादा,
कौन मानेगा कि
बिना मतलब किसी का काम किया होगा,
पर इंसान तो गल्तियों का पुतला है
कभी कभी हो जाये भला काम
फिर उसे कभी अकेले में भी गुनगनाना नहीं,
लिख देना समय के हिसाब में
मिला इनाम तो ठीक
पर अपना खुद भुनाना नहीं।

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Apr 11, 2010

इंसानी मुखौटा-हिन्दी शायरी (insani mukhauta-hindi shayri)

भूख बाहर बिफरी है
अनाज के दाने गोदामों में पाये जाते हैं
भूखे इंसानों के पांव वहां तक क्या पहुचेंगे
पंछी भी पंख वहां तक नहीं मार पाते हैं।
इंसानी मुखौटा लगाये शैतानों ने
कर लिया है दौलत और ताकत पर कब्जा
अपनी भूख मिटाने के वास्ते
हुक्मत अपने इशारों पर चलाये जाते हैं।
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वादों पर कब तक यकीन करें
हर बार धोखा खाया है,
मगर फिर भी लाचारी से देखते
क्योंकि उन्होंने हर वादे से पहले
चेहरे पर नया मुखौटा लगाया है।

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Apr 7, 2010

लहु और आंसु-हिन्दी शायरी (lahu aur ansu-hindi shayri)

जमीन पर लहु बिखरा पड़ा है
फिर भी उनका बयान
किन्तु और परंतु शब्दों के साथ खड़ा है।
मरने वालों पर बोले वह कुछ शब्द
पर कातिलों का दर्द भी बयान कर गये
हैवानों के इंसानी हकों के साथ
ज़माने से लड़कर उन्हें जिंदा रखने का जिम्मा
उनकी रोटी के गहने में सच की तरह जो जड़ा है।
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शहीद जो हो गये
उन पर उन्होंने आंसु बहाये,
पर फिर कातिलों के इंसाफ के लिये
खड़े हो गये वह मशाल जलाये।
हैवानों के चेहरे पर फरिश्तों का नकाब
वह हमेशा सजा दी
फिर इंसानी हक के नारे लगाये।
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Apr 3, 2010

ईमानदार अब तबाह हो गये-हिन्दी शायरी (imandar ab tabah ho gaye-hindi shayri)

उनके दिखाये सपनों का पीछा करते कई घर तबाह हो गये,
अंधेरे को भगाने के लिये जलाई आग में अंधे स्वाह हो गये।
जंग भड़काई थी जमाने में, ईमान और इंसाफ लाने के लिये
हार गये तो अपने ही दोस्तों के खिलाफ एक गवाह हो गये।
मुखौटा लगाया पहरेदार का, सब का भरोसा जीतने के लिये,
लुट गया सामान, भरोसा करने वालों के चेहरे स्याह हों गये।
जिंदगी बनाने का दावा करने वालों पर नहीं करना भरोसा,
बेईमान चढ़े हैं हर शिखर पर, ईमानदार अब तबाह हो गये।
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Mar 31, 2010

हंसना और रोना भी व्यापार है-हिन्दी शायरी (hansha aur rone ka vyapar-hindi shayri)

दौलत कमाने से अधिक वह
उसे छिपाने के लिये वह जूझ रहे हैं,
उनके अमीर होने पर किसी को शक नहीं
लोग तो बस उनके
काले ठिकानों की पहेली बूझ रहे हैं।
--------
इतनी दौलत कमा ली कि
उसे छिपाने के लिये वह परेशान है,
खौफ के साये में जी रहा खुद
फिर भी जमाने को लूटने से उसको फुरसत नहीं
उसकी अदाओं पर जमाना हैरान हैं।
----------
यूं तो दुनियां को वह
ईमान का रास्ता बताते है,ं
पर मामला अगर दौलत का हो तो
वह उसे खुद ही भटक जाते हैं।
-------
उनका हंसना और रोना भी व्यापार है,
पैसा देखकर मुस्कराते है,
कहो तो रोकर भी दिखाते हैं,
अकेले में देखो उनका चेहरा
लोग क्या, वह स्वयं ही डर जाते हैं।
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Mar 30, 2010

