Dec 31, 2011

नव वर्ष और नये दिन पर हिन्दी साहित्यक कविता (hindi literature poem or kavita on new year and new day, naya varsha aur naya din)

 वह बोले
"दीपक बापू
नव वर्ष की बधाई,
उम्मीद है इस साल आप सफल हास्य कवि  हो जाओगे,
फिर हमें जरूर दारू पिलाओगे।"
दीपक बापू बोले
"आपको भी बधाई
पर हम ज़रा गणित में कमजोर हैं,
भले ही शब्दों के  सिरमोर हैं,
यह कौनसा साल शुरू हुआ है
आप हमें बताओगे।"
वह तिलमिला उठे और
यह कहकर चल दिये
"मालूम होता तो
नहीं देते तुम्हें हम बधाई,
तुमने अपनी हास्य कविता वाली
जुबान हम पर ही  आजमाई,
वह तो हम जल्दी में हैं
इसलिए नए साल का नंबर याद नहीं आ रहा
फुर्सत में आकर तुम्हें बता देंगे
तब तुम शर्माओगे।"

दिन बीतता है
देखते देखते सप्ताह भी
चला जाता है
महीने निकलते हुए
वर्ष भी बीत जाता है,
नया दिन
नया सप्ताह
नया माह
और नया वर्ष
क्या ताजगी दे सकते हैं
बिना हृदय की अनुभूतियों के
शायद नहीं!
रौशनी में देखने ख्वाब का शौक
सुंदर जिस्म छूने की चाहत
शराब में जीभ को नहलाते हुए
सुख पाने की कोशिश
खोखला बना देती है इंसानी दिमाग को
मौज में थककर चूर होते लोग
क्या सच में दिल बहला पाते हैं
शायद नहीं!
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Dec 17, 2011

इंसानी रिश्तो का भरोसा-हिन्दी शायरी (insani rishton ka bharosa-hindi shayari)

आदमी बेईमान हो या ईमानदार
सभी इंसान सूरत तो इंसान जैसी पाते हैं,
पहली नज़र में पहचानने का दावा
कौन बेवकूफ करता है
यहां हर कदम पर वादे
धोखे में बदल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
इश्क केवल हो सकता है सर्वशक्तिमान से
इंसानी रिश्तों के क्या भरोसा,
दिल ने जिसे प्यार किया
फिर उसी को कोसा,
लोगों के ख्यालों पर यकीन करना बेकार है
मतलब और समय के साथ
फायदे के लिये रिश्ते भी बदल जाते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Dec 11, 2011

हमदर्दी की जरूरत-हिन्दी शायरी (hamdardi ki zarurat-hindi shayari)

अपने बढ़ते कदमों के नीचे
लोगों के जज़्बात यूं न कुचलते जाओ
जब लड़खड़ायेंगे तुम्हारे पांव
तुम्हें सहारे की जरूरत होगी,
कहें दीपक बापू
अपने दिल के दर्द और खुशी सभी जानते हैं
दूसरे के अहसास के समझते है पराया
नहीं जानता कोई
किसी दिन उसे भी हमदर्दी को जरूरत होगी।
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Nov 26, 2011

अन्ना हजारे का जनलोकपाल कहीं प्रायोजित झुनझुना तो नहीं-हिन्दी व्यंग्य (anna hazare ka janlokpak bil aur vidheyak -hindi satire article)

           जनलोकपाल कानून बनेगा या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। जहां तक इस कानून से देश में भ्रष्टाचार रुकने का प्रश्न है उस पर अनेक लोग के मन में संशय बना हुआ है। मूल बात यह है कि देश की व्यवस्था में सुधार लाने के मसले कभी नारों से नहीं सुलझते। एक जनलोकपाल का झुनझुना आम जनमानस के सामने प्रायोजित रूप से खड़ा किया गया है ऐसा अनेक लोगों का मत है। हम देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरु होने वाले लोग अब कमजोर होते जा रहे हैं। वह दो भागों में विभक्त हो गया है। पहले यह आंदोलन बाबा रामदेव के नेतृत्व में चला पर बाद में अन्ना हजारे आ गये। बाबा नेतृत्व ने योग शिक्षा के माध्यम से जो ख्याति अर्जित की है उसके चलते उनको किसी अन्य प्रचार की आवश्यकता नहीं रहती। इसलिये जब आंदोलन चरम पर होता है तब भी चमकते हैं और जब मंथर गति से चलता है तब भी उनका नाम छोटे पर्दे पर आता रहता है। अन्ना हजारे आंदोलन के थमने पर अन्य काम कर प्रचार करते हैं। कभी मौन रखकर तो कभी कोई भ्रष्टाचार से इतर विषय पर बयान देकर वह प्रचार में बने रहने का फार्मूला आजमाते हैं। अभी उन्होंने अपने मोम के पुतले के साथ अपना फोटो खिंचवाया तो विदेश की एक पत्रिका के साक्षात्कार के लिये फोटो खिंचवाये। तय बात है कि कहीं न  कहीं उनके मन में प्रचार पाने की चाहत है। जहां तक उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का सवाल है तो ऐसा लगता है कि कुछ अदृश्य आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक शक्तियों ने उनकी जिस तरह सहायता की उससे प्रतीत होता है कि प्रायोजित समाज सेवकों ने उनको आंदोलन के शीर्ष पर लाकर अपने मुद्दे को आगे बढ़ाया। पहले वही लोग बाबा रामदेव का दामन थामे थे पर चूंकि उनका योग दर्शन भारतीय अध्यात्म पर आधारित है इसलिये उसमें कहीं न कहीं भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की धर्मनिरपेक्ष छवि ध्वस्त होने का भय था इसलिये एक धर्मनिरपेक्ष समाज सेवक अन्ना हजारे को लाया गया। अन्ना का देश के भ्रष्टाचार पर उतना ही अनुभव है जितना किसी आम आदमी का होता है। इस भ्रष्टाचार की जड़ में क्या है? इसे कैसे रोका जाये अगर हमसे कोई बहस करे तो उसकी आंखें और कान फटे की फटे रह जायेंगे। यह अलग बात है कि चूंकि हम बाज़ार और प्रचार समूहों के स्थापित चर्चा करने योग्य विद्वान न होकर एक इंटरनेट प्रयोक्ता ही है इसलिये ऐसी अनेक ऐसी बातें कह जाते हैं जो वाकई दूसरों के समझ में नहीं आ सकती। हमारे कुछ विरले पाठक और मित्र हैं वही वाह वाह कर सकते हैं। असली बात कहें तो यह तो सभी जानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार है। इसलिये उसे हटाने के तमाम तरह के रास्ते बता रहे हैं पर इसके मूल में क्या है, यह कोई हमसे आकर पूछे तो बतायें।
          जब अन्ना हजारे रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठे थे तब उनके अनुयायी और सहायक सगंठन जनलोकपाल बिल पर बहस कर रहे थे। अन्ना खामोश थे। दरअसल बिल बनाने में उनकी स्वयं की कोई भूमिका नहीं दिखाई दी। सीधी बात यह है कि एक मुद्दे पर चल रहे आंदोलन और उस संबंध में कानून के तय प्रारूप के लिये वह अपना चेहरा लेकर आ गये या कहें कि प्रायोजित समाज सेवकों को एक अप्रायोजित दिखने वाला चेहरा चाहिए था वह मिल गया। यह अलग बात है कि उस चेहरे पर भी कहीं न कहंी प्रायोजन का प्रभाव था। अब यह बात साफ लगने लगी है कि इस देश में कुछ आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक शक्तियां थीं जो एक प्रभावी लोकपाल बनाने की इच्छुक थीं पर प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय होने कोे लेकर उनकी कुछ सीमायें थीं इसलिये स्वयं सामने न आकर अन्ना हजारे को आगे कर दिया। इन शक्तियों को यह सोच स्वाभाविक था कि प्रत्यक्ष रूप से सक्रियता पर उनको गैरों का ही नहीं बल्कि अपने लोगों का भी सामना करना पड़ सकता है। इसी मजबूरी का लाभ अन्ना हजारे को मिला।
             अब मान लीजिये जनलोकपाल बन भी गया तो अन्ना हजारे का नाम हो जायेगा। सवाल यह है कि जनलोकपाल से समस्या हल हो जायेगी। हल हो गयी तो ठीक वरना पासा उल्टा भी पड़ सकता है। जैसा कि कुछ लोग यह प्रश्न उठा रहे हैं कि वह भी अगर भ्रष्ट या उदासीन भाव तो निकला तो क्या होगा?
            अभी तो भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत प्रचार माध्यमों के हो हल्ला मचाने पर कार्यवाही हो जाती है और न करने पर संविधानिक संस्थाओं से सवाल पूछा जा सकता है। फिर कई जगह संविधानिक संस्थाऐं स्वयं भी सक्रिय हो उठती हैं। अगर जनलोकपाल बन गया तो फिर प्रचार माध्यम क्या करेंगे जब संविधानिक एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी से परे होती नजर आयेंगी। फिर भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाकी कानूनों का क्या होगा? क्या वह ठंडे बस्ते में पड़े रहेंगे। कहीं ऐसा तो नहीं प्रचार माध्यमों के हल्ले को थामने तथा संविधानिक एजेंसियों की सक्रियता को रोकने के लिये कथित रूप से एक स्वतंत्र जन लोकपाल की बात होती रही। अभी प्रचार माध्यम वर्तमान व्यवस्था के पदाधिकारियों पर बरस जाते हैं पर जनलोकपाल होने पर वह ऐसा नहीं कर पायेंगे। जनलोकपाल भ्रष्टाचार नहीं रोक पाया तो प्रचार माध्यम केवल उसका नाम लेकर रोते रहेंगे और व्यवस्था के पदाधिकारी जिम्मेदारी न निभाने के आरोप से बचे रहेंगे। जब प्रचार माध्यमा किसी के भ्रष्टाचार पर शोर मचायेंगे तो उनसे कहा जायेगा कि जाओ लोकपाल के पास, अगर उसने नहीं सुनी तो भी शोर मचाना मुश्किल होगा क्योंकि तब कहा जायेगा कि देखो उसे लोकपाल ने नहंी पकड़ा है। भगवान ही जानता है सच क्या है? अलबत्ता जिस तरह लग रहा है कि जनलोकपाल बनने के बाद भ्रष्टाचार पर प्रचार माध्यमों में मच रहा ऐसा शोर अधिक नहीं दिखाई देगा। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल होगा कि किसने किसके हित साधे?
          जहां तक भ्रष्टाचार खत्म होने का प्रश्न है उसको लेकर व्यवस्था के कार्य में गुणवत्ता तथा संचार तकनीकी की उपयोगिता को बढ़ाया जाना चाहिए। देखा यह जा रहा है कि व्यवसायिक क्षेत्र में कंप्यूटर का प्रयोग बढ़ा है पर समाज तथा व्यवस्था में उसे इतनी तेजी से उपयोग में नहीं लाया जा रहा है। इसके अलावा अन्य भी उपाय है जिन पर हम लिखते रहते हैं और लिखते रहेंगे। जैसा कि हम मानते हैं कि जनलोकपाल पर आंदोलन या बहस के चलते लोग अपनी परेशानियों के हल होने की आशा पर शोर मचाने की बजाय खामोश होकर बैठे हैं और यही बाज़ार तथा उसके प्रायोजित लोग चाहते हैं। कहीं परेशान लोगों के समय पास करने के लिये ऐसा किसी सीधे प्रसारित मनोरंजक धारावाहिक की पटकथा का हिस्सा तो नहीं है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Nov 17, 2011

अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और क्रिकेट मैच में फिक्सिंग-हिन्दी व्यंग्य (anna hazare ka anti corruption movement and fixing in cricket match-hindi satire article)

