Nov 5, 2010

इंडिया और भारत-हिंदी व्यंग्य कविता (india aur bharat-hindi poem)

महंगाई में दिवाली भी मना ली
होली भी मनाएंगे,
लूट जिनका पेशा हैं
उनके कारनामों पर कितना रोयेंगे,
कब तक अपनी खुशियाँ खोएंगे,
जब आयेगा हंसने का मौक़ा
खुद भी हंसेगे दूसरों को भी हंसाएंगे.

देश से लेकर विदेश तक
हैरान हैं लुटेरे और उनके दलाल,
क्यों नहीं हुआ देश बर्बाद
इसका है उनको मलाल,
वैलेन्टाईन डे और फ्रेंड्स डे के
नाम पर मिटाने की कोशिश
होती रही है देश की परंपराएं,
हो गए कुछ लोग अमीर,
गरीब हो गया उनका ज़मीर,
मगर जो गरीब रह गए हैं,
लुटते रहते हैं रोज
पर मेहनत के दम पर वह सब सह गए हैं,
ज़िन्दगी के रोज़मर्रा जंग में
लड़ते हुए भी
होली और दिवाली पर
खुशियाँ मनाएँ,
रौशन इंडिया में
अँधेरे में खड़े भारत को जगमगाएं..
-------------------------

कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
Post a Comment

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर-दीपकबापूवाणी (man ke khet par dhan ka Chakkar-DeepakBapuwani)

मन के खेल पर भारी धन का चक्कर, वैभव रथ पर सवार देव से लेता टक्कर। ‘दीपकबापू’ आदर्श की बातें करते जरूर, रात के शैतान दिन में बनते फक्कड़।।...