वैचारिक योग

अहिंसासत्यास्तेब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः।
हिन्दी में भावार्थ-अहिंसा, सत्य, अस्तेय,ब्रह्चर्यऔर अपरिग्रह-यह पांच यम हैं।
शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः।।
हिन्दी में भावार्थ-शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर की आराधना-यह पांच नियम हैं।
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्।
हिन्दी में भावार्थ-जब वितर्क यम और नियम के पालन में बाधा पहुंचाने लगे तो उसके विपरीत विचार का चिंतन करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-शारीरिक योगासन के साथ वैचारिक योग का भी महत्व है क्योंकि जीवन में मनुष्य के कर्म ही उसके फल का आधार होते हैं  जिनके करने की शुरूआत मस्तिष्क में उत्पन्न विचार से ही होती है।  अहिंसा न करना, सत्य मार्ग पर स्थित रहना, दूसरे के स्वामित्व की वस्तु का अपहरण न करना (जिसे चोरी भी कहा जाता है), काम में अधिक अनुरक्त न रहना तथा भौतिक साधनों के संचय में अधिक रुचि न रखना एक तरह से वैचारिक योगासन है।  इनमें स्थित व्यक्ति दृढ़ व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है। इन प्रवृत्तियों को यम कहा जाता है और इनमें स्थित होने पर मनुष्य सिद्ध हो जाता है।
यही स्थिति नियमों की है।  प्रातःकाल शौच आदि से निवृत होने पर अपने अंदर जब स्वच्छता का अनुभव हो तभी यह मानना चाहिये कि हम स्वस्थ हैं।  इसके अलावा सांसरिक वस्तुओं को लेकर संतोष का भाव रखते हुए तप एवं स्वाध्याय में लीन रहकर ईश्वर की भक्ति करने से अपने अंदर एक महान आनंद की अनुभूति होती है।
अनेक बार जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब हम डांवाडोल होते हैं। ऐसे में विपरीत विचार का चिंतन करना चाहिये। जब हमें क्रोध आये तब शांति का और जब निराशा उत्पन्न हो तब आशा पर विचार करना चाहिये। जब लोभ की प्रवृत्ति जागे तक त्याग का सोचें।  जब किसी की निंदा का मन हो तो किसी की प्रशंसा पर विचार करें।  इस तरह सकारात्मक प्रवृत्ति का निर्माण करें ताकि जीवन पथ पर अधिक से अधिक आनंद की प्राप्ति हो। यह वैचारिक या साधना मनुष्य को उत्कृष्ट श्रेणी का बनाती है। अच्छे विचार और संकल्प से स्वयं की बुद्धि जोड़ने पर वह पवित्र हो जाती है और इसके विपरीत अगर उसमें कुविचारों और अन्मयस्कता का समावेश किया जाये तो भारी अनर्थ का सामना करना पड़ता है।

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Mar 28, 2010

चाणक्य नीति दर्शन-धन और भोजन की तृष्णा कभी नहीं मिटती (Dhan aur bhojan ki bhookh-chankya niti)

धनेषु जीवतिव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्तः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।
हिन्दी में भावार्थ-
धन और भोजन के सेवन तथा स्त्री के विषयों में लिप्त रहकर भी अनेक मनुष्य अतृप्त रह गए, रह जाते हैं और रह जायेंगे।
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।
या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
उस संपत्ति से क्या लाभ जो केवल घर की अपने ही उपयोग में आती हो। जिसका पथिक तथा अन्य लोग उपयोग करें वही संपत्ति श्रेष्ठ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के लोभ की सीमा अनंत है। वह जितना ही धन संपदा के पीछे जाता है उतना ही वह एक तरह से दूर हो जाती हैं। किसी को सौ रुपया मिला तो वह हजार चाहता है, हजार मिला तो लाख चाहता है और लाख मिलने पर करोड़ की कामना करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दौलत की यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। आदमी का मन मरते दम तक अतृप्त रहता है। जितनी ही वह संपत्ति प्राप्त करता है उससे ज्यादा पाने की भावना उसके मन में जाग्रत होने लगती है।
आखिर अधिकतर लोग संपत्ति का कितना उपयोग कर पाते हैं। सच तो यह है कि अनेक लोग जीवन में जितना कमाते हैं उतना उपभोग नहीं कर पाते। उनके बाद उसका उपयोग उनके परिजन करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो सार्वजनिक हित के लिये दान आदि कर समाज हित का काम करते हैं। ऐसे ही लोग सम्मान पाते हैं। जिन लोगों की अकूल संपत्ति केवल अपने उपयेाग के लिये है तो उसका महत्व ही क्या है? संपत्ति तो वह अच्छी है जिसे समाज के अन्य लोग भी उपयोग कर सके। जब समाज किसी की संपत्ति का उपयोग  करता है तो उसको याद भी करता है। संपत्ति के संग्रह से स्वयं को आत्म तृप्ति तो हो सकती हैं पर अगर वह किसी दूसरे के काम की नहीं है तो उसकी कोई प्रशंसा नहीं करता।  शायद यही कारण है कि हमारे देश में दान कि महिमा का बखान किया गया है जिससे समाज में सामंजस्य बना रहता है।
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Mar 26, 2010