       अन्ना हजारे ने कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते जो प्रतिष्ठा अर्जित की उसे बाज़ार और उसका प्रचार माध्यम भुनाने में लगा है। जनमानस में उनकी लोकप्रियता का दोहन करने के लिये पहले तो फटाखे तथा अन्य सामा3न अन्ना छाप बने तो लंबी चौड़ी बहसों में टीवी चैनलों का विज्ञापन समय भी पास हो गया। इधर अन्ना हजारे साहब ने अपने ही प्रदेश के एक खिलाड़ी जिसे क्रिंकेट का कथित भगवान भी कहा जाता को भारत रत्न देने की मांग की है। ऐसे में लगता है कि बाज़ार और प्रचार समूहों ने शायद अपने भगवान को भारत रत्न दिलाने के लिये उनका उपयोग करना शुरु कर दिया है। हो सकता है अब यह सम्मान उसे देना भी पड़े। हालांकि इसके लिये अन्ना साहेब को अनशन या आंदोलन का धमकी देनी पड़ सकती है।
         एक बात यहां हम साफ कर दें कि हम न तो अन्ना हज़ारे के आंदोलन के विरोधी हैं न समर्थक! हम शायद इसके समर्थक होते अगर अन्ना ने अपने पहले अनशन की शुरुआत में ही विश्व कप क्रिकेट में भारत की विजय से प्रेरित होकर यह आंदोलन शुरु होने की बात नहीं कही होती। जिस तरह पेशेवर समाज सेवकों की मंडली ने उनके आंदोलन का संचालन किया उससे यह साफ लगा कि कहीं न कहीं आंदोलन प्रायोजित है और देश की निराश जनता में एक आशा का संचार करने का प्रयास है ताकि कहीं उसकी नाराजगी कहीं देश में बड़े तनाव का कारण न बन जाये। ऐसे में बाज़ार और प्रचार समूहों के स्वामियों के लिये यह जरूरी होता है कि वह कोई महानायक खड़ा कर जनता को आशावदी बनाये रखें। उस समय विश्व के कुछ देशों में अपने कर्णधारों के नकारापन से ऊगह निराश जनता हिंसा पर उतर रही थी तब भारतीय जनता में आशा का संचार करने के लिये उनका आंदोलन चलवाया गया लगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी फिक्सिंग होना बुरा नहीं है पर मुश्किल तब होती है जब जज़्बातों ने ओतप्रोत लोगों को यह बात कहीं जाये तो वह उग्र हो जाते हैं
             देश की स्थिति से सभी चिंतित हैं और इस पर तो हम पिछले छह साल से लिख ही रहे है। क्रिकेट का किसी समय हमें बहुत शौक था पर जब क्रिकेट में फिक्सिंग की बात पता चली तो दिल टूट गया और उसके बाद जब कोई इस खेल का नाम लेता है तो हमें अच्छा नहीं लगता।
          क्रिकेट में फिक्सिंग होती है और इस पर चर्चा प्रचार माध्यमों में अब जमकर चल रही है। आज ही पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी कांबली ने आरोप लगाया कि सन् 1996 में कलकत्ता में खेले गये विश्व कप किकेट सेमीफायनल में भारत के कुछ खिलाड़ियों ने मैच में हार फिक्स की थी। 15 साल बाद यह आरोप वह तब लगा रहे हैं जब सारा देश क्रिकेट मैच देखते हुए भी यह मानता है कि वह फिक्स हो सकता है। स्पष्टतः बाज़ार और प्रचार समूहों ने अपने लाभ के लिये क्रिकेट खेल को व्यवसाय बना लिया है। इतना ही नहीं सट्टा बाज़ार में भी वह अन्य उत्पाद से ज्यादा व्यापार करने वाला खेल बन गया है। ऐसे में इस खेल को मनोरंजन के लिये या फिर टाईम पास के लिये देखना बुरा नहीं है पर इसमें शुचिता की आशा करना मूर्खता है।
           जब अन्ना हज़ारे क्रिकेट से अपने लगाव और किसी खिलाड़ी को भारत रत्न देने की बात कर रहे हैं तो उनको नहीं पता कि इससे वह देश के उन लाखों लोगों के घावों को कुरेद रहे हैं जिन्होंने अपनी युवावस्था इस खेल को देखते हुए गुजार दी और तब पता लगा कि उनके देश के खिलाड़ी तो बाज़ार, प्रचार और अपराध जगत के संयुक्त उपक्रम के तय किये हुए पात्र हैं जो उनके इशारे पर ही चलकर कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे में उनमें से कुछ लोग अन्ना हजारे के आंदोलन को ही नहीं उनकी कार्यशैली पर भी प्रश्न उठा सकते हैं।
            आखिरी बात यह कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक महान कार्य है और उसके अगुआ होने के नाते अन्ना को प्रमाद वाले विषयों से दूर रहना चाहिए था। हम उन पर कोई अपनी बात थोप नहीं रहे पर यह सच है कि क्रिकेट से संबंधित विषय अनेक लोगों के लिये मनोरंजन के अलावा कुछ नहीं है। फिर अन्ना हज़ारे के कथित आंदोलन किसी परिणाम की तरफ जाता नहीं दिख रहा। दूसरा यह भी कि अन्ना हजारे ने जनलोकपाल का जो स्वरूप तय किया था उसे आमजन न समझें हो पर जानकार उस नजर रखे हुए हैं। एक बात यहां भी बता दें कि अन्ना हजारे साहब के लक्ष्य और उनके जनलोकपाल के स्वरूप में तालमेल पहले से ही नहीं दिख रहा था। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाने के लिये जूझ रहे अन्ना साहब ने कहा था कि देश में आम जनता से जुड़ी राशन कार्ड, लाइसैंस, विद्यालयों में बालकों के प्रवेश तथा बिजली पानी समस्याओं का निराकरण होना चाहिए। स्पष्टतः यह सभी राज्यों का विषय है जबकि केंद्र सरकार के लोकपाल की परिधि केवल राष्ट्रीय समस्याओं का हल ही संभव है। फिर अन्ना पूरे देश में एक जनलोकपाल की बात कर रहे हैं पर उसके कार्य क्षेत्र का विषय केवल केंद्र होगा। मान लीजिये संसद में लोकपाल विधेयक पास भी हो गया तो क्या अन्ना आम जनता की समस्याओं के हल का दावा कर रहे हैं वह संभव होगा?
              हम यहां अन्ना समर्थकों को निराश नहीं करना चाहते पर एक बात बता दें कि हमें अन्ना के दावों, सरकार के वादों तथा तथा लोगों की यादों के बीच में जाकर देखना है इसलिये निरंतर इस विषय पर कुछ न कुछ लिखते रहते हैं। यह सही है कि हमें अधिक पढ़ा नहीं जाता पर दूसरा सच यह भी कि सुधि लोग पढ़कर इसे अपने लेखों में स्थान देते हैं। हमारा नाम नदारत हो तो क्या पर वह हमारा संदेश जनता के बीच में जाता तो है। बाज़ार और प्रचार समूह क्रिकेट की बात करते हैं अन्ना भी कर रहे हैं। ऐसे में लगता है कि कहीं न कहीं उनके आंदोलन में फिक्सिंग भी हो सकती है भले ही उन्होंने नहीं की हो। देश में भ्रष्टाचार हटाना तो असंभव है पर उसे न्यूनतम स्तर तक लाया जा सकता है पर वह भी ढेर सारी मुंश्किलों के बाद! अलबत्ता अन्ना चाहें तो अपने ही प्रदेश के खिलाड़ी को भारत रत्न दिला सकते हैं। हां, उन्होंने इतनी अच्छी छवि बना ली है कि बाज़ार अपने व्यापारिक उत्पाद और प्रचार माध्यम विज्ञापन से अच्छी कमाई करवाने वाले भगवाने को भारत रत्न दिला सकता है। अभी तक अन्ना अपने आंदोलन को आधी जीत बताकर जनता को खुश करते रहे थे पर भारत रत्न दिलाकर वह देश के जनमानस को पूरी जीत का तोहफा दे सकते हैं। वैसे भी अन्ना देश में राजकीय क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की बात करते हैं क्रिकेट में उनको वह नहीं दिखता मगर जिनको दिखता है वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बारे में तमाम तरह के अनुमान भी कर सकते हैं। उनको लग सकता है अन्ना हजारे के आंदोलन प्रबंधक चूंकि बाज़ार से प्रायोजित हैं इसलिये उनके माध्यम से वह अपने हित साध सकता है।
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Nov 11, 2011

रूह और दिमाग-हिन्दी शायरी

मेरे दिल में न खुशी है
न कोई गम है
अपनी हालातों से परेशान लोग
हैरान है यह देखकर
यह कभी रोता नहीं
कभी हंसता भी नहीं
बिचारे नहीं जानते
बाज़ार में बिकने वाले
जज़्बात मैंने खरीदना छोड़ दिया है,
इंसानों के फरिश्ते होने की
उम्मीद कभी नहीं करता
अपनी रूह से दिमाग का
अटूट रिश्ता जोड़ दिया है।
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Oct 27, 2011

चुंबन का स्वाद न मीठा न नमकीन-हिन्दी हास्य व्यंग्य रचना (chumban ka swad n meetha n namakeen-hindi hasya vyangya or comic satire article in hindi)