हर काम का दाम-व्यंग्य कविता (word and prize-hindi satire poem)

लोहे के सामान में जान फूंकने वाला
पेट्रोल मंहगा
और आदमी को जिंदगी देने वाला
पानी बहुत सस्ता है।
बहाते हैं लोग पानी मु्फ्त का मानकर
पर पैट्रोल की कदर करते महंगा जानकर
बिना दाम लिये भलाई करने से
खुद के दिल को तसल्ली जरूर हो जाती है
पर जमाने में कद्र पाने के लिये
हर काम का दाम
वसूल करने का ही एक रस्ता है।
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जो तराशे गये हीरे
वह मुकुट में सज गये,
जिन पर नहीं पड़ी किसी की नज़र
वह खदान में ही सड़ गये।
दोष हीरों का नहीं
कद्रदानों का है
जिनकी नज़रें अब दौलत पर ही रहती हैं
कई तो हीरे के भाव लेकर पत्थर भी जड़ गये।
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Mar 23, 2010

ज़हर और अमृत-हिंदी शायरी (zahar aur amrit-hindi shayri)

यूं तो तन्हाई में भी इतना नहीं डरे थे

जितना भीड़ में आकर खौफ खाने लगे.

घर से निकलते हुए सोचा नहीं था कि

ज़माने भर के कायरों से मुलाकात होगी,

बिके थे लोग बाज़ार के सौदागरों के हाथ

दलाली लेकर ज़हर को अमृत बताने लगे..

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शहीदों के नाम पर लगाते हैं हर बरस मेले

नाम और नामा कमाने के वास्ते.

अपने हाथ से कभी किसी की

जिन्होंने कभी नहीं संवारी ज़िन्दगी

वाही बता रहे हैं लोगों को तरक्की के रास्ते..
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Mar 13, 2010

अब नारियों को बांटने लगे हैं-हिन्दी क्षणिकायें

पहले जाति में बांटा
भाषा में छांटा
और धर्म में काटा
फिर समाज में एकता की कोशिश
अमन के ठेकेदार करने लगे।
नारी की तरक्की देखकर
हक के नाम पर लड़ाने के लिये
उसे भी अब बांटने, छांटने तथा काटने के लिये जगे।
.....................................
क्या पता नारियां आगे बढ़कर
कहीं दुनियां में एकता न स्थापित कर दें
इस खौफ से
जमाने की फूट पर रोटियां सैंकने वाले
कंपने लगे हैं।
इसलिये ही जाति, भाषा और धर्म के
अलग अलग खंडों में नारियों को भी बांटने लगे हैं।
-------------
मां है
बहिन है
पत्नी है
और बेटी है
नारी हर रिश्ता ईमानदारी से निभाती है।
जाति, धर्म और भाषा के नाम पर
लड़ने वाले पुरुषों की जननी जरूर है
पर फिर भी अपनी निर्मलता पर नहीं उसे गरुर है
इज्जत के अहंकार में लड़ने वाले पुरुष
जब उसके हकों में पुराने जमाने के तर्क देने लगे
समझ लो उन्हें स्त्री सत्ता की आशंकायें सताती हैं।
----------------
जमाना बदल रहा है
महिलाओं के हकों के लिये
पुरुष भी लड़ने लगे हैं।
इसे चालाकी कहें या सादगी कि
जाति, धर्म और भाषा के नाम पर
महिलाओं को आगे लाने की बात कर
अपने समूहों के भले का नारा देने वाले ठेकेदार
अपनी रोटी सैंकने के लिये भी तत्काल जगे हैं।

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Mar 9, 2010

तुम्हारे जज़्बात-हिन्दी शायरी (tumhar jazbat-hindi shayri)

अपने जज़्बातों को दिल में रखो
बाहर निकले तो
तूफान आ जायेगा।
हर बाजार में बैठा हैं सौदागर
जो करता है व्यापार जज़्बातों का
वही तुम्हारी ख्वाहिशों से ही
तुमसे तुम्हारा सौदा कर जायेगा।
यहां हर कदम पर सोच का लुटेरा खड़ा है
देख कर ख्याल तुम्हारे
ख्वाब लूट जायेगा।
इनसे भी बच गये तो
नहीं बच पाओगे अपने से
जो सुनकर तुम्हारी बात
सभी के सामने असलियत गाकर
जमाने में मजाक बनायेगा।

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Feb 28, 2010

चाटुकारिता का फन-व्यंग्य कविता (chatukarita ka fun-hindi vyangya kavita)

बाजार के खेल में चालाकियों के हुनर में
माहिर खिलाड़ी
आजकल फरिश्ते कहलाते हैं।
अब होनहार घुड़सवार होने का प्रमाण
दौड़ में जीत से नहीं मिलता,
दर्शकों की तालियों से अब
किसी का दिल नहीं खिलता,
दौलतमंदों के इशारे पर
अपनी चालाकी से
हार जीत तय करने के फन में माहिर
कलाकार ही हरफनमौला कहलाते हैं।
----------
काम करने के हुनर से ज्यादा
चाटुकारिता के फन में उस्ताद होना अच्छा है,
अपनी पसीने से रोटी जुटाना कठिन लगे तो
दौलतमंदों के दोस्त बनकर
उनको ठगना भी अच्छा है।
अपनी रूह को मारना इतना आसान नहीं है
इसलिये उसकी आवाज को
अनसुना करना भी अच्छा है।
किस किस फन को सीख कर जिंदगी काटोगे
नाम का ‘हरफनमौला’ होना ही अच्छा है।

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Feb 23, 2010

आंसु भी हंसी में बदल जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य क्षणिकायें (ansu aur hansi-hindi satire poem)

फिक्र हो या नहीं
करते दिखना,
एक झूठ को
सौ बार सच लिखना,
ईमानदारी और वफा के कायदों से
कोई वास्ता हो या न हो
कामयाबी का बस एक ही दस्तूर है
बाजार में महंगे भाव बिकना।
--------
कभी कभी आंखों के आंसु भी
हंसी में बदल जाते हैं
जब हमदर्द कम करने की बजाय
दर्द बढ़ाने लग जाते हैं।
--------
अभावों का होना
तब नहीं अखरता
जब सामान हादसों की वजह
बनते नज़र आते हैं।
किसी हमदर्द का न मिलना
तब दुःख नहीं लगता
जब दौलतमंद भी
अपने महलों में तन्हा नज़र आते हैं।

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Feb 20, 2010

सादगी से वार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (sadgi se war-hindi satire poems)

उनकी नज़रों मे आते हैं हमेशा
तलवारें चलने के मंजर
जुबां से
गरीबों और बेसहारों पर
जमाने के दिये घावों का
बयां किये जा रहे हैं।

हर जगह बेसहारों के लिये
हमदर्दी दिखाते हैं,
अमन के लिये जंग करना सिखाते हैं,
अपने हाथ में लिये छुरा कर लिया है
उन्होंने पीठ पीछे
जहां में तसल्ली लाने के लिये
सादगी से वार किये जा रहे हैं।
------------
वह लोगों के दिल में लगा कर आग
शांति के लिये कर रहे हैं जंग,
गरीब की भलाई का ख्वाब दिखाते
अमीरों के करके रास्ते तंग।
दान लेने से ज्यादा स्वाभिमान
उनको लूटने में लगता है,
जिंदा लोगों से कुछ नहीं सीखते
मरों की याद में उनका ख्याल पकता है,
एक बेहतर ढांचा बनाने की सोच लिये,
उन्होंने कई शहर फूंक दिये,
भूखे के लिये रोटी पकाने के बहाने
शहीदों की चिता पर मेले लगाने का
उनका अपना है ढंग।
यह अलग बात है कि
गरीबों पर नहीं चढ़ता उनका रंग।