          सिनेमा या टीवी के पर्दे पर चुंबन का दृश्य देखकर लोगों के मन में हलचल पैदा होती है। पहले की युवा पीढ़ी तो देखकर मन में कसमसाकर रह जाती थी क्योंकि उस समय लड़कियों की शैक्षणिक तथा व्यवसायिक क्षेत्रों में उपस्थिति नहिनी थी। अब समय बादल गया है और खुलेपन के कारण युवा पीढ़ी को सार्वजनिक रूप से प्रेम के अवसर खूब मिलते हैं और वह उनका उपयोग करने के लिए बेताब हो उठती है।  अगर ऐसे में कहीं किसी प्रसिद्ध हस्ती ने किसी दूसरी हस्ती का सार्वजनिक रूप से चुंबन  लिया और उसकी खबर उड़ी तो हाहाकार भी मच जाता है। कुछ लोग मनमसोस कर रह जाते हैं कि उनको ऐसा अवसर नहीं मिला पर कुछ लोग समाज और संस्कार विरोधी बताते हुए सड़क पर कूद पड़ते हैं। चुंबन विरोधी चीखते हैं कि‘यह समाज और संस्कार विरोधी कृत्य है और इसके लिये चुंबन लेने और देने वाले को माफी मांगनी चाहिये।’
          अब यह समझ में नहीं आता कि सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना समाज और संस्कारों के खिलाफ है या अकेले में भी। अगर ऐसा है तो फिर यह कहना कठिन है कि कौन ऐसा व्यक्ति है जो कभी किसी का चुंबन नहीं लेता। अरे, मां बाप बच्चे का माथा चूमते हैं कि नहीं। फिर अकेले में कौन किसका कैसे चुंबन लेता है यह कौन देखता है और कौन चुंबन ले देकर उसको सार्वजनिक रूप से प्रकट करता है?
           किसी के सार्वजनिक रूप से चुंबन लेने देने पर लोग ऐसे ही हाहाकार मचा देते हैं भले ही लेने और देने वाले आपस में सहमत हों। अगर किसी विदेशी होंठ ने किसी देशी गाल को चुम लिया तो बस राष्ट्र की प्रतिष्ठा के लिए खतरा और समाज के साथ ही  संस्कार विरोधी घोषित कर दिया जाता है। अन्य  भी न जाने कितनी नकारात्मक संज्ञाओं से उसे नवाजा जाता है। कहीं कहीं तो जाति,धर्म और भाषा का लफड़ा भी खड़ा हो जाता है। पश्चिमी देशों में सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना शिष्टाचार माना जाता है जबकि भारत में इसे अभी तक अशिष्टता की परिधि में रखा जाता है। यह किसने रखा पता नहीं पर जो रखते हैं उनसे बहस करने का साहस किसी में नहीं होता क्योंकि वह सारे फैसले ताकत से करते हैं और फिर समूह में होते हैं।
          इतना तय है कि विरोध करने वाले भी केवल चुंबन का विरोध इसलिये करते हैं कि वह जिस सुंदर चेहरे का चुंबन लेता हुआ देखते हैं वह उनके ख्वाबों में ही बसा होता है और उनका मन आहत होता है कि हमें इसका अवसर क्यों नहीं मिला? वरना एक चुंबन से समाज,संस्कृति और संस्कार खतरे में पड़ने का नारा क्यों लगाया जाता है।
           दूसरे संदर्भ में इन विरोधियों को यह यकीन है कि समाज में कच्चे दिमाग के लोग रहते हैं और अगर इस तरह सार्वजनिक रूप से चुंबन लिया जाता रहा तो सभी यही करने लगेंगे। ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस आता है जो पूरे समाज को कच्ची बुद्धि का समझते हैं। यकीनन उनको अपनी आक्रामकता से ही समाज की संस्कृति और संस्कार बचते नज़र आते है।
         फिल्मों में भी नायिका के आधे अधूरे चुंबन दृश्य दिखाये जाते हैं। नायक अपना होंठ नायिका के गाल के पास लेकर जाता है और लगता कि अब उसने चुंबन लिया पर अचानक दोनों में से कोई एक या दोनों ही पीछे हट जाते हैं। इसके साथ ही सिनेमाहाल में बैठे वह  लड़के -जो इस आस में हो हो मचा रहे होते हैं कि अब नायक ने नायिका का चुंबन लिया-हताश होकर बैठ जाते हैं। चुम्मा चुम्मा ले ले और देदे के गाने जरूर बनते हैं नायक और नायिक एक दूसरे के पास मूंह भी ले जाते हैं पर चुंबन का दृश्य फिर भी नहीं दिखाई देता। फिल्म निर्माता जानते हैं कि ऐसा करना खतरनाक हो सकता है।
        आखिर ऐसा क्यों? क्या वाकई ऐसा समाज और संस्कार के ढहने की वजह से है। नहीं! अगर ऐसा होता तो फिल्म वाले कई ऐसे दृश्य दिखाते हैं जो तब तक समाज में नहीं हुए होते पर जब फिल्म में आ जाते हैं तो फिर लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। फिल्म से सीख कर अनेक अपराध हुए हैं ऐसे में अपराध के नये तरीके दिखाने में फिल्म वाले गुरेज नहीं करते पर चुंबन के दृश्य दिखाने में उनके हाथ पांव फूल जाते हैं। सच तो यह है कि चुंबन  जब तक लिया न जाये तभी तक ही आकर्षण है उसके बाद तो फिर सभी खत्म है। यही कारण है कि काल्पनिक प्यार बाजार में बिकता रहे इसलिये होंठ और गाल पास तो लाये जाते हैं पर चुंबन का दृश्य अधिकतर दूर ही रखा जाता है।
       यह बाजार का खेल है। अगर एक बार फिल्मों से लोगों ने चुंबन लेना शुरू किया तो फिर सभी जगह सौंदर्य सामग्री की पोल खुलना शुरू हो जायेगी। महिला हो या पुरुष सभी सुंदर चेहरे सौंदर्य सामग्री से पुते होते हैं और जब चुंबन लेंगे तो उसका स्पर्श होठों से होगा। तब आदमी चुंबन लेकर खुश क्या होगा अपने होंठ ही साफ करता फिरेगा। सौंदर्य प्रसाधनों में कोई  ऐसी चीज नहीं होती जिससे जीभ को स्वाद मिले। कुछ लोगों को तो सौदर्य सामग्री से एलर्जी होती और उसकी खुशबू से चक्कर आने लगते हैं। अगर युवा वर्ग चुंबन लेने और देने के लिये तत्पर होगा तो उसे इस सौंदर्य सामग्री से विरक्त होना होगा ऐसे में बाजार में सौंदर्य सामग्री के प्रति पागलपन भी कम हो जायेगा। कहने का मतलब है कि गाल का मेकअप उतरा तो समझ लो कि बाजार का कचड़ा हुआ। याद रखने वाली बात यह है कि सौदर्य की सामग्री बनाने वाले ही ऐसी फिल्में के पीछे भी होते हैं और उनका पता है कि उसमें ऐसी कोई चीज नहीं है जो जीभ तक पहुंचकर उसे स्वाद दे सके।
       कई बार तो सौंदर्य सामग्री से किसी खाने की वस्तु का धोखे से स्पर्श हो जाये तो जीभ पर उसके कसैले स्वाद की अनुभूति भी करनी पड़ती है। यही कारण है कि चुंबन को केवल होंठ और गाल के पास आने तक ही सीमित रखा जाता है। संभवतः इसलिये गाहे बगाहे प्रसिद्ध हस्तियों के चुंबन पर बवाल भी मचाया जाता है कि लोग इसे गलत समझें और दूर रहें। समाज और संस्कार तो केवल एक बहाना है।
        एक आशिक और माशुका पार्क में बैठकर बातें कर रहे थे। आसपास के अनेक लोग उन पर दृष्टि लगाये बैठै थे। उस जोड़े को भला कब इसकी परवाह थी? अचानक आशिक अपने होंठ माशुका के गाल पर ले गया और चुंबन लिया। माशुका खुश हो गयी पर आशिक के होंठों से क्रीम या पाउडर का स्पर्श हो गया और उसे कसैलापन लगा। उसने माशुका से कहा‘यह कौनसी गंदी क्रीम लगायी है कि मूंह कसैला हो गया।’
       माशुका क्रोध में आ गयी और उसने एक जोरदार थप्पड़ आशिक के गाल पर रसीद कर दिया। आशिक के गाल और माशुका के हाथ की बीचों बीच टक्कर हुई थी इसलिये आवाज भी जोरदार हुई। उधर दर्शक तो जैसे तैयार बैठे ही थे। वह आशिक पर पिल पड़े। अब माशुका उसे बचाते हुए लोगों से कह रही थी कि‘अरे, छोड़ो यह हमारा आपसी मामला है।’
      एक दर्शक बोला-‘अरे, छोड़ें कैसे? समाज और संस्कृति को खतरा पैदा करता है। चुंबन लेता है। वैसे तुम्हारा चुंबन लिया और तुमने इसको थप्पड़ मारा। इसलिये तो हम भी इसको पीट रहे हैं।’
        माशुका बोली‘-मैंने चुंबन लेने पर थप्पड़ थोड़े ही मारा। इसने चुंबन लेने पर जब मेरी क्रीम को खराब बताया। कहता है कि क्रीम से मेरा मूंह कसैला हो गया। इसको नहीं मालुम कि चुंबन कोई नमकीन या मीठा तो होता नहीं है। तभी इसको मारा। अरे, वह क्रीम मेरी प्यारी क्रीम है।’
       तब एक दर्शक फिर आशिक पर अपने हाथ साफ करने लगा और बोला-‘मैं भी उस क्रीम कंपनी का ‘समाज और संस्कार’रक्षक विभाग का हूं। मुझे इसलिये ही रखा गया है कि ताकि सार्वजनिक स्थानों पर कोई किसी का चुंबन न ले भले ही लगाने वाला कोई  भी क्रीम लगाता हो। अगर इस तरह का सिस्टम शुरु हो जायेगा तो फिर हमारी क्रीम बदनाम हो जायेगी।’
        बहरहाल माशुका ने जैसे तैसे अपने आशिक को बचा लिया। आशिक ने फिर कभी सार्वजनिक रूप से ऐसा न करने की कसम खाई।
        हमारा देश ही नहीं बल्कि हमारे पड़ौसी देशों में भी कई चुंबन दृश्य हाहाकर मचा चुके हैं। पहले टीवी चैनल वाले प्रसिद्ध लोगों के चुंबन दृश्य दिखाते हैं फिर उन पर उनके विरोधियों की प्रतिक्रियायें बताना नहीं भूलते। कहीं से समाज और संस्कारों की रक्षा के ठेकेदार उनको मिल ही जाते हैं।
        वैसे पश्चिम के स्वास्थ्य वैज्ञानिक चुंबन को सेहत के लिये अच्छा नहीं मानते। यह अलग बात है कि वहां चुंबन खुलेआम लेने का शिष्टाचार है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे बुरा समझा जाता है। चुंबन लेना स्वास्थ्य के लिये बुरा है-यह जानकर समाज और संस्कारों के रक्षकों का सीना फूल सकता है पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि अमेरिकन आज भी आम भारतीयों से अधिक आयु जीते हैं और उनका स्वास्थ हम भारतीयों के मुकाबले कई गुना अच्छा है।
         वैसे सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना अशिष्टता या अश्लीलता कैसे होती है इसका वर्णन पुराने ग्रंथों में कही नहीं है। यह सब अंग्रेजों के समय में गढ़ा गया है। जिसे कुछ सामाजिक संगठन अश्लीलता कहकर रोकने की मांग करते हैं,कुछ लोग कहते हैं कि वह सब अंग्रेजों ने भारतीयों को दबाने के लिये रचा था। अपना दर्शन तो साफ कहता है कि जैसी तुम्हारी अंतदृष्टि है वैसे ही तुम्हारी दुनियां होती है। अपना मन साफ करो, पर भारतीय संस्कृति के रक्षकों देखिये वह कहते हैं कि नहीं दृश्य साफ रखो ताकि हमारे मन साफ रहें। अपना अपना ज्ञान है और अलग अलग बखान है।
जहां तक चुंबन के स्वाद का सवाल है तो वह नमकीन या मीठा तभी हो सकता है जब सौंदर्य सामग्री में नमक या शक्कर पड़ी हो-जाहिर है या दोनों वस्तुऐं उसमें नहीं होती।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Oct 16, 2011

विश्व में महंगाई, मंदी और बेरोजगारी पर बढ़ता असंतोष खतरनाक-आर्थिक विषय पर हिन्दी लेख-vishva mein mehngai,mandi aur berojgari par badhta asantosh-hindi article on ecomonmics subject)