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Feb 16, 2010

पसीना और कमाई-व्यंग्य कविता (pasina aur kamai-vyangya kavita)

गाड़िया बहुत हैं

पर सड़कें जाम हैं,

कभी आती तो कभी जाती

बिजली के इंतजार में

खड़े उपकरण तमाम हैं।

तरक्की का मतलब कभी

समझ में नहीं आया,

चीजों की खरीद फरोख्त में ही

ग्राहक और सौदागरों का  बाजार समाया,

अमीरों की चकाचैंध में

गरीबी का अंधेरा नहीं देखायी देता,

खाली है जो हाथ, किसे दिखते

समेट रहा है जो लूट का सामान

बस वही सर्वत्र दिखाई देता,

पसीना बहा रहा है कोई

कमाई किसी दूसरे के नाम है।

कहने को तरक्की तमाम  है।


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Feb 14, 2010

पसीना है पवित्र नदी-हिन्दी शायरी (pasnina hai pavitra nadi-hindi shayri)

मेहनतकशों की किस्मत में

आरामदायक गद्दे इसलिये भी नहीं आते हैं,

उनके लिये रोगों का  होना जरूरी है

जो अमीरों के ही हिस्से में आते हैं।

तीर्थ में जाकर सर्वशक्तिमान के दर्शन कर

स्वर्ग मिल जाता,

पर वहां पवित्र सरोवरों में

स्नान कर भी

देह का कूड़ेदान साफ नहीं हो पाता,

जाने को पैसा नहीं है

फिर भी मजदूरों की देह से

बहते हुए अमृत रूप पसीने में

कई रोग बाहर बह जाते हैं।

पसीना है वह पवित्र नदी

जिसमें मेहनतकश की तैर पाते हैं।

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Feb 12, 2010

जय हो दूरदर्शन-हिन्दी हास्य व्यंग्य (jay ho doosrdarshan-hindi haysa vyangya)