          दुनियां भर के 82 देशों एक हजार के करीब शहरों में मंदी, महंगाई और बेरोजगारी के विरुद्ध प्रदर्शन होना आम भारतीय के लिये कोई बड़ी बात नहीं है पर देश के आर्थिक रणनीतिकारों, धनपतियों तथा उन उच्च मध्यमवर्गीय लोगों के लिये चिंता की बात होगी जिनके मुख हमेशा पश्चिम की तरफ ताकते हैं इस आशा के साथ हम उनकी राह पर चलकर हम विकसित राष्ट्र कहलायें। यह हम इसलिये कह रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के दोहरे रूप सामने आ रहे हैं। एक तो आधुनिक अर्थव्यवस्था है जो शुद्ध रूप से औद्योगिक आधार पर टिकी है दूसरी वह हो हमारी परंपरागत कृषि व्यवस्था है जिसके सहारे पूरा देश जिंदा है। सच बात तो यह है कि आज भी हम कृषि पर निर्भरता कम नहीं कर पाये तो औद्योगिक विकास का लाभ चंद पूंजीपतियों के इर्दगिर्द सिमट गया। हमने पश्चिमी देशों के दबाव में आर्थिक उदारीकरण किया पर उसी सीमा तक जिसमें केवल धनपतियों को ही लाभ हों। उस समय हमारे देश के रणनीतिकारों को पश्चिम में आने वाली भावी तबाही का आभास नहीं रहा होगा। आज अगर हमारे यहां भ्रष्टाचार और महंगाई के विरुद्ध कोई बड़ा आंदोलन चलता है तो लोग उसमें शािमल हो जाते हैं। इसके बावजूद लगता नहीं है कि देश के आर्थिक रणनीतिकार इसे समझना चाह रहे हों।
        हमारे यहां औद्योगिक आधार पर लाभ श्रमिकों से अधिक पूंजीपतियों को है और अर्थशास्त्र के जो विद्यार्थी रहे हैं वह जानते हैं कि धन का असमान वितरण हमारी अर्थव्यवस्था की बहुत बड़ी समस्या हैं। कहने को हमारे देश र्के आािक नीतियां अर्थशास्त्रियों से राय लेकर बनाई जाती होंगी पर लगता नहीं है कि उन पर अमल हुआ होगा। संभव है कि अर्थशास्त्री भी इस तरह के होंगे जिनको अपनी राय देते समय ही इस तरह का प्रयास करते होंगे कि देश के अर्थप्रबंधकों को जो बात अच्छी लगे वही कही जाये। वरना यह संभव नहीं है कि जिस समस्या को पचास बरस से देखा जा रहा है वह कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। पहले तो यह माना गया कि औद्योगिक विकास के कारण भारत की रोजगार समस्या का हल हो जायेगा। यही कारण है कि कृषि विकास की बजाय उद्योगों की तरफ ध्यान दिया गया। इन प्रयासों के बावजूद स्थिति यह है कि औद्योगिक विकास का कोई लाभ देश को नहीं मिला सिवाय इसके कि चंद ऐसे लोगों को रोजगार मिला जो कृषि से ही आते रहे। हमारे यहां कुछ बुद्धिजीवी चीन को आर्थिक विकास प्रेरक मानने की बात कह रहे हैं पर जिस तरह पूरे विश्व की हालत है उसे देखकर नहीं लगता कि वहां कोई असंतोष नहीं है-यह अलग बात है कि तानाशाही होने के कारण उसके विश्व सूचना पटल पर आने की संभावना नहीं है।
          कभी कभी तो लगता है कि सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा कलात्मक क्षेत्रों में जड़ता की स्थिति है। वहां चंद परिवारों या समूहों का कब्जा है। शिखर पर विराजमान लोग अपनी पूरी शक्ति केवल अपना प्रभाव बनाये रखने पर खर्च कर रहे हैं। उनके सारे प्रयास नये लोगों या समूहों का राष्ट्रीय दृश्य पटल पर आने से रोकना है। उन्होंने अपनी आर्थिक शक्ति, बुद्धि तथा सपने पश्चिमी देशों के पास गिरवी रख दी है। आम आदमी के प्रति नफरत, द्वेष तथा चिढ़ के भाव हैं पर उनको व्यक्त करने वाले माध्यम भी तो इन्हीं प्रभावी लोगों के हाथ में है इसलिये उसका आभास नहीं होता। कुछ आंदोलन होते हैं पर उसमें सक्रिय लोग प्रायोजित लगते हैं और कहीं न कहीं वर्तमान शिखर पुरुषों से उनके संबंध जाहिर हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि जनअसंतोष को उबरने न देने के लिये शिखर पुरुष प्रायोजित लोगों को आगे कर देते हैं ताकि लोग यह समझें कि उनके हितों के लिये कोई जूझ रहा है। ऐसे अंादोलनों का परिणामविहीन रहना या फिर शिखरपुरुषों के अनुरूप फलदायी होना इस बात की पुष्टि करता है। हमारे देश के बुद्धिमानों के पास एक दूसरी सुविधा भी है कि वह भारत के लोगों के मन की भाषा, जाति, धर्म क्षेत्र तथा वर्ण संबंधी कमजोरियों की वजह देश की वास्तविक समस्याओं को भुलाने के लिये वह ऐसे संवेदनशीन मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा कर लेते हैं जिससे विवाद और बहसों की दिशा बदल जाती है।
          बहरहाल पश्चिमी देशों के बढ़ते तनाव के परिणाम क्या होंगे यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि कहीं न कहीं भारत के शिखर पुरुषों पर उनका प्रभाव बढ़ेगा। इसका कारण यह है कि इन सभी की आत्मायें विदेशों में ही बसती हैं और ऐसा लगता है कि वह अपनी देह लेकर यहां इसलिये जमे हैं क्योंकि इसके बिना बाहर उनका आधार बना नहीं रह सकता। यहां शोषक बनकर ही वह विदेशों में सेवक बने रह सकते हैं, इसी कारण ही अनेक जनवादी बुद्धिजीवी देश के आर्थिक रूप से गुलाम होने के आरोप लगाते हैं। उनसे असहमत होने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि हम यह अब सब प्रत्यक्ष देख रहे हैं। मूल बात यह है कि भारत में जनअसंतोष बड़े पैमाने पर है पर यहां इसका उपयोग भी पेशेवर समाज सेवक कर रहे हैं। प्रत्यक्ष रूप से वह भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई तथा कालाबाजारी के विरुद्ध आंदोलन करते हैं पर उनका लक्ष्य लोकप्रियता प्राप्त कर फिर शिखर पुरुषों की प्रवाहित शोषण की धारा में शामिल होना होता है। जब यह बात देश समझ जायेगा तभी यह पता चलेगा कि यहां कोई बड़ा आंदोलन चल पाता है कि नहीं। एक बात तय है कि बड़े से बड़ा विशेषज्ञ भी फिलहाल भारत में किसी भारी बदलाव की आशा नहीं करता। हालांकि देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार तथा सामाजिक वैमनस्य इस कदर खतरनाक सीमा तक पहुंच गया है जहां टूटे समाजों से देशभक्ति की आशा करना बेकार है और यह स्थिति परमाणु बम के गिराने अधिक खतरनाक है।
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Oct 1, 2011

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी और भारत की चिंता-हिन्दी लेख (afganisatan,america and india ,milatry action ofr peace-hindi lekh(

         अमेरिका अब अफगानिस्तान से जाने की तैयारी कर रहा है तो भारतीय रणनीतिकारों की सांसें फूल रही हैं। भारतीय प्रचार माध्यमों के सूचीबद्ध बुद्धिजीवियों के लिये यह संभव नही है इस विषय पर वह सार्थक बहस कर सकें। यही सूचीबद्ध बुद्धिजीवी न केवल चैनलों पर आते रहते हैं बल्कि समाचार पत्रों में भी उनके लेख वगैरह छपते हैं। इस बात पर तो बहस हो जायेगी कि अफगानिस्तान ने अमेरिका की सेना वापस जाना चाहिए कि नहीं पर इस पर शायद ही कोई अपनी बात ठोस ढंग से कह सके कि भारतीय रणनीतिकारों की सांस इससे फूल क्यों रही है?
       हम इस पर लिख रहे हैं तो हमारे पास जो जानकारी है वह इन्हीं प्रचार माध्यमों के समाचारों पर आधारित हैं यह अलग बात है कि वह उनको राजनीति, समाज, आर्थिक तथा पत्रकारिता के आधारों पर अलग श्रेणीबद्ध करते हैं पर उनके आपसी संबंध पर उनके सूचीबद्ध बुद्धिजीवी दृष्टिपात नहीं कर। किसी समय अफगानिस्तान पाना अमेरिका का लक्ष्य था और आज वहां बने रहना उसके लिये समस्या बन गया है। अगर हम राष्ट्रीय आधारों पर देखें तो यह समस्या अमेरिका की है कि उसकी सेना वहां रहे या जाये। हमें उसमें दिलचस्पी नहीं लेना चाहिए। जब हमारे रणनीतिकार इस बात से घबड़ाते हैं कि वहां से अमेरिकी सेना जाने के बाद भारत पर संकट आ सकता है तो यह बात माननी पड़ेगी कि वहां हमारे लिये भी समस्या है और हम उससे निपटने में सक्षम नहीं है। दूसरी बात यह है कि हम अगर अपने देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक शक्ति के स्तोत्रों को देखें तो ऐसा नहीं लगता कि हमारे लिये कोई बड़ी समस्या है। सामाजिक और एतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करें तो भी ऐसा नहीं लगता कि वहां की आम जनता हमारे से कोई नफरत करती है। तब सवाल उठता है कि आखिर समस्या क्या और कहां है?
         दरअसल हमारे देश ने चालीस वर्ष से कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा। जब हम अपने अंदर बैठे राष्ट्र की संकल्पना को देखते हैं तो पाते हैं कि हर राष्ट्र को अपनी रक्षा के लिये युद्ध करना ही पड़ते हैं। हालांकि भारतीय परिस्थ्तिियों में युद्ध का मतलब भयावह ही होता है। 1971 में पाकिस्तान से युद्ध में विजय तो पाई पर आर्थिक रूप से यह देश वहां से टूटा तो फिर खड़ा नही हो सका। वहां से महंगाई का जो दौर चला तो फिर आज तक थमा नहीं है। विकास हुआ पर जरूरतों भी बढ़ी। कमाई बढ़ी पर रुपये का मूल्य गिरता गया। समाज में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक शिखरों पर बैठे पुरुषों के लिये अब यही समस्या है कि वह अस्तित्व कैसे बनायें रखें। उनकी दिलचस्पी देश की आम जनता के दोहन में है। वह कमाते हैं पर गुणगान अमेरिका और ब्रिटेन का करते हैं। कभी कभी तो लगता है कि देश के शिखर पुरुषों की आत्मा ही अब पश्चिम में बसती है। ऐसे में युद्ध से होने वाली हानि में वह अपनी हानि देखने के साथ ही अपने अस्तित्व का संकट भी अनुभव करते हैं। यही कारण है कि उनको लगता है कि यह देश सुरक्षित रहे और युद्ध भी न करना पड़े इसलिये अमेरिका से वह यही अपेक्षा करते हैं कि वह अफगानिस्तान में अपनी सेना बनाये रखें।
        एक बात तय है कि अफगानिस्तान के आर्थिक संसाधनों का लाभ भारतीय धनपतियों को कहीं न कहीं मिलता है-भले ही वह वैध व्यापार से हो या अवैध व्यापार से। इसके अलावा अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में सक्रिय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जब बात होती है तो भारतीय आर्थिक विश्लेषक इस बात पर प्रकाश नहीं डालते कि उनमें भारतीय धनपतियों का अंश कितना है? हम जानते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कहीं न कहीं भारतीय पैसा और श्रम लगा हुआ है। यह अलग बात है कि इनके कर्ताधर्ता प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकन या ब्रिटिश पूंजीपति हों। स्पष्टतः वैश्विक उदारीकरण के चलते पूरे संसार के धनपति एक हो गये हैं। यह धनपति चाय की पत्ती से लेकर अंतरिक्ष तकनीकी बेचने तक का काम करते हैं। दूसरी बात यह है कि धनपतियों का कहीं न कहीं अपराधियों से सभी संबंध हो गया है और इसी कारण अवैध हथियारों की तस्करी और मादक द्रव्य का व्यापार भी बढ़ा है। इन्हीं धनपतियों के प्रभाव राज्यों पर स्पष्टतः दिखाई देते हैं। भारतीय धनपतियों का प्रभाव जिस तरह विश्व में बढ़ा है उससे लगता है कि अब अफगानिस्तान में भारतीय धनपतियों के लाभ की शायद अधिक संभावना है और अमेरिकी रणनीतिकार इसे समझ रहे हैं। हालांकि भारतीय धनपतियों की अमेरिकी रणनीतिकार अनदेखी नहीं कर सकते पर भविष्य की अधिक संभावनाओं के चलते वह कुछ भी कर सकते हैं। कहीं न कहीं भारतीय धनपति इस बात की अपेक्षा कर रहे हैं कि अमेरिका अफगानिस्तान में बना रहे ताकि उसके प्रबंधकों के सहारे वहां के संसाधनों का दोहन किया जा सके।
         जिस तरह हमारे देश में भ्रष्टाचार जोर पकड़ चुका है। समाज का आम आदमी टूट रहा है ऐसे में किसी भी युद्ध की संभावना किसी को भी डरा देती है। मुश्किल यह भी है कि जब हम एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो ऐसे युद्ध लड़ना भी पड़ेंगे। देश के शिखर पुरुषों को आम जनता से अधिक खतरे भी उठाने पड़ेंगे। इधर अब देख रहे है कि सभी प्रकार के शिखर पुरुषों के स्वामी आर्थिक शिखर पर बैठे धनपति हो गये है। अब यह अलग बात है कि अपने ही प्रचार माध्यमों की वजह से भारतीय धनपतियों के प्रति आम जनता का उनमें विश्वास नहीं रहा। इस पर जिस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा आतंकवाद को धन देने की बातें सामने आ रही हैं उससे देश का जनमानस अब इस बात को समझने लगा है कि व्यापारियों का काम केवल कमाना है देशभक्ति दिखाना नहीं। जरूरत पड़े तो वह देशभक्ति को पर्दे पर बेचकर वह पैसा भी कमा सकते हैं। इधर भारतीय रणनीतिकारों को भी सुविधायें भोगने की आदत हो गयी है। पड़ोस में इतने बड़े युद्ध हो गये पर उनको अपना दिमाग चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। अगर अमेरिका की सेना अफगानिस्तान से चली गयी तो उनको दिमागी कसरत करनी होगी। आर्थिक लाभ से अधिक सामरिक स्थिति पर अधिक सोचना होगा। सबसे बड़ी बात यह कि इसके चलते भारत के पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान शिखर पुरुषों से दोस्ती निभाने के अवसर कम मिलेंगे। अभी हम देख रहे हैं कि हमारे रणनीतिकार इन दोनों देशों से आर्थिक हितों पर ही बात करते हैं। सामरिक महत्व की कोई चर्चा नहीं होती क्योंकि अमेरिकी सेना के वहां रहते हुए हम ‘बाह्य मामलों में हस्तक्षेप से बचने का बहाना’ बना लेते हैं क्योंकि वहां द्वंद्व अमेरिका की स्थिति को लेकर ही चल रहा है। । इस समय अफगानिस्तान के कथित जुझारु लोग अमेरिका से जूझ रहे हैं उसके जाते ही वह भारत की तरफ मुखातिब होंगें तब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के शिखर पुरुषों से आर्थिक लाभ वाला दोस्ताना खतरे में पड़ सकता है क्योंकि तब सैन्य और सामरिक महत्व के विवादास्पद मामले भी उठ खड़े होंगे। तय बात है कि वह आतंकवाद को लेकर ही होंगे।
       भारतीय रणनीतिकारों की यह चिंता उनकी कमजोरियों को दर्शाती है। वह यह भी दर्शाती है कि सामरिक रूप से शक्तिशाली होते हुए भी हम भारतीयों में वीरता और देश के लिये त्याग करने के संकल्प की कमी है। चालीस साल से शांति भोगते भोगते कहीं न कहीं कायरता का भाव आ गया है। आर्थिक लाभ ही हमारे लिये सर्वोपरि है। हालांकि पहली बात तो यह कि अमेरिका अभी तत्काल अफगानिस्तान से नहंी जाने वाला है इसलिये फिलहाल चिंतायें दूर की हैं। दूसरी बात यह भी है कि जिस तरह अंग्रेज भारत और पाकिस्तान में अपने चरणपुरुष छोड़कर गये वैसे वह अफगानिस्तान में नहीं कर सकता। एक बार वह वहां से निकला तो फिर वहां उसका प्रभाव समाप्त हो जायेगा ऐसे में भारत और पाकिस्तान के धनपतियों के लाभ प्रभावित होंगे। शायद यही कारण है कि भारतीय रणनीतिकार इतने चिंतित है पर जिस तरह भारतीय धनपति देश के प्रति लापरवाह हो गये हैं इस चिंता में आम जनमानस उनके साथ नहीं है।
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Sep 16, 2011