अरे, हम क्या देखना चाहते हैं और यह क्या दिखा रहे हैं।
भइये यह क्या हुआ। हम टीवी पर देशभर के शिव मंदिरों में आज मनाये जा रहे शिवरात्रि पर्व को देखना चाहते हैं पर यह सभी चैनल वाले एक नायक शाह की फिल्म रिलीज होने का का शोर इस तरह दिखा रहे हैं जैसे कि उसने कोई युद्ध जीत लिया हो।
अब समझ में आया गड़बड़झाला। बुढ़ा चुका हीरो उनके विज्ञापन का भी आधार है! देश के सबसे बड़ी कपंनी  भारतीय संचार निगम की प्रतिद्वंद्वी एक टेलीफोन कंपनी उसी हीरो को लिये डोल रही है उसको लगता है कि उसके कनेक्शन उसकी वजह से ही बढ़ रहे हैं।  पिछले साल पंद्रह अगस्त पर भी उसके नाम पर जोरदार शोर मचा था। अमेरिका में  हवाई अड्डे पर उसे रोका गया।  तब देश की इज्जत दांव पर लग गयी थी। यह चैनल वाले भूल गये थे कि इस देश में आजादी का पर्व मनाया जा रहा है। सारा दिन उसका नाम ही रटते रहे।  केवल दिल्ली दूरदर्शन ही आजादी के विषय पर आजादी से अकेले डटा रहा। 
‘अरे शाह’, ‘हाय शाह’, और ‘अपना शाह’ जैसा गाते हुए यह निजी चैनल  उस हीरो को शिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।  अब समझ में आया पंद्रह अगस्त का माजरा। हमें लगता है कि अमेरिका में हवाई अड्डे पर उसे  इसलिये ही रोका गया होगा  ताकि भारत के निजी टीवी चैनल उसका नाम जाप सकें-यह कल्पना अब की हालतों को देखकर ही पैदा होती है।   अब यकीन नहीं होता कि वह एक सच था-यकीनन वह प्रायोजित खबर रही होगी  ताकि पंद्रह अगस्त को घर बैठा भारतीय समुदाय अपने देश की आजादी के बारे में सोचने की बजाय उस बुढ़ा चुके हीरो के बारे में अधिक सोचे।  पंद्रह अगस्त को आता देखकर पहले ही यह योजना बनी होगी।
कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अमेरिका में भी नववर्ष और क्रिसमस की छुट्टियों में लोगों के ध्यान को भटकाने के लिये ही अनेक ऐसी खबरें बनवायीं जाती हैं, भले ही उनमें सत्यता का पुट हो। सद्दाम हुसैन को फांसी और बेनजीर की हत्या के समय कुछ अंतर्जाल लेखकों ने ऐसी बातें लिखी थीं, पर उस पर यकीन नहीं हुआ। उनका आशय तो यही था कि कहीं एक नंबर एक तो कहीं दो नंबर वाले लोग इन प्रचार माध्यमों के छद्म साथी उनको प्रचार के अवसर उपलब्ध कराते हैं।   अब लगता है कि उन लेखकों ने शायद यही बात कहीं से देखी या सुनी होगी और परिस्थतियां उनको विश्वास करने योग्य लगती होंगी।  फिर अपने देश का आधुनिक बौद्धिक चल तो अमेरिकी शैली पर ही रहा है तब यह शक होना स्वाभाविक है।
यह आज महाशिवरात्रि का पर्व भी पहले से तय था। शायद फिल्म को इसी दिन पहली बार प्रदर्शित किया जाने की योजना बनी होगी और साथ में विवाद खड़े करने का कार्यक्रम भी बना होगा। इस कार्यक्रमं  के पीछे शिव के नाम धरने वाले गण भी लगाने का विचार हुआ होगा। पहले क्रिकेट पर उस हीरो का बयान फिर शिव नाम धारी कथित गणों का उस पर शाब्दिक हमला-अपने देश के प्रचार मसीहाओं की इस बात के लिये प्रशंसा तो करनी होगी कि उन्होंने सारे कार्यक्रम हवाई रूप से करवाये, जमीन पर खून खराबा नहीं हुआ।  फ्लाप हो रही क्रिकेट भी हिट तो  बुढ़ा राह हीरो भी जवान होने लगा था। 
बाजार के सौदागर और उसके प्रचार प्रबंधक लगातार इस बात का प्रयास करते  हैं कि सोने के अंडे देने वाली यह दोनों मुर्गियां-क्रिकेट और फिल्म-बुढ़ायें नहीं और अंडे देती रहें इसके लिये क्रीम पाउडर से अभिनेता अभिनेत्रियों और खिलाड़ियों का मेकअप होता है तो विवादास्पद घटनाओं से उनके व्यक्तित्व में निखार लाया जाता है।   इतना ही नहीं विदेशों में भी पैसा मिले इसके लिये भी कोशिश कम नहीं होती इसलिये उनका ऐजेंडा भी चलाया जाता है।  
आजादी के दिन अमेरिका को तो शिवरात्रि के दिन शिव जी के कलियुगी गणों को खलनायक बना दिया। बना क्या दिया! सभी खुद ही तैयार हुए होंगे यह अभिनय करने के लिये। अमेरिका हो या भारत, यहां सब बिकता है भले ही हर कोई आजाद दिखता है।
अब यह कौन समझाये कि फिल्मी और क्रिकेट दर्शक ही केवल देश नहीं होते।  बीसीसीआई -जो कि एक क्लब ही है-की टीम पिटे तो देश का कहीं सम्मान नहीं गिरता और  फिल्म दिखे या नहीं इससे देश की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा का कोई तारतम्य नहीं है। मगर वह गाये जा रहे हैं कि ‘फिल्मी दर्शकों फिल्म की अग्रिम टिकिट खरीदकर  दिया शिव के गणों को करारा जवाब।’
लोग देख रहे होंगे, कुछ सोचने की विलासिता भी में व्यस्त होंगे पर यह कौन पूछेगा  कि ‘अरे, भई यह बताओ तो सही यह मैच चल कहां रहा था?  बैठे ठाले पाकिस्तान को देश की अभिव्यक्ति और काम करने की स्वतंत्रता से जोड़ दिया है।  बुढ़ा रहा हीरो उनके लिये आजादी का नायक बन रहा है। बैठे ठाले शिव के गण भी मिल गये जिनकी प्रतिष्ठाा सूरज डूब रहा था और वह उसे बचाने आये। 
इससे भला तो दिल्ली दूरदर्शन लगा जिसने घर पर बैठे ठाले ही हरिद्वार के दर्शन कराये। भगवान शिवजी का गुणगान कर मन को प्रसन्नता प्रदान की।  गंगा के विषय पर अच्छी चर्चा सुनाई।  इसी दूरदर्शन की कभी लोग आलोचना करते थे पर आज हमें उसे देखना अच्छा लगा।  सच बात तो यह है कि निजी समाचार चैनल तो अब शाह परस्त हो गये हैं जो भ्रम का प्रतीक हैं। सत्य के प्रतीक शिव उनको नहीं सुहाते। देश के अनेक बुद्धिजीवी कहते थे कि दूरदर्शन तो जनता पर खबरें थोपता है पर यह निजी चैनल क्या कर रहे हैं?