विकास और महंगाई-हिन्दी हास्य कविता (vikas aur mehangai or mahangai-hindi hasya kavita)

उनसे पूछा गया कि
‘‘आप इस तरह कब तक महंगाई बढ़ायेंगे,
आम आदमी को यूं तड़पायेंगे,
समझ में नहीं आता
आप लोगों का दर्द कैसे समझ पायेंगे।’’

वह बोले
‘देश विकास की तरफ बढ़ रहा है
चाहे आतंकवाद से लड़ रहा है,
तुमने सुना नहीं हमने चवन्नी बंद कर दी है,
उसी तरह हम चाहते हैं कि
दस, पचास और सौ के नोट को रोने वाले
गरीब लोग
हजार और पांच सौ के नोट पाने लगे,
महंगाई बढ़ेगी तो कमाई भी बढ़ेगी
किसी तरह गरीबी दूर भगे
अमीर भी अपनी दौलत आसानी से
गरीबों में बांटने के साथ ही
इधर उधर ले जायेंगे,
अभी तक अमीर ही देख रहे हैं हजार के नोट
हमारी कोशिश से गरीब भी देख पायेंगे।
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Sep 9, 2011

हिन्दी का महत्व गरीबों की वजह से ही तो है-हिन्दी व्यंग्य (hindi ka mahatva garibon ki vajah se-hindi vyangya or satire)

                14 सितंबर 2011 बुधवार को हिन्दी दिवस मनाया जाने वाला है। इस अवसर पर देश में हिन्दी बोलो, हिन्दी सुनो और हिन्दी समझो जैसे भाव का बोध कराने वाले परंपरागत नारे सुनने को मिलेंगे। प्रचार माध्यम बतायेंगे कि हिन्दी अपने देश में ही उपेक्षित है। हिन्दी को निरीह गाय की तरह देखा जायेगा भले ही वह असंख्य बुद्धिजीवियों को शुद्ध दूध, देशी की तथा मक्खन खिलाती हो। इसी दिन अनेक कार्यक्रम होंगे तो नाश्ता वगैरह भी चलेगा।
           शायद इस लेखक ने अपने ब्लागों पर कई लेखों मे खुशवंत सिंह नामक अंग्रेजी के लेखक की चर्चा की है। दरअसल उन्होंने एक बार लंदन में कहा था कि ‘ भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है।’ इस पर देश में भारी बवाल मचाया गया। समस्त प्रचार माध्यम राशन पानी लेकर उनके पीछे पड़ गये। उनका बयान यूं सुनाया गया कि खुशवंत सिंह ने कहा है कि हिन्दी गरीबों भाषा है। इस लेखक ने वह समाचार पढ़ा। हिन्दी को गरीब भाषा कहने पर मन व्यथित हुआ था तो एक अखबार में संपादक के नाम पत्र में उनकी खूब बखिया उधेड़ी। उसके बाद कुछ समाचार पत्रों में उनका पूरा बयान भी आया। उससे साफ हो गया कि उन्होंने हिन्दी को गरीबों की भाषा कहा है। तब भी मन ठंडा नहीं हुआ क्योंकि तब जीवन का ऐसा अनुभव नहीं था। समय ने करवट बदली। दरअसल इस प्रचार के बाद से खुशवंत सिंह के लेख हिन्दी भाषा में अनुवाद होकर छपने लगे। तब यह सोचकर हैरानी होती थी कि जिस शख्स पर यह अखबार वाले इस कदर पिल पड़े थे उनके लेख अनुवाद कर क्यों हिन्दी पाठकों के सामने प्रस्तुत कर उनको चिढ़ा रहे हैं? अब यह बात समझ में आने लगी है कि इस तरह के प्रचार से उस समय के बाज़ार प्रबंधक एक ऐसा नायक गढ़ रहे थे जिसे हिन्दी में पढ़ा जाये। उस खुशवंत सिंह को बता दिया गया होगा कि यह सब फिक्स है और अब आपकी रचनायें हिन्दी में छपा करेंगी।
        खुशवंत सिंह ने अपने उसी बयान में हिन्दी भाषा में चूहे के लिये रेट और माउस अलग अलग शब्द न होने पर अफसोस जताया था। इससे उन पर हंसी आयी थी। दरअसल वह अंग्रेजी भाषा के लेखक हैे पर उसका सही स्वरूप नहीं जानते। वह कहते है कि भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है यह हमने मान लिया मगर वह इस लेखक की बात-उनको हिन्दी आती नहीं और हम कोई बड़े लेखक नहीं है कि उन तक पहुंच जायेगी पर इंटरनेट पर यह संभावना हम मान ही लेते हैं कि उनके शुभचिंतक पढ़ेंगे तो उन्हें बता सकते हैं-मान लें कि अंग्रेजी भाषा इस धरती पर दो ही प्रकार के लोग लिखते और बोलते हैं एक साहब दूसरे गुलाम! जिनको अंग्रेजी से प्रेम है वह इन्हीं दो वर्गों में अपना अस्तित्व ढूंढे तीसरी स्थिति उनकी नहीं है। याद रखें यह संसार न साहबों की दम पर चलता है न गुलामों के श्रम पर पलता है। उनके अपने रिश्ते होंगे पर स्वतंत्र वर्ग वाले अपनी चाल स्वयं ही चलते हैं। स्वतंत्र वर्ग वाले वह लोग हैं जो अपनी बुद्धि से सोचकर अपने ही श्रम पर जिंदा हैं। उनका न कोई साहब है न गुलाम।
          बहरहाल हम यह तो मानते हैं कि इस देश में हिन्दी अब गरीबों की भाषा ही रहने वाली है और यहीं से शुरु होता है इसका महत्व! इंटरनेट पर हिन्दी के महत्व पर लिखे गये एक लेख पर अनेक लोग उद्वेलित हैं। वह कहते हैं कि हिन्दी का आपने महत्व तो बताया ही नहीं। उनका जवाब देना व्यर्थ है। दरअसल ऐसे लोग एक तो अपनी बात रोमन लिपि में लिखते हैं। अगर हिन्दी में लिखते हैं तो उनका सोच अंग्रेजी का है। मतलब कहंी न कहंी गुलामी से ग्रसित हैं। हम यह बात स्पष्ट करते रहते हैं कि हिन्दी अनेक लोगों को कमा कर दे रही है। अगर ऐसा नहीं है तो हिन्दी फिल्मों, समाचार पत्रों और टीवी धारावाहिकों में हिन्दी के प्रसारण प्रकाशन में अंग्रेजी शब्द क्यों घुसेड़ते हैं? अपनी बात पूरी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं करते? हिन्दी चैनल चला ही क्यों रहे हैं? अपने चैनल में अंग्रेजी ही चलायें तो क्या समस्या है?
      नहीं! वह ऐसा कतई नहीं करेंगे! इसका सीधा मतलब है कि अंग्रेजी हमेशा हर जगह कमाने वाली भाषा नहीं हो सकती। दूसरा यह भी कि अंग्रेजी पढ़ने वाले सभी साहब नहीं बन सकते! जो साहब बनते हैं उनके हिस्से में भी ऐसी गुलामी आती है जो पर्दे के पीछे वही अनुभव कर सकते हैं भले उनके सामने सलाम ठोकने वालों का जमघट खड़ा रहता हो। आप किसी माता पिता से पूछिये कि‘‘अपने बच्चे को अंग्रेजी क्यों पढ़े रहे हैं?’
          ‘जवाब मिलेगा कि ‘‘आजकल इसके बिना काम नहीं चलता!’’
         देश के सभी लोग अमेरिका, कनाडा या ब्रिटेन  नहीं जा सकते। जायें भी तो अंग्रेजी जानना आवश्यक नहीं जितनी कमाने की कला उनके होना चाहिए। एक पत्रिका में हमने पढ़ा था कि आज़ादी से पहले एक सिख फ्रांस गया। उसे अंग्रेजी क्या हिन्दी भी नहीं आती थी। इसके बावजूद अपने व्यवसायिक कौशल से वह वहां अच्छा खासा कमाने लगा। अब हो यह रहा है कि लोगबाग अपनी भाषा से परे होकर अंग्रेजी भाषा को आत्मसात करने के लिये इतनी मेहनत करते हैं कि किसी अन्य विषय का ज्ञान उनको नहीं रहता। बस उनको नौकरी चाहिए। सच बात कहें तो हमें लगता है कि हमारी शिक्षा पद्धति में अधिक शिक्षा प्राप्त करने का मतलब है निकम्मा हो जाना। बहुत कम लोग हैं जो अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद निजी व्यवसायों में सफलता प्राप्त कर पाते हैं। उनसे अधिक संख्या तो उन लोगों की है जो कम पढ़े हैं पर छोटे व्यापार कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखते हैं। अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगारी की कोई गारंटी नहीं है पर इससे एक खतरा है कि हमारे यहां के अनेक लोग परंपरागत व्यवसायों को हेय समझ कर उसे करते नहीं या उनको शर्म आती है जिसकी चरम परिणति बेरोजगार की उपाधि है।
        अंग्रेजी पढ़कर कंपनियों के उत्पादों की बिक्री करने के लिये घर घर जाने को भले ही सेल्समेनी कहा जाता हो पर अंततः पर इसे फेरी लगाना ही कहा जाता है। यह काम कम शिक्षित लोग बड़े आराम से कर जाते हैं। अलबत्ता सेल्समेन के बड़े व्यापारी बनने के संभावना क्षीण रहती है जबकि फेरीवाले एक न एक दिन बड़े व्यापार की तरफ बढ़ ही जाता है। न भी बने तो उसका स्वतंत्र व्यवसाय तो रहता ही है।
         पता नहीं हिन्दी का महत्व अब भी हम बता पाये कि नहीं। सीधी बात यह है कि हिन्दी गरीबों की भाषा है और उनकी संख्या अधिक है। वह परिश्रमी है इसलिये उपभोक्ता भी वही है। उसकी जेब से पैसा निकालने के लिये हिन्दी भाषा होना जरूरी है वह भी उसके अनुकूल। अपने अंदर हिन्दी जैसी सोच होगी तो हिन्दी वाले से पैसा निकलवा सकते हैं। उसके साथ व्यवहार में अपने हित अधिक साध सकते हैं। देखा जाये तो इन्हीं गरीबों में अनेक अपने परिश्रम से अमीर भी बनेंगे तब उनकी गुलामी भी तभी अच्छी तरह संभव है जब हिन्दी आती होगी। वैसे तो गुलामी मिलेगी नहीं पर मिल भी गयी तो क्लर्क बनकर रह जाओगे। उसकी नज़रों में चढ़ने के लिये चाटुकारिता जरूरी होगी और वह तभी संभव है जब गरीबों की भाषा आती होगी। अंग्रेजी अब बेरोजगारों की भाषा बनती जा रही है। साहबनुमा गुलामी मिल भी गयी तो क्या? नहीं मिली तो बेरोजगारी। न घाट पर श्रम कर सके न घर के लिये अनाज जुटा सके। इतना लिख गये पर हमारे समझ में नहीं आया कि हिन्दी का महत्व कैसे बखान करें। अब यह तो नहीं लिख सकते कि देखो हिन्दी में इंटरनेट पर लिखकर कैसे मजे ले रहे हैं? यह ठीक है कि इसे गरीबों की भाषा कह रहे हैं। हम इस लिहाज से तो गरीब हैं कि हमें अंग्रेजी लिखना नहीं आती। पढ़ खूब जाते हैं। वैसे लिखना चाहें तो अंग्रेजी में सौ पचास लेखों के बाद अच्छी अंग्रेजी भी लिखने लगेंगे पर यकीनन उसमें मजा हमको नहीं आयेगा। वैसे हिन्दी दिवस पर प्रयास करेंगे कि हिन्दी का महत्व जरूर बतायें। यह लेख तो इसलिये लिखा क्योंकि हिन्दी दिवस के नाम से सर्च इंजिनों पर हमारे पाठ खूब पढ़े जा रहे हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Aug 28, 2011

अन्ना हजारे की अनशन समाप्ति के मायने-हिन्दी संपादकीय लेख (anna hazare ka anshan samapt hone ke mayne-hindi sampadkiya lekh)

                अन्ना हजारे का अनशन समाप्त होने पर पूरे देश में जश्न मनाया जा रहा है। कोई इसे लोकतंत्र की जीत बता रहा है तो किसी का दावा है कि इस लोकचेतना का संचार हुआ है। भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल बनाने को लेकर महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे ने 12 दिन तक जमकर अनशन किया। अंततः कुछ आश्वासनों पर हजारे साहब ने बड़े राजनीतिक चातुर्य के साथ आधी जीत बताकर उसे समाप्त कर दिया। संविधान और राजनीतिक विश्लेषकों की बात माने तो आधी जीत तो दूर अभी उनका अभियान अपनी जगह से एक इंच हिला भी नहीं है। इतना ही नहीं अब कथित रूप से गैरराजनीतिक होने का दावा करने वाली उनकी कथित ‘अन्ना टीम’ अंततः परंपरागत राजीनीतिक दलों के शिखर पुरुषों में की दरबार में मदद मांगने भी जा पहंुची। जब देश में कानून बनाने में संसद सर्वोपरि है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दलीय राजनीतिक दलों के आधार पर ही गठित होती है। ऐसे में उनके साथ संवाद करना उस आदमी के लिये भी जरूरी होता है जो स्वयं गैरराजनीतिक है पर किसी जनसमस्या का हल चाहता है। दूसरी बात यह है कि अगर कोई समूह अपने मनपसंद का कानून बनाना चाहता है तो उसके पास चुनाव लड़ना ही एक जरिया है। किसी गैर राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से कानून बनाना एक आत्ममुग्ध प्रक्रिया हो सकती है जिससे परिणाम प्रकट नहीं होता चाहे नारे कितने भी लग जायें। अन्ना की टीम यह जानती है और ऐसा लगता है कि कहंी न कहीं भविष्य के चुनाव उसकी नजर में है।

          अब हम जो देख रहे हैं तो लग रहा है कि अन्ना हजारे और अन्ना टीम दो अलग अलग केंद्र बन गये हैं। अन्ना टीम के सदस्य पेशेवर अभियानकर्ता हैं जबकि अन्ना स्वयं एक फकीर हैं। अलबत्ता राजनीतिक चातुर्य उनमें कूटकूटकर भरा ही यही कारण है कि उन्होंने पेशेवर अभियानकताओं की दाल नहीं गलने दी। इससे हुआ यह कि एक स्वामी नामधारी एक पेशेवर अभियानकर्ता उनसे नाराज हो गया। उसका सीडी जारी हो गया है जिसमें वह अपने किसी मित्र के साथ सहयोगियों की निंदा कर रहा है। सच तो यह है कि उसके शामिल होने की वजह से लोग इस आंदोलन को अनेक बुद्धिजीवी शक की नजर से देख रहे थे। कहने को वह जोगिया वस्त्र पहनता है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की निंदा उसके श्रीमुख से कई बार सुनी गयी है। उस पर यह आरोप लगता है कि वह समाज सेवा की आड़ के केवल दिखावा करता है। हमारा उसके चरित्र से मतलब नहीं है पर इतना जरूर अब लग रहा है कि आने वाले समय में अन्ना टीम को अनेक तरह के सवालों का सामना करना पड़ेगा।
       अन्ना हजारे ने कहा था कि यह आधी जीत है। लोग फूल रहे हैं। जश्न बनाये जा रहे हैं। विवेकशील लोगों के लिये इतना ही बहुत है कि अन्ना जी ने अनशन तोड़ दिया। दूसरी बात यह भी लग रही है परंपरागत समाज सेवी और राजनीतिक संगठन अब चेत गये हैं। अभी तक वह देश के जनमानस में फैले असंतोष का शायद सही अनुमान नहीं कर पाये थे जो अन्ना के अनशन के लिये शक्ति बना और अन्ना टीम उसके आधार पर ऐसा व्यवहार करने लगी कि वह कोई संवैधानिक संगठन है। वैसे हम यहां साफ कर दें कि इस अनशन की समाप्ति से कोई हारा नहीं है कि किसी को विजेता बताया जाये। अलबत्ता प्रचार माध्यमों के लिये यह अनशन महान कमाई का साधन बन गया। पूरे पंद्रह दिन तक उन्होंने इस प्रकरण को जिस तरह चलाया वह आश्चर्यजनक लगता है। अलबत्ता इस चक्कर में उन्होंने देश के संविधानिक संगठनों के महत्व को कम कर दिखाया। आज तो सारे चैनल दूसरी आजादी का जश्न मना रहे हैं। अब इस आजादी का मतलब कौन पूछे?
        भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के लिये यह एक दो दिन आत्म मंथन का समय है जब उनको प्रचार माध्यम हाशिए पर बैठा दिखा रहे हैं। विवेकवान लोग जानते हैं कि भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान में अनेक बुद्धिमान लोग सक्रिय हैं। शीर्ष पदों पर है और अपनी चतुराई से उन्होंने इस आंदोलन की हवा निकाल दी है। यह अलग बात है कि इस आंदोलन की वजह से उनके मन में अब तेजी से जनकल्याण का भाव आया लगता है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा संविधान हैं तो हम बचे हुए हैं और संसद और सत्ता प्रतिष्ठान कहीं न कहीं हमारे चुने हुए लोगों की सक्रियता के कारण चल रहे हैं।
पिछले 15 दिनों से परंपरागत राजनीतिक संगठन को शीर्ष पुरुषों ने शायद बहुत तनाव झेला होगा पर अब वह यकीनन चेत गये होंगे। अन्ना साहेब भले हैं पर उनकी टीम का का व्यवहार राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अन्ना अकेले अनशन कर रहे थे पर यह अन्ना की टीम केवल राजनीति करती दिखी। ऐसा लगा कि अन्ना का अनशन उनकी निजी जागीर हो। अभी एक स्वामी की हवा निकली है और अब उनका सामना देश के समस्त परंपरागत राजनीतिक संगठनों से होगा तो पता नहीं कितनों की हवा निकल जायेगी।     आखिरी बात यह है कि इस गलत फहमी में किसी को नहीं रहना चाहिए कि अन्ना टीम कोई हाथ पर हाथ धरे बैठेगी। ऐसा लगता है कि अगले चुनाव में इसके लोग मैदान में भी उतर सकते हैं। परंपरागत राजनीतिक दलों को उनकी इस बात पर यकीन नहीं करना चाहिए वह गैरराजनीतिक लोग हैं। दरअसल अन्ना टीम धीरे धीरे परंपरागत राजनीतिक संगठनों को अप्रासंगिक दर्शाते हुए जनता में उनकी छवि खराब करेगी फिर आखिर यही कहेगी कि चुनाव में हमें जितवाने के अलावा जनता के पास कोई चारा नहीं है।
          विवेकशील पुरुष इस बात से खुश हैं कि अन्ना साहेब के अनशन से देश भर में उपजा तनाव खत्म हो गया है पर जिस तरह इसकी कथित विजय पर जश्न मन रहा है वह शक पैदा करता है कि वाकई यह कोई भ्रष्टाचार की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाले हैं। अब तो मामला चुनाव सुधार की तरफ मुड़ गया है। अन्ना साहेब भले हैं पर अपना राजनीतिक इस्तेमाल होने देते हैं। कोई उनको चला नहीं सकता यह सच है पर अपनी राजनीतिक मौज के चलते वह अपने चेलों की सहायता करते हैं। वह कहते हैं कि वह महात्मा गांधी के अनुयायी हैं और यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी छवि राजनीतिक संत की रही है। अन्ना साहब की वाक्पटुता गजब की है और उनका एक एक वाक्य जनमानस में प्रभाव डालता है। जब वह कहते हैं कि अभी अनशन स्थगित किया है खत्म नहीं किया तो समझना चाहिए कि उनकी राजनीतिक मौज का सिलसिला जारी रहेगा। यह स्पष्ट है कि अनशन की समाप्ति पर वह विवेकवान लोगों के नजरिये को समझते हैं पर यह भी जानते हैं कि उनके नाम से जुटी भीड़ नारों पर चलने और वादों में बहने वाली है इसलिये उसे अपने साथ बनाये रखने के लिये यह अहसास दिलाना जरूरी है कि आधी ही सही जीत जरूर हुई है।