दूरदर्शन के समाचारों पर महाशिवरात्रि के पर्व मनाने के समाचार भी अच्छे लगे।  ऐसा लग रहा था कि जैसे वाकई अपने देश का ऐसा चैनल है जिसे इस बात का पता है कि देश का दर्शक क्या देखना चाहता है? जबकि यह निजी चैनल देखते हैं कि कौन उनके विज्ञापन का नायक है उसी का नाम ऐसे लेते हैं जैसे कि वह कोई भगवान हो। इसलिये यह कहने को मन करता है कि ‘जय हो दूरदर्शन’।  निजी चैनल वाले अपनी आजादी का आनंद शाह नाम धारी  के साथ उठायें हमें आपत्ति नहीं। हम तो भगवान शिवजी का स्मरण कर उसका आनंद उठायेंगे। हमारा मानना है कि जो जैसा स्मरण करता है वैसा ही गुण उसमें आता है।
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Feb 6, 2010

खेल के खेल का विस्तार-हिन्दी व्यंग्य (game of cricket and sports-hindi article

क्रिकेट खेल की दृष्टि से प्रचार माध्यमों के लिये आज का दिन करुणामय रहा। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई)की टीम-यही इस टीम का वास्तविक परिचय है-के सदस्यों का मैदान में अभिनय अपेक्षानुरूप नहीं रहा। दक्षिण अफ्रीका के पेशेवर खिलाड़ियों के सामने बीसीसीआई के कमाऊ गेंदबाजों का गेंदबाजी अभिनय काम नहीं आया और पूरे दिन के 91 ओवर में वह केवल दो विकेट गिरा सके।  प्रचार माध्यम कल अपनी बीसीसीआई टीम के  कप्तान हीरो की रणनीति का खुलासा कर रहे थे कि उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ अपने गेंदबाजों से ‘राउण्ड द विकेट’ गेंदबाजी करने की जो सफल रणनीति अपनाई थी वही दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध भी आजमायेंगे।  उद्घोषक ऐसा करते हुए ऐसी मुस्कराहट बिखरे रहे थे जैसे कि कोई बड़ा रहस्योद्घाटन कर रहे थे।  उनका मानना था कि इसी रणनीति की वजह से बांग्लादेश हारा था। उद्घोषक घोषणा कर रहे थे कि ‘इस रणनीति के आगे दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज हवा हो जायेंगे।’
यह नहीं हुआ। बरसों से हम क्रिकेट का खेल देख रहे हैं और यह पता है कि ‘ओवर द विकेट’ गेंदबाजी हो या ‘राउण्ड द विकेट’ कुशल और पेशेवर बल्लेबाजों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
हमने मैच नहीं देखा मगर लोग है कि पुराने नशे को भूलने नहीं देते।  सुबह एक ने बताया कि ‘दक्षिण अफ्रीका के दो विकेट 17 रन पर ही गिर गये हैं।’
हमने सोचा कि शायद पटकथा ऐसी रही होगी। फिर भारत में पिचें स्पिन लेती हैं इसलिये संभव है कि सच में ऐसा हुआ हो।
शाम को टीवी चैनलों की नाराजगी साफ दिख रही थी। करुणामय प्रदर्शन पर श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति तो संभव भी नहीं थी।  वैसे यह कोई विश्व कप थोड़े ही है कि लोग नाराज होकर खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापनों का बहिष्कार करेंगे।  मगर बाजार की चिंतायें हैं और प्रचारक भी उससे नहीं बच सकते।