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होना स्वागतयोग्य-हिन्दी लेख (end of anna hazare fast and agitation-hindi lekh or article)               
       महाराष्ट्र के समाज सेवी अन्ना हजारे आज पूरे देश के जनमानस में ‘महानायक’ बन गये हैं। वजह साफ है कि देश में जन समस्यायें विकराल रूप ले चुकी हैं और इससे उपजा असंतोष उनके आंदोलन के लिये ऊर्जा का काम कर रहा है। पहले अप्रैल में उन्होंने अनशन किया और फिर अगस्त माह में उन्होंने अपने अनशन की घटना को दोहराया। जब अप्रेल   में उन्होंने अनशन आश्वासन समाप्त किया तब उनका मजाक उड़ाया गया था कि वह तो केवल प्रायोजित आंदोलन चला रहे हैं। अब की बार उन्होंने 12 दिन तक अनशन किया। इस अनशन से भारत ही नहीं बल्कि विश्व जनमानस पर पड़े प्रभावों का अध्ययन अभी किया जाना है क्योंकि इस प्रचार विदेशों तक हुआ है। फिर जिन लक्ष्यों को लेकर यह अनशन किया गया उनके पूरे होने की स्थिति अभी दूर दिखाई देती है मगर देश के चिंतकों के लिये इस समय उनकी उपेक्षा करना ही ठीक है। अन्ना हजारे के अनशन आंदोलित पूरे देश के लोगों ने उसकी समाप्ति पर विजयोन्माद का प्रदर्शन किया पर महानायक ने कहा‘‘यह जीत अभी अधूरी है और अभी मैंने अनशन स्थगित किया है समाप्त नहीं।’ इस बयान से एक बात तो समझ में आती है कि अन्ना साहेब में राजनीतिक चातुर्य कूट कूटकर भरा है।
              अन्ना साहेब के बारह दिनों तक चले अनशन में तमाम उतार चढ़ाव आये और अगर उनका उसे छोड़ना ही सफलता माना जाये तो कोई बुरी बात नहीं है। साथ ही लक्ष्य से संबंधित परिणामों पर दृष्टिपात न करना भी ठीक है। पूरे देश का जनमानस ही नहीं जनप्रतिनिधियों के मन में जो भारी तनाव इस दौरान दिखा वह चौंकाने वाला था। इसका कारण यह था कि हिन्दी प्रचार माध्यम निरंतर इससे जुड़े छोटे से छोटे से घटनाक्रम का प्रचार क्रिकेट मैच की तरह कर रहे थे गोया कि देश में अन्य कोई खबर नहीं हो।
            अगर हम तकनीकी दृष्टि से बात करें तो अन्ना साहेब के प्रस्तावित जनलोकपाल ने अभी एक इंच कदम ही बढ़ाया होगा पर अन्ना साहेब की गिरते स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह भारी सफलता है। हम तत्काल इस आंदोलन के परिणामों पर विचार कर सकते हैं पर ऐसे में हमारा चिंत्तन इसके दूरगामी प्रभावों को देख नहीं पायेगा।  इस आंदोलन के लेकर अनेक विवाद हैं पर यह तो इसके विरोधी भी स्वीकारते हैं कि इसके प्रभावों का अनदेखा करना ठीक नहीं है।
         प्रधानमंत्री श्रीमनमोहन सिंह की चिट्ठी मिलने के बाद श्री अन्ना साहेब न अनशन तोड़ा। अपने पत्र में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यह अच्छी बात कही है कि ‘संसद ने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है जो कि देश के लोगों की भी है।’’
           उनकी इस बात में कोई संदेह नहीं है और इस विषय पर संसद के शनिवार को अवकाश के दिन विशेष सत्र में सांसदों ने जिस तरह सोच समझ के साथ ही दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने विचार जिस तरह दिये वह इसका प्रमाण भी है। संभव है विशेषाधिकार के कारण कुछ सांसदों के मन में अहंकार का भाव रहता हो पर कल सभी के चेहरे और वाणी से यही भाव दिखाई देता कि किस भी भी तरह इस 74 वर्षीय व्यक्ति का अनशन टूट जाये जो कि इस देश के जनमानस का ही भाव है। सच बात तो यह है कि इस बहस में आंदोलन से जुड़े संबंधित सभी तत्वों का सार दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रचार माध्यमों के सहारे इस आंदोलन की सफलता की बात कही गयी। अनेक सांसदों ने इस आंदोलन के उन देशी विदेशी पूंजीपतियों से प्रायोजित होने की बात भी कही जो भारत की संसदीय प्रणाली पर नियंत्रण करना चाहते हैं। इसके बावजूद सभी ने श्री अन्ना हजारे के प्रति न केवल सभी ने सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके चरित्र की महानता को स्वीकार भी किया। देश के जनमानस का अब ध्यान करना होगा यह बात कमोबेश सभी सांसदों  ने स्वीकार की और इस आंदोलन के अच्छे परिणाम के रूप में इसे माना जा सकता है।
           देश के जिन रणनीतिकारों ने इस विषय पर संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बनाई हो वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि श्री अन्ना साहेब की वजह से देश के युवा वर्ग ने उसे देखा और यकीनन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रुचि बढ़ेगी। देश के संासदों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इस बात को अनुभव किया कि अन्ना साहेब की देश में एक महानायक की छवि है और उन पर आक्षेप करने का मतलब होगा देश की आंदोलित युवा पीढ़ी के दिमाग में अपने लिये खराब विचार करना इसलिये शब्दों के चयन में सभी ने गंभीरता दिखाई। बहरहाल कुछ सांसदों ने प्रचार माध्यमों पर आंदोलन को अनावश्यक प्रचार का आरोप लगाया पर उन्हें यह भी याद रखना होगा इसी विषय पर हुए विशेष सत्र के बहाने उन्होंने पूरे देश को संबोधित करने का अवसर पाया जिसे इन्हीं प्रचार माध्यमों ने अपने समाचारों में स्थान दिया। यह अलग बात है कि इस दौरान उनके विज्ञापन भी अपना काम करते रहे। वैसे तो संसद की कार्यवाही चलती रहेगी पर इस तरह पूरे राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर सांसदों के पास बहुत समय बाद आया। उनको इस बात पर भी प्रसन्न होने चाहिए कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र को संबोधित न करने के कारण जनप्रतिनिधियों पर देश के जनमानस की उपेक्षा का आरोप लगता है वह इस अवसर के कारण धुल गया क्योंकि उन्होंने देश की इच्छा को ही व्यक्त किया।
         हम जैसे आम लेखकों के पास इंटरनेट और प्रचार माध्यम ही है जिसके माध्यम से विचारणीय सामग्री मिलती है यह अलग बात है कि उसे छांटना पड़ता है। होता यह है कि समाचार पत्र और टीवी चैनल अपनी रोचकता का स्तर बनाये रखने के लिये किसी एक घटना में बहुत सारे पैंच बना देते हैं और फिर अलग अलग प्रस्तुति करने लगते हैं। सामग्री में दोहराव होता है और जब पाठकों और दर्शकों के अधिक जुड़ने की संभावना होती है तो उनके विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं। समस्त प्रचार माध्यम धनपतियों के हाथ में और यही कारण है कि अन्ना साहेब के आंदोलन के प्रायोजन की शंका अनेक बुद्धिमान लोगों के दिमाग में आती है। इसमें कुछ अंश सच हो सकता है पर एक बात यह है अन्ना साहेब एक सशक्त चरित्र के स्वामी हैं।
             आखिरी बात यह है कि भोगी कितना भी बड़ा पद पा जाये वह बड़ा नहीं कहा जा सकता। बड़ा तो त्यागी ही कहलायेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना साहेब ने अन्न का त्याग किया था। पूरे 12 दिन तक अन्न का त्याग करना आसान काम नहीं है। हम जैसे लोग तो कुछ ही घंटों में वायु विकार का शिकार हो जाते हैं। अन्ना साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना लोगों के सामने प्रस्तुत की है जो अभी स्वप्न ही लगता है पर सबसे बड़ी बात वह अभी अपने प्रयास जारी रखने की बात भी कह रहे हैं। मुश्किल यह है कि वह अनशन शुरु कर देते हैं तब आदमी का हृदय कांपने लगता है। यही कारण है कि उनका अनशन टूटना भी ही लोगों में विजयोन्माद पैदा कर रहा है। उन्होंने जिस तरह आज की युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त बनाया उसकी प्रशंसा तो की ही जाना चाहिए जो कि अंततः हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वाहक हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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Aug 16, 2011

अन्ना हजारे (अण्णा हजारे) की ध्यान मुद्रा दिलचस्प रही-हिन्दी लेख (anna hazare kee dhyan mudra-hindi lekh)

         समसामयिक विषयों पर लिखना इसलिये भी व्यर्थ लगता है क्योंकि उसको कुछ समय बाद पढ़ने पर ही बासीपन का अहसास होता है। किस्सा अन्ना हजारे साहेब की गिरफ्तारी और रिहाई का है। सुबह उनकी गिरफ्तारी की खबर पर उस पर लिखने की बात समझ में नहीं आयी क्योंकि हमें पता था कि समसामयिक घटनाओं में दिन भर में बहुत सारा बदलाव आता है। शाम को जब लौटे तो उनके रिहा होने की खबर मिली। इसका मतलब गिरफ्तारी पर लिखते तो वह शाम तक बासी हो जाता।उससे पहले भी उन्होंने एक आंदोलन किया था जिस पर हमने लिखा। वह सामयिक था पर अभी भी पढ़ा जा रहा था। इंटरनेट पर जहां यह सुविधा कि किसी विषय पर आपके हाथ से लिखा कभी पढ़ा जा सकता है तो यह समस्या भी है कि वह तब भी पढ़ा जायेगा जब उसे पढ़ने की अवधि निकल चुकी हो।
           इधर अन्ना साहेब का भारतीय प्रचार माध्यमों पर फिर जोरदार ढंग से अवतरण हुआ। उनके आंदोलन की बात सामने आयी। तब समझ में नहीं आ रहा था कि उसके परिणामों पर क्या अनुमान जतायें। इस पर एक लेख तीन चार दिन पहले तब लिखा था जब उनके प्रचार ने अभी गति नहीं पकड़ी थी। जैसे ही प्रचार ने जोर पकड़ा तो एकदम उस पर पाठक आ गये। अन्य कई लेख भी आये पर उनकी अवधि बीत चुकी थी। इस आंदोलन को लेकर हमारा नजरिया दूसरा है। अगर अन्ना हज़ारे साहब के आंदोलन से देश में कुछ बदलाव आये तो हम खुश होंगे पर अभी निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना नहीं है। उनकी मांगों पर विवाद है और इस देश की समस्या यही है कि यहां आदमी समाज हित की बात इसी शर्त पर सोचता है कि उसे नाम या नामा मिले तभी करेगा। खास आदमी अधिक चाहता है तो आम आदमी भी कम से कम चाहता है। सीधी बात कहें तो समाज की सोच में ही दोष है इसलिये जब तक उसमें बदलाव नहीं आयेगा सारी बातें हवा होती दिखेंगी। बहरहाल अन्ना साहेब के प्रयासों से उनको उनको देश में अच्छी खासी लोकप्रियता मिली। 15 अगस्त से पूर्व गांधी समाधि पर जाकर उन्होंने जाकर जो ढाई घंटे तक ध्यान लगाया वह दर्शनीय था। देखा जाये तो उनको भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सांसरिक विषय है पर ध्यान एकदम अध्यात्मिक क्रिया है। अन्ना की देश में लोकप्रियता है और अगर इस बहाने ध्यान पद्धति का प्रचार हो जाये तो बहुत अच्छा रहेगा। सांसरिक विषय कभी समाप्त नहीं होते पर ध्यान सिद्धि हो तो वह आदमी को अनेक पीड़ाओं से मुक्ति दिलाती है।
            इस प्रसंग में बाबा रामदेव की बात की जाये। अभी तक उनकी लोकप्रियता उनके योग प्रशिक्षण की वजह से थी और राजनीतिक दल बनाने या भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उसमें एक प्रतिशत भी वृद्धि नहीं हुई। हम जैसे लोग उनकी अध्यात्मिक छवि की प्रशंसा करते हैं। योग साधना से व्यक्ति निर्माण होता है यह अलग बात है कि उसका अहसास नहीं होता। व्यक्ति निर्माण से समाज में स्वतः स्फृर्ति का संचार होता है। वैसे बाबा रामदेव के आलोचक उनको व्यायाम शिक्षक की उपाधि तक ही सीमित मानते हैं। दरअसल बाबा रामदेव अपने प्रशिक्षण में ध्यान की उस शक्ति की बात नहीं करते जो वाकई मनुष्य को तेजस्वी बनाती है। हमें यह पता नहीं था कि अन्ना हजारे साहिब भी ध्यान की कला में दक्ष हैं। देखा तो अच्छा लगा।
              उनके ध्यान की मुद्रा वाकई बहुत दर्शनीय थी। हमारी अनुभूति के अनुसार ध्यान के बाद संविधान क्लब पर उनका जो भाषण हुआ वह अन्य भाषणों से अलग था। उन्होंने इस भाषण में जनलोकपाल की ही नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की बात भी कही जो शायद हमने अभी तक उनके मुख से नहीं सुनी थी। तब हम सोच रहे थे कि उनके अंदर इस नवीन विचार का संचार क्या यह उनके ध्यान का परिणाम था?
          मान लीजिये वह अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से विख्यात नहीं भी होते और ध्यान की कला का प्रशिक्षण देते होते तो शायद वह बाबा रामदेव की तरह ही लोकप्रिय होते। बहरहाल इन दोनों  महानुभावों के प्रति हमारे मन में आकर्षण उनके सांसरिक विषयों से अधिक योग साधना और ध्यान की वजह से अधिक है। हमारा मानना है कि अध्यात्मिक विषयों में पारंगत विषय सांसरिक विषयों से परे तो नहीं भागता पर उन पर इस तरह नियंत्रण रखता है कि उनमें ऊंच नीच की चिंता उनको नहंी होती। बहरहाल जब हम सांसरिक विषयों पर लिखते हैं तो इस बात को नहीं भूलते कि उसका अध्यात्मिक पक्ष भी लिखना चाहिए। हमारा देश लोकतांत्रिक है इसलिये यहां आंदोलन तो चलते ही रहेंगे। विवाद भी होंगे पर उनसे जुड़े पात्रों का अध्यात्मिक पक्ष देखन रुचिकर लगता है। सच बात तो यह है कि जब हमने उनको ध्यान लगाते देखा तो फिर उनके सांसरिक विषयों से ध्यान हटकर उनकी अध्यात्मिक शक्ति की तरफ आकृष्ट हो गया। यही कारण है कि इस लेख में उनके सांसरिक विषय से अधिक ध्यान की मुद्रा पर लिखने की प्रेरणा मिली।
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Aug 8, 2011

जनभक्षी-हिन्दी व्यंग्य शायरियाँ (janbhakshi-hindi vyangya shayriyan)

जन जन के भले की बात करते हुए
कई फरिश्ते जनभक्षी हो गए हैं,
दाने खिलाने के लिए हाथ फैलाते हैं
जिनको खिलाने के लिए
वही जन उनके लिए
शिकार करने वाले पक्षी हो गए हैं।
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नरभक्षियों का समय गया
अब खतरा जनभक्षियों का हो गया है,
चेहरे काले नहीं खूबसूरत हैं,
हाथों में तलवार की जगह
जुबान के हर शब्द में प्यार है,
मगर जन जन के भले की बात
करने वाले इन फरिश्तों के लिए
आम इंसान
शिकार करने लायक पक्षियों जैसा हो गया है।
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Aug 2, 2011

ख्याली रोटियाँ कभी नहीं पक पाएँगी-हिन्दी व्यंग्य कविता (khyali rotiyan pak nahin paengi-hindi vyangya kavita)

पत्थरों पर है टिकी है आस्था
उन पर पाँव मत रखना
वरना टूट जाएंगी,
धरती को चाहे जितना रौंदते रहो
मगर पर्दे पर चमकने वाली
देवियों पर से नज़र मत हटाना
वरना खुशियां रूठ जाएंगी।
सुना रहे हैं रोज
एक नया आसमानी सच
बाज़ार के सौदागरों के भौपू
उन पर ही कान धरना
वरना तरक्की की उम्मीदें रूठ जाएंगी।
यह अलग बात है
लुटते रहोगे हमेशा
ख्याली रोटियाँ कभी नहीं पक पाएँगी।
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Jul 21, 2011

नोएडा एक्सटेंशन एक टेंशन-हिन्दी लेख (tension for noeda extension after court vardict)

               जब हम आधुनिक लोकतंत्र की बात करते हैं तो उसमें अप्रत्यक्ष रूप से धनपतियों की राज्य का उपयोग अपने हित में करने की प्रवृत्ति स्पष्टतः सामने आती है। एक समय तक भारत में कथित मिश्रित अर्थव्यवस्था-साम्यवादी और पूंजीवाद विचारधारा से निर्मित खिचड़ी चिंतन जैसा ही समझें-अपनाया गया। इसी आधार पर हमारे यहां समाजवाद का नारा भी लगा। यहां यह स्पष्टतः कर दें कि समाजवादी विचारधारा भारत में ही पैदा हुई है। अधिकांश विश्व में पूंजीवादी राजकीय व्यवस्था है पर कुछ देशों फिर वामपंथियेां का शासन है जो मूलतः तानाशाही के सिद्धांतों पर आधारित है। हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से ओतप्रोत विद्वानों को कभी भारतीय दर्शन में वैज्ञानिक आधार पर राज्य और समाज के गठन का विचार सूझा ही नहीं। चूंकि विदेशी विचाराधारा लानी थी और जलकल्याण करते दिखना भी था तो वामपंथी विचाराधारा बहुत अच्छी थी। इधर अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में भारतीय धनपतियों के अप्रत्यक्ष सहयोग की वजह से उनको खुश रखने के लिये पूंजी की आजादी का पक्ष भी रखना जरूरी था सो समाजवाद की विचाराधारा बनी।
               संदर्भ हम नोएडा एक्सेंटेशन को लेकर अधिग्रहीत किसानों की जमीन पर बने आवासीय परिसरों को बढ़ते हुए विवादों को लें। यह उस खिचड़ी व्यवस्था से उत्पन्न वह दृश्य है जो कालांतर में आना ही था। भारतीय धनपतियों का प्रभुत्व आजादी से पहले स्थापित हो चुका था और वह देश को अपने ही आर्थिक नियंत्रण में रखकर आजाद देखना चाहते थे। उन्हें समाजवाद बहुत भाया होगा। दरअसल वामपंथ राज्य के समाज की हर गतिविधि पर नियंत्रण करने का मार्ग बतलाता है। पूंजीवाद इसके विपरीत समाज को आजाद देखना चाहता है। समाजवाद बीच की विचारधारा इसलिये बनी क्योंकि भारतीय धनपतियों को यह लगा कि उनकी तो अपनी शक्ति है इसलिये कोई उन पर नियंत्रण करेगा नहीं पर समाज जितना ही अधिक राज्य के नियंत्रण में रहेगा उतना ही अच्छा है क्योंकि अंततः देश की गतिविधियों का नियंता तो उनका ही धन है।
                      किसानों की रक्षा, गरीब का कल्याण, बीमार के लिये इलाज और नारी उद्धार के नारों के चलते जहां अनेक बुद्धिजीवी और समाज सेवक प्रचारक जगत में जननायक बनते रहे वहीं धनपतियों ने भी खूब नामा कमाया। आप आयकर की दरों को ही देख लें। एक समय बहुत अधिक दर थी। ऐसे में इस पर कोई यकीन नहीं कर सकता कि किसी धनपति ने ईमानदारी से यह कर दिया होगा। स्पष्टतः धनपतियों को पता था कि वह अपने दावपैंचों से अपना साम्राज्य बचाते रहेंगे पर कोई दूसरा बड़ा धनपति नहंी बन पायेगा। बन भी गया तो कालाधन होने की वजहा से उनके समकक्ष खड़ा नहीं हो सकेगा।
          इसके अलावा भी कृषि जमीन को आवासीय स्थल में परिवर्तन करने के भी अनेक प्रतिबंध रहे। स्थिति यह हो गयी थी कि देश की अनेक कॉलोनियां केंद्रीय और सरकारी संस्थाओं की छत्रछाया में बनी। निजी क्षेत्र में आवास निर्माण तो बहुत कम ही होता था। देश में आवास समस्या थी पर यह सरकारी संस्थायें धीरे धीरे उसे समायोजित करती रहीं। देश का एक बहुत बड़ा मध्यम वर्ग इन्हीं कॉलोनियों में आया जिनमें बुद्धिजीवी भी थे। तब तक मकान निर्माण लोगों की निजी क्षमताओं के इर्दगिर्द ही सीमित था इसलिये उसमें निजी ठेकेदार और व्यवसायी एक सीमा तक ही लाभान्वित होते थे।
           कालांतर में उदारीकरण के चलते देश की स्थितियां बदली हैं। अब मकान निर्माण एक भारी फायदे का धंधा बन गया है। यह अकेला एसा धंधा है जिसमें कोई योग्यता होना जरूरी नहीं है। बस दावपेंच आना चाहिए। अगर हम कोई हजारों का टीवी या फ्रिज खरीदते हैं तो दुकानदार गारंटी या वारंटी देता है पर मकान निर्माण करने वाला व्यवसायी कोई गारंटी नहीं देता। न इसका कोई कानूनी प्रावधान किया गया है। उपभोक्ता फोरम के अनेक चर्चित निर्णयों में कोई मकान से संबंधित नही होता।
              भारत में उदारीकरण की गति धीमी होने की शिकायत करने वाले उद्योगपति कभी यह मांग नहीं करते कि आम जनता के हितों की रक्षा के लिये उसे आजादी दी जाये। वह मकान बनाना चाहते हैं पर चाहते हैं कि उसके लिये सरकारी संस्थाायें अपनी ताकत से ज़मीन खरीद कर उनको दें। इतना ही नहीं वह कृषि भूमि को आवासीय स्थल में बदलने का कानून रद्द करने की बात भी नहीं करते जिससे निजी लोग स्वयं ही जमीन खरीद कर मकान बनाने लगें। अगर ऐसा हो गया तो इन धनपतियों को थोक में इतनी जमीन नहीं मिलेगी क्योंकि तब सामान्य लोग उसे खरीद चुके होंगे। मकान निर्माण में गारंटी का नियम लागू करने की भी यह मांग नहीं करते। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय धनपति नहीं चाहते कि धन का विकें्रदीयकरण हो क्योंकि उनके आने वाली पीढ़ियां राज्य नहीं कर पायेंगी।
           राजधानी दिल्ली में नोएडा उत्तरप्रदेश का ऐसा शहर है जो दिल्ली का ही हिस्सा लगता है। जिसे दिल्ली में जगह नहीं मिली वह नोएडा में मकान ढूंढ रहा है। तय बात है कि वहां मकानों के लिये कृषि भूमि ही आवासीय स्थल बन सकती है। जैसा कि आरोप लगाया है कि किसानों को कम मुआवजा देकर भूमि ली गयी और वहां महंगे आवास बनाये गये। अब अदालत के निर्णय के बाद औद्योगिक विकास के नाम पर कृषि भूमि को आवासीय स्थल में बदलने पर भी नये सिरे से विचार प्रारंभ हो गया है।
            किसानों को पैसा कम मिला पर उन्होंने लिया। उधर फ्लैट लेने वालों ने बिल्डर को पैसा दिया। अब अदालत के निर्णय से किसानों से जमीन अधिग्रहण रद्द हो गया है। चूंकि अभी निर्णय ऊंची अदालतों में जाना है इसलिये कहना कठिन है कि आगे क्या होगा पर इतना तय है कि इसमें धनपतियों को कोई हानि नहीं है। दरअसल फंसा तो वह निवेशक है जिसने फ्लैट के लिये पैसा दिया है। जिसने अपना पैसा दिया है वह सब्र कर सकता है पर जिसने कर्ज लेकर किश्त दी है उसके लिये भारी संकट बन सकता है। जिस तरह मकान के लिये बैंक कर्ज दे रहे हैं उसे लेने वालों की संख्या बढ़ गयी है। मध्यम वर्ग कर्ज लेने के लिये हमेशा तैयार रहता है।
जहां तक किसानों को जमीन वापस मिलने का सवाल है तो उसमें भी कठिनाई आयेगी। इसका कारण यह है कि अनेक किसानों ने टीवी चैनलों पर बताया कि वह पैसा लेकर खर्च कर चुके हैं इसलिये उसे वापस करने का संकट उनके सामने है। ऐसे में मुआवजे की रकम दिये बिना उनको जमीन वापस मिलना मुश्किल है। इसके अलावा जब उनकी भूमि पर खेती होती थी तो उसका सीमांकन अब कैसे दुबारा होगा। वहां तो अनेक तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। हैरानी की बात है कि अदालत में मामला होते हुए भी वहां निर्माण कार्य होने दिया गया। वैसे देखा जाये तो अदालतों के माननीय न्यायाधीश तो अपने सामने उपस्थित तथ्यों को देखते ही फैसला देते हैं इसलिये उनके निर्णय का समर्थन करना चाहिए। ऐसा लगता है कि भवन निर्माताओं को अपने पक्ष में फैसला होने का कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास रहा होगा। न्यायालय के निर्णय से उनका यह भ्रम टूट गया होगा कि पैसे और ताकत से कुछ भी किया जा सकता है। सुनने में आया है कि अब विनिवेशक भी न्यायालय में जा रहे हैं। अभी तक मामला किसानों की जमीन और उनके अधिग्रहण तक ही सीमित था और न्यायालयों के सामने इसी संदर्भ में तथ्य प्रस्तुत किये गये होंगे तो निर्णय इसी तरह आना था। अब विनिवेशक भी एक पक्ष बन रहे हैं तो न्यायालयों में उनकी बात भी सुनी जायेगी। इस मामले के आगे बढ़ने की संभावना है।
             आगे जो निर्णय होंगे वह तो एक अलग बात है पर मुख्य बात यह है कि एक तरफ बड़े धनपति अपनी ताकत के दमपर चाहे जो हासिल कर लेते हैं पर सामान्य आदमी के लिये हर चीज प्राप्त करना कठिन इसलिये बना दिया गया है ताकि वह मजबूरों की भीड़ का हिस्सा बन रहे। इससे वह भारतीय धनपतियों को अपने उत्पादों, भवनों और अन्य सुविधाओं के लिये प्रयोक्ता के रूप में मिलता रहे। इसलिये धनपति चाहते हैं कि राज्य का समाज पर कठोर नियंत्रण रहे और उस पर तो उनका निंयत्रण अंग्रेजों के समय था और अब भी है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

Jul 12, 2011

हम मुस्करा दिये-हिन्दी कविता (ham muskra diye-hindi kavita)

उसने कहा
‘हम जमाने को बदल देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘हम हर इंसान को खुश कर देंगे।’
हम मुस्करा दिये।
उसने कहा
‘बस, एक बार पद पर बैठ जाने दो
हम अपनी ताकत दिखा देंगे।’
हम मुस्करा दिये।

बोलने में ताकत कहां लगती है
मगर जब करने की ताकत आती है
तो फिर दिखाता कौन कहां है
पद में मदांध आदमी
एक शब्द बोलने पर भी
कत्ल कर सकता है
इस ख्याल ने डरा दिया
बस, हम यूं ही मुस्करा दिये।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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आओ खूबसूरत चरित्रों की फिक्र करें-दीपकबापूवाणी (Aao Khubsurat charitron ki Fikra kahen-DeepakBapuwani)

जिससे डरे वही तन्हाई साथ चली , प्रेंमरहित मिली दिल की हर गली। ‘ दीपकबापू ’ हम तो चिंगारी लाते रहे अंधेरापसंदों को नह...