बांग्लादेश से बीसीसीआई क्या जीती? आसमान सिर पर उठा लिया। रेटिंग में नंबर बन हो गयी-और हमारी टीम तो एक तरह से विश्व विजेता है जैसे जुमले सुनाये गये, मगर दक्षिण अफ्रीका टीम कोई ऐसी वैसी टीम नहीं है। शुद्ध रूप से पेशेवर खिलाड़ियों से सुसज्जित यह टीम केवल आस्ट्रेलिया से ही पीछे है।  दरअसल अब क्रिकेट में मजा रह गया है तो वह इन दोनों टीमों के आपसी मैचों में दिखता है।  वह एक दिवसीय मैच हमें अब तक याद है जिसमें चार सौ से अधिक रन आस्ट्रेलिया ने बनाया और दक्षिण अफ्रीका ने उसका पीछा किया। तमाम तरह के रोमांचक उतार चढ़ाव के बाद दक्षिण अफ्रीका ने मैचा जीता।  मेन आफ दि मैच के सम्मान के लिये आस्ट्रेलिया के कप्तान को जब बुलाया गया तो उन्होंने उसे ठुकरा कर अपने ही उस विपक्षी बल्लेबाज को देने के लिये कहा जिसने उनसे केवल एक रन कम बनाया था।  उनका मानना था  कि मैंने तो बिना किसी दबाव के बल्लेबाजी की पर उस विपक्षी खिलाड़ी ने तो दबाव में इतना जोरदार प्रदर्शन किया। क्या जोरदार मैचा था? ऐसे मैच कभी कभी ही देखने को मिल सकते हैं?
बहरहाल बीसीसीआई के  खिलाड़ियों पर जैसे पांच दिवसीय मैच एक बोझा है पर सच यही है कि इसी में खिलाड़ी की काबलियत का परिचय मिलता है।  देशी टीम का प्रदर्शन वालीवुड की फिल्मों की तरह ही लगता है।  जैसे वालीवुड कभी भी हालीवुड का सामना नहीं कर पाता वैसे ही बीसीसीआई की टीम पश्चिमी टीमों के सामने ढेर हो जाती हैं। इसका कारण यह भी है कि भारतीय खिलाड़ी अन्य देशों से अधिक अमीर है इसलिये इस साहबी खेल को अपने ही ढंग से खेलते हैं।  दो की जगह एक रन बनता है और कोई कैच हाथ में आ जाये तो ठीक, नहीं तो ‘अनिश्चिताओं के इस खेल में’ सब चलता है।  खिलाड़ियों का खेल कम अभिनय अधिक इसलिये दिखता है क्योंकि उनके रैम्प पर चलने के कार्यक्रम, विज्ञापन तथा रोमांस के किस्से फिल्म अभिनेताओं की तरह ही होने लगे हैं।  अनेक बार तो उनको टीवी चैनलों के साथ कार्यक्रम करते देखा जा सकता है। कुछ फिल्मी अभिनेत्रियों के साथ नाचते भी देखे जा सकते हैं।
एक पाठक ने इस संबंध में एक बार टिप्पणी करते हुए हमको समझाया था कि क्रिकेट को खेल की तरह देखो।’
हमने इसका जवाब नहीं दिया। देना चाहते थे। वही यहां दे रहे हैं कि क्रिकेट को हमने खेल की तरह उठते देखा है और व्यापार की तरह गिरते भी देखा है।  प्रचार माध्यम इस खेल पर फिदा है पर इसमें फिक्सिंग की आशंकायें भी यही जताते रहे हैं-अनेक बार तो सनसनीखेज स्टिंग आपरेशन इनके द्वारा ही प्रस्तुत किये गये हैं। कुछ खिलाड़ियों को खेल से निकालकर सजा भी दी गयी।  अब उसे माफ करने की बात भी चल रही है। अब यही प्रचार माध्यम मानते हैं कि सब ठीक हो गया है तो हम भी मानते हैं कि हो गया हो होगा, पर एक बार दिल टूटा तो टूट ही गया। अलबत्ता इस खेल को कभी कभार हम देखते हैं पर इससे अब प्रभावित नहीं होते।  यह खेल अब बहुत कुछ हो गया है। नहीं तो इस देश में होने वाली एक मामूली से क्रिकेट प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के न आने पर इतना उत्पात नहीं मचता। एक ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसा न होने से उन लोगों को परेशानी आयेगी जो दोनों देशों में कड़वाहट कम करने का प्रयास कर रहे  हैं।  ऐसे में इस खेल के खेल का विस्तार समझा जा सकता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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